गाजियाबाद : पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है, पिछले पंद्रह दिनों में राजनीति के रणबांकुरों ने सियासत के मैदान में हर दांव आजमाया। विरोधी को प्रचार में पटखनी देने के लिए किसी ने विकास के नाम पर वोट मांगे तो किसी ने भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद और जातिवाद के मुद्दों पर मतदाताओं से रिश्ता मजबूत करने का प्रयास किया।
सियासत की हांडी में राजनीतिक दलों के मुद्दे कितने पके इसका मूल्यांकन अब 26 अप्रैल को मतदाता करेंगे, जिसका परिणाम तो चार जून को आएगा। लेकिन, पश्चिम की परीक्षा के बाद जो हवा चलेगी। उसका असर तीसरे और चौथे चरण में भी दिखाई देगा।
दूसरे चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों मथुरा, गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, बागपत, मेरठ, अमरोहा, बुलंदशहर और अलीगढ़ पर होने वाले मतदान को लेकर दिग्गजों की साख दांव पर है। राजनीति के अखाड़े के दिग्गजों ने पंद्रह दिन तक हेलीकाप्टरों से खूब धूल उड़ाई, लेकिन मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में पूरी तरह सफल दिखाई नहीं दिये। जनसभा, रोड शो और नुक्कड़ सभाओं में भीड़ तो खूब उमड़ी, लेकिन मतदाता अभी तक मौन है। इसे लेकर नेताओं के साथ ही राजनीति के जानकार भी असमंजस में हैं। इन आठ सीटों का परिदृश्य तीसरे चरण के चुनाव की भी दिशा तय करेगा। इनमें से चार उम्मीदवारों ने हैट्रिक लगाने को चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी। बदलती सियासी हवा को लेकर दिग्गज नेताओं की हवाइयां उड़ी हुई हैं।
भाजपा ने 2019 में जीती थीं सात सीटें 2019 में इन आठ सीटों में से भाजपा ने सात जीती थीं और एक पर बसपा ने जीत हासिल की थी। इस बार आठों सीटों पर राजनीति के जानकारों का गणित कह रहा है कि प्रत्येक सीट पर मतदाता राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों के साथ स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट कर सकते हैं। इस बार I.N.D.I.A. के अलावा रालोद-भाजपा गठबंधन से भी सियासी समीकरण बदल गए हैं। इसमें बसपा अपने कोर वोटर के दम पर मुकाबले को रोमांचक बना रही है।
समीकरण बदलने से रोचक हुआ मुकाबला : इस बार इस चरण के समीकरण बदलने से भी चुनाव रोचक हुआ है। पिछले चुनाव में जिन कुंवर दानिश अली ने 2019 में बसपा के टिकट पर चुनाव जीता था, उन्हें कांग्रेस ने अमरोहा सीट से उम्मीदवार बना दिया है। पिछले चुनाव में बसपा और सपा में गठबंधन था। इस वजह से प्रदेश में बसपा ने 10 और सपा ने 5 सीटें जीत ली थीं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। बसपा अकेले दम पर चुनाव लड़ रही है और सपा-कांग्रेस इंडी गठबंधन में साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
बीजेपी के साथ आरएलडी आ चुकी है। जिसकी वजह से बीजेपी की ताकत बढ़ी मानी जा रही है। इस चरण में सपा और कांग्रेस 4-4 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। जबकि बीजेपी सात और आरएलडी एक (बागपत) सीट पर चुनाव लड् रही है।
शिक्षाविद् का मत
"लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के चुनाव प्रचार में राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे हावी रहे हैं। सभी दलों के दिग्गज नेताओं ने मतदाताओं को अपने-अपने एजेंडे को बताकर वोट मांगा है। वादे और दावे भी किये हैं। इसके बावजूद मतदाता स्थानीय मुद्दों को लेकर मत डालने की तैयारी कर रहा है। मंहगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं और मंहगी हो रही शिक्षा को ध्यान में रखकर मतदाता सतर्क और सावधान दिख रहा है। मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में इस बार नेता कमजोर दिखाई दिये हैं। अन्य आधार पर मतदान की हवा भी जोर पकड़ रही है।"
डा. राकेश कुमार राणा (समाजशास्त्री)
सैन्यकर्मी का मत
"देश के विकास को लेकर लोग वोट करने जा रहे हैं। सामाजिक ताना- बाना ऐसा है कि लोग राष्ट्रीय मुद्दों की बात करते करते क्षेत्रवाद और जातिवाद पर अटक जाते हैं। इस बार चुनाव में इसका प्रभाव नजर आ रहा है। आबादी के हिसाब से राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर कई वर्ग नाराज हैं। दिग्गज नेता इस बार जन सभाओं में छोटी-छोटी बातों को लेकर खुद को हल्का करते दिख रहे हैं। मतदान पर इसका भी प्रभाव पड़ेगा। पिछले कुछ सालों में देश की सैन्य क्षमता में विस्तार होने से देश की सुरक्षा चाक चौबंद हुई है।"
ब्रह्म सिंह जी नागर, (सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी)
दैनिक जागरण से साभार
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