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होली कार्यक्रमों का तुलनात्मक विवेचन

भूमिका 

साथियो! यहां पर होली को ध्यान में रखकर एक ही शहर में आयोजित दो कार्यक्रमों का तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा करने के मूल में प्रयास यह है कि हम जान सकें कि हम अपने उद्देश्य के कितना निकट तक पहुंच सके और भावी कार्यक्रमों को और और उपयोगी बना सकते हैं। इसको पढ़कर विचारें अवश्य कि हम अपने मूल्यवान समय का सदुपयोग कर भी पा रहे हैं कि नहीं? स्मरण रहे कि समय का सदुपयोग भी ईश्वर की आराधना के जैसे है।

तुलनात्मकता की ज़रूरत 

हमारा समाज मूलतः शिक्षा का एक अप्रतिम माध्यम है जो हमारे संकल्पों को पूरा करने के समस्त साधन उपलब्ध कराता है। यह निर्भर हम पर करता है कि हम उन उपलब्ध साधनों का कितनी कुशलता के साथ उपयोगी रूप में प्रयोग कर पा रहे। ऐसी ही दो गतिविधियों का आइए आज अवलोकन करते हैं जिनमें एक ने सीख दी तो दूसरी ने विमर्श का अवसर। तो आइए समझने का प्रयास करते हैं।

प्रथम - सुगठित लक्ष्यबद्ध आयोजन

कार्यक्रम निमंत्रण

आयोजक
वाग्देवी साहित्यिक संस्था
कार्यक्रम विवरण
विगत कई वर्षों से साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय वाग्देवी साहित्यिक संस्था ने अपना द्वितीय होली मिलन समारोह 'फाग बहार' NH- 58 सरधना रोड स्थित सूर्या पब्लिक स्कूल में आयोजित किया। इसमें शहर के ख्यातिनाम कवि सुमनेश सुमन, डॉ. ईश्वर चंद्र 'गंभीर', सुदेश 'दिव्य' सहित रामलखन पटेल, मंगल सिंह 'मंगल', धर्मपाल मित्र एवं व्यंग्यकार विनय नोक शामिल रहे। होली हास्य के रंग में रंगे सभी कवियों ने संदेशपरक कविताओं का पाठ किया, जिनकी बानगी यहां प्रस्तुत है। 

सुदेश 'दिव्य' ने वाग्देवी वंदना पढ़ी-

"दिया है मैया ने ज्ञान इतना 

हर एक प्रतिभा दिखा रहा है,

कोई सुरों को सजा रहा है 

तो कोई पंचम में गा रहा है 

पुराणों वेदों रामायणों में 

हमारी वैदिक परंपरा है 

धरा से लेकर गगन तक 

विज्ञान पूरा भरा पड़ा है 

सही समय पर निकलता सूरज 

समय पर चंदा भी आ रहा है।"

प्रख्यात कवि सुमनेश सुमन ने देशभक्तिपूर्ण कविता श्रोताओं के समक्ष रखी जिसे श्रोताओं द्वारा करतल ध्वनि से सराहा गया।

"देशविरोधी षडयंत्रों के हम मंसूबों को तोड़ेंगे 

देशद्रोह-आतंकवाद को कहीं न जिंदा छोड़ेंगे 

नया खून है नई जवानी 

तेवर वही पुराना है 

बदली है दुनिया तो 

भारत का भी नया तराना है 

आतंकियों से घबराकर 

नहीं पीछे हट जाना है 

राष्ट्रधर्म का हित सीखा 

हंसते-हंसते जल जाना है।"

सामाजिक विद्रूपताओं को सामने लाने वाले क्रांतिकारी कवि डॉ. ईश्वर चंद्र 'गंभीर' ने एक मुक्तक से अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता प्रकट की।

"अन्याय के आगे सर झुकने नहीं दिया 

जमीर को कभी बिकने नहीं दिया 

आया ख्याल कई दफा चुटकुले लिखूं 

इन बिगड़ी व्यवस्थाओं ने मगर लिखने नहीं दिया।"

पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट है।

"फल-फूल प्राणवायु दें इनको लगाइए 

इनसे दवाई और घनी छांव पाइए

मरकर भी जलाते हैं ये चूल्हा गरीब का 

पेड़ों सा मित्र दूसरा हो तो बताइए।"

