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कर्नल मान सिंह जी के जन्मदिवस (१४ अक्टूबर) पर विशेष प्रस्तुति

'वीर गुर्जर' पत्रिका के व्यवस्थापक श्रद्धेय यतेंद्र कुमार वर्मा जी के मुख से जब कर्नल मान सिंह जी के निधन का शोक समाचार सुना तो कुछ क्षण के लिये कानों की श्रवण शक्ति अशक्त सी हो गई । मन को विश्वास ही नहीं हुआ। 'नेताजी जीवित हैं' इस पर तो पूर्ण विश्वास है। नेता जी के परम प्रिय विश्वासपात्र कर्नल मान सिंह जीवित नहीं रहे? इस पर कैसे विश्वास किया जाय? पुनः व्यवस्थापक जी से प्रश्न किया और वर्मा जी की नम आखों ने स्पष्ट साक्षी दे दी कि कर्नल मान सिंह जी अब इस ससार में नहीं रहे। एक अभूतपूर्व व्यथा के आभास ने मन-मस्तिष्क को व्यथित कर दिया। नेता जी के समान ही इतिहास द्वारा उपेक्षित वह महान पुरुष इस संसार से इतना शीघ्र क्यों विदा हो गया, समझ में नहीं आया। ऐसा लगता है कि 'महान' शब्द में उनकी महानता को अभिव्यक्ति करने की सामर्थ्य नहीं है। वे महान से भी महान थे। मानव से ऊपर विशिष्ट मानव के अनेक गुण उनमें विद्यमान थे । सम्भवतः इन्ही गुणों के आधार पर, सम्पर्क में आने वाले अनेक व्यक्ति उन्हें 'देवता' भी कहते थे । 'कर्नल मान सिंह' आदमी नही देवता हैं! अनेक महानुभावों के मुख से अनेक बार लेखक ने यह वाक्य सुना था। वस्तुतः उनका व्यवहार ही देवतुल्य था। मैं भी उनके सम्पर्क में काफी रहा, और उनके महान व्यक्तित्व व नेतृत्व से प्रभावित था।

जिला-अलवर, पोस्ट-खिजूरी और वास-टपूकड़ा राजस्थान में, कोली गोत्र के गुर्जरों का एक प्रसिद्ध गांव है। यह कोली दाहिमा क्षत्रिय हैं। कैप्टन मुखराम जी निवासी अलवर के घर १४ अक्टूबर १९१९ को इनका जन्म हुआ। राजऋषि कॉलेज, अलवर से इन्होंने इन्टरमीडिएट पास किया। खेलकूद, हॉकी में कॉलेज कलर, अलवर स्टेट कलर और राजस्थान कॉलेज कलर मिले।

१६ अप्रैल १९३८ ई० में ये आफिसर कैडिट के बतौर अलवर स्टेट फोर्सेज में भरती हुए। १६ मई १९४१ में  स्टेट से बदलकर इंडियन चार्ली में सैकिण्ड लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त हुए। करफल नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर से ए.आई.ए.एस.पी. ऑफिसर्स कोर्स और सागर में सिविल कोर्स और जबलपुर से एजुकेशनल कोर्स पास किये। हिन्दुस्तान से बाहर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा खड़ी की गई इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल हुए। उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी में निम्न पदों पर काम किया। कमांडर नम्बर

