भूमिका
मुक्तक; काव्य का वह रूप है, जिसमें एक ही छंद में एक विचार, एक भाव या एक अनुभूति को बिना किसी पूर्वोपर संबंध के अपनेआप में पूर्णता के साथ प्रस्तुत किया गया हो। मुक्तक काव्य अपनेआप में पूर्ण स्वतंत्र काव्य रचना (छंद/इकाई) होती है। इसकी पूर्णता के लिए ना तो इसके पहले और ना इसके बाद में, किसी संदर्भ या कथा की आवश्यकता होती है। इसको इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह ऐसे है जिस प्रकार एक मोती सौन्दर्य की एक इकाई होता है। उसका सौन्दर्य अपने आप में पूर्ण होता है। उसके लिए किसी दूसरे मोती, सोने, चाँदी या अन्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है। यहां पर उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण के मुक्तकों की श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। यहां पर उनका प्रेषण नियमित रूप से प्रतिदिन किया जाएगा।
मुक्तक
जगत के प्राणी सभी हम अंश हैं भगवान के।
रास्ते भी साथ लाते अपने हम कल्याण के।
किन्तु माया में उलझ हम भूल जाते हैं सभी,
इसलिए ही निकट नहिं आ पाते हम भगवान के।।
(२९.०६.२०२४)
बन्दे जीवन में कभी मत करना अभिमान।
अभिमानी मानव कभी नहीं भाता भगवान।
काया माया जगत में मात्र पलों का खेल,
ये सब नश्वर जगत में नहीं समझे इन्सान।
(३०.०६.२०२४)
जीना मरना जगत में सब विधना के हाथ।
खाली आया जायेगा तू खाली ही हाथ।
द्वेष, दंभ और कपट से खुद को रहा लपेट,
कैसे मुक्ति पायेगा जब धर्म कर्म न साथ।
(३०.०६.२०२४)
मानव जीवन जगत में होता है अनमोल।
पर मानव नहीं समझता जग में इसका मोल।
धर्म कर्म की बात को मिथ्या ही बतलाय,
नहीं कभी भी देखता मन की आंखें खोल।
(३०.०६.२०२४)
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