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प्रयासों की ध्वनि (गुर्जर - भील एकता के संदर्भ में)

 भूमिका

प्रयासों की ध्वनि इतनी तीव्र, मनमोहक और मनभावन होती है कि उसको सिर्फ चतुर ही नहीं प्रत्येक मनःस्थिति वाला सरल, सहज भाव से समझ सकता है। एक ऐसे ही अवसर का वृत्तांत आपके समक्ष प्रस्तुत है।

वृत्तान्त 

अभी अभी मानगढ़ शहीदस्थल पर आयोजित भील प्रदेश सांस्कृतिक महासम्मेलन में भाग लिया। इस सांस्कृतिक महासम्मेलन से पहले भी हम आदिवासी परिवार के साथ गुर्जर - भील एकता के लिए काम कर रहे हैं। इस दौरान काफ़ी बार आदिवासी परिवार के आधुनिक बिरसा भंवर परमार दादा और बाक़ी जागरूक साथियों पर इस विषय पर काफ़ी चर्चा और तथ्यात्मक साझा अध्ययन तैयार कर चुके हैं।

हमारे एक क्षेत्र में रहने, एक जैसे जीवन - यापन और एक जैसी सामाजिक, सांस्कृतिक परंपराओं के साथ - साथ जो हमारा साझा इतिहास है उस पर सामूहिक रूप से काम करते हुए इस साझी विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं। इस साझे इतिहास के तीन मुख्य बिंदु निम्न हैं –

बिंदु एक 

हमारे पुरखे देवनारायण जी का सामाजिक जनजागरण और सांस्कृतिक आंदोलन 

आप सबको विदित है कि देवनारायणजी के पिताजी का संपूर्ण कुनबा तत्कालीन सामंतवादी व्यवस्था से लड़ते हुए खत्म हो चुका था। देवजी के जन्म के बाद माता साडू को मालासेरी से उनके पीहर मालवा तक सुरक्षित पंहुचाने वाले सल्ला और भल्ला नाम के दो भील बंधू ही थे। बाद में, देवनारायणजी ने अपनी युवावस्था में आसींद के पास रहने वाले इन ही भीलों और गुर्जरों को एकत्र कर सामंती व्यवस्था को हराया और अपने पूर्वजों का राज पुन स्थापित किया।

देवनारायणजी ने भीलों को सम्मान देते हुए उनको अपना मामा माना भीलों के सम्मान में अपने बेटा और बेटी का नाम भीला और भीली रखा। आज भी देवजी के बहुत से देवरों में सेवक या पुजारी भील और मेघवाल होते है।

अब हमें जरूरत है देवनारायणजी के सामाजिक जनजागरण और सांस्कृतिक आंदोलन के संस्थानिक और प्रमाणीकृत अध्ययन एवम् विश्लेषण की। यह हमारे और हमारी नस्लों के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातीय समुदायों से मजबूत सामाजिक एवम सांस्कृतिक एकीकरण का काम करेगा। याद रखिए नागभट्ट ही नही देवनारायण जी भी नागवंशी थे और परमार/पंवार/चौहान सभी भोजपरिवार नागवंशी (महाभोजी) हैं। इन समुदायों में भी नांगवंशी गोत्र आज भी मौजूद है ।

बिंदु दो

वर्ष 1824 से भारत की आज़ादी तक की बगावतें 

वर्ष 1824 में अंग्रेजों और देशी रियासतों (स्मरण रहे कि देशी रियासतों का राज केवल शहरी जनता तक ही सीमित था। हमारी तो अलग से पंचायती और स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था थी।) के बीच हुए समझौतों के बाद जब ब्रिटिशर्स सम्पूर्ण उत्तर भारत को अपने कब्जे में लेने लगे तो स्वतन्त्र कबीलों ने इसका विरोध कर दिया और 1824 में गुर्जर (शिवालिक की पहाड़ियों में सहारनपुर में राजा विजय सिंह गुर्जर कुंजा बहादुरपुर ने) एवम् भीलों (अरावली की पहाड़ियों में) में एक साथ विद्रोह उठा और अंग्रेज़ी सत्ता जब तक भारत में रही तब तक ये दोनों कबीले बागी रहे। उत्तर भारत में अंग्रेजों की ज्यादातर बटालियन इन्हीं को काबू करने के लिए इनकी बहुलता वाले इलाकों में स्थापित हुई जैसे मेरठ (गुर्जर बहुल), नसीराबाद (गुर्जर बहुल), नीमच (भील और गुर्जर बहुल) टॉटगढ (भील और गुर्जर बहुल), खेरवाड़ा (भील बहुल)। हालांकि बाद में संविधान में एक समुदाय गुर्जर को डिनोटीफाई ट्राइब (DNT) एवं दूसरे भील को शिड्यूल्ड ट्राइब स्टेट्स दिया गया। जबकि गुर्जर समुदाय भी एक ट्राइब ही है।

बिंदु तीन

विजय सिंह पथिक जी (किसान एवम् भील विद्रोह)

विजय सिंह पथिक जी के नेतृत्व वाले किसान आंदोलनों; जैसे बिजौलिया, बेगू, डाबी; में गुर्जर और भीलों ने बहुत ही जिंदादिली से कुर्बानियां दीं एवम् भागीदारी निभाई। नानक जी भील जैसे शहीदों ने अपनी जान तो दे दी, लेकिन पथिक जी का साथ मरते दम तक नहीं छोड़ा। तत्कालीन भील प्रदेश में हो रहे विद्रोह में भी पथिक जी का योगदान अतुल्य है। 

