भूमिका
जीवन से अनुकूलन का अर्थ है बदलते हुए परिवेश और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना। यह वह महत्वपूर्ण गुण है जो हमें नई चुनौतियों का सामना करने और सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक, अनुकूलन जीवन में निरंतर विकास और स्थिरता सुनिश्चित करता है।
समझें भी!
विश्रामावस्था इंसान का सर्वप्रिय और सर्वाधिक चैन का वह समय है जब वह शिथिलावस्था में आंतरिक सुख की अनुभूति तो करता है लेकिन यह वह समय है जो शरीर को काहिल बनाता है और इस स्थिति में भी इंसान सुख और दु:ख के सम्मिलित जीवन चक्र को तोड़ सिर्फ और सिर्फ सुख की अनुभूति कर सके। ऐसा संभव नहीं है। इंसान सक्रिय रहे या फिर विश्रामावस्था में सुख और दु:ख आते जाते ही रहेंगे। प्रकृति और परिस्थिति से हम उक्त संदर्भ में सीख ले सकते हैं। पतझड़ के दौरान वृक्षों से जब पत्तियां गिर जाती हैं तो यह स्थिति किसी भी वृक्ष का अंत नहीं है। जिस प्रकार वृक्ष धैर्यपूर्वक वसंत की प्रतीक्षा करता है ठीक उसी तरह इंसान को भी कष्ट के पलों को बीत जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सुख और उल्लास की स्थिति ठीक ऐसे है जैसे कि किसी वृक्ष पर नई कोंपलें दस्तक देती हैं। जिस प्रकार जीव-जंतु शीतनिद्रा में चले जाते हैं और ऊर्जा संचित कर पुनः सक्रिय होने की तैयारी करते हैं। ठीक ऐसे ही दु:ख या कष्ट अथवा कठिन परिस्थितियों का समय इंसान को परखकर उसे अनुभवी एवं दृढ़ बनाता है। दुनिया भर में अपने कौशल को परिष्कृत करने वाले लोग परिष्कृति की स्थिति तक पहुंचने के उपरांत ही पुरस्कृत हुए। अब उनके कौशल विकास की परिष्कृत स्थिति उनके लिए सुखकारी कही जा सकती है।
जीवन के सुख और दु:ख के इस चक्र में जब भी आगे की कोई राह न सूझे तब हमें धैर्य और सहनशीलता से काम लेना चाहिए। परिस्थितियों से अनुकूलित होकर हमको अपने भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता को संरक्षित करन चाहिए और जिस तरह प्रकृति हर जटिल स्थिति के बाद नवजीवन को प्राप्त करती है, वैसे ही हमें भी विश्वास रखना चाहिए कि हर दु:ख के बाद सुख और हर अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है और आएगा। सुख अथवा दु:ख की भांति जीवन की प्रत्येक स्थिति और परिस्थिति अस्थायी है और हमें अपनी और परिवेश की संभावनाओं का आकलन करना और उनको पहचान कर नए सिरे से शुरुआत करना निश्चित ही आना चाहिए। इसलिए, जीवन चक्र को स्वीकारें, उससे अनुकूलन करना सीखें और आगे बढ़ें। प्रकृति के ऐसे अनंत उदाहरणों से प्रेरणा लेकर हम तमाम उलझनों को अपने स्तर से सुलझा सकने में सक्षम हो सकते हैं और अपनी रचनाधर्मिता को फिर से जाग्रत कर सकते हैं।
प्रकृति प्रेमी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की भांति अनेकानेक मानव संसाधनों ने स्वीकारा कि 'प्रकृति को अपना शिक्षक बनने दो' अर्थात जीवन में संतुलन, खुशहाली और रचनाधर्मिता के लिए हमें प्रकृति से जीवन के सुख - दु:ख के चक्र को सीखने की आवश्यकता है। प्रकृति ही हमें यह सिखाती है कि जीवन में किसी भी प्रकार की भी उलझन आए, उसको अपने ही स्तर से सुलझाया जा सकना संभव है। ऐसा करके हम ना सिर्फ अपने बल्कि औरों के जीवन को भी खुशहाल और अर्थपूर्ण बना सकते हैं।
शब्दशिल्प

बहुत अच्छा आर्टिकल
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