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मैं बाबुल की परछाई

भूमिका

यह दुनिया नवाचारियों और सृजकों की है और ऐसे लोग मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक बन जाते हैं। प्रस्तुत विवरण भी एक ऐसी प्रतिभा की पहल और उनकी पहल से विविध रूपों में जुड़ गए सैकड़ों लोगों का है। यह सिलसिला अभी रुका नहीं है। आइए देखिए इस उदाहरण मैं बाबुल की परछाई का विवरण।

विवरण

पत्र समीक्षा 

1- पुस्तक का नाम-मैं बाबुल की परछाई।

2- सम्पादक-डा. सूरज सिंह नेगी, डा. मीना सिरोला और श्री चन्द्र मोहन उपाध्याय।

3- आर्थिक सहयोग-श्रीमती विमला नागला, केकड़ी।

4- समर्पण- स्व. श्री श्यामसुन्दर नागला

5- पत्र समीक्षक-शिवराज जी कुर्मी, टोडारायसिंह

6- अनुभूतियों का सागर-श्रीमती आशा शर्मा, अंशु जयपुर

7- भूमिका- श्री चन्द्र मोहन उपाध्याय, मालपुरा

8- मेरी बात मेरी पाती- डा. सूरज सिंह नेगी साहब

9- कुल पत्र - 103 

10- पृष्ठ कवर- मनमोहक आसमानी रंग, पृथ्वी एवं नीचे एक बेटी अपने पिताश्री की अंगुली थामे।

पत्र लेखक, पत्र क्रमांक-37

डा. नीना छिब्बर, जोधपुर 

'मैं बाबुल की परछाई' पुस्तक में बेटियों के पत्र समाहित हैं। विलुप्त होती पत्र विधा को प्रत्येक साहित्यकार ने जागरूकता का कार्य किया है। सभी पत्र युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी साबित होंगे। पाती मुहिम जिस मुकाम पर खड़ी है उसमें बेटियों का स्नेह एवं सहयोग रहा है।

आदरणीय नीना छिब्बर, जोधपुर ने अपने पिताश्री को पत्र लिखा है। पिताश्री द्वारा दिए संस्कार बेटी में देखने को मिलते हैं। बेटी गुणों की खान है। पिताश्री की शेरनी। चोट लगने पर पिताश्री ने स्वयं बेटी के हाथ से आंसू पोंछने के लिए कहा ताकि बेटी  संवेदनशीलता से आत्मविश्वास की ओर बढ़ सके। बेटी को पिता का घर छोड़कर नये घर के संस्कारों को आत्मसात करना होगा।

बेटी पिताश्री से ज्यादा ही सवाल करती थी। खुला आसमान तो मिला है पर पापा, डोर हमेशा दूसरों के हाथ क्यों होती है।  बड़ी बेटी गौरैया चिरैया अपने माता पिता की गोद में दुबकने को तरसती है। बेटी जब मायके आई तो माँ से खूब बक-बक करती थी, लेकिन पिताश्री को सामने पाकर ना जाने क्यों शब्द गूंगे हो जाते हैं। बेटी छिब्बर शेरनी बनकर मन के भावों को पत्र में लिख रही है। बेटी और पिता एक दूसरे की परछाई हैं।

पिताश्री का लाड, स्नेह खूब मिला जिससे बेटी लाडो के नाम से जानी जाती है, लेकिन पिताश्री कहते हैं कि बेटी छिब्बर तू ज्यादा बोलती ह आज भी आ, नीना छिब्बर जी ज्यादा बोलकर भी अपनी बात निर्भीक होकर कहती है। आत्मविश्वास भरा पड़ा है। दूसरों के लिए परोपकारी बनी है। शेरनी युवाओं के लिए पथ प्रदर्शक बन रही है। पिताश्री जैसे वटवृक्ष की छाया में बैठी सोनपरी।

सूचना स्रोत

शिवराज जी कुर्मी

प्रस्तुति

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