सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नवाचारी ही नहीं विलक्षण उदाहरण भी हैं शिक्षा के क्षेत्र में

भूमिका

शिक्षक जगत नवाचारियों का क्षेत्र है जिसमें शिक्षक निरंतर ज्ञान को हस्तांतरित करने को प्रयास रहते हैं और ऐसे सुगम उपागमों को तलाश करते रहते हैं जो सीधा, सरल और सुगम हो। उत्तर प्रदेश के एक प्रधानाचार्य महोदय ने 'संकल्प' नाम से एक पुस्तिका का सृजन कर विद्यालय को उस व्यवस्था के अनुसार चलाकर जनता को आश्चर्यचकित कर दिया, तो राजस्थान की माननीया शिक्षिका शोभा कंवर जी ने परोपकार के अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत कर दिए। जानिए शोभा जी के प्रयास उन्हीं की जबानी।

परिचय

साथियो! आज हमारे मध्य हैं, एक ऐसी प्रतिभा शोभा कंवर जी, जिनको उनकी असीमित कौशल के कारण उनका प्रदेश राजस्थान ही नहीं असंख्य वो बालक भली प्रकार जानते हैं जिनको उन्होंने शिक्षित कर उनके जीवन को नया आयाम दिया। एक ऐसी अध्यापिका जो पूर्ण रूप से बच्चों के साथ साथ शिक्षा और शैक्षिक विकास के लिए समर्पित है और शैक्षिक उन्नयन के समस्त कार्यों में बढ़-चढ़ कर भाग लेती है। ये अब तक एक सौ से भी अधिक बालिकाओं की आर्थिक मदद कर उनकी शिक्षित होने में सहायक रहीं। इन्हीं की मदद से अंतर्राष्ट्रीय नवाचार के रूप में इनका विद्यालय भारत का पहला ऐसा शासकीय विद्यालय बना, जहाँ की प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे अमेरिका के स्कूल के पेनफ्रेंड हैं और विगत दस वर्षों से उनके साथ पत्राचार कर रहे हैं। इन्होंने ही ऑनलाइन शिक्षण के लिए पहल करके बून्दी जिले में सबसे पहला व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर बच्चों व उनके अभिभावकों को सिस्टम से जोड़ा। कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में सफलतापूर्वक अच्छी खासी रकम जीतकर उसको जनहितकारी कार्यों के लिए दान कर दिया। आइए मिलते हैं कोमल मना मृदुभाषी और अपेक्षा करने वालों को कभी भी निराश ना करने वाली विलक्षण प्रतिभा शोभा जी से।




बातचीत

प्रश्न १. आदरणीय शोभा जी सर्वप्रथम अपने चुनौतीपूर्ण जीवन से कृपा कर अवगत कराइए।

उत्तर - "नमस्कार साथियों🙏. जहाँ तक चुनौतीपूर्ण जीवन की बात है तो मेरा मानना है कि आज से चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले की बात करें, तो लगभग हर लड़की को उस समय बहुत-सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा। मैंने पहले पढ़ाई के लिए संघर्ष किया, क्योंकि दादी-सा ने साफ मना कर दिया था कि ज्यादा पढ़ेगी तो कोई लड़का नही मिलेगा तथा पढ़ने से लड़कियों का दिमाग खराब हो जाता है। पर उस वक्त माँ ने साथ दिया और हायर सेकेंडरी करने के बाद मुझको कॉलेज नहीं जाने दिया गया। STC में दाखिला करवा दिया, जबकि कॉलेज में एडमिशन हो चुका था। अठारह की होते होते ही शादी हो गयी।

सोचा था वहाँ पढ़ाई पूरी करूंगी। पर यहाँ भी ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहिए थी। वर्ष 1992 में जॉब भी लग गयी थी, वो भी छोड़नी पड़ी। सोलह वर्ष लग गए घर वालों को मनाने में और फिर आरपीएससी देकर बिना किसी तैयारी के वापस शिक्षक बनी और पढ़ाई भी पूरी की।"

प्रश्न २. शिक्षा क्षेत्र से जुड़ाव सामान्य तरीके से ही हो गया या कि किसी प्रकार की उलझनों से दोचार होना पड़ा? यदि कुछ उलझनें पेश आईं तो आपने उनको किस प्रकार सुलझाया?

