भूमिका
शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें हर दिन कुछ नया सीखने और सिखाने का अवसर होता है। एक शिक्षक अपनी शिक्षण विधियों में नवाचार लाकर छात्रों की शिक्षा को और भी प्रभावी बना सकता है। आज के युग में, डिजिटल उपकरणों का उपयोग, क्रियात्मक शिक्षण, और व्यक्तिगत शिक्षा योजनाओं का निर्माण हमारे शिक्षण में नई क्रांति ला सकते हैं। कक्षाओं में इंटरएक्टिव ऐप्स, ऑनलाइन क्विज़, और वीडियो ट्यूटोरियल्स का उपयोग करके शिक्षा को अधिक रोचक और आकर्षक बनाया जा सकता है। छात्रों को कुशल शैक्षणिक माहौल में विभिन्न प्रोजेक्ट्स और असाइनमेंट्स के माध्यम से व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह उनके रचनात्मक और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करता है।
ध्यान रहे हर छात्र की सीखने की क्षमता अलग होती है। इसलिए, व्यक्तिगत शिक्षा योजनाओं के माध्यम से छात्रों को उनकी ज़रूरतों के अनुसार सिखाने की कोशिश करना एक उत्तम प्रयास होगा। नवाचारों को शिक्षण में शामिल करके, छात्रों के लिए एक बेहतर और प्रेरणादायक शिक्षा का माहौल तैयार किया जा सकता है। आइए एक समाजशास्त्र के विशेषज्ञ डॉक्टर राकेश राणा के आलेख से इस सबको समझने का प्रयास कीजिए।
"शिक्षकः नया दौर नया दायित्व"
डॉ. राकेश राणा
प्रकृति के अपने दो ही मौलिक संसाधन हैं-समय और स्थान, जिन पर सवार होकर वह प्रगति का आख्यान आहूत करती है। पहचान का प्रतिबिम्ब बनाने में भी यही सामग्री काम आती है। हर दौर हर क्षेत्र की दिक्कतों और दिव्यताओं को अपने ऊपर उकेरकर अतीत होने को अभिशप्त है। परन्तु हर दौर पर समय की गहरी छाप अंकित हो ही जाती है। जिसमें छिपे होते हैं महान नायकों के नवाचार और बहुसंख्यक सामान्यजनों के जीवन की दैनंदिन जुगालियां। किसी भी समाज के इन महान नायकों में नाम दर्ज है शिक्षक का, जो अपने समय की चुनौतियों और अवसरों का आह्वान करता है। समाज की हर नयी पीढ़ी को भावी योद्वाओं की तरह तैयार करता है। जो रचते है उस समय पर अपनी शिनाख्त और उकेरते है उस जगह पर अपनी सभ्यता के संदेश। इसी दायित्व को धारण कर उतरता है एक शिक्षक समाज-निर्माण के रणक्षेत्र में। इस दृष्टि से नई सदी के नए अवसरों और चुनौतियों का चुनाव उन प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर करना होगा जो हमारी मानवता के भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने में संलग्न है। जिस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिन्न जिन्नात की शक्ल में जमता जा रहा है। सम्पूर्ण मानव जीवन पर टैक्नोलॉजी का शिकंजा कसता जा रहा है। उससे मानवीय मौलिकताएं मरणासन्न हो रही हैं। मानवीय मूल्यों का तिरोहन सब तरफ हम सबके सामने है। ऐसे में एक सजग समाज का निर्माण शिक्षा की प्राथमिकता कैसे बने? नयी आधुनिकताएं जिन नयी नैतिकताओं पर टिकेंगी उनका प्रवाह शिक्षा के जरिए समाज में कैसे सम्प्रेषित हो? यह दुरुह दायित्व शिक्षक के सिवा कौन निभा पायेगा। अब गंभीर प्रश्न यही उठता है कि -
यह नया शिक्षक कैसा हो? वह इस नयी भूमिका का निर्वाह कैसे करे? शिक्षा की प्राथमिकताएं क्या हों? और वह कौन-सा परिवेश है जिसमें शिक्षा बदल रही है?