होली के रस से सराबोर श्रोताओं को उन्होंने निम्नलिखित पंक्तियों से होली के पवित्र त्यौहार की मर्यादा का भान कराया।

"होली खेलो, जम के खेलो 

मगर इतना ध्यान रहे 

भैया भी नाराज ना हो 

भाभी का सम्मान रहे।"

होली के मस्त मौसम को चित्रित करती राम लखन पटेल की कुछ पंक्तियां देखिए-

"बज उठीं मौसम में फिर से फागुनी शहनाइयां 

प्राणों में संचार उल्लास का लिए होली आ गई 

चांद के चेहरे पर फिर से खिल उठी हैं जवानियां 

शीत कंपित गात पर फिर से ठिठोली आ गई।"

कवि मंगल सिंह 'मंगल' ने होली पर कर्णप्रिय गीत का पाठ किया।

"अलियों ने गुल के अधरों पर नाच-नाच कर घाव किए 

फिर भी गुल ने तो अलियों को मन की दवा पिलाई है।

सतरंगी परिधान पहनकर रंग वासंती आई है 

तभी धरा की हरी चुनरिया फूलों से सज पाई है।"

काव्यपाठ के उपरांत संस्था के वरिष्ठ सदस्य श्री वीरेश कटारिया ने सभी आगंतुकों का आभार प्रकट किया और उपस्थित सभी भद्रजनों को जलपान के लिए आमंत्रित किया।

कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात कवि सुमनेश सुमन व संगीत शर्मा ने किया। उपस्थित गणमान्यों में राजेंद्र 'उमंग', रविंद्र भर्तृहरि, आलोक शर्मा, नरेंद्र दत्ताल, प्रवीण कुमार, महेंद्र रस्तोगी, चक्रधर प्रसाद मनोड़ी, अनिलकांत एवम् अजय मोहन शर्मा रहे। सामूहिक होली नृत्य, रंग-गुलाल के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

सूचना स्रोत एवं समाचार सृजक - श्री संगीत शर्मा जी

द्वितीय - लक्ष्यहीन आयोजन

कार्यक्रम निमंत्रण


आयोजक  

अंतर्राष्ट्रीय गुर्जर परिसंघ

कार्यक्रम विवरण

जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं, जो हमारे समक्ष अनेक ऐसे प्रश्न जो अनुत्तरित हैं, छोड़ जाते हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय गुर्जर परिसंघ नाम से गठित नव-संगठन ने होली मिलन पर्व तो मनाया लेकिन उसके नाम को लेकर अनेक प्रश्न खड़े हो गए जिसके मूल में कुछ कारण भी हैं। 

रचनात्मक प्रकृति के शिक्षित समाजसेवी कोई भी आयोजन अत्यंत विस्तृत सोच के साथ करते हैं और किसी भी आयोजन की समिति का नामकरण तो कम से कम बहुत ही सतर्कता के साथ करते हैं। 

किसी भी संस्था के नाम में यदि अंतर्राष्ट्रीय शब्द जोड़ा जाता है तो उसका भाव यह आता है कि ऐसा संगठन जिसके स्थानीय सदस्य दो या अधिक देशों में हों। अब यदि नाम में अंतर्राष्ट्रीय शब्द जोड़ दिया गया तो इसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। यहां तक कि व्यापकता की दृष्टि से भी नहीं।

किसी समाज विशेष का नाम देकर यदि परिसंघ कहा गया हो तो इससे मूलतः एक ऐसी राजनैतिक व्यवस्था का भाव आता है जिसमें दो या उससे अधिक लगभग पूर्णतः संप्रभु राष्ट्र समझौता कर लें कि बाक़ी विश्व के साथ वे एक ही राष्ट्र की तरह सम्बन्ध रखेंगे। संघों की तुलना में परिसंघों के सदस्यों को अधिक स्वतंत्रता होती है।

अध्ययनकर्ता को नहीं लगता कि इस निमंत्रण के माध्यम से कार्यक्रम में प्रतिभाग करने आने वालों में से पांच प्रतिशत लोग भी इन शब्दों के भाव को ग्रहण कर पाए होंगे। इससे भी अधिक शोचनीय विषय यह है कि यह नामकरण पूर्णतया साक्षर समझी जाने वाले समाज के प्रतिनिधियों द्वारा आयोजित था और उसमें हुआ क्या वह कुछ भी उल्लेख करने योग्य नहीं है।

अध्ययनकर्ता - शब्दशिल्प 










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