भूमिका
आज के समय में महिलाएं परिवार के आर्थिक समर्थन के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत यदि हैं तो अपने जीवन और परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों में भी मेहनत कर पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए। चाहे वह कृषि क्षेत्र हो, घरेलू कामकाज, कारखाना या कॉर्पोरेट क्षेत्र, महिलाएं हर क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। पुरुष अक्सर उसके कार्यों की तुलना अपनी कार्य स्थितियों से करता है, लेकिन महिलाएं न केवल अपने काम को निभाती हैं, बल्कि घरेलू जिम्मेदारियों को भी बखूबी संभालती हैं। उनके समर्पण और संघर्ष को पहचानना और सराहना बहुत जरूरी है।
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मिलकर चलने का अहसास
जो महिलाएं जाती हैं, घर से बाहर, मटरगश्ती करने तो नहीं जातीं...
वे जाती हैं थोड़ा-सा आत्मविश्वास कमाने, थोड़ी-थोड़ी आत्मनिर्भर होने और दिमाग को रिएनर्जाइज करने...
वरना उनको क्या शौक पड़ा है कि वे काम करके भी काम पर जाएं और काम से लौटकर भी काम पर ही आएं...
और! एक ही वक्त में, दो-दो जिम्मेदारियां, एक साथ निभाएं...
दो जून (वक्त) की रोटी तो मिल जाती है उनको, बाप-भाई, पति और बेटे के अहसानों के तले...
पर! नहीं मिल पाता उन्हें, आत्मविश्वास-आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और सम्मान....
जिसके लिए होती हैं, वो सुबह से शाम तक हलकान...
इसीलिए तो; थकी-हारी मारी-मारी, वे निभाती हैं, एक साथ कई सारी जिम्मेदारी....
फिर भी सुनती हैं कटाक्षपूर्ण बातें, करती क्या हो तुम दुनिया से न्यारा, बस दो रोटी थपेलना है, दिन भर में काम तुम्हारा...
इस काम के उनको..; पैसे जो नहीं मिलते, इसीलिए पुरुषों को..; घर के काम, काम ही नहीं लगते...
घर संभालना, जब है..; इतना आसान, तो कर लो ना अदला-बदली...
तुम संभालो घर, और उनको दे दो, अपनी जिम्मेदारी...
आटे-दाल का भाव, उन्हें भी तो पता चलने दो, कौन है कितने आराम में, इसका निर्णय स्वत: तो होने दो...
प्रेषिका
©सोनिया सिंह
(संपादिका, उलझन सुलझन महिला)
सहारनपुर
प्रस्तुति


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