संदर्भ
आज के हमारे मेहमान हैं शतायु प्राप्त सफल शिक्षक पतराम जी जिन्होंने ना जाने कितनों का भविष्य बनाया और उनके द्वारा शिक्षित न जाने कितनी मानव संपदा सेवानिवृत्त होकर आज भी उनको सम्मान के भाव के साथ देखती है। यह नज़ीर है कृत्संकल्प के साथ अपने पेशे के साथ न्याय करने वाले एक गुरु की।
परिचय
किसी भी बच्चे का मानसिक विकास करने के लिए एक मुख्य पहलू है शिक्षा के प्रति ममता और उत्साह को पोषित करना। ऐसा अनुकूलित सहायक वातावरण तैयार करके किया जा सकता है और एक समर्पित व सकारात्मक रोल मॉडल बना जा सकता श्री पतराम जी की तरह। साथियो! आइए आज मुलाकात करते हैं शतायु प्राप्त पतराम जी से। जिन्होंने अपने विद्यार्थियों में शिक्षा के साथ साथ दयालुता, सहानुभूति और प्रतिकूलता भी विकसित की ताकि वे भावी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकें। नैसर्गिक तरीके से उलझनों को सुलझाने की सामर्थ्य अपने स्तर से विकसित कर सकें। उनको मानसिक स्वतंत्रता देकर और समस्या समाधान कौशल को बढ़ावा देकर। विद्यार्थी सम्पूर्णता में, मार्गदर्शन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाएं ताकि वे आत्मविश्वासी और क्षमतावान व्यक्तियों के रूप में विकसित हो सकें। तो आइए आज हम मुलाकात करते हैं एक सौ दस वर्षीय शिक्षक श्री पतराम जी से।
एक आयोजन के प्राचार्य और अतिथि के द्वारा सम्मान
प्रश्न १. सर, आपने शिक्षण कबसे आरंभ किया? और! आपने इस क्षेत्र का चयन क्या सोच कर किया था?
उत्तर - "मैंने सन् 1949-50 में ए.के.जी. इंटर कॉलेज जलालपुर धना से अपने शिक्षण करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 1954 में मैं कृषि प्रसार अध्यापक के पद पर नियुक्त हुआ इस पद पर रहते हुये। मैंने मौजिला - मुरादाबाद, अल्मोड़ा, प्रतापगढ़, फैजाबाद (अयोध्या) में शिक्षण कार्य किया तथा ए.के.जी. इंटर कॉलेज जलालपुर धना से सन 1988 में सेवानिवृत्त हो गया। मैंने शिक्षण क्षेत्र का चयन यह सोचकर किया था कि जो भी ज्ञान मैंने अर्जित किया है उसका सही उपयोग अध्यापक बनकर ही किया जा सकता है।"
प्रश्न २. आपने शिक्षण के पुरातन और नवीन दोनों दौरों को देखा और समझा है तो आप उनमें क्या अंतर पाते हैं?
उत्तर - "यह मेरा सौभाग्य है कि मैंने शिक्षण के पुरातन और नवीन दोनों दौरों को देखा और समझा। मैंने जो अंतर दोनों दौरों में पाया उनमें पाया कि शिक्षण के पुरातन दौर में पहले विषय का गहन अध्ययन कराया जाता था तथा पुरातन शिक्षक सख्त होते थे। पालन की जरूरत वाले नियम वे गहनता से उनकी जरूरत के अनुसार समझाते थे, लेकिन नवीन दौर में साक्षरता भले ही अधिक और विस्तृत हो गई हो परंतु विषय का गहन अध्ययन और ज्ञान कम ही नज़र आता है।
किताबी दृष्टिकोण से नवीन शिक्षक विचारशील होते हैं जो छात्र को प्रत्येक कार्य के फायदे व नुकसान का एहसास कराते हैं।"
प्रश्न ३. आप पुरातन काल के और वर्तमान विद्यार्थी वर्ग में क्या मुख्य अंतर महसूस करते हैं?
