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एकाधिक कवितायें - श्री बाबूलाल 'नायक' (अपडेटेड 01.05.2024))

श्रमिक दिवस पर विशेष रचना

🇮🇳बाल मजदूर 🇮🇳

वो देखो-देखो..!!!

भट्टा बस्ती में ईंटों के बीच,

बचपन को देखो!

गारे में सने,

बहती नाक, 

हाथों में ईंटें,

भारी बोझा उठाते देखो!

उलझे हुए बाल,

नंगे पैर फटे हाल,

धूप में सना काला चेहरा,

गोल-गोल ऑंखें घुमाते देखो!

सुबह देखो-शाम देखो! 

दोपहरी में भी ईंटें उठाते देखो!

ना रात को सोते, 

ना दिन में चैन,

सदा ईंटों में ही रहते बेचैन।

एक-एक कर ईंटें गिनते,

भूल जाते फिर गिनते-गिनते,

फिर-फिर गिनते।

फिर विश्वास जताते,

गिन-गिन कर ईंटों को चुनते।

मां कहती ......

बेटा जल्दी करो,

आज इन सभी को चुनते हैं।

पिता बैठे-बैठे.....

बीड़ी की फूंक लगाते हैं।

दूर से देती सुनाई धीमी-धीमी, 

आती कानों में टन-टटन-टन-टन,

चौकन्ने हो जाते हैं।

ललचाई नज़रों से देखे कुछ पल,

फिर काम पर लग जाते हैं।

गाॅंठ खोलती मां पल्ले की,

फिर निहारती बच्चों को,

उठती हूक मन में,

बेबस हो जाती है।

पूर नहीं हो सकती बच्चों की,

वापस गांठ लगाती है।

टनटन करता वो डेरे पर,

सब बच्चों को एक-एक कर,

कुल्फी देने लगता है।

मां दौड़ उठी बोली भैया,

पूरे पैसे आज नहीं हैं,

बस रहने दो,

बच्चे कुल्फी लेकर चाट रहै थे।

धड़कन बढ़ती देख,

सब नजारा समझ गया,

तत्काल बोला...... 

कोई बात नहीं मां.....

यह भी मेरे ही बच्चे हैं।

आंखों से ओझल,

टन-टनन-टन-टन.... 

ध्वनि मंधरी-मंधरी...

निःशब्द हो.........।

स्वरचित

'नायक' बाबूलाल नायक 

(व्याख्याता, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, खरेडा़) 

टोंक (राज.)

#झुलसती धरती दोषी कौन?

झुलसती धरती दोषी कौन, आपस में सब बैठे मौन।

धरती बंजर कर दी सारी, बिछी जाल कंक्रीट की भारी।


अट्टालिकाऍं ऊॅंची-नीची, बहै नालियाॅं जहर सींची।

दूर-दूर तक गायब हरियाली, पड़े हुए हैं भूखण्ड खाली।


रंगी काॅलोनी काट दिए पेड़, कटी खेत की सारी मेड़।

तपती धरती आग उगलती, सनन-सनन लपटें चलतीं।


स्वार्थ साध निज वैभव का, हनन करते सब प्रकृति का।

चंद दिनों की ऐश्वर्यता हित, जीवन हुआ सभी कलंकित।


भू जल दोहन करे उत्खनन, आफत कर दी भारी उत्पन्न।

दूर-दूर तक किया सफाया, कांपे थर-थर सबकी काया।


रोग विषाणु बढ़ी बीमारी, काया सुख आयु घटती सारी।

बहे फैक्ट्री जहरीला पानी, सभी जीवों को होती हानि।


छोड़ो व्यर्थ दिखावा सारा, करो श्रृंगार धरती का न्यारा।

धरती सरसिज अमृत बरसे,  जीव जंतु ना कोई तरसे।


आओ मिलकर करें प्रयास, धरती मा का होय विकास।

जन-जन तक पहुंचे संदेश, हरियाली युक्त हो अपना देश।

स्वरचित

'नायक' बाबू लाल नायक 

(व्याख्याता, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय)

खरेड़ा (टोंक, राज.)

