हम सभी प्राकृतिक रूप से सीधे, सरल और सहयोगी हैं, लेकिन छद्म आवरण लेकर हम समाज में लोगों से मिलते हैं। झूठ ने समाज में इतने पैर पसार दिए हैं कि अधिकांश लोगों को लगने लगा है कि झूठ और कूट रचना के बिना जीवन ही नहीं। अति तो तब हो गई है जब हम स्वयं से भी झूठ बोलने लगे हैं। जब भी हम किसी को झूठा व्यक्ति कहते हैं, तब यह समझने की जरूरत है कि इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि जो भाव आपके हमारे भीतर है, जो भी विचार हम लेकर चलते हैं वो कहीं ना कहीं पर लोगों से छुपा रहे हैं, मतलब ऐसे समझें कि कमियों को छुपाना और अच्छाइयों को बढ़चढ़ कर बताना। या कुछ किया भी न हो, फिर भी वो बताना, तो यह जो छद्म मुखौटा है उसको निकालने का समय अब आ गया है।
आप और हम जब परिवर्तन की इस यात्रा पर निकल ही पड़े हैं, तो यह भी जान लें कि परिवर्तन की इस यात्रा के साथ आप अपने भीतर एक उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था का अनुभव करने वाले हैं और सही मायने में यदि आप एक इंसान बनने के आकांक्षी हैं, तो इस झूठे मुखौटे का त्याग करना ही श्रेयस्कर होगा अन्यथा आप हम ऐसे ही जीवन में भटकते रहेंगे। स्थिरता नहीं आ पाएगी और शांति का अनुभव नहीं होगा। देखें तो सही जैसे अन्य लोग भाग रहे हैं वैसे ही आप भी भागते रहेंगे। अभी सर्वप्रथम हमको करना यह है छद्म मुखौटे से हमको बाहर निकलना है।
इसके लिए एक सूत्र आज हम सभी मिलकर सीखेंगे। वह सूत्र है ईश्वर के और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना।
अक्सर आप महसूस करेंगे कि रोते रहना एक आदत सी बन जाती है। इस से मतलब यह कि अपना दुखड़ा रोते रहना, बार-बार किसी से भी मिलते हुए शिकायत की मुद्रा में रहना कि 'मेरे साथ यह हो गया', 'मेरे साथ वो हो गया', 'मैं अकेला पड़ गया हूँ', या फिर 'मैं अकेली हूँ', 'मुझे कोई प्यार नहीं करता', 'मेरे साथ कोई नहीं है', आदि अर्थात् हर समय ही शिकायत की मुद्रा में रहना। हम सबसे बात करने की कोशिश करते हैं, पर बातें यही करते हैं। कोई मुझसे बात नहीं करता हमको ऐसा लगता है। लोगों को मैं पसंद नहीं हूँ ऐसा भी लगता है या फिर कि कुछ भी अच्छा करने की कोशिश करते हैं अच्छा होता ही नहीं है। ऐसा भाव उत्पन्न होना ही परेशानी का सबब है। दरअसल इसके पीछे मुख्य कारण यह होता है कि हम अपने दुखड़े को रोते हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित करें।
ध्यानाकर्षण का यह भाव अभिव्यक्ति देता है कि आप मुझे देखो, मेरे ऊपर कुछ अत्याचार हुआ है। दरअसल यह लाचारी और बेचारगी की स्थिति है। आपकी, मेरी या किसी की भी ज़िन्दगी में यदि सच में कोई उलझन है तो वह किसी निकटस्थ को बताई जा सकती है। सभी को जाकर बताना कितना उचित है यह तो हमको ही सोचना होगा!
और! यदि हम अधिसंख्य लोगों के समक्ष अपना दुखड़ा रोने की कोशिश करते हैं तो मतलब साफ है कि यह ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश है। सोचने वाली बात यह है कि अगर आपको ऐसा करना पसंद नहीं है तो इसका सर्वोत्तम उपाय यह है कि आप भी किसी के साथ ऐसे बात ना करें। एक वादा स्वयं से करना होगा कि अगर मेरी कोई उलझन है तो उसका निदान मैं स्वयं ढूंढूंगा या फिर मैं सही व्यक्ति से ही विचारविमर्श करूंगा। ऐसा प्रण करने से निदान तो मिलेगा ही वैचारिक क्षमता में भी निश्चित ही वृद्धि होगी।
शब्दशिल्प की प्रस्तुति


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