सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दुनिया - प्रतिभा जोशी

पुस्तक विवरण

शीर्षक - दुनिया


पुस्तक आवरण
संपादिका - श्रीमती प्रतिभा जोशी, अजमेर (राजस्थान)

प्रेरणादायी सन्देश - डा. सूरज सिंह नेगी, वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रशासनिक अधिकारी, जयपुर

प्राक्कथन - श्रीमती प्रतिभा जोशी 

कहानी समीक्षक - शिवराज कुर्मी, संयोजक, साहित्य मंच टोडारायसिंह जिला केकड़ी (राजस्थान)

मन की बात - डा. मधु खंडेलवाल, मधुर, वरिष्ठ साहित्यकार, अजमेर  (राजस्थान)

कुल संकलित कहानियाँ - 24

आवरण पृष्ठ का विवरण - रंगीन आसमान में विचरण करते पक्षी, तालाब में खूबसूरत खिले कमल के फूल, तैरती बत्तखें, उछलकूद करती मछलियाँ|

विशेषता- पुस्तक के अन्दर खूबसूरत चित्र श्री कृष्ण जी का|

पुस्तक प्रकाशक - साहित्यागार, चौड़ा रास्ता, जयपुर (राजस्थान)

कहानी समीक्षा         

कहानी क्रमांक 10

कहानी का नाम - चांदी की ईमानदारी।

कहानीकार - श्रीमती प्रतिभा जोशी, अजमेर।

कहानी के मुख्य पात्र - कमला एवं उसका पति एवं घर का काम करने वाली बाई।

प्रस्तुत कहानी गृहस्थ जीवन पर आधारित है। कमला ने जन्माष्टमी के दिन अपनी अलमारी से नया चांदी का गिलास निकाला। वह अपने पतिदेव से कहती है, "देखो जी! आज जन्माष्टमी है, तो मैं आज से अपने लड्डू गोपाल जी को इस चांदी के गिलास में दूध पिलाऊंगी।"

उसके पतिदेव व्यापारी थे। उन्होंने बोला, "ध्यान रखना। मुझसे मिलने वाले अनेक आते हैं। अपने घर पर काम करने बाई भी आती है। अगर गुम हो जाये तो मुझे मत कहना।"

कमला ने कहा, "चिंता मत करो।" कमला ने दूध भरकर चांदी का गिलास मंदिर में भगवान् के पास रख दिया और मंदिर को फूलों से सजाने लग गयी। दिन भर अनेक लोग दर्शन करने आये। काम वाली बाई भी साफ-सफाई करने आयी। 

इसी तरह दिन बीतते गये। एक दिन कमला ने मंदिर के सभी बर्तन मांझकर छोटी टोकरी में रख दिए। भूलवश चांदी के गिलास को रसोई में ही बर्तनों के दूसरे छींके में रख दिया।

काम बाली बाई बर्तन साफ करने आयी तो उसने बर्तन साफ कर रसोई वाले छींके में रख दिये। गिलास नीचे दब गया। बाई कार्य से निवृत्त होकर कमला के पास आकर बोली, "मेरा बेटा बीमार है और मैं दो दिन काम पर नहीं आऊंगी।" पूजा से उठकर कमला ने कहा, "तुम जल्दी जाओ, अपने बच्चे का ध्यान रखना। मैं सम्भाल लूंगी।"

अब कमला घर का काम निबटाने लगी। उसको अचानक याद आया कि आज तो भगवान् को दूध नहीं रखा। वो चांदी का गिलास ढूंढने लगी लेकिन गिलास वहाँ नहीं मिला। कमला परेशान हो उठी। उसने आव देखा न ताव, तुरंत बिना सोचे समझे काम वाली बाई को फोन लगा दिया। उसको गुस्से में कहने लगी, तुमने मेरा चांदी का गिलास चुरा लिया। कल से काम पर मत आना।"

इतनी नोकझोंक होने के बाद कमला रसोई में आकर गुस्से को शांत करने के लिए स्टील का गिलास उठाकर पानी पीने लगी तभी अचानक नजर छींके के बर्तनों के नीचे रखे चांदी के गिलास पर गयी।  कमला आश्चर्य में पड़ गयी, "ओह! मैंने गुस्से ही गुस्से में बाई को कितना भला बुरा कह दिया।" अब उससे माफी मांग लेती हूँ। वरना उस जैसी काम वाली बाई मुझे कहाँ मिलेगी।"