१. एम.टी. कंपनी व हिन्दुस्तान फील्ड फोर्सेज।

२. ऐडजूटेन्ट एंड चीफ इंस्ट्रक्टर मैप रीडिंग एंड स्टाफ ड्यूटीज आफिसर्स स्कूल।

३. चीफ ऑफ मिलटरी पुलिस एंड सीक्रेट सर्विस सुप्रीम फोर्सेज। 

४. कमांडर सैकिण्ड बटालियन फर्स्ट इन्फेंटरी रेजिमेंट।

बर्मा के जंगलों में अंग्रेजों के साथ भयंकर संग्राम में ब्रिगेड कमांडर के पकड़े जाने तथा डिव कमान्डर शाहनवाज के इरावदी नदी के पार कहीं जंगल में छिप जाने पर ब्रिगेड हेडक्वार्टर के पास इन्होंने अपना मोर्चा जमाकर शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे और नेताजी के 'जय हिंद' के नारे के साथ कोहिमा के निकट मोराई से लेकर पलेल तक के डेढ़  हजार वर्ग मील क्षेत्र पर नियंत्रण करके आजाद हिंद फौज का विजयी भारतीय तिरंगा पहली बार फहराया था। जन. ग्रोसी, जो विभाजन के बाद पाकिस्तानी सेनाओं के सी.एन.सी. बने, कर्नल मान सिंह के इस हौसले को देखकर हैरान रह गये थे तथा उनके नेतृत्व की सर्वत्र सराहना की थी।

आजाद हिन्द सरकार के गठन के समय दूरदर्शी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने स्वतन्त्र भारत के विकास में भारत की नव पीढ़ी (किशोरों) की  शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देकर उनके शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक तथा प्रशासनिक प्रशिक्षण हेतु, प्रत्येक दृष्टि से उनके पूर्ण विकास के लिये 'बाल सेना' का गठन किया। इस बाल सेना के सम्पूर्ण प्रशिक्षण का दायित्व नेताजी ने अपने परम विश्वासपात्र कर्नल मान सिंह जी को सौंपा। उन्हें ही 'बाल सेना का' प्रभारी (इंचार्ज) नियुक्त किया। यह नये भारत की आधारशिला थी जिसकी नींव का पहला पत्थर कर्नल मान  सिंह जी ही थे।

दुर्भाग्यवश नेताजी के स्वप्नों के स्वतन्त्र भारत का स्वप्न साकार होने से पूर्व ही अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराये जाने तथा जापानी सेनाओं द्वारा बिना शर्त समर्पण करने पर आजाद हिन्द सेना को भी पराजय का सामना करना पड़ा तथा युद्ध बन्दियों एवं युद्ध अपराधियों की सूची में नेताजी के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने कर्नल मान सिंह जी का भी नाम रक्खा। नेताजी के अज्ञातवास को प्रस्थान करने पर अन्य युद्धबन्दी अधिकारियों के साथ इन्हें भी दिल्ली के लाल किले में बन्दी बनाकर रखा गया। जून १९४५ ई. में वे भारत वापस आये और उन पर विद्रोही युद्ध अपराधी होने का अभियोग लगाकर मुकदमा चलाया गया। आजाद हिन्द फौज के जनरल जे के भोंसले के साथ १ मई १९४६ को इन्हें मुक्त किया गया।  इसके बाद आप ऑनरेरी रिक्रूटिंग ऑफिसर अलवर तथा टपकूड़ा की ९६ गांवों की पंचायत के अध्यक्ष और अलवर जिले के डिस्ट्रिक्ट सेशन्स जज (जजेस कोर्ट) के अफसर बने ।

