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सीता की पीड़ा

भूमिका

प्रभु राम की अर्धांगिनी सीता जी के दर्द को महसूस कर उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने अपने शब्दों में उस दर्द को विस्तार दे दिया। इससे पूर्व कवि महोदय अपनी दिवंगत पत्नी की स्मृति में कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं। आनंद लीजिए इस करुण गाथा का।


'सीता को पीड़ा' 

बिना किये अपराध सिया को क्यूँ बोलो वनवास मिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।


महलों का सुख छोड़ पलों में सिया राम वन साथ गयी थी। 

भूखी-प्यासी रही वनों में महा भयंकर पीर सही थी। 

खुश होकर ही सब दुःख झेले मुखड़े पर नहीं छाई उदासी। 

सदा राम को रही समर्पित समझ स्वयं को उनकी दासी। 

रावण छल से हर कर ले गया बना लिया लंका में बन्दी। 

राम-राम ही रटती पाई उस लंका में सीता बन्दी। 

कभी नहीं उसने जीवन में श्रीराम से किया गिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।१।।


श्रीराम का सदा समर्पण मर्यादा की रक्षा करता। 

मर्यादा पुरुषोत्तम पद का ध्यान राम हृदय में रखता। 

लेकिन सिया समर्पण पाया मात्र राम को किया हुआ था। 

मर्यादा या पद लालच को नहीं सिया ने कभी छुआ था। 

बन्दी बनकर रही लंक में दोष कहां इसमें सीता का। 

रावण पापी तक ने उर में मान वहाँ रखा सीता का।

मंदोदरी के संग ही रावण सीता जी से सदा मिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।२।।


सदा त्रिजटा राक्षसी ने ही सीता जी की की रखवाली।

राम नाम की महिमा का वो गायन वहां थी करने वाली।

ले तिनके की ओट सिया ने रावण पापी को ललकारा।

गर न लेती ओट तेज से भस्म दीखता रावण सारा।

ऐसी पावनतम सीता का कहां राम ने मान रखा था।

अग्नि परीक्षा दे सीता ने कितना वहाँ अपमान चखा था।

सीता बोल नहीं पाई थी मुरझाया मन कहां खिला था।

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।३।।


व्यंग्य किये का श्रीराम ने क्यूँ नहीं प्रतिकार किया था। 

पावनता प्रमाणित न कर क्यूं नारी तिरस्कार किया था। 

राम थे राजा वो प्रजा थी और थे वो महा गुणकारी। 

सिया पक्ष नहिं रखा ढंग से वन को भेज दई बेचारी। 

वनवासी जब हुए राम तो सीता ने महलों को छोड़ा। 

लेकिन दे वनवास सिया को उसका कोमल हृदय तोड़ा। 

सिया त्यागकर विरह पीर का खुद को भी तो कष्ट मिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।४।।


सीता महा समर्पण आगे राम सदा ही बौने पाए। 

सीता को वनवास दिया पर स्वयं राज को त्याग न पाए। 

जैसे सीता ने सुख छोड़ा राम स्वयं सुख तज सकते थे। 

राज सभी अनुजों को देकर स्नेह सिया में रम सकते थे। 

मर्यादा भी चोट न खाती मान सदा नारी का बढ़ता। 

दृढ़ होता विश्वास सिया पर नहीं अकेले रहना पड़‌ता। 

क्या सीता को पूर्ण राज्य में वन का ही स्थान मिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।५।।


गर्भवती अपनी सीता का श्रीराम को स्वयं पता था। 

क्यूं नहीं रक्षा की सीता की कैसा भय जो रहा सता था। 

निष्कासित नारी का देखा कलियुग में भी ध्यान बहुत है। 

न्याय यहां मिलता है उसको रहन सहन का मान बहुत है। 

कैसा राम राज था, जिसमें नारी सदा बिलखती पाई। 

पति प्यार को धोबन अबला सोता सती सिसकती पाई। 

कहे 'कृष्ण' इसका उत्तर तो नहीं किसी से कभी मिला था। 

श्रीराम के न्याय राज्य में नारी को क्यूं त्रास मिला था।।६।।


कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण


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