भूमिका
अपने किसी प्रिय की स्मृतियों को सहेजना दुश्वार नहीं। यह सिद्ध कर दिखाया है उत्तराखंड के प्रख्यात शब्दशिल्पी श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने। दिवंगत पत्नी की स्मृतियों को अनेक पुस्तकों में सहेजने के उपरांत उनकी स्मृति में एक पुरस्कार आरंभ करके। इस सबसे न केवल उनके योगदान और व्यक्तित्व का सम्मान हो रहा है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देगा। कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने उनकी स्मृति को अमर कर देने के लिए जो साहित्यिक पुरस्कार आरंभ किया है इसके मूल में उद्देश्य उन रचनाकारों को सम्मानित करना है, जो साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दे रहे थे या हैं, खासकर वे रचनाएँ जो समाज, मानवीयता और नैतिक मूल्यों पर केंद्रित थीं – ठीक वैसे ही जैसे कवि की पत्नी के जीवन के मूल्य थे।
कार्यक्रम विवरण
कवि द्वारा अपनी धर्मपत्नी की स्मृति में पुरस्कार की स्थापना न केवल उनके प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में साहित्य और मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम भी बन गया है। ऐसे पुरस्कार समाज को प्रेरित करते हैं और साहित्यकारों को उत्कृष्ट रचनाएँ करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
राष्ट्रीय कवि संगम महानगर इकाई, देहरादून के तत्वावधान में देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार एवं राष्ट्रीय कवि संगम के संरक्षक श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' जी की धर्मपत्नी स्मृतिशेष श्रीमती कृष्णा जी की स्मृति में प्रतिवर्ष 'कृष्णा स्मृति साहित्य सम्मान' से एक साहित्यकार को सम्मानित किये जाने की श्रृंखला में वर्ष २०२४ के 'प्रथम कृष्णा स्मृति साहित्य सम्मान' वरिष्ठ साहित्यकार-नवगीत पुरोधा श्री असीम शुक्ल जी को भेंट किया गया।
दिनांक-१५/०९/२०२४ को १९९-निर्माण विहार, रिस्पना पुल, हरिद्वार रोड, देहरादून में आयोजित सम्मान-समारोह एवं काव्य-गोष्ठी में अध्यक्षता ख्यातिलब्ध शायर श्री 'अंबर खरबन्दा' जी ने की।
मुख्य अतिथि के रूप में हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ० रामविनय सिंह जी ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम का कुशल संचालन संस्था के महासचिव श्री पवन शर्मा ने किया।
माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर एवं कवयित्री महिमा 'श्री' की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।
तत्पश्चात मंचासीन साहित्यकारों ने श्री असीम शुक्ल जी को पुष्प-माला, अंगवस्त्र, श्रीफल तथा सम्मान-पत्र सौंपकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' जी ने अपनी धर्मपत्नी 'श्रीमती कृष्णा शर्मा जी' को स्मरण करते हुए कहा कि "मेरे साहित्यिक सृजन की प्रेरणा मेरी धर्मपत्नी ही हैं।" उन्होंने काव्य-रचना के माध्यम से 'कृष्णा जी' के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए उनकी स्मृतियों का भावपूर्ण वर्णन किया, जो इस प्रकार था -
12 सितम्बर 2024 कृष्णा जी के बयासीवें जन्मदिन पर
'याद'
यादें ही बन गईं कहानी जो सच था लगता है सपना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।
पूर्ण हुए छः वर्ष विदाई आज सातवाँ लगा हुआ है।
लेकिन मन में मात्र तुम्हारा नाम पूर्ण ही जगा हुआ है।
नितनूतन रचनाएं करके केवल अपना मन बहलाता।
उनमें भी जो लिखता तुम पर मात्र उसी में मन सुख पाता।
आज तुम्हारा जन्मदिवस है केक मंगाया है भावों में।
पाँच दीप घी के सुन्दर से जलवाये मैंने भावों में।
ऐसे ही सुख की अनुभूति करता है ये हृदय अपना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।१।।
जीवन तो सपनों जैसा है खिलता-खिलता बिखरा पाता।
खिलते सपनों की यादों में सिसक-सिसक मन समय बिताता।
होनी हो या हो अनहोनी मानव जीवन के अंग होते।
अनहोनी जब हो जीवन में विधि सामने नयन भिगोते।
होनी को अनहोनी कहकर दुनिया ये निष्फल ही रोती।
कुछ नहीं होती है अनहोनी विधि नजर में होनी होती।
पर मानव अनहोनी माला कभी नहीं तज पाता जपना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।२।।
मेरे मन में यादों की ही सदा-सदा सरितायें बहतीं।
सरिताओं की याद तरंगें बिन बोले ही सब कुछ कहतीं।
जन्मदिवस ये आज सातवां बिना तुम्हारे ही आया है।
छप्पन वर्षी याद पुरानी नयन बहाकर मुस्काया है।
