महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट, बिहार/उत्तर प्रदेश में कुर्मी/यादव राजनीति में ठीक ठाक प्रतिनिधित्व के साथ साथ सामाजिक हस्तक्षेप भी रखते हैं, परन्तु गत तैंतीस वर्षों में सामाजिक बदलाव के रूप में और विशेष रूप से अपनी जाति के लिए यदि कुछ विशेष नहीं कर पाए हैं तो उसके मूल में वो कारण हैं जो विशिष्ट वर्गों को ध्यान में रखकर नीति बनाने में निहित हैं। यह सब सर्व समाज समझ ही नहीं पाता और यह सब अल्प बुद्धि के कारण नहीं और इसीलिए दिक्कत का विषय है। यदि सारी व्यवस्था का समग्र आकलन करें तो उपरोक्त वर्णित समस्त असरदार जातियां तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियां दिलवाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कर पाई हैं और ऐसी कोई भी गलतफहमी ना पालें कि माननीय कांशीराम ने अनुसूचित जातियों का बहुत बड़ा हित कर दिया है। उनके अभियान से कुछ सत्तालोलुप वक्ता अवश्य पैदा हो गए और अर्थार्जन के अनेकानेक माध्यम अवश्य बन गए हैं। जो कुछ भी पुख्ता तरीके से किया था वह डा. भीमराव अंबेडकर ने किया था संविधान में व्यवस्था करके और सबको समान मानकर।
इसके समानांतर हम वर्तमान शासक वर्ग को और दैनंदिन गतिविधियों को यदि देखते हैं तो पाते हैं कि गत चौंतीस वर्षों में जनसंख्या में अल्पांश में होते हुए भी अपने वर्ग हित के सभी कार्य (निजीकरण, राजकीय संपति अंतरण, शिक्षा का अवनयन, आर्थिक आधार पर आरक्षण, न्यायपालिका पर नियंत्रण) कराने में सफल हो रहे हैं और चमत्कृत रूप से ऊपर इंगित असरदार जातियों के सहयोग से यह हो रहा है और वो समस्त जातियां अपने हित-अहित को सोचे बगैर सहयोग कर रही हैं।
'ऐसा हो क्यों पा रहा है?' यह वर्तमान स्थितियों में यक्ष प्रश्न और विचारणीय विषय है। इस संदर्भ में मेरा मत है कि आज की परिस्थितियों के अनुसार राजनेताओं के नैतिक चरित्र में कमी महसूस होती है, जबकि व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा अधिक और अधिक होती जा रही है। इसके साथ साथ वर्गीय भावना की कमी भी प्रतीत होती है जबकि गत सौ वर्षों में जब से जनता को वोट देने और सरकार बनाने का अधिकार मिला है तब से वर्गीय भावना ही के कारण शासक वर्ग निर्मित हुआ है। शासक वर्ग ने निजी हित को त्यागकर वर्गीय भावना के लिए कार्य किया है और आज भी वर्गीय भावना सर्वोपरि है। अतः इसकी कद्र की जानी चाहिए ।
स्वहित, वर्गहित, जनहित, समाजहित तथा विश्वहित देखना प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति का अधिकार है तो कर्तव्य भी है, लेकिन इस सबका एक क्रम है और इस सबके लिए मानसिक व्यापकता अर्थात् खुले दिमाग की जरूरत है। अतः इसकी आलोचना करने के बजाय सभी अपनी वर्गीय भावना बनाएं, दिमाग को व्यापक सोच के साथ विकसित करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आज की परिस्थितियों में विश्व हित की सोच अप्रासंगिक हो गई है क्योंकि विश्व का नियंत्रण वैश्विक शक्तियों के हाथ में है जो केवल स्वहित देख रही हैं। इसलिए हम राष्ट्र हित तक ही सीमित रहें तो श्रेयस्कर होगा। अपने वर्ग के, समस्त वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करें तो सबको संतुष्ट भी किया जा सकता है और बहुत कुछ अच्छा हो सकता है। सिर्फ जाति, वर्ग और धर्म के व्यक्तियों को किसी भी स्तर का जनप्रतिनिधि बनाने भर से कुछ नहीं हो सकेगा ।
कुछ लोगों की मेरे मत से असहमति हो सकती है, तो इस संदर्भ में मेरा यही कहना है कि समाज में हजार साल पहले किया गया विभाजन ही तो देश की सबसे बडी समस्या है जिसका निदान किया जाना समय की आवश्यकता है।
ये मेरे निजी विचार हैं बाकी आप स्वयं सम्यक निर्णय लेने मे सक्षम हैं शेषराज पंवार (आलेख सृजक)
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