भूमिका
प्रकृति किस जीवात्मा के जीवन को अप्रत्याशित रूप से कितना कष्टमय बना दे प्रस्तुत वार्तालाप यह स्पष्ट कर देता है एक ऐसी युवती के जीवन के समस्त एहसासात को।
परिचय
साथियो, आज हमारे मध्य एक ऐसा इंसान है जिसको दुर्भाग्यवश अपने युवा काल में ही वृद्धावस्था का आभास करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर निवासी सोनिया सिंह नवम्बर २००६ से वर्तमान समय तक गठिया रोग (संधिवात) से पीड़ित हैं। किशोरावस्था में एक एनसीसी कैंप में साधारण बुखार से आरंभ उनकी शारीरिक अस्वस्थता से आरंभ उनकी व्याधि आज अपने विकरालतम रूप में है। उनके सभी जोड़ों में दर्द सूजन निरंतर रहती है। हल्की सी चोट या दबाव पड़ने पर प्रभावित हिस्सा नीला पड़ जाता है और हफ्ते भर तक दुखता भी है। अभी तक उन्होंने एलोपैथिक, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धतियों से उपचार के साथ-साथ फिजियोथेरेपी, एक्यूप्रेशर थेरेपी पंचकर्म इत्यादि करवाई हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक किसी से भी लाभ नहीं मिला है। उल्टा दवाइयों के दुष्प्रभाव से दोनों आंखों में मोतियाबिंद बन गया है।अत्यधिक एसिड बनने के कारण उनके ९५% दांत खत्म हो चुके हैं। उनके हाथों की सभी अंगुलियों का बीच वाला जोड़ लगभग डिस्फंक्शनल हो गया है। कोहनी पर से हाथ ना खुलते हैं ना ही मुड़ते हैं। उन्होंने अपना स्वयं का चेहरा २०१० के बाद से छूआ तक भी नहीं है।उनके कमर और घुटने भी मुड़ गये हैं बल्कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पाती हैं। दैनिक क्रियाओं के लिए भी व्हील चेयर पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अपनी पसंद का खा नहीं सकतीं, पहन नहीं सकतीं, कहीं घूम-फिर नहीं सकतीं। जीवन नर्क जैसा महसूस होता है, कभी-कभार अत्यंत आवश्यक कार्यवश अगर कहीं आना जाना पड़ जाए तो अगला पूरा हफ्ता जोड़ों और मांशपेशियों के असहनीय दर्द और सूजन के दौर से उनको गुजरना पड़ता है। रही बात डाक्टर और इलाज की बात तो उनको डाक्टर फ़रिश्ते कम और व्यापारी ज्यादा लगते हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य अपनी तिजोरी भरना भर है और उन्हें किसी के जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है। आइए आज एक इंसान के दर्द को साझा करते हैं और ईश्वर से कामना करते हैं कि उनको उनकी पीड़ा से मुक्ति दे जिससे वो भी सामान्य तरीके से जीवन यापन कर सकें।
वर्तमान स्थिति
बातचीत
प्रश्न १. सोनिया जी आपका बाल्यकाल जैसा रहा और आपके कष्टों का समय कब से और कैसे आरम्भ हुआ?
