भूमिका
भारत में विजय सिंह 'पथिक' एक जाना पहचाना नाम है। भारतीय जनमानस के मस्तिष्क में सामाजिक सरोकारों का जिक्र होते ही यह नाम कौंधता है। दिल्ली में उनकी स्मृति में आयोजित कार्यक्रम का पूर्ण विवरण यहां पर उलझन सुलझन के द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है और इसके साथ ही प्रख्यात रचनाकार डॉ. महिपाल का एक आलेख भी उनकी सहमति से प्रस्तुत किया जा रहा है इन उम्मीदों के साथ कि पाठकों को पसंद आएगा।
कार्यक्रम विवरण
जून, 2024 के प्रथम दिन शाम दिल्ली बार एसोसिएशन, तीस हजारी कोर्ट और पथिक लॉयर्स फोरम, दिल्ली द्वारा हर वर्ष की भाँति महान स्वतंत्रता सेनानी वीर विजय सिंह पथिक की पुण्य तिथि 29 मई के स्मरण में स्मृति व्याख्यान का आयोजन दिल्ली के तीस हजारी परिसर में किया गया!
निमंत्रण पत्रक
वक्तागण
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता खटाना साहब ने की। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ. राकेश राणा रहे और विशिष्ट अतिथि के रूप में एडवोकेट ज्ञानेंद्र अवाना जी मंच पर मौजूद रहे! कार्यक्रम का संचालन युवा एडवोकेट और तीस हजारी कोर्ट बार एसोसिएशन के निर्वाचित सदस्य प्रदीप नागर ने किया, जबकि कार्यक्रम के मंचासीन अतिथियों का विस्तार से परिचय एडवोकेट प्रिया नागर ने कराया!
मुख्य वक्ता राकेश राणा के साथ अधिवक्तागण
मंचासीन अतिथि
अध्यक्ष द्वारा आमंत्रण
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता खटाना जी ने क्रमवार अतिथियों को बोलने के लिए आमंत्रित किया।
मुख्य वक्ता डॉ. राकेश राणा ने महान किसान नेता स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह 'पथिक' पर अपना व्याख्यान केंद्रित रखा।
"विजय सिंह 'पथिक' भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर वह एकमात्र नेतृत्व है जिसने समाज के साथ मिलकर सफल सत्यागह की शैली ईजाद की। 'पथिक' जी का जन्म होली के दूसरे दिन दुल्हेंडी 27 फरवरी, 1884 को हुआ था। उनका मूल नाम भूप सिंह राठी था। उनके पिता और माता के परिवारों की 1857 की क्रांति में सक्रिय भागीदारी थी। 'पथिक' इन्दौर में 1905 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी देशभक्त शचीन्द्र सान्याल के सम्पर्क में आये। उन्होंने 'पथिक' जी को रासबिहारी बोस से मिलवाया। क्रांतिकारियों के इस समूह में 'पथिक' जी कई महत्वपूर्ण कार्यवाहियों का हिस्सा रहे। 1912 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाया तो क्रांतिकारियों ने उद्घाटन समारोह में वायसराय के जुलूस पर चांदनी चौक में बम फेंका। इस कार्यवाही में 'पथिक' जी शामिल थे। 1914 में रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल ने सम्पूर्ण भारत में एक साथ सशस्त्र क्रांति के लिए अभिनव भारत समिति नाम का संगठन बनाया। 'पथिक' जी को इस काम के लिए राजस्थान का जिम्मा सौंपा गया। अजमेर से प्रमुख समाचार पत्रों का सम्पादन और प्रकाशन प्रारम्भ किया। बिजौलिया का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन, बेगू किसान आन्दोलन, सिरोही का भील आन्दोलन, बरार किसान आन्दोलन ये सब बडे किसान आन्दोलन 'पथिक' जी के नेतृत्व में खड़े हुए। राजस्थान के स्वतंत्रता आन्दोलन का विस्तार कर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक ले गये। उस दौर के बड़े नेता गांधी और तिलक थे। उन तक राजस्थान के स्वतंत्रता संघर्ष की पूरी योजना और परिणामों को पहुँचाया। ऐनी हडसन के जरिये ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में राजस्थान स्वतंत्रता संघर्ष की आवाज को उठाया। रियासतों के दमन और शोषण को समझाने वाली विशाल प्रदर्शनी अधिवेशन स्थलों पर आयोजित की। यह सब 'पथिक' जी की दूरदृष्टि और नेतृत्व शैली को समझने के लिए पर्याप्त है। 1920 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की गई। इसके माध्यम से सत्याग्रह के प्रयोग शुरू किए। बाद में सेवा संघ की गतिविधियों का केन्द्र अजमेर बना। देशभक्त युवाओं को खोज-खोज कर आन्दोलन में शामिल किया गया। माणिक्य लाल वर्मा, राम नारायन चौधरी, हरिभाई किंकर, नैनूराम और मदन सिंह करौला जैसे देशभक्त और आजाद भारत के बड़े नेता 'पथिक' जी के राजस्थान सेवा संघ की ही देन थे। 1929 में 'पथिक' जी राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये।"