स्वतन्त्र भारत की पहली सरकार में आजाद हिन्द फौज के जनरल जे० के० भोंसले पुनर्वास मंत्रालय में उपमन्त्री बनाये गये । उनके समक्ष विभाजन के फलस्वरूप शरणार्थी बालकों के पुनर्वास की विकट समस्या थी। अनाथ बालकों में हताशा एवं निराशा व्याप्त थी। ऐसी विकट परिस्थिति में जनरल भोंसले ने कर्नल मान सिंह जी को स्मरण किया तथा दिल्ली बुलाकर उनसे इस समस्या पर विचार विमर्श किया। कर्नल साहब के मस्तिष्क में पूज्य नेताजी द्वारा निर्मित नए भारत का निर्माण, जो नई पीढ़ी के माध्यम से करना चाहते थे, जिसकी रूपरेखा उन्होंने बर्मा के जंगलों में बनाई थी। नेताजी ने अपनी इस योजना का प्रारूप अपने परम विश्वासपात्र कर्नल मान सिंह को सबसे पहले बतलाया था जिसे सुनकर कर्नल साहब ने स्वतन्त्र भारत में इस स्वप्न को साकार करने की परिकल्पना की थी। जन० भोंसले कर्नल मान सिंह के परामर्श पर इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि नेताजी की उसी योजना को क्रियात्मक रूप दिया जाय। जन० भोंसले नेहरू जी की सरकार में उपमन्त्री थे। अतः उन्होंने अपने मन्त्रालय (पुनर्वास) के अधीन शरणार्थी बालकों के प्रशिक्षण का  दायित्व कर्नल मान सिंह को सौंपा। कर्नल मान सिंह जी ने उन बालकों के प्रशिक्षण हेतु ने आजाद हिन्द फौज के कर्मठ अधिकारियों एवं सैनिकों को प्रशिक्षक (इन्सट्रक्टर) के रूप में भर्ती किया तथा राष्ट्रीय अनुशासन योजना की योजना का श्रीगणेश किया। प्रशिक्षण का कार्य सबसे पहले दिल्ली के शरणार्थी शिविरों के अनाथ बच्चों के लिए प्रारम्भ किया गया। 'राष्ट्रीय अनुशासन योजना' के अन्तर्गत केवल तीन मास के अल्पकालिक प्रशिक्षण द्वारा उन निःसहाय, निराश एवं हताश बालकों के मुख पर एक नई आशा एवं साहस स्पष्ट झलकने लगा। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा के समन्वित प्रशिक्षण से इस योजना से बालकों में चमत्कारिक परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे। प० नेहरू एवं तत्कालीन शिक्षा मन्त्री मौलाना आजाद ने जब ये सब कुछ स्वय अपनी आंखों से देखा तो वे इस योजना से इतने प्रभावित हुए कि दिल्ली के हायर सेकेन्ड्री स्तर तक के समस्त विद्यालयों के छात्रों के लिये इस योजना का प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया। देश-विदेश के नेताओं ने जब इस भेजना के अंतर्गत प्रशिक्षित छात्रों के क्रियाकलापों का अवलोकन किया तथा भारत के भावी नागरिकों पर उसके प्रभाव को देखा तो सभी इससे अत्यन्त प्रभावित हुए। सन १६६२ ई० में सम्पूर्ण भारत के हायर सेकंडरी विद्यालयों में राष्ट्रीय अनुशासन योजना का प्रशिक्षण शिक्षा का अनिवार्य अंग बना दिया गया तथा शिक्षा मन्त्रालय के अधीन यह एक विशिष्ट योजना के रूप में स्वीकार कर ली गई। जन० भोंसले इस योजना के महानिदेशक बने। प्रशिक्षण के संचालन का भार  कर्नल मान सिंह जी ही संभालते रहे।