शिक्षा के बदलते परिवेश में नए शिक्षक की नई भूमिकाएं कौन सी हैं? इक्कीसवीं सदी में शिक्षक, शिक्षा और शिक्षण संस्थाएं सब के सब आमूलचूल बदलावों की तरफ बढ़ रहे हैं। प्राथमिकताओं का प्रण करना इतना सरल नहीं है। समाज की अपनी जरूरतें हैं तो राजनीति के अपने अलग तकाजे हैं और बाजार तो खनन के ख्याल से बाहर कभी सोचता ही नहीं। ऐसे में सार्वभौमिकताओं को सहेजने वाली मानवता का दिग्दर्शन नयी शैक्षिक संस्कृति में कैसे उभरे? यह एक उद्यम भरा दायित्व है जो नए शिक्षक के कंधों पर आन पड़ा है।
इस दृष्टि से विश्व एकीकरण और सामाजिक विखंड़न को रोकने का जो महत्वपूर्ण दायित्व शिक्षक की नयी भूमिका से जुड़ चुका है। नई पीढ़ी के चरित्र और मानस निर्माण में अग्रणी भूमिका से जुड़ा है। इसके लिए शिक्षक को उच्च लक्ष्यों का वरण और निर्धारण स्वयं करना होगा। उसे नवाचार का नायक बनना होगा। क्योंकि बचपन में रोपे गए नैतिक मूल्य ही व्यक्तित्व निर्माण का आधार बनते हैं जिनका महत्व जीवन भर बना रहता है। यही एक शिक्षक का राष्ट्रीय दायित्व है और उसकी वैश्विक सामाजिक भूमिका भी। एक अच्छे शिक्षक को अपनी इसी भूमिका में संतोषप्रद जीवन जीते हुए भावी पीढिय़ों का निर्माण करना होता हैं। शिक्षक राष्ट्र-निर्माता के दायित्वों और जिम्मेदारियों से भी आगे बढ़कर, जब अपने स्नेह और प्रेम के दायरों का विस्तार करता है तो समाज में उसके विराट व्यक्तित्व से जो आलोक फैलता है वह उसकी रचनाधर्मिता को आधार उपलब्ध कराता है। तभी एक शिक्षक अपनी सर्वांगीण शक्तियों के साथ नवाचारों का उद्यम कर पाता है। नये सिरे से समाज और राष्टृ को गढ़ने का काम करता है। नवाचार के नायक के रूप में यही वह भूमिका है जो शिक्षक को राष्ट्र-प्रहरी के साथ साथ राष्टृ-शिल्पी भी बनाती है और समाज में उसके प्रति अगाध आस्था के साथ श्रद्धा का विस्तार करती है।
भारतीय इतिहास अनगिनत घटनाओं का साक्षी है जहां सफलताएं गुरु-शिष्य परम्परा के अनवरत प्रवाह से उपजती रही हैं। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों की एक ही कसौटी है वह है एक शिक्षक की नवाचारी दृष्टि। शिक्षा की चाहे कोई भी प्रणाली हो, विशेषकर स्कूली शिक्षा व्यवस्था तो एक व्यावहारिक और व्यावसायिक दृष्टि से सम्पन्न, सक्षम, प्रज्ञ और प्रेरित तथा नवोत्साह से भरे शिक्षक व उसके सक्रिय सहयोग एवं उसकी सुनियोजित-समुचित मौजूदगी के बिना फल-फूल ही नहीं सकती। केवल शिक्षक ही ऐसे सभ्य-सुशिक्षित मानवीय बोध वाले बीज मानव मस्तिष्क में अंकुरित कर पाता है जिससे ‘विविधता में एकता’ के बहुलता आधारित समावेशी समाज का निर्माण हो सके। एक सजग और सामाजिक दृष्टि से सम्पन्न शिक्षक की उपस्थिति से ही स्कूल सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक व धार्मिक सद्भाव तथा नए मूल्यों के निर्माण-केंद्र बन जाते हैं। आज शिक्षा में ऐसी पद्धति को अपनाने की प्रबल परवाह है जिसके नए और युवा शिक्षक अधिक अनुभवी एवं ज्ञानवान शिक्षकों के साथ गहन संवाद जारी रख सकें। नये और पुराने के बीच सेतु स्थापित कर नेतृत्व कर सकें। परम्परा को नवाचारों की चाशनी में पकाकर नये स्वाद और संवाद के साथ नयी पीढ़ी में सम्प्रेषित कर सकें।