उत्तर - "जैसा कि मम्मी जी बताती है कि जन्म के तीन चार महीने बाद मुझे लू लग गई थी, जिसकी वजह से मैं शुरूआती चार साल तक अस्वस्थ रही, लेकिन पांच साल की होते-होते मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गई थी। फिर उसके बाद अगले पंद्रह सालों तक मैंने अस्वस्थता महसूस नहीं की, बस कभी-कभार इक्का दुक्का दिन बुखार भर रहा होगा। वर्ष २००६ में अक्टूबर माह के आखिरी सप्ताह में मेरा NCC कैंप सहारनपुर से कुशीनगर जिले में गया। यह वह समय था जब मेरी ग्रह दशा बदल रही थी। उस समय उस क्षेत्र में जापानी बुखार ने दस्तक दी हुई थी जो भारत में नया था। यहां के डाक्टर उसे सामान्य बुखार समझकर उपचार कर रहे थे। मुझे भी शायद वही बुखार आया था। इसलिए प्राथमिक उपचार के तौर पर मुझे जो दवाइयां दी गईं। उन्होंने मुझ पर कोई असर नहीं दिखाया, कैंप खत्म करके जब मैं घर पहुंची तो फैमिली डाक्टर से चैकअप करवाया। उन्होंने वायरल व टायफायड बुखार की पुष्टि की, जिसका उन्होंने विधिवत इलाज शुरू किया, लेकिन जब दो महीनों तक भी बुखार में कोई सुधार नहीं आया तो उन्होंने अपनी असमर्थता जताते हुए मुझे बुखार स्पेशलिस्ट डॉक्टर से इलाज करवाने को कहा। फिर मैं उनके पास दौड़ी, पर मेरा रोग उनकी समझ से भी बाहर निकला। सहारनपुर के तमाम नामचीन डाक्टर्स से इलाज करवाने के बाद आसपास के जिलों में इलाज करवाया, पर फायदा तो तब हो जब डाक्टर को असल रोग का पता चले। सभी डॉक्टर्स मुझे पेनकिलर दे रहे थे जो मात्र मेरा दर्द कुछ घंटे के लिए थोड़ा कम कर पाते थे। दवाई का असर खत्म होते ही मैं बुरी तरह से कराह उठती थी। सारी-सारी रात मैंने रो-रोकर गुजारी है। बुढापे को लोग खुद में एक बीमारी क्यों कहते हैं इसका बहुत गहराई से अनुभव किया है मैंने।"
प्रश्न २. आप लंबे समय तक उपचार में रही हैं तो आपकी प्राथमिक समस्या का उपचार आपके अनुसार आपके फैमिली डॉक्टर ने किया तो वो डॉक्टर क्या रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर थे?
उत्तर - "जी, मेरे क्षेत्र के बहुत प्रतिष्ठित और रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर है वह। वह आजकल के डाक्टर की तरह बिल्कुल नहीं हैं, अगर कोई रोग उनकी समझ से बाहर होता है तो वह इंसान को स्पष्ट कह देते हैं ना कि लोगों को गुमराह करके अपनी तिजोरी भरते हैं। मेरी अस्वस्थता के दौरान मुझे अभी तक तीन डाक्टर ही ऐसे मिले हैं जिन्होंने मुझसे स्पष्ट रूप से कहा है कि उनके पास मेरी बीमारी का कोई परमानेंट हल नहीं है, जिनमें से एक मेरे मित्र भी हैं।"
प्रश्न ३. अभी तक के असहज जीवन में कब कब आपको लगा कि अब स्थिति सुधार की ओर है?
उत्तर - "शुरुआती पहले दूसरे महीने में हर डाक्टर की दवाई पकड़ करते हुए महसूस हुई, लेकिन जैसे ही उन्होंने इलाज को लेकर मेरा अनुभव जाना उसके बाद आराम की दर में गिरावट होती चली गई, साथ ही मेरा रोग असाध्य तथा विकरालतम रूप लेता चला गया।"
प्रश्न ४. इतना लंबा बीमारी का समय है तो ना जाने कितने चिकित्सकों से परामर्श किया गया होगा। तो उन सब में लाभ ना होने के बावजूद भी क्या कोई चिकित्सक ऐसा रहा जिसको लेकर आपके मन में विश्वास रहा हो कि यह मुझको ठीक कर देगा?
उत्तर - "मैं प्रत्येक चिकित्सक के पास इसी उम्मीद के साथ गई कि यह भला मानुष मुझे स्वस्थ कर देगा। कई चिकित्सक तो मुझे ऐसे भी मिले जिन्होंने गारंटी ली थी कि वो इस बीमारी को कुछ महीनों में ठीक कर देंगे। मैंने उनसे साल दो साल इलाज करवाया। अंततः उनकी बातें झूठी साबित हुईं और मुझे दवाइयों के दुष्प्रभावों के रूप में कुछ ना कुछ सौगात मिलती चली गई।"
प्रश्न ५. आपकी अस्वस्थता के दौरान आपके प्रति परिजनों का रवैया कैसा रहा? इस संदर्भ में परिवार के किस परिजन को आपने अपने लिए सर्वाधिक दुःखी महसूस किया? और? ऐसा आपको क्यों लगा?
उत्तर - "वैसे तो समस्त परिजन, मित्र, रिश्तेदार, मौहल्ला, पड़ोसी जो भी मुझे पहले से जानता है सभी बहुत दुःखी होते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा माता-पिता व रक्त संबंधी आहत हैं। माता-पिता को तो जैसे अपनी तैयार हुई फसल बर्बाद होते हुए देखनी पड़ी है।"
प्रश्न ६. अपनी चिकित्सा के समय कौन चिकित्सक आपको स्पष्ट ही कुटिल महसूस हुआ? आपने यह निष्कर्ष कैसे निकाला?
