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जानी मानी शख्सियत हैं संगीत कुमार शर्मा जी

भूमिका

सृष्टि में ऐसी अनेकानेक प्रतिभाएं हैं जो असीमित क्षमता लिए हैं और वो अपने दायित्वों के साथ - साथ अनेकानेक अन्य जनहितकारी कामों में अत्यंत रुचि के साथ प्रतिभाग करके जनमानस को चमत्कृत कर देती हैं।

परिचय

साथियो आज हमारे अतिथि हैं श्री संगीत कुमार शर्मा जी। मूलतः शासकीय सेवारत हैं और साहित्यिक एवं सामाजिक क्षेत्र की एक जानी मानी शख्सियत भी। नगर की वाग्देवी साहित्यिक संस्था के सचिव पद का निर्वहन कर रहे हैं। यह संस्था मुख्यतः विद्यालयों में नवांकुरों के मध्य साहित्यिक अभिरुचि उत्पन्न करने एवं उनकी प्रतिभा को सामने लाने तथा उन्हें सम्मानित करने का कार्य करती है। समाज के निराश्रित बालकों की यथासंभव मदद करने एवं उन्हें शिक्षा की ओर उन्मुख करने के लिए भी संस्था निरंतर प्रयासरत है। इन्होंने सरकारी सेवा में आने से पूर्व एक वर्ष तक अध्यापन कार्य भी किया है। फिलवक्त 510 आर्मी बेस वर्कशॉप मेरठ कैंट में टेलीकम्युनिकेशन में तकनीकी पद पर कार्यरत हैं। इनकी गद्य लेखन और पद्य रचनाओं में अभिरुचि है। इनकी काव्य यात्रा 'अपना मेरठ' नामक कविता से आरम्भ हुई, जो दैनिक जागरण द्वारा कई वर्ष पहले अपने शहर मेरठ के बारे में मांगी गई प्रविष्टियों में प्रथम चार में चुनी गई थी। आइए आज मुलाकात करते हैं इस अनूठी प्रतिभा से।

काव्य रचना

'अपना मेरठ' 

मदमाती माटी मेरठ की 

सुखदायी हवाएं मेरठ की

बलखाती रवानी मेरठ की 

सिंहों सी शान है मेरठ की 

युगों की कहानी कहती आई 

ये माटी मेरठ की 

ये माटी मेरठ की 


लहलहाती फसलें मेरठ की

'प्रथम क्रांति' धरोहर मेरठ की

खेलो में धाक है मेरठ की 

फिल्मों में तूती मेरठ की 

सदियों का संघर्ष देखती आई 

ये माटी मेरठ की 

ये माटी मेरठ की


अजब निराले लोग यहां 

करते सदा उदघोष यहां 

शब ए बारात पे मने दिवाली 

और होली पर ईद यहां 

इतिहास का पन्ना बनती आई  

ये माटी मेरठ की 

ये माटी मेरठ की


यहां व्यापार भी है, सम्मान भी है 

यहां प्यार भी है, मनुहार भी है 

यहां गलियों और बाजारो में 

सावन सी मस्त फुहार भी है 

नफरत के नारों से हटकर 

प्रेम के फूल खिलाती आई 

ये माटी मेरठ की 

ये माटी मेरठ की


हुनरमंद यहां के शिल्पी हैं 

और मेहनत करते किसान भी हैं 

हर शिक्षक यहां शिक्षाविद है 

तो मील के पत्थर छात्र भी है 

शांतिधरा है, क्रांतिधरा है 

ये माटी मेरठ की 

ये माटी मेरठ की।।


बातचीत

प्रश्न १. श्रीमान जी, आप अपने कैरियर को अपनाने का श्रेय किसको देंगे और क्यों?

उत्तर - "परिस्थितियों को और अपने माता-पिता को। आर्थिक रूप से जब अपने पैरों पर खड़ा होने की आवश्यकता महसूस हुई तो पिताजी ने मुझे एकेडमिक एजुकेशन से हटकर तकनीकी शिक्षा लेने की सलाह दी और उसको पूरा करने में अपनी शक्ति से अधिक सहयोग दिया। भारतीय सेना में मुझे मिली नौकरी भी पिताजी के प्रयासों का ही परिणाम रही है।"

प्रश्न २. आपने अपने कैरियर को लेकर क्या धारणा बनाई हुई थी? क्या वह आपके वर्तमान कैरियर से मेल खाता था?

