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एक कर्मठ व उच्च शिक्षा प्राप्त सेवाभावी शिक्षाविद श्री मुरलीधर जी से मुलाकात

परिचय

साथियो! आज हम बात कर रहे हैं अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन जिला टोंक टीम के एक कर्मठ व उच्च शिक्षा प्राप्त सेवाभावी शिक्षाविद श्री मुरलीधर जी से। आप विगत चालीस वर्षों से शिक्षा की बेहतरी के लिए विभिन्न एनजीओ के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। हमारा सौभाग्य है कि विगत दस वर्षों से टोंक जिले के शिक्षकों को आपका सान्निध्य मिल रहा है। आपने शिक्षा में अधिस्नातक कर रखा है। टोंक जिले के शिक्षकों ने आपसे 'लगन व मेहनत से कैसे कार्य किया जाता है', इसको बहुत अच्छे तरीके से सीखा है। आप हमेशा हर कार्य को चुनौती के रूप में लेते ही नहीं, बल्कि उसे समय पर पूरा भी अवश्य करते हैं। आपके कई सारे शिक्षाप्रद आलेख राष्ट्रीय समाचार पत्रों व कई सारी शैक्षिक पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी होते रहते हैं। आपका सदैव हंसता चेहरा सबको बेहद प्रेरणा तो देता ही है, सब ही को बहुत भाता भी है। आप से आज यह लघु बातचीत करके बहुत अच्छा लगा। अब कुछ शिक्षा संबंधी हमारे कुछ सवाल हैं। हम अपेक्षा करते हैं कि आप उनके जवाब अवश्य देंगे और हमारी व आपकी टीम के एनर्जेटिक व नवाचारी शिक्षकों को बहुत लाभ होगा।

बातचीत

प्रश्न १. मुरली सर, आपने शिक्षा क्षेत्र में ही कुछ करने का निर्णय स्वयं लिया या किसी ने मार्गदर्शन किया?

उत्तर – "बच्चों के साथ शिक्षण कार्य करने में मेरी रुचि थी। मैं इसी  तलाश में था कि किस स्कूल में पढ़ाया जाए। इसी दौरान हमारे परिवार में ही बड़े भाईसाहब  सुरजन जी को दिगंतर शिक्षा संस्थान में नवाचारी तरीके से शिक्षण कार्य करने का मौका मिला। उनके प्रयासों से  मुझे भी दिगंतर शिक्षा संस्थान में छोटे बच्चों के सर्वे के लिए जयपुर खोनागोरियान क्षेत्र में कार्य करने का मौका मिला। मैंने सत्तर ईंट भट्टों में छह वर्ष तक के बच्चों का सर्वे कर यह पता लगाया कि कितने बच्चे पढ़ने की उम्र के हैं।  दिगंतर एक स्वयंसेवी संस्था है और शिक्षा के क्षेत्र मे नवाचारी शिक्षण प्रक्रियाओं को आगे लाने के कार्य मे प्रयासरत थी और है। उस समय दिगंतर के तीन स्कूल चलते थे और रोहित धनकड और रीना जी उसका संचालन करते थे। उनको मेरा कार्य पसंद आया और उन्होंने मुझे शिक्षण कार्य के लिए नियुक्त करने का ऑफर  दिया। मैंने उनके इस ऑफर को स्वीकार किया और पूरे मन एवं तत्परता के साथ बच्चों के साथ शिक्षण कार्य करने लगा। 'शिक्षण कार्य कैसे करना है?', 'क्यों करना है?', ' किस तरह से करना है?' आदि सवालों के साथ दैनिक योजना बनाना और उसे लागू करना, स्कूली समय के बाद, मैं  हर बच्चे का उसके नोट बुक में किए कार्य के आधार पर  आकलन करता और अगले दिन की योजना तैयार  करता। रोहित धनकड जी जो कि वर्तमान में भारत के जाने-माने शिक्षाविद हैं, मेरी मदद करते और साथ ही  इस तरह के चिंतन को बढ़ावा देते।"

प्रश्न २. एक एनजीओ तथा एक शिक्षण संस्थान की कार्यशैली में आप क्या मुख्य अंतर पाते हैं?