तो, साथियो! इन सब घटनाक्रमों से स्पष्ट  है कि हमारा ऐतिहासिक दुश्मन (ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद का साझा गठजोड़) एक है और वही हमारा साझा दुश्मन भी है। तो लडाई भी साझी है। संघर्ष भी साझा है और जो जीत होगी वो भी हमारी नस्लों की साझी विरासत होगी। इतिहास गवाह है कि हमारे पुरखे संयुक्त होकर लड़े है, जीते हैं और साझी विरासत हमें सौंपकर गए हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था ने गुर्जर और भील दोनों भाइयों में काफ़ी दूरियां बढ़ा दी हैं, इसलिए अब दोनों ही अलग–अलग पिट रहे हैं और सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण को ढो रहे हैं, तो, साथियो! अब वक्त आ गया है कि इन दोनों कबीलों का सामाजिक जागरण कर इन्हें इनकी ताकत का अहसास करवाकर साझी सांस्कृतिक विरासत को फिर से शुरू करने का। हालांकि यह भी स्थापित नियम है कि सामाजिक चेतना को कुंद करने के लिए धर्म का प्रयोग किया जाता है और वर्तमान में तो हमारा दुश्मन इस धर्म की आड़ मे उसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक प्रबंधन और सत्ता सुख ले रहा है। इसलिए जागरूक सामाजिक साथियो को बिना विलंब किए इस सामाजिक जनजागरण को जोर शोर से शुरू करना चाहिए। हमें हमारी कौम के राजनेताओं से आशा न रखते हुए यह कार्य करना चाहिए क्योंकि हमारे राजनेता उनकी पार्टियों के गुलाम हैं और विनाश के अव्यय हैं। साथियो! इस लड़ाई को सिर्फ और सिर्फ सामाजिक जनजागरण से ही जीता जा सकता है क्योंकि यह लोकतंत्र है और इसमें अब तलवारी और लट्ठ जोर की लड़ाई नहीं चल रही। 

लोकतंत्र; हज़ारों हजार साल राजा, महाराणाओं धार्मिक सत्ताओं को सहने के बाद बुद्धिमान लोगों के दिमाग़ से उपजी एक श्रेष्ठ समाज एवम्  देश संचालन की पद्धति है। इसका अर्थ ही सर्वसमाज की भागेदारी एवम् बराबरी है। बराबरी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एवम् भागेदारी समाज के प्रत्येक कार्य में। लोकतंत्र वास्तव में व्यक्तिवाद का समर्थन नहीं करता, अपितु प्रत्येक व्यक्ति को बराबर मानता है एवम् प्रगति करने का अवसर भी प्रदान करता है। समय साक्षी है कि संसार में लोकतंत्र को अपनाने वाले देश और व्यक्ति ही आगे बढ़े हैं। हमारे देश मे भी शाक्य वंश ने लोकतंत्र पद्धति का पालन आज से हज़ारों साल पहले किया है। हमारे संविधान मे मूल तत्व शाक्य संघ से लिए गए हैं। संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि लोकतंत्र को चलाने के लिए समाज के सभी वर्गों की एवम् देश के सभी क्षेत्रों की समान भागेदारी सभी आयामों में हो। विधायिका, कार्यपालिका न्यायपालिका एवम् समाचार तंत्र सभी में बराबर भागेदारी होगी तभी सही लोकतंत्र कहा जा सकता है। भारत प्राचीनतम सभ्यताओं का देश है जिसने संसार को दिशा दी है और विश्वगुरु कहलाया है, परंतु भारत ही एक मात्र भूभाग भी है जहाँ वर्ण व्यवस्था जैसी पक्षपातपूर्ण सोच को फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिला है। शिक्षा के अभाव में समाज को दिग्भ्रमित कर सीमित लोगों के हित साधने एवम् अधिकांश लोगों के शोषण की व्यवस्थाएँ की गईं, जिसका परिणाम हमें ग़ुलामी के रूप में चुकाना पड़ा। तीन शताब्दी पूर्व जब संसार नए नए अन्वेषण कर नई नई ऊँचाइयों को छू रहा था तब हम भक्तिकाल में लीन थे और आपस में लड़ रहे थे। फलतः हम संसार को दिशा देने वाले विकास की दौड़ में सबसे पीछे रह गए। मुझे जो लिखना और कहना था वो कह दिया। हम आगे इस एकता के लिए काम भी कर रहे हैं अब निर्णय आपको लेना है।

और, अंत में 

भील प्रदेश का ये सांस्कृतिक महासम्मेलन महज एक महासम्मेलन ही नहीं, बल्कि प्रदेश और देश में पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने की एकजुटता का संदेश है, जिसका परिणाम निकट भविष्य में देखने को मिलेगा।

चित्रों का झरोखा



















वीडियो दीर्घा 






#गुर्जर_भील_एकता 

जय भील प्रदेश

जय जोहार जय देव दरबार।

🌹🌹🌹🙏🙏🙏


आपका 

इंजीनियर महावीर सिंह गुर्जर 

ग्राम+पोस्ट–थली

जिला जयपुर (राजस्थान)

मो. न.7073727829

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