उत्तर - "वस्तुतः मेरी प्रकृति टेक्निकल नहीं है। मैं स्वभाव से पढ़ने और पढ़ाने का इच्छुक रहा हूं। सरकारी सेवा में आने से पहले भी मैं स्कूल में अध्यापन का कार्य करता था और शिक्षा के क्षेत्र में ही कैरियर खोज रहा था किंतु जहां आज हूं उसे विधि की क्रिया मानकर स्वीकार कर लिया है।"

प्रश्न ३. अपने पिताश्री के अवसान के बाद क्या आप कोई रिक्ति जीवन में महसूस करते हैं? यदि हां तो क्या आप बताना चाहेंगे?

उत्तर - "पिताजी का स्थान तो अब सदा रिक्त ही रहेगा यह कटु सत्य है किंतु उनकी स्मृतियां और उनका मार्गदर्शन इस रिक्तता का अनुभव मुझे नहीं होने देता है। मेरे यशस्वी पिताजी स्वर्गीय जयप्रकाश शर्मा 'जेपी' प्रख्यात कवि रहे हैं उनके लिखे दो काव्य संग्रह 'पनिहारिन लौट चलो' और 'पैगाम' प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी अनुपस्थिति में जो बात मुझे सबसे अधिक खलती है वह यह कि जब मैं उनके पास अपना लिखा कुछ लेकर जाता था तो वह एक बार में ही गलत और सही का निर्णय कर देते थे अब यह सुविधा मुझे अब उपलब्ध नहीं है।"

प्रश्न ४. तकनीकी कौशल होने के बाद भी आप गद्य और पद्य में लिखते हैं, तो आपकी कौन सी गद्य और कौन सी पद्य रचना को श्रेष्ठ मानते हैं?

उत्तर - "श्रेष्ठता का निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। सबसे श्रेष्ठ लिखूँ ऐसा लक्ष्य मेरा नहीं रहा है। गद्य मैंने काफी समय से नहीं लिखा है। एक कहानी 'रामराज्य' मेरे मित्रों की पसंद रही है। पद्य रचनाओं में 'ताजमहल', 'प्रतिबिंब', 'वापसी','देश का संदेश','धन्यवाद','समय' और 'कर्मण्यवाधिकारस्ते' मुझे लगता है ठीक-ठीक लिखी गई हैं।"

प्रश्न ५. वाग्देवी संस्था से जुड़ने के बाद से क्या आप अपने जीवन में कोई परिवर्तन महसूस करते हैं?

उत्तर - "निश्चित रूप से जिम्मेदारी का पद वहन करने से काम करने की ऊर्जा बढ़ी है सामाजिक संपर्क बढ़ा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थियों के बीच में काम करते रहने से, उनके लिए काम करने से हमें धरातल पर क्या स्थिति है इसका भलीभांति अनुमान हो रहा है। साहित्य जो रचा जा रहा है उसका एकमात्र उद्देश्य है भावी पीढ़ी का सर्वांगीण विकास, किंतु श्रेष्ठ साहित्य तक विद्यार्थियों की पहुंच नहीं है।"

प्रश्न ६. शासकीय सेवा से सेवानिवृत्ति के उपरांत आपका क्या भावी प्लान है?

उत्तर - "वाग्देवी साहित्यिक संस्था से जुड़े रहकर केवल और केवल विद्यार्थियों के बीच में रहकर श्रेष्ठ और सतसाहित्य को लोकप्रिय बनाना, अभावग्रस्त विद्यार्थियों और बच्चों की मदद करना, शिक्षा पाने से वंचित बच्चों को स्कूल के द्वारा तक पहुंचने में हरसंभव प्रयास करना।"

सूचना प्रदाता

श्री संगीत कुमार शर्मा जी

प्रस्तुति




अतिथि के साथ पत्राचार के लिए पता

निवास

बी-273, श्रद्धापुरी-2, सरधना मार्ग

मेरठ - 250001

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