सामाजिक जीवन में हमें ऐसे अनेकानेक उदाहरण मिलेंगे, जब हमें लगा होगा कि एक बार जो काम हमने किया, वह बहुत ही अच्छा और फलदायी रहा, वहीं जब दूसरी बार वही काम किया, तो परिणाम निराशाजनक रहा। ऐसा होने में सकारात्मक या फिर नकारात्मक परिवेश भी अपनी भूमिका अक्सर निभाता है, अन्यथा यदि आप, हम या कोई भी कुछ मापदंडों को स्मरण रखकर सकारात्मक दृष्टिकोण से काम करे तो पूर्व में किए गए काम से बेहतर परिणाम भी आ सकते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि एक ही काम, एक ही करने वाला और एक जैसी ही कार्य प्रकृति व समय, लेकिन नतीजे फिर भी अलग-अलग। यह वास्तव में ईश्वरीय व्यवस्था है विविधता पैदा करने और सब ही के लिए मध्य मार्ग निकालने के ध्येय से, लेकिन इसमें भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि सिर्फ गुणवत्ता मापदंड सख्ती से तय करने पर एक ही काम, एक ही करने वाला और एक जैसी ही कार्य प्रकृति व समय, और! नतीजे भी यूनिफॉर्म प्राप्त कर लिए जाएं। इसी तरह एक ही काम में लगे दो समान लोगों के साथ भी होता है। एक ही कक्षा में कई विद्यार्थी होते हैं, लेकिन सबका नतीजा समान तो नहीं होता। इस अंतर का एकमात्र कारण एकाग्रता, तल्लीनता, तन्मयता संबंधी भिन्नता में निहित है। जो जिस समय अपने काम में थोड़ा एकाग्र, तल्लीन और तन्मय होगा, उसका काम उस समय में उतना ही सुचारु और अच्छी गुणवत्ता वाला होगा। जो अधिक एकाग्रता से ध्यान केंद्रित करेगा, उसके विचार उतने ही स्पष्ट और उत्कृष्ट होंगे। हम जितनी तन्मयता, तल्लीनता से काम में जुटेंगे, एकाग्रता उतनी ही सूक्ष्म होगी और यह सूक्ष्मता ही किसी कार्य की परिष्कृति में झलकती है। दुनिया में ऐसे असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें सूक्ष्मता से प्रयास हुए और उम्मीद के अनुसार ही परिणाम भी मिले।
दरअसल मन की स्थिरता, केंद्रीकरण और समग्रता को ही एकाग्रता, तन्मयता और तल्लीनता कहा जाता है। यह सारा खेल हमारे मन का है। शरीर तो साधन भर है। असली कलाकार हमारा मन ही है, जिसकी शक्ति हमें एकाग्रता की ओर ले जाती है और कार्य विशेष में तल्लीन कर देती है। दुनिया की तमाम महान विभूतियों के जीवन पर नजर डालें, तो पाएंगे कि उनकी सफलता का रहस्य मन की शक्ति में छिपा था। वर्ष २०२२ में पद्मश्री पुरस्कार से विभूषित महिला शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान देने वाले ओमप्रकाश गांधी जी हों या फिर कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय करने वाले सेठपाल।
दोनों ही ने अपने क्षेत्र में अपने मन से प्रेरित होकर सूक्ष्म निर्णय कर जो भी निर्णय लिए उनमें उनको सफलता मिली। सच है कि वास्तविक कर्ता तो मन है, जो हमें सफलता की ओर ले जाता है। जब हम मन की शक्ति से एकाग्रता, तन्मयता को हासिल कर लेते हैं, तो फिर कोई भी कार्य असंभव नहीं रह जाता। इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य के मन के भीतर ही लौकिक, पारलौकिक सारी शक्तियां सुरक्षित रहती हैं। मन की स्थिरता का अर्थ होता है- उसमें सभी प्रकार की शक्तियों की उपस्थिति और शक्तियों की उपस्थिति का मतलब होता है सफलता। जबकि मन का परिभ्रमण अर्थात् डांवांडोल होना यह स्पष्ट बताता है कि हमारे भीतर शक्तियों का अभाव है और इसी वजह से हम सफलता को स्पर्श नहीं कर पाते। जीवन में निश्चित सफलता पाने के लिए मन में एकाग्रता और सूक्ष्मता का होना बेहद जरूरी है। मन चंचल प्रकृति का होता है। इसलिए पहले उसे साधना होगा और उसे स्थिर व शक्तिशाली बनाना होगा। मन को शक्तिशाली बनाने के लिए जरूरी है कि उसे मुक्त और निर्भय रखा जाए। मन की दो ही गतियां होती हैं। या तो यह मनुष्य को अपना दास बना लेता है या फिर स्वयं मनुष्य का दास बन जाता है। इनमें होता यह है कि अगर मन कमजोर पड़ने लगा और हम उसके दास होते चले गए. तो क्या होगा? हम इच्छाओं, लिप्साओं, तृष्णा के जाल में फंसने लगेंगे और अंततः हमारी भीतरी शक्तियों का ह्रास होने लगेगा। अगर मन निरंकुश होता चला गया, तो भी वह मनुष्य को अपना दास बना लेगा। और अगर हमने मन को काबू करना तथा जीवन में सूक्ष्मता का प्रभाव जान लिया तो हम फिर उसके गुलाम नहीं रहने वाले। आखिर समझोगे तो पाओगे कि मन की शक्ति में ही छिपा है सफलता का राज।
दैनिक अमर उजाला से उद्धृत पाठ्य का संशोधित रूप


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