वर्तमान समय (२०२४) लोकसभा चुनावों का है तो ऐसे में आइए उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण की कुछ सामयिक कविताओं को एकीकृत करके उनका आनंद लेते हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है उनकी लोकप्रिय कविता 'राजनीति'।
"राजनीति"
जोड़-तोड़ गठजोड़ गणित की है राजनीति,
इस राजनीति की कुछ चर्चा कर लेने दो।
मंत्री बनते-बनते कैसे रह गया वो तो भला,
थोड़ी उसको और अभी आहें भर लेने दो।
देश के विकास का तो काम है बहुत बड़ा,
पहले मुझे अपना ही विकास कर लेने दो।
अभी तक तो रहा खाली घर मेरा बन्धुओ,
मेरे खाली घर को अब थोड़ा भर लेने दो॥
पटरी से रेल क्यों उतर रही बार-बार,
साँच की जाँच आयोग को कर लेने दो।
गति प्रगति की देश में अवरुद्ध क्यों है?
जाकर के विदेश कुछ विचार कर लेने दो।
साम्प्रदायिक झगड़े तो स्वयं मिट जाएंगे,
अभी दो चार को और मर लेने दो।
माँग तो अवश्य ही सुनेंगे अभी धीर धरो,
पहले सबको यहां वहां धरना धर लेने दो।
बिना तोड़-फोड़ कोई सुनने को तैयार नहीं,
थोड़ी तोड़-फोड़ अभी और कर लेने दो।
बंदीग्रह में मौत कैसे बन्दी की हो गई,
फिलहाल अफसर को निलंबित कर लेने दो।।
डाकुओं की समस्या का एक हल और भी है,
फर्जी मुठभेड़ कुछ और कर लेने दो।
वोट का न मोल अभी लग पाया ठीकठाक,
अभी वोट का भाव कुछ और बढ़ लेने दो ॥
पीने से शराब गर गरीब मेरे मरने दो,
शराब के ठेकों से पेट भर लेने दो।
शांति को बात तो अशांति में दब गयी,
शांति का अंग भंग और कर लेने दो॥
जीवन का ठिकाना क्या, कैसे कब मिट जाये,
आओ नग में सबसे पहले प्यार कर लेने दो।
जोड़तोड़ गठजोड़ गणित की है राजनीति,
इस राजनीति को कुछ चर्चा कर लेने दो।
कविता 'राजनीति' के उपरांत उनकी कविता 'आरती मतदाता की' का आनंद लेते हैं जिसमें कवि ने राजनीति में सबसे महत्व के मतदाता की महत्ता का उल्लेख किया है।
'आरती मतदाता की'
ओइम् जय-जय मतदाता, ओइम् जय-जय मतदाता।
जिस पर हो कृपा तेरी, सुख-सम्पति पाता॥
खुद तुम हो दीन-दु:खी पर रखते भाव बड़े।
तेरे दर पर देखे हैं नेता रोज खड़े।।
पाँच वर्ष में एक बार तेरा चेहरा मुस्काता।
ओइम् जय-जय मतदाता, ओइम् जय-जय मतदाता।।१।।
महंगाई की मार ने तेरा जीना कठिन किया।
संघर्षों में जीकर तूने विष का घूंट पिया॥
पर मत का अधिकार तुझे एक गौरव दिलवाता।
ओइम् जय-जय मतदाता, ओइम् जय जय मतदाता।।२।।
तू चाहे तो बड़ों- बड़ों को पानी दिलवा दे ।
अपनी छोटी खोली में भी उनको सुलवा ले॥
घास-फूस का छप्पर तेरा मन्दिर बन जाता।
ओइम् जय-जय मतदाता ओइम् जय जय मतदाता।।३।।
निर्वाचन के समय तेरी तो याद बहुत आती।
तेरी आरती पूर्ण देश में गाई है जाती॥
मदमाते नेता का एकदम भूत उतर जाता।
ओइम् जय-जय मतदाता, ओ३म् जय-जय मतदाता॥४।।
तेरी झोंपड़ी में मच्छर और मक्खीमार बड़ी।
रूखी-सूखी रोटी है और हंडिया गली-सड़ी॥
पर वोटों के समय सभी यह अमृत बन जाता।
ओइम् जय-जय मतदाता ओइम् जय-जय मतदाता॥५॥
तू चाहे तो राजा को भी रंक बना डाले।
और रंक की गर चाहे तो किस्मत चमका दे॥
किस पर होगी दया तेरी कोई जान नहीं पाता।