प्रशिक्षकों (इंस्ट्रक्टर्स) को प्रशिक्षण एव प्रशिक्षण केन्द्र की विकट समस्या सरकार के सामने आई। जन० भोंसले ने इन समस्याओं के सबन्ध में पुनः कर्नल साहब से विचार विमर्श किया। कर्नल साहब ने गम्भीरतापूर्वक विचार करके जयपुर नरेश के उपेक्षित 'सरिस्का पैलेस' को प्रशिक्षण केन्द्र बनाने का परामर्श जन० जे० के० भोंसले को दिया। यह चार मंजिल का भव्य महल अलवर से २३ मील आगे जयपुर जाने वाले राजपथ पर स्थित है जिसे कभी महाराजा जयपुर ने अपने शिकार के शौक के लिये निर्मित कराया था। यह वैभवशाली विशाल महल चारों ओर से विस्तृत दोहरी चारदीवारी से घिरा है जिसके चारों ओर अरावली पर्वत की एक श्रेणी लगभग १०० वर्ग मील का सुरम्य प्राकृतिक घेरा बनाती है जिसे पशु-पक्षी विहारस्थल (बर्डस सैंक्चुअरी) कहा जाता है। शेर और चीतों से लेकर साधारण खरगोश तथा मोर से लेकर साधारण गोरैया तक सभी प्रकार के पशु - पक्षी एवं वन्यजीव जन्तु इसमें स्वछन्द विचरण करते हैं। यह भव्य भवन अंग्रेजी शासनकाल में अपने उत्तराधिकारियों की फांसी के बाद से पूर्ण उपेक्षित रहने के कारण विशाल जंगली वृक्षों से आवृत्त होकर अदृश्य सा हो गया था और वन ही वन नजर आता था। कर्नल साहब के प्रयास एवं परामर्श पर इसी महल को 'राष्ट्रीय अनुशासन योजना' के केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्था के रूप में प्राप्त किया गया। जन० जे० के० भोंसले ने इस प्रशिक्षण संस्था का प्रथम कमान्डेन्ट 'कर्नल मान सिंह जी' को ही नियुक्त किया। वनाच्छादित इस महल का जिस परिश्रम, साहस एवं शौर्य से कर्नल साहब ने एन०डी०एस० से सेन्ट्रल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के रूप में जिस प्रकार पुनः उद्धार कराया उसका अन्यत्र उदाहरण दुर्लभ है। रात-दिन प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षकों को प्रेरणा देकर उन विशालकाय दैत्याकार वृक्षों को काटकर साफ कराया। प्रशिक्षार्थियों के साथ कर्नल साहब वृक्ष काटते थे। हाथों में बुरी तरह छाले पड़ जाने के कारण मूल त्वचा का परिवर्तन उसके घोर परिश्रम का ज्वलन्त प्रमाण था। इनकी लगन एक परिश्रम के परिणामस्वरूप विश्व ख्याति प्राप्त जन० करिअप्पा, थिमैया एवं थापर और चीन के तत्कालीन प्रधानमन्त्री चाऊ एन लाई तथा जर्मनी के थीलो बोड ने इस योजना के क्रियाकलापों को देखकर इसे भारत की अद्वितीय योजना कहकर सराहा था। चाऊ एन लाइ ने तो अपने देश के लिये इस योजना के प्रशिक्षकों की मांग तक भी की थी। कर्नल साहब के सम्पर्क में रहने वाले उनके द्वारा प्रशिक्षित प्रशिक्षकों का कथन है कि कर्नल साहब ने भारत के नवनिर्माण हेतु इस योजना के माध्यम से नेताजी के स्वप्नों का भारत बनाने के लिये अपने जीवन को ही समर्पित कर दिया था। केन्द्रीय सरकार की सेवा में होते हुए भी प्रशिक्षकों को कई मास तक का वेतन तथा इस प्रशिक्षण संस्था का किराया भी अपने पसीने की नेक कमाई से ही प्रदान किया था।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही इस देश का यह है कि स्वतन्त्रता के ३२ वर्ष (तत्कालीन) बीत जाने पर भी यहां सही इन्सान एवं इन्सान के सही कामों का मूल्यांकन नहीं हुआ है। सही काम और सच्चे इन्सान की पहिचान यहां नहीं है। हीन भावना से ग्रस्त इतिहास के निर्माता सत्ताधारी राजनीतिज्ञों ने सभी सच्चे राष्ट्रभक्त बलिदानी वीरों के नाम को उपेक्षित करके भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास को चापलूस एवं चाटुकार इतिहासकारों से जिस प्रकार लिखवाया गया है वह उन बलिदानी वीरों एवं भावी पीढ़ी, तीनों के प्रति गद्दारी है। भारत की आजादी के सच्चे प्रणेता युग नेता नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम तक कालपात्र में नहीं, इस से बढ़कर कृतघ्नता और क्या हो सकती है?