उत्तर – "मेरे विचार से एनजीओ और शिक्षण संस्थान के मध्य ऐसा कोई सैद्धांतिक अंतर तो नहीं है क्योंकि दोनों ही गैर-सरकारी संगठन हैं और संस्थाएं सभी एक अच्छे विचार के साथ जन्म लेती हैं पर उसके कार्मिक संस्था को अच्छी-बुरी बना देते हैं। कार्मिकों का संस्था के विचारों एवं उद्देश्यों के साथ जुड़ाव और क्रियान्विति के साथ समर्पण ही संस्था के प्रति समुदाय का जुड़ाव बढ़ाते हैं। कई बार एक एनजीओ एक से अधिक क्षेत्रों में कार्य  कर रहा होता है, जिसका प्रभाव यह होता है कि किसी भी क्षेत्र में गुणवत्ता का अभाव झलकता है, जबकि शिक्षण संस्थाएं एक क्षेत्र में ही विशेष ध्यान  देती हैं, तो उस क्षेत्र में उसके सदस्य विशेष योग्यता  हासिल कर लेते हैं।"

प्रश्न ३. शिक्षण और प्रशिक्षण में से कौन आपको अधिक आकर्षित  करता है और क्यों?

उत्तर – "शिक्षण और प्रशिक्षण आपस में जुड़े हुए हैं। प्रशिक्षण होते ही इसलिए हैं कि अच्छे से शिक्षण करवा पाएं और किस तरह के प्रशिक्षण की जरूरत है यह शिक्षण से ही तय होगा। इसीलिए आजकल शिक्षक-प्रशिक्षणों में शिक्षण भी एक हिस्सा होता है। मेरी दृष्टि में शिक्षण प्रशिक्षण के केंद्र में है।"

प्रश्न ४. आपको आपके जीवन में सबसे अधिक प्रभावित करने वाला जीवन यात्रा का सहयात्री कौन लगा और क्यों?

उत्तर – "मेरे जीवन में मेरा व्यावसायिक सहयात्री के रूप में शिक्षाविद रोहित धनकड जी रहे हैं उनसे मैंने बहुत सीखा है। दिगंतर में मैंने 13 वर्ष शिक्षण एवं शिक्षा से जुड़े सभी आयामों पर कार्य किया जो कि मेरे जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा।"

प्रश्न ५. अपने किस शिक्षक को आप विशेष कोटि प्रदान करना चाहेंगे और किस कारण से आप उनसे प्रभावित रहे?

उत्तर – "आज मैं  शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ा हुआ हूँ, एक शिक्षक कैसा हो? स्कूल में बच्चों को किस तरह का वातावरण मिले? बच्चे के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए?  आदि आयामों की दृष्टि के साथ  देखता हूँ, तो एक अच्छा शिक्षक बताना मुश्किल हो जाता है। एक अच्छे शिक्षक के लिए बच्चे की बात ध्यान से सुनना और सहजता के साथ उसका जवाब देना, बच्चे की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचे इस तरह से संवाद करना जरूरी है।"

प्रश्न ६. अजीम प्रेमजी समूह में कार्य का आपका अनुभव कैसा रहा?

उत्तर – "अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथ कार्य करने का अनुभव मेरे लिए बहुत अच्छा रहा है, यहां पर मुझे शिक्षा के क्षेत्र में उन सभी आयामों पर सोचने, चिंतन करने और धरातल पर अपनी योजनाओं को लागू करके देखने का अवसर मिला। एक अच्छा शिक्षक किस तरह से तैयार हो सकता है? यहाँ पर कार्य कर यह जानने का अवसर मिला है। शिक्षा के  क्षेत्र में कार्य करने वाले हर सदस्य को इस पर सोचना और चिंतन करना जरूरी है कि जिन  बच्चों के साथ मैं शिक्षण कार्य कर रहा हूँ उसका पूर्व ज्ञान क्या है? उसका सीखने का स्तर क्या है? बाल मनोविज्ञान को समझते हुए किस तरह से बच्चों के साथ  गतिविधि एवं शिक्षण सामग्री आधारित शिक्षण प्रक्रियायें चलाएं। साथ ही सतत आकलन करना और उसकी मदद से आगामी शिक्षण योजना बनाना आदि पर मुझे अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्य करने का मौका मिला है।"

प्रश्न ७. सेवानिवृत्ति उपरांत अपने भावी जीवन के लिए क्या आपने अभी कुछ सोचा है?

उत्तर – "मैंने अभी तक इस पर ज्यादा सोचा नहीं है, पर पिछले 30-32 वर्ष से शिक्षा में नवाचारी तरीकों को ईजाद करने और कक्ष कक्ष में उनको लागू करके देखना, शिक्षण प्रक्रियाओं में आने वाली चुनौतियों को समझने और समाधान में  गए हैं तो आगे भी इसी में अपना अच्छा करने को प्रयास किया जाएगा।"

प्रस्तोता




टिप्पणियाँ

  1. मुरलीधर जी के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा।उनके शिक्षा के प्रति जो विचार है वह हम सब शिक्षकों के लिए प्रेरणादायक है।

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