ओइम् जय-जय मतदाता ओइम् जय -जय मतदाता॥६॥
इस कविता के उपरांत प्रस्तुति कविता 'मतदाता का धन्यवाद' शीर्षक से संकलित है जो समय के अनुसार इस क्रम में कितनी सटीक बैठती है।
"मतदाता का धन्यवाद"
देता धन्यवाद तुझे मैं हे! मेरे मतदाता।
तेरी कृपा के कारण ही विजय गीत हूँ गाता।।
नगर-नगर व गाँव-गाँव में निशि दिन मैं था डोला।
हर वोटर की बात सुनी थी नहीं पलट कर बोला॥
पहन पजामा-कुरता-धोती डाल गले में झोला।
केवल वायदे करने को हो मुँह था अपना खोला।।
खुल गया मेहनत वायदे से अब संसद वाला खाता ।
देता धन्यवाद तुझे मैं हे! मेरे मतदाता।।१।।
जब भी पैसा मिल जायेगा वायदे पूरे होंगे।
सड़कें-बिजली-पानी के सब सपने पूरे होंगे॥
जब भी समय मिलेगा मुझको टूर मेरे भी होंगे।
इन्तजार का फल मीठा है साथ संग फिर होंगे।।
अपने पूजा घर में भी मैं तेरी आरती गाता।
देता धन्यवाद तुझे मैं हे! मेरे मतदाता।।२।।
संसद मैं अब पूर्ण क्षेत्र की बात उठाऊँगा में।
नहीं सुनेगा कोई अगर तो क्या कर पाऊँगा मैं॥
आशा है मन्त्रीमंडल में पैठ बनाऊँगा में।
मंत्री पद गर मिल पाया तो सब कुछ पाऊँगा मैं॥
व्यस्त रहूँ कितना ही क्यूँ ना टूटेगा ना नाता
देता धन्यवाद तुझे मैं हे! मेरे मतदाता।।३।।
छोड़ तुझे गर्मी में विवश हो ऐ० सी० में जाऊंगा।
बड़ी भीड़ में तुझको वहां पहचान नहीं पाऊँगा ।।
कुछ वर्षों की बात है केवल मैं तो फिर आऊंगा।
गोद में लेकर तेरे बच्चे फिर से मुस्काऊंगा।
मैं क्या कर सकता होता वो ही जो भी रचे विधाता।
देता धन्यवाद तुझे मैं हे! मेरे मतदाता।।४।।
'मतदाता से शिकवा'
मुझसे ऐसी भूल हुई क्या हे! मेरे मतदाता।
मुझको भी तू मत दे देता तेरा क्या घिस जाता॥
मेरे अरमानों की होली तूने अरे जला दी।
मेरी अच्छी खासी खटिया की भी चूल हिला दी।
वोट दिलाने को कह मुझको उसको क्यूँ दिलवा दी।
किस करनी का बदला लेकर हार मुझे दिलवा दी।
दर्द मुझे ऐसा दे डाला सहा नहीं है जाता।
मुझसे ऐसी भूल हुई क्या हे! मेरे मतदाता॥१॥
मेरे वादे उसके वादे में कह क्या अन्तर था?
मेरे मंचों से ना गूंजा उसका क्या मंतर था ।।
पाने तेरी वोट मैं भटका घर-घर और दर-दर था।
तेरे कदमों में मैंने तो झुका दिया ये सर था ।।
मेरे माल-पुए सब खा गये खुल न पाया खाता।
मुझसे ऐसी भूल हुई क्या हे! मेरे मतदाता ॥२।।
इस चुनाव लड़ने को मैंने पैसा पैसा जोड़ा।
इधर-उधर से भी धन मांगा मैंने थोड़ा-थोड़ा।
मैंने मांगी वोट थी केवल ना बग्गी या घोड़ा।
वोट न देकर मुझको तूने नहीं कहीं का छोड़ा।
न जाने किसके बहकावे में तू है आ जाता।
मुझसे ऐसी भूल हुई क्या हे! मेरे मतदाता।।३।।
पाँच वर्ष में फिर आऊँगा पीछा ना छोड़ूंगा।
जिसने आज हराया मुझको उसका दंभ तोड़ूंगा।
अपनी ओर सभी वोटर के रुख को मैं मोड़ूंगा।
नहीं ठीकरा किसी तरह का दूजों पर फोडूंगा।
पहले क्यूँ ना समझा तुझको मन मेरा पछताता।
मुझसे ऐसी भूल हुई क्या हे! मेरे मतदाता॥४॥
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'





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