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की भांति ही उनकी आजाद हिन्द फौज का यह महान योद्धा 'कर्नल मान सिह' भी स्वतन्त्र भारत में उपेक्षित रहा। इसके नाम एवं काम दोनों की उपेक्षा की गई। नेहरू जी के निर्देशन में कार्य करने वाले महानिदेशक जन० जे० के० भोंसले इस राष्ट्रीय अनुशासन योजना के माध्यम से 'नेताजी' के स्थान पर 'नेहरू जी' के सपनों को साकार करते की दुहाई देने लगे। नेताजी के परम् विश्वासपात्र कर्नल मान सिंह जी ने यह पक्षपात स्वीकार नहीं किया। नेताजी की इस योजना को वे नेहरू जी को योजना कहने पर सहमत नहीं हुए। मतभेद बढ़े। जन० भोंसले ने पदोन्नति रोक दी। कमान्डेंट के पद पर एक अन्य सज्जन को नियुक्ति करके कर्नल मान सिंह जी को जयपुर में सीनियर सुपरवाइजर के पद पर स्थानान्तरित कर दिया।

  'देश की सेवा करने का अवसर, जिस रूप में भी मिलेगा, करेंगे'। 

इसी सिद्धांत को मानकर आप सेवारत रहे। इनके द्वारा साधारण प्रशिक्षक (एन०डी०एम०आई०) के रूप में चयन की गई नेहरू परिवार से सम्बधित एक अति सुन्दर एवं स्वस्थ सुकुमारी का बूढ़े जनरल ने सेंट्रल रीजन (यू०पी०, दिल्ली तथा राजस्थान) के डायरेक्टर पर पदोन्नत किया तथा इन्हीं भाग्यशाली महिला के सगे भाई को केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान  सरिस्का में कमान्डेन्ट के पद पर सीधी भर्ती करके लाया गया । एन०डी०एस० के इतिहास में जन० भोंसले योजना के जनक बन गये। नेताजी के स्थान पर नेहरूजी का नाम इस योजना में प्रारम्भ हो गया। नेताजी के सपनों के भारत के निर्माण का मार्ग पुनः अवरुद्ध हो गया । सन् १९६३ ई० में इस योजना के तथाकथित जनक जन० जे० के० भोंसले सदा-सदा के लिये सुख की नींद सो गये और एक ही वर्ष पश्चात २७ मई सन् १९६४ ई० को नेहरू जी भी स्वर्गवासी हो गये। फलतः योजना यतीम बन गई। पालन-पोषण सर- कार के हाथ की बात हो गई। सरकार क्या जाने कर्नल मान सिंह जी को? मान सिंह जी स्वयं क्यों और कैसे अवगत करायें सरकार को? योजना से सम्बन्धित सभी अधिकारी मौन। कौन सम्भाले? नेहरू जी के निकट सम्बन्धी मेजर जन० ए० एस० पठानिया को महानिर्देशक के पद पर नियुक्त किया गया जिन्हें इस योजना से एलर्जी थी। वे तो एन०सी०सी० को ही जानते थे। अपने कार्यकाल में इसे तोड़मरोड़ कर इसके नाम तथा काम सब बदल डाले और कुछ दिन बाद स्वयं भी बदल गये, किसी अन्य विभाग में चले गये और उनके पश्चात जो महानुभाव आए उन्होंने सुनियोजित ढंग से तत्कालीन सरकार के संकेत पर धीरे-धीरे सन् १९७५ ई० तक इसे समाप्तप्राय: कर दिया तथा उच्चाधिकारियों को 'राष्ट्रीय सेवा योजना' नामक एक नए संगठन में ले लिया। एन० डी० एस० के उच्चाधिकारी होने के नाते कर्नल मान सिंह जी भी इस नये संगठन में 'अवर युवा अधिकारी' बनाए गए।

