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प्रकृति की पुकार

 पुस्तक आवरण

संकलित पत्र

हे मेरे प्यारे मानस पुत्र !

बनेठा, 10 अगस्त, 2020

मेरा और तेरा "माँ और बेटे का" संबंध है। प्रकृति और मानव एक-
दूसरे के पूरक हैं। मैंने तेरे लिए मेरा अमूल्य खजाना जैसे हवा, पानी, खनिज तत्व, सोना, चांदी और तमाम सभी चीजें जो मेरे पास हैं। वह सब तेरी है, तेरे लिए है। मैं कभी अपने फल नहीं खाती हूँ। अपना जल नहीं पीती हूँ। फूलों की खुशबू भी सारे वातावरण में सब जगह, सबके लिए बराबर फैलाती हूँ। मैं कभी भी, किसी के भी साथ भेदभाव नहीं करती हूँ। मेरी हर वस्तु चाहे वह छोटे से छोटा कीड़ा हो, पेड़ का पत्ता हो, वह सब कुछ तेरे काम आने वाला है। मेरी हर एक वस्तु बेकार व फालतू नहीं है। वह सब तेरे काम आने वाली है, तेरे लिए ही है। तुझे मेरे पतझड़ से समझना चाहिए कि जीवन में असफलता भी आती है। पर असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए, लगातार कोशिश करते रहने वालों को एक दिन निश्चित सफलता मिलती है। इसी प्रकार मेरे फलों से लदे पेड़ों से तुझे शिक्षा लेनी चाहिए कि संपन्नता, प्रसिद्धि मिलने पर भी विनम्रता बनी रहनी चाहिए। जैसे पेड़ फलों से लदे होने पर भी सदैव नीचे की ओर ही झुकते हैं। तेरा काम है मेरा संरक्षण और सुरक्षा करना। पर मैं देख रही हूँ विगत 15-20 सालों से तू विकास के नाम पर मेरे साथ अनावश्यक खिलवाड़ कर रहा है। तेरी ही स्वार्थी, लालची प्रवृत्ति के कारण, जो
विकार समझ कर तू कर रहा है, वह तेरा विनाश है। मैं समय-समय पर तुझे सचेत भी कर देती हूँ। जैसे तूफान, भूकंप, बाढ़, सूखा व महामारी आदि तुझे जाग्रत, चैतन्य करने के मेरे रूप ही होते हैं। मैं तेरी माँ हूँ, मुझे तेरे ज्ञान, बुद्धि व विवेक पर तरस आता है। तू तेरे स्वार्थ व थोड़े से लालच के कारण यह सब कर बैठता है। मैं तुझे फिर कहती हूँ, मैं तेरी हर जरूरत को पूरी कर सकती हूँ, पर तेरे लालच को
कभी पूरा नहीं कर पाऊँगी। अब भी समय है। तू मेरे संदेश को समझ ले। तुझे रुककर, थोड़ा सोचने-समझने, विचार करने की आवश्यकता है। तू विकास की बजाय विनाश की तरफ बढ़ रहा है। मैंने तुझे सोचने, समझने, विचार करने व कार्य करने की जो योग्यता दी है, जो संवेदनशीलता दी है, उसका विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग करके, इस विनाश लीला को रोक ले। जल, जंगल और जमीन जब तक हैं, तब तक ही मानव का विकास होता है। मानव जो वायु छोड़ता है, उसको पेड़- पौधे लेते है और जो पेड़-पौधे छोड़ते हैं, उसको मानव लेते हैं। जल, जंगल व जमीन ही जीवन है। जब जीवन ही नहीं रहेगा, तो तेरा यह विकास किसी काम का नहीं रहेगा। हे मानव, मेरी तरफ से तू यह अंतिम चेतावनी समझकर जल, जंगल व जमीन को बचा ले। इसी में तेरी और मेरी भलाई है।
तेरी प्यारी माँ ! प्रकृति।
डॉ. हंसराज "हंस"
ग्राम पोस्ट बनेठा, तहसील उनियारा 
जिला टोंक (राजस्थान) पिन- 304024 
मो.- 9829434517, 966409119
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