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तत्काल चिंतन योग्य विषय

भूमिका

भारत में परिवारों में टूटन को रोकने के लिए हमें संवाद और समझ की भावना को बढ़ावा देना होगा। परिवार के सदस्यों के बीच नियमित बातचीत, सहनशीलता और एक-दूसरे के विचारों और भावनाओं का सम्मान करना महत्वपूर्ण है। पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का सहारा लेना, मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना और पारंपरिक मूल्यों के साथ-साथ आधुनिक जरूरतों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सहानुभूति, समर्थन और आपसी सहयोग से परिवारों को एकजुट रखा जा सकता है।

गंभीर विमर्श की दरकार

सृष्टि में अनेक विषय विचार के लिए हैं, जिनमें वर्तमान में परिवारों की टूटन मुख्य विषय है? सर्वाधिक चिंतित करने वाला इसलिए कि यह प्रत्येक किस्म (भले ही एंगेज्ड हो या प्रेम विवाह) के विवाह की यह समस्या है। अतः इस पर गौर करने की नितांत आवश्यकता है। पारिवारिक स्ट्रक्चर में आई टूटन भी इसके लिए उत्तरदायी है। पहले संयुक्त परिवारों में एक छत के नीचे एक ही परिवार के विविध रिश्तों को निभाने वाले कितने ही लोग रहा करते थे। इतने विविध रिश्तों को निभाने वाले लोगों में कितने ही मुद्दों पर आपसी बहस, मनमुटाव और द्वंद्व भी हो जाया करते करते थे, लेकिन फिर भी सभी परिजन एक साथ ऐसे मसलों को सुलझाकर साथ बने रहते थे। न उनके दिमाग में दीवारें खींचती थीं और उनके दिलों में भी किसी प्रकार की कलुषित नहीं पनपती थी। अब, जब से संयुक्त परिवार टूटने आरंभ हुए हैं तब से कहीं ना कहीं इंसान की सहनशक्ति, समन्वय क्षमता और आपसी सुहावट में कमी आई है। विशेषतः महिलाओं में। 


महिलाओं की कभी असीम कही जाने वाली सहनशक्ति में गिरावट का ही परिणाम है कि आए दिन घर परिवार की टूटन का सामना समाज को करना पड़ रहा है। समाज को इस परिवर्तन का खामियाजा दुष्परिणामों और लंबे द्वंद्वों के रूप में भुगतना पड़ रहा है। आज की नारी बड़ी तो छोड़िए छोटी से छोटी बात भी सहन नहीं करती। नतीजन पुलिस कोर्ट कचहरी मुकदमे पंचायतों के रूप में आये दिन सामने आ रहे हैं और एक से एक विचित्र रूप में।

पुरुष वर्ग ने सदैव मकान तो बनाया है लेकिन उन मकानों को घर बनाने की जिम्मेदारी सदियों से महिलाओं के हिस्से में आयी है और सदियों से उन्होंने उस दायित्व को भलीभांति निभाया भी। पर, आज के समय में महिलाएं अपनी उस जिम्मेदारी को निभाने में कहीं ना कहीं विफल होती जा रही हैं और जिसकी मुख्य वजह उनमें सहनशक्ति का गिरता स्तर है। महिला वर्ग की विशेषता देखिए कि अगर वह एक समय पर कुछ बातें सुन लेता है तो वह भविष्य में दस बातें सुनाने की काबिलियत हासिल कर लेता है।

वर्तमान विपरीत स्थितियों में हम महिलाओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि अगली पीढ़ी की नारियों में यथासंभव सहनशक्ति विकसित करें ताकि उनके घर आंगन महकते रहें। गृहस्थी में पुष्प खिलते रहें और आपसी स्नेह-सहयोग-सौहार्द और समझदारी भरी साझेदारी बढ़ती रहे। अब समझने की बात यह है कि प्रकृति ने नारियों को विशेष गुणों में एक गुण यह भी दिया है कि वह कम से कम संसाधनों को अधिक से अधिकतम उपयोगी बना सकती हैं तो आइए समाज की टूटन को प्रभावी रूप में रोककर समाज को बनाने के जटिल प्रतीति वाले कार्य को सुगम सरल बनाकर उसकी बनाने के अभियान में जुटते हैं। ईश्वर भली करे।

समाज में सभी की इच्छा के अनुरूप ढलकर तथा परिवार को एक सूत्र में बांधने की काबिलियत नारी रखती है तो क्यों ना उसकी काबिलियत का आदर करते हुए बखूबी उसका इस्तेमाल किया जाए व परिवारों को टूटने से बचाया जाए। हर महिला अपनी दायित्व को समझकर इसको अपने कंधों पर फिर से उठाए और देश की सभ्यता व संस्कृति समेत क्षेत्र, समाज और परिवारों को दुर्गति से बचाए।

सृजक 

सोनिया सिंह

सहारनपुर


प्रस्तुति









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