कमला ने बाई को फोन लगाकर कहा, "मुझे माफ करना, मेरा चांदी का गिलास मिल गया। बेटे का ध्यान रखना और दो दिन बाद काम पर लौट आना।"

कमला की सफाई सुनने के बाद बाई ने कहा, "भाभीजी गिलास चुराने की बात दिल तोड़ गयी। मेरे पास सोना-चांदी नहीं है, लेकिन मेरी ईमानदारी ही मेरी दौलत है। माफ करना भाभीजी आप अपने लिए नयी बाई ढूंढ लीजिए।"

शिक्षा 

बिना सोचे समझे कोई कार्य न करें।

कहानी समीक्षा

कहानी क्रमांक 05

कहानी का नाम - एक रिश्ता भावनाओं भरा

कहानीकार - श्रीमती प्रतिभा जोशी, अजमेर

कहानी के मुख्य पात्र शिक्षिका, उसका पुत्र एवं अन्य छात्र राहुल हैं। कहानी की शुरुआत में शिक्षिका हमेशा की तरह अपने पुत्र को स्कूल कार से ले जा रही थी। स्कूल जाने में देर हो गई। स्कूल से पहले छात्र राहुल लेट होने से वापस आता दिखाई दिया। शिक्षिका मीरा ने जान चूकी थी। उसने बच्चे को अपनी कार में बैठा कर स्कूल ले गयी।

प्रधानाचार्य जी से देर होने का कारण बता कर अपनी-अपनी कक्षा में बच्चे चले गए। राहुल पहले शिक्षिका के पुत्र को उसकी कक्षा में छोड़ कर आया। स्कूल आने जाने का क्रम चलता रहा।

लेकिन कुछ माह बाद राहुल की मम्मी के पास शिक्षिका मीरा का फोन आता है कि मेरे पुत्र को भी राहुल के साथ स्कूल भेज देना। फोन बन्द कर दिया। राहुल की मम्मी को चिन्ता हुई। मीरा फोन रख सिसक उठी और बेहोश हो गई। होश आने पर पतिदेव डाक्टर के पास ले गया। जांच से पता लगा कि मीरा कैंसर से पीड़ित है। यह बात स्कूल में भी आग की तरह फैल गयी।

शिक्षिका के पुत्र के चहरे पर चिन्ता के लक्षण नजर आने लगे। माँ अपनी पीड़ा कितना भी छिपाये, वह उसके चहरे पर दिखे न दिखे, लेकिन उनके बच्चों के चहरे पर झलकने लगते हैं।

एक साल बाद पुनः स्कूल शुरू हुए। राहुल वैन का इन्तजार कर रहा था। तभी वहाँ शिक्षिका मीरा की कार आकर रुकती है उसका पुत्र फाटक खोल राहुल को बैठने का इशारा करता है। राहुल ने शिक्षिका मीरा से प्रणाम कर स्वास्थ्य के बारे में पूछा। मैम, आप ठीक हो गई न। मैं रोज हनुमान बाबा से आपके लिए प्रार्थना करता था। हाथ जोड़कर राहुल बाबा को धन्यवाद बोलने लगा। स्कूल आने जाने का क्रम चलता रहा।

एक दिन स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। गर्मी की वजह से खुले स्थान की जगह बन्द हाल में कार्यक्रम रखा गया। कार्यक्रम चल रहा था तभी राहुल की नजर शिक्षिका मीरा की ओर पडी़। शिक्षिका मीरा बीमारी एवं कमजोरी की वजह से ठिठुर रही थी। तुरंत राहुल मंच पर जाकर एक सर से कहा, सर प्लीज, आपका यह शाल दे दीजिये। मेरी टीचर को ठंड लग रही है। राहुल ने वह शाल शिक्षिका मीरा तक पहुंचाकर सेवा कार्य किया।

 शिक्षा

हम सबको हमेशा दु:खी, पीड़ित की सेवा में आगे रहना चाहिए।

प्रस्तोता




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...