यह कितना न्यायसंगत है कि “पैसा तभी अच्छा है, जब बुद्धिमानों के हाथ में हो” जबकि पैसा इस भौतिकवादी युग में सबकी ज़रूरत है?
भूमिका
उलझन सुलझन मासिक का यह स्थाई स्तंभ भी है इसी शीर्षक से जिसके अंतर्गत किसी इसी तरह की उलझन की गांठों को खोलकर उसको सुलझाने की दिशा में प्रयास किया जाता है बहुत व्यापक दायरे में श्री यशवंत जी द्वारा समझकर। आइए पढ़कर लाभ उठाइए।
सुलझन
"हम बुद्धिमान किसे कहते हैं?" उसको जो किसी परीक्षा में अच्छे अंक लाता है, उसको जो शेयर मार्केट में अच्छा पैसा बनाता है, उसको जो सरकारी नियमों से बचाव के रास्ते जानता है या उसको जो अपनी बुद्धिमानी से हर सामान सस्ते में खरीद लाता है? स्वाभाविक है कि इनमें से किसी के भी पास पैसा रहे, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। समाज को भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। ‘बुद्धिमान’ श्रेणी में आने वाले लोग प्रायः अपना फायदा निकालना जानते हैं। संभवतः यह उक्ति भी ऐसे ही लोगों ने बनाई है जो अपनी बुद्धि के बल पर पैसा अपने पास रखना चाहते हैं।
प्रत्येक जीव में जीवित रहने की इच्छा होती है जिसे हम जिजीविषा कहते हैं। जिजीविषा के साथ वर्चस्व की इच्छा भी जुड़ी है। वर्चस्व यानी लोग हमारी बात मानें। लोग बुद्धि का वर्चस्व मानते हैं, शक्ति का वर्चस्व मानते हैं और धन का वर्चस्व मानते हैं। जीवन-यापन के लिए जितनी बुद्धि, शक्ति और धन चाहिए, उसके लिए प्रयास करना ही जिजीविषा है और अधिकाधिक बुद्धि, शक्ति और धन एकत्रित करने का प्रयास वर्चस्व की आकांक्षा है। मेरे पास धन आए और लोग इस धन आने की प्रक्रिया को विधिसम्मत भी मानें, इसके लिए इस प्रकार की उक्ति बनाई जाती है कि मैं ही श्रेष्ठ हूँ और मेरे पास धन आना ही सृष्टि की सबसे उचित प्रक्रिया है। लोग दूसरों से धन अपनी ओर खींचने, सत्ता में आने और वर्चस्व स्थापित करने के लिए इस प्रकार की उक्तियाँ प्रचलित करते हैं। यदि कोई राजनैतिक दल कहे कि वही सबसे अधिक देशभक्त है और उसके सत्ता में रहने पर ही देश सुरक्षित रह सकता है, तो यह उसी तरह अपना वर्चस्व स्थापित करने और उसे विधिसम्मत ठहराने की कोशिश है जैसे यह कहना कि पैसा बुद्धिमानों के पास ही रहना चाहिए।
मानव सभ्यता के इतिहास में वर्चस्व के लिए संघर्ष लगातार चलता रहा है। पहले कभी एक व्यक्ति सेना बनाकर दूसरे राज्य पर हमला करके उस पर कब्जा कर लेता और वहाँ की संपत्ति हथिया लेता। आजकल बुद्धि-बल से ऐसी व्यवस्थाएँ बना ली गई हैं कि दूसरे देश या दूसरे लोगों की संपत्ति हथियाने के लिए शारीरिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है। पहले औद्योगिकीकरण और फिर भूमंडलीकरण के जरिये यूरोपीय देशों और अमेरिका ने ऐसी मशीनें और ऐसी व्यवस्थाएँ बनाईं कि बाकी देश मेहनत करते रहें और वे बगैर अधिक मेहनत किए सुख-सुविधाओं का आनंद लें। वैश्विक वित्तीय प्रणाली जिसमें दो या अधिक देशों के बीच सामान और मुद्राओं का लेन-देन होता है, वैश्विक संचार प्रणाली जिसमें इंटरनेट शामिल है, वैश्विक परिवहन प्रणाली जिसमें जहाजों और हवाई जहाजों का परिवहन शामिल है, पर कुछ देशों का नियंत्रण है और इसके बल पर वे पूरी दुनिया को अपने तरीके से चला रहे हैं। हम देख सकते हैं कि बुद्धि के बल पर लोग समस्त संसार की संपत्ति अपनी ओर खींच रहे हैं।