कर्नल मान सिंह जी ने मौन रहकर सब कुछ अपनी आंखों से देखा। नेता जी एवं उनके कार्यों के प्रति उनके हृदय में जो अनुराग था वैसा अन्यत्र देखने को नहीं मिला। वे नेता जी को ही अपना आदर्श मान कर चलते थे। उनका कहना था कि जब तक नेता जी का स्वप्न साकार नहीं होता तब तक भारत, भारत नहीं बन सकता। अपने द्वारा प्रशिक्षित अनेक प्रशिक्षकों को उन्होंने नेताजी के सपनों में भारत के सम्बन्ध में अधोलिखित उद्धरण लिखवाकर इसे कंठस्थ करने एवं स्वयं को उसे साकार करने के सक्षम बनने की प्रेरणा दी थीः-

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" 

मेरी यह मांग मेरे दशवासियों ने मानी है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि भारतवासी मर्यादा के लिये मर मिटना नहीं भूले हैं : अनुशासनहीनता, सामाजिक विभिन्नता तथा साम्प्रदायिकता की नींव भारत में विदे- शियों ने डाली है। आजादी तो अब निश्चित है। मैं ऐसे आजाद हिन्दुस्तान का स्वप्न देख रहा हूं जिसमें अनुशासनहीनता, सामाजिक विभिन्नता तथा सम्प्रदायिकता का नाम न हो। गद्दार भी दुश्मनों के साथ ही देश से कूच कर जाएं। प्रत्येक हिन्दुस्तानी आजादी की रक्षा एवं राष्ट्र की समृद्धि के लिए एक क्षण का भी मूल्य समझे। भावी भारतीयों की चाल में एक शान हो, आंखों में गुरूर हो, गर्व से सीना तना रहे, 'भारत मां की जय' उनका नारा हो, 'जय हिन्द' उनका अभिवादन हो, वे ऐसी गति अपनाएं जो विश्व के दूसरे देशवासी उनके साथ न लग सकें। दुनिया देखते ही कह सके कि यह आजाद हिन्दुस्तान है हमें आगे बढ़ना है और आगे..."। इसी स्वप्न की साकारता का माध्यम उन्होंने अपनी योजना को माना था। उन्हीं के शब्दों में :- 

"नेताजी की फौज में युवकों के साथ युवतियों की 'रानी  झांसी रेजीमेंट' तथा बालकों की 'बाल सेना' भी थी। बाल सेना पर मुझे सबसे अधिक गर्व था। प्रत्येक बालक के चेहरे पर एक विशेष तेज नई चेतना, अदम्य साहस एवं धैर्य दिखलाई देता था। मैंने कभी उन्हें गुलाम देश के बालक नहीं समझा। मैं उन्हीं दिनों स्वप्न संजोया करता था कि कब वह दिन आयेगा जब कि मेरे देश का प्रत्येक बच्चा इस 'बाल सेना' के बच्चों के समान समुचित शिक्षा से दीक्षित होकर अपने राष्ट्र की बागडोर संभालने की क्षमता प्राप्त करेगा। आज में उसी स्वप्न की साकारता का माध्यम इस योजना को मान रहा हूं।"

गुर्जर जाति के गौरव, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के परम् विश्वासपात्र, भारत मां के सपूत महान देशभक्त कर्नल मान सिंह आज इस संसार में नहीं रहे। उनकी रिक्तता का कोई पूरक नहीं है। सरकार के कानों तक यदि यह आवाज पहुंच सके तो बस एक ही निवेदन है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी को इस राष्ट्र का आदर्श मानकर, कर्नल मान सिंह द्वारा प्रणीत उनकी 'राष्ट्रीय अनुशासन योजना' को मूल रूप में पुनर्जीवित करके सम्पूर्ण राष्ट्र की नव पीढ़ी के सही प्रशिक्षण की व्यवस्था करें जिससे नेताजी के नव भारत के निर्माण का स्वप्न साकार हो सके। इन्हीं शब्दों के साथ नेताजी के परम् विश्वासपात्र एवं महान देशभक्त कर्नल मान सिंह जी को हार्दिक स्मरणांजलि समर्पित करता हूँ।

लेखक

डॉक्टर देशराज सिंह

प्रस्तुति





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