उत्तर - "शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ाव के लिए जो उलझनें  मेरे समक्ष आईं उन्हें मैंने स्वयं ही दूर किया। व्यक्ति में आत्मविश्वास हो, तो वह हर उलझन को सुलझा सकता है। ऐसा मेरा यकीन है। मैंने भी हार नहीं मानी, न ही आत्मविश्वास खोया। मैंने अपनी पढ़ाई जैसे ही पूरी की, वैसे ही बहुत-सी ड्रॉप आउट लड़कियों को शिक्षा से जोड़ा। साथ ही गांव वालों को भी शिक्षा का महत्व बताया, ताकि वो अपनी बेटियों की पढ़ाई न रोकें। घर से सत्ताईस किलोमीटर दूर स्कूल वो भी गांव ढाणी में, जहां पर पहुंचना भी एक मुश्किल टास्क था। बारिश में कई बार धोरों में हाथ - पांव तुड़वाये। पर जाना नहीं छोड़ा। तीन साल तक एकल शिक्षक रही और एक भी छुट्टी नहीं ली।"

प्रश्न ३. जीवन को आपने जिस प्रकार आकार दिया उसमें किन किन गतिविधियों को आपने सहज भाव से संपन्न कर लिया था और उनमें से कौन सी आपको सर्वाधिक संतोषजनक लगती है?

उत्तर - "जीवन को आकार देने में जो गतिविधियां मैं बच्चों के बीच रह कर करती या उनकी मदद से करती वो मुझे सहज लगती थीं। अपने बच्चे न होने की वजह से उनसे मुझे वो प्यार मिला, जिसकी मुझे दरकार थी। जिस विद्यालय में पहली पोस्टिंग हुई थी वहां के ग्रामीण भी कुछ समय बाद समझ गए कि मैडम हमारे बच्चों के लिए इतना कुछ कर रही हैं, तो फिर उन्होंने भी मेरा भरपूर साथ दिया और अपने निजी स्कूल से अपने बच्चों को निकालकर मेरे स्कूल का नामांकन चार से बत्तीस तक पहुंचाया। साथ ही दूसरे कस्बे से भी अब बच्चे मेरे स्कूल में आने लगे थे। उन्हें सिर्फ स्कूल आना होता था, बाकी व्यवस्था यूनिफार्म, बैग, स्वेटर, जूते, मोजे, स्टेशनरी आदि सब कुछ की व्यवस्था मैं करवा देती थी। यह तो अभी भी जारी है। अब तो यह आदत ही बन चुकी है।

सर्वाधिक सन्तोषजनक की बात यदि करूं तो एक बालिका सुमित्रा भील जिसके घर में कोई पढा हुआ ही नही था, उसके मन में पढ़ने की अलख जगाई। वो अपने भाई को साथ रखती थी, ताकि उसके मम्मी पापा काम पर जा सकें। मैंने उसे उसके भाई के साथ ही स्कूल आने के लिए मनाया। आज बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद उसकी शादी हो गई और उसकी दो बहनें और हमारे ही स्कूल में पढ़ती हैं और उसका भाई भी अब कक्षा सात में है। तब से करीब करीब आस - पास के बहुत से भील बच्चों ने पढ़ना शुरू कर दिया।"

प्रश्न ४. अपने विद्यालय के बालकों के लिए पैनफ्रेंड बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया और अपने उसको कैसे अंजाम दिया?

उत्तर - "मेरे विद्यालय के बच्चे वर्ष 2014 से कैलिफोर्निया अमेरिका के एक स्कूल के पेनफ्रेंड हैं। यह सिलसिला विगत दस वर्षों से बदस्तूर जारी है। इस वर्ष तो हम 'दस साल बेमिसाल' नामक एक उत्सव भी इसी उपलक्ष में मना रहे हैं जिसमें हमारे स्कूल के कक्षा 1 से 12 तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क शैक्षणिक सामग्री दी जा रही है।

यह भी सब एक संयोग ही था कि मेरा भाई विक्रम सिंह अपने एक मित्र मिस्टर डेविड डिकिन्सन के परिवार को दशहरा दिखाने कोटा लेकर आया था। वो अमेरिका में एक एलिमेंट्री स्कूल के टीचर थे। वह हमारे घर आये थे, बस मेरी मेहमाननवाजी से खुश होकर वो मेरे दोस्त बने और फिर हमने हमारे बच्चों को दोस्त बनाया।"

प्रश्न ५. क्या आपका कोई पेनफ्रैंड कभी आपसे मिलने भारत आया?
उत्तर - "सर्वोच्च दोस्त सिद्धार्थ और इंडिया आया ट्रे, और उसका परिवार सूरज से मिलने। उसने जिद की थी कि वो छुट्टियों में सिर्फ और सिर्फ इंडिया जाकर अपने दोस्तों से मिलेगा ये हमारा परिचित नहीं था सिर्फ पेनफ्रेंड था, अब उसकी मम्मी और मैं दोस्त हैं।"

प्रश्न ६. आपके जीवन में पग पग पर परोपकार दिखता है तो उसका श्रेय आप किसको देंगी और क्यों?