जो जन्मा जाता है निश्चित तुम भी तो अपवाद नहीं हो।
यादें दु:ख की बहुत भरी हैं तुम ही दु:ख की याद नहीं हो।
लेकिन हृदय को सुख मिलता केवल याद तुम्हें ही करना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना ॥३।।
हो सकता यादों के बल पर मैंने सीखा ज्यादा लिखना।
लेखन की मुरझाई कलियों ने सीखा है ज्यादा खिलना।
ये उपकारी रूप तुम्हारा मुझको है सन्तोष दिलाता।
पावन भाव तुम्हारा आकर तुमसे ही रहता मिलवाता।
सृजनता जो भी पनपी है तुम उभरी बनकर संबल हो।
ऐसा लगता मेरी लेखनी में तुम ही भर देती बल हो।
नाम तुम्हारा इसीलिए भी छोड़ नहीं पाता मन जपना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।४।।
सभी कहानी वही पुरानी जिसमें अब तक उलझा पाऊँ।
लगे पहेली मुझको मोहक भले नहीं मैं सुलझा पांऊ।
यादों के इस भंवर जाल से मुक्ति को नहीं शोर मचाऊं।
जितना ज्यादा उलझूं इसमें उतना ही ज्यादा सुख पाऊँ।
जन्मदिवस या पुण्यतिथि हो तुम मुझको सुसज्जित दिखतीं।
लख सोलह श्रृंगार तुम्हारा कली मेरे हृदय की खिलती।
विवाह तिथि पर तुम्हें बिठाकर भूल नहीं पाता में तकना।
इन यादों को अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।५।।
याद तुम्हारी सदा सुनहरी चमक बढ़ी ही दी दिखलाई।
यादों की चढ़ती खुमारी कभी नहीं कम होती पाई।
यादों का है स्वाद रसीला कभी नहीं खारा हो पाता।
सिवा याद के कोई अंकुर हृदय पट पर नहीं उग पाता।
मैं तो धीरज खो देता हूं पर न कभी तुम धीरज खोना।
हर पल मेरी यादों को ही आरक्षित रखना उर कोना।
रहे सदा ही ताजी यादें ढका स्नेह से इनको रखना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।६।।
कृष्णा मुझको याद तुम्हारी आकर नित ही तड़पाती है।
याद नहीं ये जीवन दाता जीवन मुझको दे जाती है।
मेरी करुण अवस्था लखकर तुम भी धीरज खोती होगी।
मेरी हर अश्रु बूंदों संग तुम भी नयन भिगोती होंगी।
वश में गर मेरे होता तो अश्रु नहीं तुम्हारे झरते।
एक एक अश्रु मोती बनकर मेरी पावन झोली भरते।
मेरे नयनों से यादों का नित-नित ही बहता है झरना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।७।।
सभी पुरानी यादों का नित पुनः-पुनः सृजन होता है।
हिय पटल पर उन यादों का नित नूतन नर्तन होता है।
कभी-कभी तो ऐसा लगता ये कैसा है खेल विधाता।
जीवन में बिछुड़न जब निश्चित क्यों फिर विधना मेल कराता।
इसीलिए शायद संतों ने बतलाया सन्तोष जरूरी।
मात्र याद ईश्वर जीवन में सदा विरह से रखती दूरी।
कुछ भी कह लो फिर भी होता बड़ा कठिन यादों को तजना।
इन यादों की अग्नि में ही जीवन भर अब होगा तपना।।८।।
डॉ रामविनय सिंह जी ने सम्माननीय विभूति श्री असीम शुक्ल जी के उच्च साहित्यिक व्यक्तित्व को समक्ष रखते हुए प्रथम 'कृष्णा स्मृति साहित्य सम्मान' के लिए प्रत्येक दृष्टि से योग्य बताया।
श्री असीम शुक्ल जी ने कहा कि, "श्री कृष्ण दत्त शर्मा 'कृष्ण' की साहित्यिक साधना किसी की प्रेरणा से ही संभव हो सकती है।" उन्होंने कहा कि लगभग 19 पुस्तकों का लेखन-प्रकाशन का श्रेय जिस प्रकार 'कृष्ण' जी ने अपनी धर्मपत्नी को दिया है, वह सराहनीय है।
कार्यक्रम अध्यक्ष 'अंबर' खरबन्दा जी ने अपने प्रियजनों की स्मृति में साहित्यकारों के सम्मान करने की परम्परा को समाज में साहित्यिक अभिरुचि के विकास के लिए सहायक बताया।
सम्मान-समारोह के साथ आयोजित काव्य-गोष्ठी में सर्व श्री कवि शिवमोहन सिंह, श्रीकांत 'श्री', जसबीर सिंह 'हलधर', संजय प्रधान, शिवचरण शर्मा 'मुज्तर', डाॅ० शैलेन्द्र कौशिक, पवन कुमार 'सूरज', सत्येन्द्र शर्मा 'तरंग', सत्यप्रकाश शर्मा 'सत्य', शादाब अली, डाॅ० राकेश बलूनी, नरेन्द्र दीक्षित, सागर डंगवाल एवं कवयित्री इन्दु अग्रवाल, डौली डबराल, मीरा नवेली, कविता बिष्ट, मणि अग्रवाल, नीरू गुप्ता 'मोहिनी, क्षमा कौशिक, उषा झा 'रेणु' तथा सोनाक्षी ने काव्य-पाठ किया।
इस अवसर पर श्री सन्तोष भूषण अग्रवाल, अनिल अग्रवाल, शिवशंकर कुशवाहा, कृष्ण कुमार त्यागी, श्रीराम मिश्रा, पूनम मिश्रा, सुरेन्द्र सिंह, महेश सैनी पत्रकार आदि सहित देहरादून के अनेक साहित्यकार एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।
राष्ट्र-गान के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम चित्रों के आलोक में









































































































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