सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आचार्य श्री राधाकृष्णन मनौडी के अनुसार गीता के माध्यम से जीवन को सही दिशा देना संभव। (संशोधित)

अवसर

मानव जीवन की सभी समस्याओं का हल एवं जीवन को सही दिशा यदि कहीं से मिल सकती है तो ऐसा  केवल श्रीगीता के माध्यम से ही सम्भव है। हम सभी यह जानते हैं कि प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों ने तथा जगदगुरु पूज्य शंकराचार्य ने सदैव ही इस हेतु न केवल अपने उपदेश किए वरन सरल भाषा में समझाकर इसे अपने जीवन मे उतारने पर भी बल दिया।

उक्त विचार, 'विश्व गीता संस्था' के संस्थापक व विश्व हिंदू परिषद के केन्द्रीय मंत्री आचार्य श्री राधाकृष्णन मनोडी ने प्रकट किए।

आचार्य मनोडी शास्त्री नगर 'के' ब्लॉक में विश्व गीता संस्थान के मासिक उपवेशन बैठक में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि संस्थान अपने मुख्य उद्देश्य, 'हर घर गीता घर घर गीता' पर कार्य कर रहा है।

बैठक में आगामी 14 अप्रैल को नवसंवत्सर के उपलक्ष्य मे धूमधाम से मंगल मिलन महोत्सव मनाने का निर्णय लिया गया, जिसकी जिम्मेदारी सभी सदस्यों को दी गई।

बैठक की अध्यक्षता संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डाक्टर जितेंद्र त्यागी ने की। बैठक का संचालन संस्थान की महासचिव तुषा शर्मा ने किया तथा संस्थान के कार्यकलापों की जानकारी दी।

विषय प्रवर्तन करते हुए संस्थान के कार्याध्यक्ष डा. जितेंद्र त्यागी ने संस्थान के मासिक कार्यों के विषय मे बताया।

उन्होंने कहा कि संस्थान मासिक उपवेशन करके अपने समस्त कार्य योजनानुसार करता है, तीन माह में एक बड़ा कार्यक्रम करते हैं व वार्षिक कार्यक्रम गीता जयन्ती पर आयोजित करते हैं। साथ ही उन्होंने संस्थान की सदस्यता बढ़ाने पर जोर दिया।

चन्द्रशेखर मयूर ने संस्था की आय-व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत किया।

बैठक में डॉ. सिंह, हरेन्द्र मोरल, राजन जी, विवेक कुमार शर्मा, प्रणव मनौडी व सुमनेश सुमन आदि उपस्थित रहे।

सूचना स्रोत - कवि सुमनेश सुमन 

9997091719














टिप्पणियाँ

  1. राम कथा की तरह आजकल गीता पर प्रवचन का दौर भी खूब चल रहा है। गीता जयंती मनाने और भगवत गीता की व्याख्या करने के क्रम में कई संस्थाएं और व्यक्ति काम कर रहे हैं, किंतु जब तक ऐसे व्यक्तियों को, जिन्होंने गीता के अनुसार जीवन जीया है समाज के सामने लाकर सम्मानित करने का प्रयास नहीं करेंगे तब तक सामाजिक परिदृश्य में कोई परिवर्तन होता दिखता नहीं है।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...