उत्तर - "पुरातन काल की शिक्षा ज्ञान केन्द्रित थी और जब तक विद्यार्थी पूर्ण रूप से उसको आत्मसात नहीं कर लेता था जब तक उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं मानी जाती थी। विद्यार्थी शिक्षक से आदर भाव से मिलते थे। वर्तमान विद्यार्थी वर्ग में खुलापन व आदर सम्मान की भावना कम नजर आती है।"
प्रश्न ४. सर क्या आप महसूस करते हैं कि वर्तमान में विद्यार्थी वर्ग को शब्दकोश का सीमित ज्ञान ही है और क्या शब्दों के सीमित ज्ञान का मानव प्रगति पर कोई प्रभाव होगा?
उत्तर - "हाँ, बेशक मैं यह महसूस करता हूँ कि वर्तमान में विद्यार्थी वर्ग को शब्दकोश का सीमित ज्ञान ही है, क्योंकि कुछ विद्यार्थी सामान्य बुद्धि व कुछ उत्तम व अति उत्तम प्रकृति के होते हैं जिनका बुद्धिमता स्तर भिन्न-भिन्न होता है जिस कारण इनका कार्य- व्यवहार क्षेत्र अलग-अलग होता है, लेकिन मुझको लगता है कि सीमित ज्ञान से मानव प्रगृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
प्रश्न ५. सर, आपके अध्यापन के मुख्य विषय क्या रहे तथा आपका सर्वप्रिय विषय कौन सा था और क्यों?
उत्तर - "मैंने उर्दू विषय से मिडिल किया और अपने पिताजी के देहांत के उपरांत घर बैठ गया। कुछ वर्ष बाद हिन्दी विषय से मिडिल किया। गणित, हिन्दी, भूगोल, मनोविज्ञान, अंग्रेजी (हिन्दी विशारद में कृषि विषय था) में मैं अपने कार्य को कर सकता था, लेकिन मेरा सर्वकालिक एवं सर्वप्रिय विषय गणित रहा है। विडंबना यह है कि मुझसे कृषि प्रसार अध्यापक के पद पर कृषि विषय को पढ़वाया गया। कृषिप्रसार के शिक्षक के रूप में मेरे प्रिय विषय रहे - मधुमक्खी पालन, मछली पालन, पशुपालन। और, काष्ठकला में कढ़ाई बुनाई आदि विषयों का भी ज्ञान कराया।"
प्रश्न ६. सर क्या इस आयु में भी किसी रूप में अध्यापन से जुड़े हुए हैं?
उत्तर - सन् 1972 से मैंने प्राकृतिक चिकित्सक के रूप में अपने जीवन को ढाला है। प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी साहित्य निरंतर पढ़ता रहता हूँ तथा प्राकृतिक जीवन जीने का प्रचार-प्रसार भी करता रहता हूं। मुझे आज भी याद है कि तालकटोरा गार्डन में यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी ने विद्यार्थी सम्मेलन में कहा था कि हम लक्ष्य को लेकर नहीं पढ़ते हैं। पढ़ते कुछ हैं और बनते कुछ हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ है। पढ़ा कुछ और किया कुछ।"
बातचीत का समापन 'धन्यवाद' से हुआ।
प्रस्तुति
आभार
प्राचार्य परम सिंह जी का जिनके सहयोग से यह सब संभव हो सका।
विद्यार्थियों के मत
ऋषिपालसिंह, पी.ई.एस. उपनिदेशक (सेवानिवृत्त)
राजकीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, उत्तराखंड।
