भूमिका
मनोहरी देवी जब कभी भी निश्चिंतता के पलों में पति खड़ग सिंह गुर्जर के संग विमर्श के दौर में होती होंगी तब बालकों के भविष्य को लेकर खड़ग सिंह गुर्जर की चिंता को उन्होंने कितनी गंभीरता से लिया कि उनकी सास से लेकर बालकों तक इस चिंता से पार पाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गए और अंततः कामयाब भी हुए। रूबरू होइए एक दिलचस्प संकल्प के पूर्ण होने तक की गाथा से।
स्थिति
कारगिल युद्ध में 'ऑपरेशन विजय' के दौरान शहीद हुए बारह जाट रेजीमेंट के खड़ग सिंह गुर्जर का बेटा और तीनों बेटियां डॉक्टर बन चुकी हैं और समाज की सेवा कर रही हैं।
प्रतिज्ञा
झुंझुनू के खड़ग सिंह गुर्जर 6 मई 1999 को दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी मनोहरी देवी के अतिरिक्त बेटी सुनीता, ममता, बबली और बेटा संदीप हैं। खड़ग सिंह गुर्जर के शहीद होने के बाद वीरांगना मनोहरी ने चारों बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर पैरों पर खड़ा करने का प्रण लिया क्योंकि उनके पति सदैव बालकों के बेहतर जीवन के लिए उनसे चर्चा किया करते थे थे और वीरांगना मनोहरी का यह सपना कोटा ने पूरा किया। चारों बच्चे आज डॉक्टर हैं और इनमें से तीन ने कोटा में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर कैरियर बनाया है। कोटा के एक कोचिंग इंस्टीट्यूट द्वारा इन स्टूडेंट्स को रूटीन शुल्क में रियायत देकर प्रोत्साहित किया गया। शौर्य छात्रवृत्ति योजना लागू करने के बाद बबली व संदीप को दो वर्ष तक नब्बे प्रतिशत स्कॉलरशिप दी गई। सेना में सेवारत और सेवानिवृत्त सैनिकों के बच्चों को शौर्य छात्रवृत्ति के तहत पंद्रह से नब्बे प्रतिशत तक रियायत दी जाती है। पिता देश की रक्षा के लिए शहीद हो गए और मां ने बच्चों का कॅरियर बनाकर उन्हें देश की सेवा के लिए तैयार किया। एक परिवार की इससे बड़ी सफलता नहीं हो सकती।
मंगल कामना
"शहीद खड़ग सिंह गुर्जर के सभी बच्चों का चिकित्सक बनना हमारे लिए भी गौरव है कि इस सफलता में हम भागीदार बन सके।"
नवीन माहेश्वरी, निदेशक इंस्टीट्यूट।
ज्येष्ठ पुत्री का प्रोत्साहन
खड़ग सिंह गुर्जर की शहादत के समय उनकी सबसे बड़ी बेटी सुनीता गुर्जर आठ वर्ष की थी। ऐसे समय में शहीद की पत्नी मनोहरी एवं भाई नवीन कसाणा ने परिवार को संभाला। सुनीता ने बारहवीं कक्षा के बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की और उसे एमबीबीएस के लिए डॉ. सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज जोधपुर में एडमिशन मिल गया। डॉ. सुनीता ने तीनों भाई-बहनों क्रमशः ममता, संदीप और बबली को भी मेडिकल की तैयारी के लिए प्रेरित किया। बबली ने 2019 में नीट परीक्षा क्रैक की। ममता ने वर्ष 2016 में नीट क्रैक किया। वहीं, भाई संदीप ने भी वर्ष 2014-15 में कोटा में पढ़ाई की और 2017 में नीट क्रैक किया।
दादी ने बढ़ाया संबल
डॉ. सुनीता गुर्जर ने बताया कि हमारे लोगों की धारणा थी कि बेटियों को अधिक पढ़ाना नहीं चाहिए। कम उम्र में शादी कर दो। पढ़ाई में जो पैसा लगाने के बजाय उसकी जगह अच्छा खासा दहेज दे देना। हम लोगों को भी ऐसी बातों का सामना करना पड़ा। लेकिन, हमारी दादी पताशी देवी ने लोगों को जवाब दिया कि "म्हारी छोरियां जहां भी जायेंगी नाम ही रोशन करेंगी"। आज हमारे गांव में सिर्फ हम तीनों बहनें ही हैं, जिन्होंने गांव से बाहर जाकर पढ़ाई की। (दुर्भाग्यपूर्ण पर सत्य)
"आज सब गर्व करते हैं!" डॉ. सुनीता गुर्जर कहती हैं, जो भीलवाड़ा के बड़ा महुआ स्थित पीएचसी में मेडिकल ऑफिसर हैं। ममता एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर से एमबीबीएस के द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हैं, जबकि सबसे छोटे भाई-बहन में संदीप और बबली आम मेडिकल कॉलेज दिल्ली से एमबीबीएस कर रहे हैं। डॉ. सुनीता ने बताया कि पापा का सपना था कि चारों बच्चे बेहतरीन शिक्षा प्राप्त कर परिवार का नाम रोशन करें।
प्रेरकीय
यह दृष्टांत नज़ीर है उन समाजों के लिए जो रूढ़ियों के वशीभूत होकर भावी पीढ़ियों को हतोत्साहित करके उनकी प्रगति के मार्ग को बाधित करने का काम करते हैं और धन्य हैं कुरीतियों से जूझकर बालकों के स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करने वाली महिलाएं जिन्होंने शहीद के स्वप्न को प्राणपण से पूरा करके दिखाया।
सूचना स्रोत
दैनिक भास्कर से साभार
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