उत्तर - "ऐसे तो कई मिले हैं जिनमें से एक सोनीपत में थे जो मुझको नीयत से भी गलत लगे। इलाज करने के बहाने गलत स्पर्श की चेष्टा भी करते थे, हालांकि उनके पास मैं मात्र दो बार ही दवाई लेने गई। पहली बार मुझे लगा शायद मैंने ही गलत समझ लिया है, लेकिन जब दूसरी बार भी उन्होंने वैसी ही हरकत की तो मैं बहुत आहत हुई कि इंसान का स्तर कितना गिर गया है कि वह ना अपनी उम्र का लिहाज कर रहा है और ना ही दूसरे इंसान की हालत देख रहा है, फिर मैंने उनसे इलाज करवाने से ही मना कर दिया था।"
प्रश्न ७. आपका जीवन प्रतिकूल स्थितियों से भरा है फिर भी आपको क्या कुछ जीवन के प्रति आकर्षक और प्रेरणास्पद लगता है?
उत्तर - "अपनी से बुरी स्थिति के लोगों को जब देखती हूं तब लगता है कि मैं जैसे भी हालात में हूं ईश्वर ने मुझे बहुत हद तक संभाल रखा है अन्यथा बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास ना तो परिवार है ना ही कोई परवाह करने वाला है। मैं फिर भी बहुत सौभाग्यशाली हूं ईश्वर ने मुझे इतनी परवाह करने वाला परिवार दिया है। बाकी दु:ख-सुख तो कर्मों की देन है इसलिए कर्म की फसल तो हर किसी को काटनी ही है तो मैं कैसे उससे अछूती रह सकती हूं। नियति के खेल को कोई रोक नहीं सकता ना ही बदल सकता है। हां, सकारात्मक रहकर उसे स्वीकार करके उसके अनुरूप मानसिक स्थिति तैयार करके उससे कुछ हद तक राहत पायी जा सकती है। ईश्वर ने जिसको जो भी दिया है उसकी योग्यता के अनुरूप दिया है चाहे सुख-दु:ख हो, चाहे सफलता-विफलता हो, चाहे चुनौतियां या अवसर हों। जैसे सबसे कठिन रोल सबसे उम्दा कलाकार को मिलता है वैसे ही अगर किसी के जीवन में कठिनाइयां ही कठिनाइयां हैं तो ईश्वर की नजर में वह इंसान उसका सबसे उम्दा कलाकार है। इसीलिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण भूमिका ईश्वर ने उसे दी है ताकि ईश्वर उसे सबसे महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी उसे सौंप सकें।"
प्रश्न ८. क्या अभी भी आपको स्वास्थ्य लाभ की उम्मीद लगती है और यदि किन्हीं भी प्रयासों से आपको स्वास्थ्य लाभ होता है तो आपकी क्या करने की मनेच्छा होगी?
उत्तर - "खोई हुई संपदा तो इंसान आखिरी दम तक पाना चाहता है फिर चाहे वह संपदा पैसे की हो अथवा स्वास्थ्य की हो या किसी भी अन्य रूप में हो। मैं भी अपना स्वास्थ्य हर कीमत पर पाना चाहती हूं। साथ ही मैं स्वस्थ होने के बाद अपने जैसे लोगों के लिए सोशल वेलफेयर में काम करना चाहती हूं, क्योंकि मुझे यह भलीभांति पता है कि जब इंसान इस तरीके से लाचार हो जाता है और चाहकर भी अपनी इच्छानुसार कार्य नहीं कर पाता तो वह अंदर ही अंदर कितना परेशान होता है। अतः मैं ऐसे लोगों के लिए काम करना चाहती हूं और उनकी मन:स्थिति को बदलने की दिशा में काम करना चाहती हूं। मनःस्थिति की हमारे स्वास्थ्य में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है, जो कोई इंसान शारीरिक रूप से परेशान होता है तो उसमें उसका दिमाग, उसकी मानसिक स्थिति सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, अगर मानसिक रूप से वह स्वस्थ रहे और अपनी वस्तुस्थिति को स्वीकार कर ले तो उसके शारीरिक कष्ट में 90% तक राहत पहुंचाई जा सकती है तो मैं इस दिशा में काम करना चाहती हूं।"
सूचना स्रोत
सोनिया सिंह
प्रस्तोता




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