"मैंने सन् 1972 में कक्षा 9 में ए.के.जी. इंटर कॉलेज जलालपुर धना में प्रवेश लिया था। उस समय आदरणीय श्री पतराम जी कृषि प्रसार अध्यापक के रूप में इस कालेज में कार्यरत थे, हालांकि आपका अध्यापन विषय केवल कक्षा 6 से 8 तक था, लेकिन आपकी कठोर अनुशासनप्रियता सम्पूर्ण कॉलेज में प्रसिद्ध थी, कॉलेज के दबंग बड़ी कक्षाओं के छात्रों के आपके नाम लेने से ही पसीने छूटते थे। कॉलेज के प्रधानाचार्य से लेकर सभी अध्यापकगण एवं विद्यार्थियों में आपका एक ईमानदार, पक्षपातरहित, और अनुशासनप्रिय गुरु जी के रूप में अपार सम्मान था और यह सभी आपको एक अभिभावक के रूप में सम्मान देते थे। कॉलेज में सभी विद्यार्थी शान्ति और सुरक्षा से पठन-पाठन करते रहे, यह एक अतिमहत्वपूर्ण जिम्मेदारी माननीय श्री पतराम गुरु जी सहर्ष निभाते थे। इसलिए सभी आपसे अपार प्रेम करते थे। मेरी प्रभु से कामना है कि - आप चिरकाल तक स्वस्थ रहकर हमारे बीच बने रहें।"
सोमदत्त जी, चक
"अच्छा है। सर पतराम जी से मुझको भी शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आज भी कभी मुलाकात होने पर एक शानदार शिक्षक की तरह सुझाव देते हैं और मार्गदर्शन करते हैं।"
महदी अहमद, प्रवक्ता भूगोल (सेवानिवृत्त), अमरोहा
"मैंने सन् 1968 में कक्षा छह में जूनियर हाईस्कूल मानक जूड़ी में प्रवेश लिया था। उस समय पतराम जी वहां कृषि प्रसार के अध्यापक के रूप में कार्यरत थे। हालांकि स्कूल कक्षा 6 से 8 तक ही था, लेकिन आपका अनुशासन बड़ा कठोर था फिर भी बच्चों को तरह के अनुशासन से कोई शिकायत नहीं थी। सभी छात्र आज्ञाकारी थे और कृषि कार्य को बडी लगन से करते थे। इसके कुछ वर्षों के बाद सर ए.के.जी. इंटर कॉलेज जलालपुर धना चले गये। मैं भी कक्षा आठ पास करने के बाद 1971 में कक्षा 9 में पहुंचा। वहाँ पर मैंने सर का कठोर अनुशासन, ईमानदारी, पक्षपातरहित अनुशासन के लिए गुरुजी के लिए अपार सम्मान देखा। गुरुजी बच्चों को एक अभिभावक के समान ट्रीटमेंट देते थे। कालिज क्योंकि अनुशासन में सर्वोपरि था। इसलिए सभी विद्यार्थी शान्ति एवं सद्भाव से पठन पाठन करते थे। इस जिम्मेदारी को गुरुजी ने सहर्ष निभाया। इसलिए कॉलेज का स्टाफ एवं छात्र गुरुजी से अपार प्रेम करते थे। मैं आज भी अपने अध्यापन कार्य से सेवानिवृत्त होकर आपसे मिलता रहता हूं और वे हमारा भी बहुत सम्मान करते हैं। अतः मैं ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करता हूं। ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे स्वस्थ रहकर हमारे बीच बने रहें।"
सूबे सिंह (प्रधान आचार्य), अमरोहा
"मैंने सन् 1976 में कक्षा 6 में ए.के.जी. इंटर कालेज जलालपुर धना में प्रवेश लिया था। उस समय गुरु जी ए.के.जी. इंटर कालेज में कृषि के अध्यापक थे। गुरु जी कठोर अनुशासन, ईमानदार, पक्षपातरहित एवं हंसमुख स्वभाव के अध्यापक थे। संपूर्ण विद्यालय में गुरु जी अपार सम्मानित थे। गुरु जी सभी छात्र/ छात्राओं को स्वास्थ्य के विषय में भी अच्छा मार्गदर्शन करते थे। गुरु जी सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास करते थे गुरु जी का खानपान बहुत ही सादा था। गुरु जी फल एवं हरी सब्जियों को बहुत पसंद करते थे। यही कारण है कि गुरु जी आज 110 वर्ष की आयु में भी स्वस्थ हैं। मैं गुरु जी से समय-समय पर मिलता रहता हूँ। आज भी गुरु जी मेरा मार्गदर्शन करते हैं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि गुरु जी स्वस्थ रह कर हमारा मार्गदर्शन करते रहें नमस्कार।"
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