दोहा

पाप कर मांगे क्षमा,नहीं उचित अपमान।

परहित करते काज ही,यही अतुल सम्मान।।

🌺जीवन 🌺

जीवन के सपनों के खातिर,

       अपनों से मत होना दूर।

           चाहे कितनी आए मुश्किलें,

                 कभी नहीं होना मजबूर।।

                     अपनी चाहतें भ्रमित करती,

               भटका देती निश्चय मंज़िल।

         अंतर हित परहित ना जाने,

उलझन में फंसता है दिल।।

           'नायक' बाबूलाल नायक


🇮🇳🌺बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ🌺🇮🇳

खड़ी हस्तियॉं बढ़ी मैदान में।

क्या ये "लोकतंत्र" की चाह में ?

सब घड़-घड़ कर मुद्दे लुभा रहे।

दिखलाते सपनों की थाह में।।


🇮🇳"लोकतंत्र" अब निष्पक्ष बनाओ।

बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ।।🇮🇳


घर-घर आज निमंत्रण आया।

शत प्रतिशत मतदान की चर्चा।।

भूल न जाना नियत दिवस को।

देखो-देखो सब यह बैलट पर्चा।।


🇮🇳"लोकतंत्र" अब निष्पक्ष बनाओ।

बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ।।🇮🇳


जातिवाद का सब तोड़ो बंधन।

"लोकतंत्र" अब निष्पक्ष बनाओ।।

सक्षमता ही चुनकर आगे आए।

बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ।।


🇮🇳"लोकतंत्र" अब निष्पक्ष बनाओ।

बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ।।🇮🇳


निर्धनजन की निर्धनता समझे।

शिक्षा सबकी शिक्षा बन जाए।।

मंज़िल से अब ना कोई भटके।

स्वरोजगार भला सब जुड़ पाए।।


🇮🇳"लोकतंत्र" अब निष्पक्ष बनाओ।

बस "राष्ट्रवाद" का धर्म निभाओ।।🇮🇳


 🇮🇳"नायक"बाबू लाल नायक 🇮🇳

जिला टोंक (राजस्थान)


🌺💥अमात्रिक छंद💥 🌺

अनगनत जन मतलब संग।

खव मगज सब करवत तंग।

करत परम धरत धरम जंग।

बस अखरत धर पर बदरंग। 


सर पर धर कर चलत फरत।

इधर-उधर बतरस मनचलत।

करत रहत घर-घर अनबनत।

बरबस नफरत चरचत पसरत।


हरदम खटरस बरसत झरझर।

करत शरम नर अवत पलभर।

जनम गमय जन-जन दुतकर।

नरक गमत जनम-जनम भर।


अब सब तज गफलत मत कर।

सहज-सरल मन समरस भर।

अनवरत सत पथ पर चलकर।

करत रहत करम-धरम अवसर।


🇮🇳"नायक"बाबू लाल नायक 🇮🇳

जिला टोंक (राजस्थान)

"हौसले बुलंद कर"

हौसले बुलंद कर बुलंदियों को,

      छूने का थोड़ा जुनून तो रख।

           सफलताएं चूमेंगी हर कदम तेरा,

                धैर्य का तू थोड़ा स्वाद तो चख।।


जाल बिछा है मुश्किलों का,

        जीत लेगा तू एक-एक कर।

              मत देख कभी मुड़कर पीछे,

                    साध लक्ष्य को संधान तो कर।।


भरे हुए है ख़ज़ाने खुशियों के,

      अहसास करेगा यूं पल-पल।

             कर लेगा हासिल मंज़िल को,

                  अरमान बड़े लेकर तो चल।।


चिंता बड़ी चिता से भारी,

     सब कर्मों का ही है लेख।

           कर्म तेरा है तो सत पथ तेरा,

                  जरा कर्मठ बनकर तो देख।।

बाबूलाल 'नायक' 

      (व्याख्याता)

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय

खरेड़ा, टोंक (राजस्थान)



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