विश्व समाज की वर्तमान पीढ़ी इतिहास के ऐसे मोड़ पर है जिसके लिए भावी शिक्षक और शिक्षा दोनों का दायित्व बढ़ गया है। शिक्षा हर व्यक्ति के लिए आशा की एकमात्र किरण है। विशेष रूप से ऐसे समुदायों के लिए तो, जो घोर गरीबी, अभावों, अन्यायों और अनेक सामाजिक-आर्थिक उपेक्षाओं से उभरने के लिए लालायित हों। इस सामाजिक दायित्व को नवाचार और नेतृत्व की जिजीविषा से भरा शिक्षक ही पूरा कर सकता है। वही नवाचारों के साथ गुणवत्ता को गाढ़ा बना सकता है। गुणवत्ता सतत, समान और स्थायी विशेषताओं की वाहक होती है। व्यापक अर्थों में अच्छी गुणवत्ता अनिवार्यतः एक समान बनी रहती है। लेकिन इसके परिणाम समय की मांग के साथ बदलते रहते हैं। सामाजिक-आर्थिक दबावों व बाजार की आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप ऐसा होता है। किसी भी समाज में शिक्षा की विषयवस्तु और प्रक्रिया तभी तक प्रासंगिक बनी रहती है जब तक वह मानव व्यवहार और क्रियाशीलता के प्रत्येक क्षेत्र की आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर खरी उतरती है।
दुनिया भर के अनुभवों से अब धीरे-धीरे यह साफ होने लगा है कि सारे तकनीकी परिवर्तनों के बावजूद भी ऑनलाइन-ऑफलाइन शिक्षण विधियों-प्रविधियों में प्रमुख भूमिका शिक्षक की ही है। शिक्षक ही वह केन्द्र है जिस पर पूरी शिक्षा व्यवस्था का दारोमदार है। ऐसे शिक्षकों का कोई भविष्य नहीं होगा, जो नए ज्ञान और नए कौशल प्राप्त करने की दिशा में प्रयासरत न हो। तकनीक की गति इतनी तीव्र है कि मानवीय क्रियाओं को सीधी चुनौती मिल रही है। इसीलिए इस बहस के बलवती होने की गुंजाइशें बढ़ी हुई हैं कि गूगल बड़ा या गुरु।। कल के शिक्षक अपने विद्यार्थियों से तभी मान-सम्मान पा सकेंगे जब वे इस सच्चाई के प्रति सजग रहें कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल जीवन भर उनके लिए उपयोगी नहीं हो सकता। शिक्षकों को समयानुसार परिवर्तित विषयवस्तु के प्रति सचेत बन नवोन्मेषी रहना होगा। अपने अध्ययन-अध्यापन में नवीन तथ्यों और सूचनाओं का समावेशन निरन्तर करते रहना होगा। नए आविष्कारों, अनुसंधानों और नवाचारों को प्रासंगिकता और उपादेयता के साथ अपने सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए रखना होगा। भावी शिक्षक को इस दिशा में भी सचेत रहना होगा कि सूचना-संचार प्रौद्योगिकी में नई खोजें नयी पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। इन नवाचारों से उत्पन्न नवोत्साह में कितनी सफलता और प्रवीणता के साथ नवोन्मेष बनानें में एक शिक्षक अग्रणी भूमिका निभा पाता है। भविष्य की शिक्षा शिक्षक और शिक्षार्थी से लोकतांत्रिक व्यवहार, तकनीकी दक्षता और विश्व-दृष्टि के साथ अंत:क्रियात्मक विचार-विमर्श वाली 'द्विपक्षीय-शिक्षण' पद्धति की शुभाकांक्षी है। यही सहभागी शिक्षण का वास्तविक स्वरूप होगा। एक अच्छे-सच्चे शिक्षक को विवेकपूर्ण कौशल पर नियंत्रण हासिल करना होता है। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के गरिमापूर्ण युग में मानवीय जीवन-मूल्यों को विश्व कल्याण के विवेक की कला एवं कौशल के साथ समाज में समाहित करना ही आज के शिक्षक का परम् प्राथमिक दायित्व है।
शिक्षा की सर्वव्यापकता का विस्तार समाज और राष्टृ के साथ-साथ विश्व को हमारे योगदानों से लाभान्वित करने वाला कैसे बने। हिंसा, आतंकवाद, बढ़ती गैर-बराबरी और पर्यावरणीय सरोकारों से जुड़े यक्ष प्रश्नों को शिक्षा और शिक्षक अपनी कार्यवाहियों में कैसे समोए। भारत ने अपनी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जिस तरह से मानविकी़, कला और विज्ञान का समन्वय कर नए ढंग के संयुग्मन बनाने का विजन सामने रखा है। वह नई सदी की नयी दुनिया के लिए इन्हीं तैयारियों का एक मुक्कमल विचार है। लिबरल आर्टस का पैटर्न शिक्षा में समानता के विचार को अधिक मजबूती के साथ व्यावहारिक धरातल पर उतारने का काम करेगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रतिबद्धता हमें दुनिया के साथ कंधें से कंधा मिलाकर चलने के अवसर मुहैया करायेगी। शिक्षा के जरिए पर्यावरण सरोकारों और कला के विभिन्न आयामों सहित खेल के अनेक क्षेत्रों को विशेष तरजीह के साथ जोड़ने की प्राथमिकता, मौजूदा वैश्विक जरूरतों से जूझने का एक कारगर तरीका है। शिक्षक की यह नयी भूमिका ही भारत को नए समाज और नयी संस्कृति के निर्माण की दिशा में ले जायेगी। नई नीति का नया नियोजन भारतीय ज्ञान परम्परा का आधुनिक शिक्षा से संवाद विश्व कल्याण के लिए एक अहिंसक आह्वान है। जिसमें स्थानीयता को विशेष तरजीह देना भारतीय समाज और संस्कृति के उन सनातन मूल्यों-मान्यताओं के संरक्षण व संवर्द्धन के नियोजन को बताता है जो भारत और भारतीयता की पहचान को अक्षुण्णन बनाए रखने में महती भूमिका निभाते रहे हैं। नयी सदी के नए भारत में नए शिक्षक को ससमय अपनी ईमानदार प्रतिबद्धताओं के साथ विश्व नागरिक निर्माण के पुनीत दायित्व के साथ अपनी नयी भूमिका में आना है। यह निश्चित ही एक नए और सशक्त भारत के साथ-साथ सभ्य, समरस और शांतिपूर्ण अहिंसक विश्व समाज के निर्माण में शिक्षक की महान भूमिका होगी।
लेखक डॉक्टर राकेश राणा एक युवा समाजशास्त्री हैं!
E-mail;ranarakesh@gmail.com #9958396195
प्रतिक्रिया
Rakesh,
I am proud of you.
Teacher's role is not confind to dissipation of knowledge but create useful knowledge and infuse it in students to make them more humanistic citizens. You are playing your role.
Dr. Kalam Singh ji

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