भूमिका
उलझन सुलझन (महिला) की संपादिका सोनिया जी निरंतर कुछ उत्कृष्ट निकलने और गढ़ने को प्रयासरत हैं। प्रस्तुत शब्द समाज में नकारात्मकता से विद्रूप होते जा रहे भावों को लेकर है जो नारी की छवि को प्रभावित कर रहे हैं। आनंद भी लीजिए और प्रेरणा बेहद भावुकता से सृजित इस रचना से।
नारी का विहंगम विश्लेषण
नारी तुमने अपनी कर्मभूमि में, जब से विस्तृत विस्तार किया है...
घर-आंगन में तब से ही, तेरी पकड़ का स्वतः ही ह्रास हुआ है...
बेशक जिम्मेदारियां तुम्हारी बढ़ गईं, पर मुख्य दायित्वों में कहीं ना कहीं ह्रास हुआ है...
घर आंगन में तेरे घुसपैठियों ने पैर पसारे हैं, अदब, संस्कार और लिहाज़ के फल, कीटभक्षकों के ग्रास बने हैं...
आसमान छूने की चाह में, जमीन तेरी स्वतः खिसक रही...
घर आंगन की रौनक देखो, कैसे कड़ी धूप में झुलस रही...
चुनौतियां जीवन की बेशक, तुम नित नई स्वीकार करो...
नारी तुम अपनेआप पर विश्वास करो
अपने स्वाभिमान को शीर्ष पर रखकर, तुम नये कीर्तिमान गढ़ो...
पर अपने मूल दायित्वों से ना कभी इंकार, ना समझौता करो...
तुम हो; परिवार-समाज की नींव का पत्थर, जितनी मजबूती से जम जाओगी, उतना परिवार को ऊंचाई दोगी, तुम्हारे कीर्ति चहुंओर स्वमेव फैल जायेगी...
तुम त्याग समर्पण की प्रतिरूपा, तुम करुणामयी, तुम प्रेमस्वरूपा...
तुम जीवनदायिनी, तुम ही विधाता...
तुम क्षमाशील, तुम सहनशील..बस !
अपनी फसल पर गौर करो, समाज में जो फैल रही है महामारी...
उससे बचाव पुरजोर करो...
©सोनिया सिंह सहारनपुर ✍🏻
संपादिका उलझन सुलझन (महिला)
सोनिया सिंह रचित कविता के उन्नयन के लिए उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' जी से विचार विमर्श हुआ तो उन्होंने उपलब्ध काव्य को निम्न रूप दिया। दोनों रचनाओं को पढ़कर पाठकों को अनूठी अनुभूति होगी।
नारी का विहंगम विश्लेषण
नारी तुमने कर्मभूमि में जब से निज-विस्तार किया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।
उत्तरदायित्य बढ़ा निरन्तर मुख्य दायित्वों से रही अछूती।
घुसपैठी ने पैर पसारे नहीं कभी तू उनसे जीती।
अम्बर को छूने की इच्छा पर वहाँ से भी खींच लिया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।१।।
घर-आंगन में रौनक कहां है कड़ी धूप से झुलस रही है।
आज स्वयं तू बुने जाल में मानो जैसे उलझ रही है।
फिर भी तूने खड़ी चुनौती को हर पल स्वीकार किया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।२।।
नारी अब तुम अडिग भाव से खुद पर कुछ विश्वास करो तो।
स्वाभिमानी बन कीर्तिमान नित-नित नूतन स्वयं गढ़ो तो।
अब मत करना मूल दायित्व से जो अब तक इंकार किया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।३।।
जितनी गहरी नींव तुम्हारी होती जाती परिवार में।
उतनी ही मजबूती होती जाती तेरे मृदुल व्यवहार में।
तुम त्याग समर्पण की प्रतिरूपा प्यार सदा उपहार दिया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।४।।
तुम क्षमाशील तुम सहनशील तुम जीवनदाता स्वयं विधाता।
लख सदा तुम्हारी कर्मठता हर मानव शीश चुका है पाता।
हर सामाजिक महामारी का तुमने ही उपचार किया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।५।।
तुमको बस इतना करना है खुद अपनी शक्ति पहचानो।
फिर कौन टिके सम्मुख तेरे हर और पराजय हो मानो।
अब खुद ही शर्मिंदा होगा जिसने भी अत्याचार किया है।
घर आंगन ने तब से ही तो तेरा बस तिरस्कार किया है।।६।।
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण', देहरादून
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