अगर हम अपने देश में देखेंगे तो पाएँगे कि दिन भर मेहनत करने वाला मज़दूर या किसान उतनी कमाई नहीं कर रहा जितना एक एमबीए या एमबीबीएस कर पा रहा है। हम स्वयं विचार कर सकते हैं कि बुद्धि के बल पर कमाने वालों और अन्य तरीके से कमाने वालों के बीच में आय का कितना अधिक अंतर है। इस अंतर से जो समाज बन रहा है, उसमें समरसता नहीं है। इसलिए हम कह सकते हैं कि पैसा केवल बुद्धिमान के पास होना उचित नहीं है। यदि हम लूट के तरीके भी देखें तो पाएँगे कि उसमें भी शक्ति का प्रयोग कम हुआ है और बुद्धि का प्रयोग बढ़ा है। पहले, अगर किसी को आपसे धन लूटना है तो उसे आपसे अधिक शक्तिशाली होना पड़ता था। डाकुओं का गिरोह आता था, लोगों को मार-पीटकर या भय दिखाकर उनसे पैसा लूटता था। आजकल कहीं दूर बैठा, दुबला-पतला, मरियल-सा व्यक्ति भी अपने बुद्धि-बल से आपका बैंक खाता खाली कर सकता है। अब लूट-पाट में भी शारीरिक बल का महत्व घट गया है।
यदि हम अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो अर्थशास्त्र इस तरह का विभेद नहीं करता। अर्थव्यवस्था की प्रगति के लिए आवश्यक है कि पैसा कहीं एक जगह एकत्रित न हो जाए, वह जितने हाथ बदलेगा, अर्थव्यवस्था भी उतनी ही गति से आगे बढ़ेगी। अर्थशास्त्रियों का विश्लेषण है कि एक गरीब को अगर एक सौ रुपये दिए जाएँ तो वह उसमें से अधिकांश राशि खर्च कर लेगा, जबकि अमीर को उतनी ही राशि मिलने पर वह अधिकांश राशि बचा लेगा और उसमें से बहुत कम राशि खर्च करेगा। यानी गरीब के पास पैसा आने पर पैसे के बाज़ार में लौटने की अधिक संभावना है। अर्थशास्त्र बुद्धिमान और बुद्धिहीन में अंतर नहीं करता।
संभवतः हम यह चाहते हैं कि धन का सदुपयोग हो, उससे समाज को बेहतर बनाने के लिए कार्य किए जाएँ, धन का भौंडा प्रदर्शन न हो और आय की असमानता कम हो। मनुष्य ने अपने बुद्धि-बल से ही यह विभेदक समाज बनाया है। लेकिन मनुष्य विवेकशील प्राणी है, वह अच्छे-बुरे में अंतर करने की क्षमता रखता है। मनुष्य अपने विवेक से अपनी क्षमताओं का उपयोग सभी के कल्याण के लिए कर सकता है। हम चाहते हैं कि ऐसे विवेकवान मनुष्यों के पास पैसा आए ताकि वे और अधिक ऊर्जा के साथ दुनिया की बेहतरी के लिए काम कर सकें।
यदि हम अपने प्राचीन ग्रंथों में इस प्रश्न का उत्तर खोजें तो पाएँगे कि धन की देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी है। विष्णु प्रजापालक हैं। भगवान राम और भगवान कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उनके चरित्र में हम करुणा, नेतृत्व-क्षमता, मर्यादा, अपनत्व, धैर्य और वचनबद्धता देखते हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण को हर प्रसंग में याद किया जाता है। प्राचीन भारतीय मनीषा से हम यह सीख ले सकते हैं कि पैसा (आप इसमें सत्ता और वर्चस्व भी जोड़ सकते हैं) तभी अच्छा है जब वह श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे गुणों वाले व्यक्ति के पास हो।
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