उत्तर - "परोपकार नहीं, यह सब मैं अपने लिए करती हूँ क्योंकि बच्चों के चेहरे की खुशी से मुझे जो खुशी होती है न उसको मैं आपके क्या किसी के भी समक्ष बयाँ नही कर सकती। और साथ मे सेवा भावना तो परिवार से ही मिली क्योंकि पापा डिफ़ेंस में थे, ससुर जी भी।"

प्रश्न ७. आपने अनेक बालकों को गोद लेकर या फिर विविध रूपों में सहायता देकर एक माता का फर्ज अदा किया है तो उनमें से ले किस बालक की मदद करके आपको परम संतोष की अनुभूति हुई और किस कारण से?

उत्तर - "मैंने जिन बालकों को गोद लिया उनमें से बहुत से अपनी मंजिल प्राप्त कर चुके हैं और कई कोशिश कर रहे हैं। उन सब में से मुझे सबसे ज्यादा संतोष की अनुभूति अभी पिछले वर्ष गोद ली गयी हिना मेघवाल से हुई है। बहुत अच्छी बच्ची है। NMMS परीक्षा में भी उसका सलेक्शन हुआ है अभी कक्षा नौ में है। साथ ही मेरी छुटँकी अंजलि जो कक्षा तीन में मेरे पास आई थी और आज कक्षा आठ में है।"

प्रश्न ८. कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम के दौरान एक प्रोफेशनल कलाकार के समक्ष हुई अनुभूति से जरा अवगत तो कराइए।

उत्तर - "कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन सर मेरे द्रोणाचार्य जी के सामने बैठ कर ही मैं अपने आप को करोडपति नही अरबपति समझ रही थी। उन्होंने जब मेरा हाथ अपने हाथ में लिया था तो मैं जमीं पर नहीं सितारों में पहुँच गयी थी। आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं ऐसा लगा ही नहीं कि वो मेरे लिए अजनबी हैं। वह जीवन का अविस्मरणीय पल था।"

प्रश्न ९. इस कार्यक्रम में विजित राशि को दान करने के लिए आपको कितना सोचना पड़ा?

उत्तर - "जी, जैसा कि मैंने कहा कि मेरा लक्ष्य तो अमिताभ जी के सामने हॉट शीट पर बैठना था। ऐसा तो मैंने पहले ही सोच रखा था कि मुझे कम से कम इतना जीतना है, जिससे मैं अपने प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए एक शानदार सभी सुविधाओं वाला एक कमरा बना सकूं। मैं वो नहीं कर पाई इसका मलाल हमेशा रहेगा। पर ईश्वर ने मेरी सुनी और हमारा स्कूल पीएम श्री हो गया। अब आगामी 5 सालों में लगभग 10 करोड़ रुपए का कार्य हमारे स्कूल में होगा।"

प्रश्न १०. यदि आपको अपने समग्र जीवन का आकलन करने के लिए कहा जाए तो आपका क्या कहना होगा?

उत्तर - "मेरे जीवन का आकलन!

अभी तो शुरुआत है अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है। मेरे बच्चों का आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा रही तो बहुत से काम करेंगे। पर्यावरण संरक्षण के लिए इस वर्ष 530 पौधे लगाने हैं। इस विद्यालय के बच्चों को नित-नई ऊंचाइयों को छूते हुए देखना है, मेरी सोसायटी उसके लिए काम कर रही है और मेरे बाद भी करती रहेगी। 

बस ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जब तक जियूं, इन बच्चों के लिए ही कार्य करती रहूं।"

प्रश्न ११. आप अपने जीवन में किसको अपने सर्वाधिक निकट पाती हैं और क्यों?

उत्तर - "मैं अपने जीवन में सर्वाधिक निकट मेरे ईश्वर के, उसके बाद मेरे पति के, जो इस काम को करने में मुझे भरपूर सहयोग देते हैं।

फिर मेरे बच्चों के प्यार व आशीर्वाद के निकट अपने को पाती हूं। मेरे माता-पिता को जिनकी वजह से आज मैं इस दुनिया में हूँ।🙏🏻"

विलक्षण व्यक्तित्व के कृतित्व चित्रों के आलोक में










सूचना स्रोत

शोभा कंवर

प्रस्तोता






टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...