विशिष्ट अतिथि का संबोधन
विशिष्ट अतिथि ज्ञानेंद्र अवाना जी ने भारतीय न्याय संहिता में आपराधिक विधानों के तीन मुख्य परिवर्तित प्रावधानों पर विस्तार से अपनी बात कही।
"नमस्कार आज हम बात करेंगे जो अभी हमारी देश की पार्लियामेंट;; लोकसभा और राज्यसभा; ने हमारे जो देश के तीन महत्त्वपूर्ण कानून हैं क्रिमिनल जिनको पास किया है और अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने बाकी हैं वह भी एक दो दिन में हो जाएंगे और उसके बाद नोटिफिकेशन होने के बाद यह तय हो जाएगा कि किस तारीख से इनको लागू किया जाएगा और उसके बाद यह जो हमारे भारत के तीन अंग्रेजी जमाने के जो कानून थे इंडियन पैनल कोड, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और इंडियन एविडेंस एक्ट इन तीनों को ये रिप्लेस कर देंगे।" तदुपरांत अतिथि महोदय ने इस परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले प्रभाव का विवरण दिया और विस्तार से उसे प्रभावों और दुष्प्रभावों के साथ ही उत्पन्न होने वाली स्थितियों तथा उनसे पार पाने वाले तरीकों का विस्तार से वर्णन किया।
कार्यक्रम के प्रतिभागी अधिवक्ता
विजय सिंह पथिक - एक पूर्वकालिक आलेख
सामाजिक निवेश के नायक थे 'पथिक'
डॉ. महिपाल
विजय सिंह 'पधिक' जी ने भारत की अनेक क्रांतिकारी हलचलों में भाग लिया और गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें अपन नाम तक भी बदलना पड़ा। किसी समय के भूप सिंह विजय सिंह 'पथिक' बन गए। सरदार पटेल की भांति उनका उदाहरण भी यह सिद्ध करता है कि साधारण जनता के भीतर से भी नेतृत्व पनप सकता है। 'पथिक' जी का जन्म 27 फरवरी, 1884 को एक किसान परिवार में बुलंदशहर जिले के गुलावटी होशियारपुर गांव में हुआ था। उनके पूर्वजों ने 1857 की सशस्त्र क्रांति में भाग लिया था। 'पथिक' जी ने बाद के वर्षों में राजस्थान को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया था। उस समय राजस्थान अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में विभक्त था और चारों ओर सामंतवाद का बोलबाला। वहां उन्होंने राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। आजादी के आंदोलन के समय किसानों पर भयंकर अत्याचार हो रहे थे। बिजौलिया में किसानों का आंदोलन दबाया जा रहा था। बिजौलिया के किसान सत्याग्रह के सिलसिले में ही 'पधिक' जी गणेशशंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए और दोनों की मित्रता अंत तक बनी रही।
महात्मा गांधी ने 'पधिक' जी के बारे में ये शब्द कहे थे, "मैं पथिक के बारे में कुछ बता सकता हूं। वह एक सिपाही आदमी है, बहादुर है, जोशीला है और तेज मिजाज है, पर जिद्दी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बिजौलिया की जनता का उन पर पूरा-पूरा विश्वास है।"
उन्होंने समाज, देश व राजनीति से संबंधित अनेक साहित्यिक रचनाएं कीं। 'पधिक' जी ने राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, राजस्थान संदेश, व नव संदेश समाचार पत्रों को संपादित भी किया। गीता के निष्काम कर्मयोग में उनकी गहरी आस्था थी, लेकिन धीरे-धीरे उन पर मार्क्सवाद का प्रभाव गहरा हो गया। वह कभी जात-पांत के पचड़े में नहीं पड़े। कोई अगर उनसे पूछता भी कि आप किस जाति के हैं, तो कहते कि आपको जो जंचे वही मान लो।
जब देश आजाद हुआ और महात्मा गांधी कांग्रेस से निराश होने लगे, उन्हीं दिनों 'पथिक' जी गांधी जी से मिले। उनसे गांधी जी ने कहा कि उन्हें राजस्थान में ही जमकर बिजौलिया की शैली पर कार्य करना चाहिए। उनके कहने के अनुसार पथिक जी राजस्थान लौटे। वह अजमेर जाने की व्यवस्था कर रहे थे, क्योंकि वह राजस्थान में जनजागृति के लिए राजस्थान सेवाश्रम नामक संस्था स्थापित करना चाहते थे। उसी दौड़ धूप में उन्हें लू लग गई और 28 मई 1954 को यह महान क्रांतिकारी नेता चिरनिद्रा में सो गया।
समाज को कैसे संगठित किया जाए इसके बारे में पथिक जी की बहुत पकड़ थी। उन्होंने अनेक संगठन बनाकर समाज को खास उद्देश्य के लिए लामबंद करके उनमें सामाजिक पूंजी का निर्माण किया, जो उस समय के समाज के विकास का महत्वपूर्ण साधन रहा।
प्रस्तोता
बहुत बेहतरीन कार्यक्रम।राणा सहाब बहुत अच्छे वक्ता हैं।आपको कई बार सुना है।
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