पुस्तक का आवरण
पत्र
मेरे प्रिय,
हंसराज हंस, नमस्ते।
20 नवम्बर, 2021
आज बहुत वर्षों के बाद मैं तुझे पत्र के माध्यम से मेरे मन के उद्गार तेरे तक पहुँचा रहा हूँ। तू तो भूल गया है शायद मुझे, ऐसा लगता है, क्योंकि तुझे मेरे पास आये दिन, महीने ही नहीं वर्ष गुज़र गये हैं। मैं टकटकी लगाये तेरी बाट देखता रहता हूँ। तुझे तो शायद अब कुछ भी याद नहीं रहा है या तू याद ही नहीं करना चाहता है। यह तो मुझे पता नहीं। पर जब तू यहाँ मेरी जड़ों, शाखाओं पर झूलता था। मेरी छाया में कूलाम लाकड़ी का खेल खेलता था। इस गाँव की मिट्टी में लोटता था। तेरी दोस्तों के संग धींगामस्ती खूब करता था। मेरी शाखाओं को पकड़कर झूला झूलता था। मेरे नीचे उगे छोटे-छोटे पौधों को मिट्टी सहित ही ले जाकर अपने घर के बगीचे में लगाता था। उस माटी को जिसने तुझे चलना-फिरना, उठना-बैठना सिखाया, जो तेरी जन्मदात्री है उसको ही तू भुला बैठा है। आज वह तेरे छोटे-छोटे पौधे, बड़े-बड़े वृक्ष बन गये हैं। वह पौधे व गाँव की मिट्टी तेरी हर समय राह देख रहे हैं। पर मुझे पता चला है कि तू दुनिया की आधुनिक चकाचौंध में डूबा है। तुझे तेरे बचपन के दोस्त, गाँव का वह बड़ा सा बरगद का पेड़, उसके नीचे की बालू मिट्टी, किसी की भी याद नहीं आती है। तू तो अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है। अब तुझे इन सब पुरानी चीजों, बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा है। शायद मुझे तो ऐसा लग रहा है। तू इस भागमभाग जिंदगी की दौड़ में लगातार दौड़े जा रहा है। साथ ही तेरे को इस दौड़ के परिणाम का भी पता नहीं है। पर तुझे इसका पता तब लगेगा जब एक दिन तेरे बच्चे भी तेरे द्वारा बसाई दुनिया, गाँव, माटी आदि यादों को छोड़कर तेरे से दूर बहुत दूर चले जायेंगे और तू अकेला हो जायेगा। तब तू सोचेगा अरे भगवान! यह मैंने क्या किया। दुनिया में आने का मकसद केवल परिवार के लिए 'कोल्हू का बैल' की तरह रात-दिन मेहनत करके धन-संपदा इकट्ठा करना ही तो नहीं था। मैंने तो मेरा सारा समय इनके लिए दौलत इकट्ठा करने में ही बिता दिया और आज वह धन-दौलत भी मेरे कोई काम नहीं आ रही है। मुझे शांति नहीं मिल रही है। ऐसे समय में मैं तेरे को बचपन की यादें, गाँव के दोस्त, वहाँ की माटी की महक, खेत-खलिहान, पेड़-पौधे, पनघट व चौपाल की बातें यहाँ खींच कर लायेगी। यहाँ आने पर ही तुझे जीवन का परमानंद प्राप्त होगा। तेरे मन को शांति मिलेगी। अभी तो तेरे पास मिलने के लिए समय नहीं है। पर जब समय खूब रहेगा पर यह सब नहीं रहेगा। अभी तो तुझे यह सब बातें फालतू लग रही हैं। पर जब तुझे इन सबकी जरूरत होगी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। उस समय तुझे यहाँ की वह सब पुरानी यादों के प्रतीक उखड़े मिलेंगे। उनकी जगह बड़े-बड़े फ्लैट बने होंगे। पेड़ों को काटकर बड़ी-बड़ी सड़कें बनी होंगी। ऐसे समय में तेरे पास सिर पकड़कर रोने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा।
इसलिए मैं तुझे एक बार फिर याद दिला रहा हूँ। मन की शांति, जीवन का सच्चा सुख पाना है तो अभी इसी समय तू वापस दौड़ा चला आ क्योंकि अभी तो तेरे सभी दोस्त, पेड़-पौधे, फूलों की भीनी-भीनी खुशबू, माटी की सुनहली सुगंध पाकर तू अपने आपको ही नहीं, तेरे पूरे परिवार को धन्य कर लेगा। और अभी तू यह सब नहीं करेगा तो एक दिन तुझे मेरी बात बहुत याद आयेगी। पर समय निकलने पर कुछ नहीं होता है। इसके लिए राजस्थान में एक कहावत भी है-'अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत' इसलिए मैं तुझे बार-बार पुकार रहा हूँ। मेरी पुकार को सुनकर मुझे पूरा विश्वास है तू दौड़ा चला आयेगा। तेरी बाट जोह रहे तेरे दोस्तों, पेड़-पौधों से आकर एक बार जरूर मिल ले। इसी में तेरा और मेरा भला है।
पत्र को पढ़कर जल्दी चले आना मेरे प्यारे मीत ।
यहाँ आने पर और भी बहुत सारी मन की बातें तुझसे दिल भर के पूरे दिन करूँगा।
तेरे इंतजार में, तेरी बाट जोह रहा हूँ।
हंसराज हंस तेरा प्रिय
टोंक बरगद का पेड़

बहुत ही भावपूर्ण पत्र।आपको बधाई एवम शुभकामनाएं
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