सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मिलकर चलने का अहसास - सोनिया सिंह

भूमिका

आज के समय में महिलाएं परिवार के आर्थिक समर्थन के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत यदि हैं तो अपने जीवन और परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों में भी मेहनत कर पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए। चाहे वह कृषि क्षेत्र हो, घरेलू कामकाज, कारखाना या कॉर्पोरेट क्षेत्र, महिलाएं हर क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। पुरुष अक्सर उसके कार्यों की तुलना अपनी कार्य स्थितियों से करता है, लेकिन महिलाएं न केवल अपने काम को निभाती हैं, बल्कि घरेलू जिम्मेदारियों को भी बखूबी संभालती हैं। उनके समर्पण और संघर्ष को पहचानना और सराहना बहुत जरूरी है।

यूट्यूब विज्ञापन की टैक्स्ट


मिलकर चलने का अहसास

जो महिलाएं जाती हैं, घर से बाहर, मटरगश्ती करने तो नहीं जातीं...

वे जाती हैं थोड़ा-सा आत्मविश्वास कमाने, थोड़ी-थोड़ी आत्मनिर्भर होने और दिमाग को रिएनर्जाइज करने...

वरना उनको क्या शौक पड़ा है कि वे काम करके भी काम पर जाएं और काम से लौटकर भी काम पर ही आएं...

और! एक ही वक्त में, दो-दो जिम्मेदारियां, एक साथ निभाएं...

दो जून (वक्त) की रोटी तो मिल जाती है उनको, बाप-भाई, पति और बेटे के अहसानों के तले...

पर! नहीं मिल पाता उन्हें, आत्मविश्वास-आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और सम्मान....

जिसके लिए होती हैं, वो सुबह से शाम तक हलकान...

इसीलिए तो; थकी-हारी मारी-मारी, वे निभाती हैं, एक साथ कई सारी जिम्मेदारी....

फिर भी सुनती हैं कटाक्षपूर्ण बातें, करती क्या हो तुम दुनिया से न्यारा, बस दो रोटी थपेलना है, दिन भर में काम तुम्हारा...

इस काम के उनको..; पैसे जो नहीं मिलते, इसीलिए पुरुषों को..; घर के काम, काम ही नहीं लगते...

घर संभालना, जब है..; इतना आसान, तो कर लो ना अदला-बदली...

तुम संभालो घर, और उनको दे दो, अपनी जिम्मेदारी...

आटे-दाल का भाव, उन्हें भी तो पता चलने दो, कौन है कितने आराम में, इसका निर्णय स्वत: तो होने दो...

प्रेषिका

©सोनिया सिंह 

(संपादिका, उलझन सुलझन महिला)

सहारनपुर

प्रस्तुति








टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...