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प्रताप वार्षिकी के लिए संपादकीय

इस बार प्रताप वार्षिकी का प्रकाशन ऐसे समय में हो रहा है जब समूचा भारत सात चरणों में मनाए जा रहे लोकतंत्र के महापर्व लोकसभा चुनावों से रूबरू है। चुनाव अर्थात् देश के नागरिकों की बुद्धिमता का प्रत्येक दृष्टिकोण से परीक्षण। इस स्वतः होने वाले परीक्षण ही की भांति प्रताप राव गुर्जर ने भी अपने चातुर्य और कौशल की धमक से भारतीयों को चमत्कृत किया था। और! अब वर्षों वर्ष से उनकी स्मृति में हो रहा प्रताप वार्षिकी का प्रकाशन आत्मसंतोष देता है कि उस महापुरुष की विविध यादों को हम संजो पा रहे हैं और उस महापुरुष के व्यक्तित्व को नित नए लोग समझ कर उसके प्रति कृतज्ञ होते जा रहे हैं। इस सबके मूल में जो व्यक्ति है उसने राजनीतिक क्षेत्र में रहते हुए भी सामाजिक क्षेत्र के प्रति भी अपने समर्पण को दर्शाया है। उस व्यक्तित्व ने अपने दो राजनीतिक सहकर्मियों को शासकीय व्यवस्था के अंतर्गत उन  सहकर्मियों के जीवन के अंतिम दौर में उनको आर्थिक मदद राजनीतिक विभूतियों से दिलवाकर उनके परिजनों के मन में बेहद सम्माननीय स्थान बनाया। इस आर्थिक मदद के पात्र व्यक्ति के लिए पात्रता सिद्ध करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसको इस अनूठे राजनीतिक-सामाजिक व्यक्तित्व ने बेहद संयम से पूरा कराया। और! शासन प्रशासन की संतुष्टि के साथ साथ जीवन की अंतिम घड़ियों से रूबरू अपने सहयोगियों को भी संबल दिया।

यही जीवन की आदर्श प्रक्रिया है जब यह व्यक्तित्व, मैं अथवा आप अर्थात् कोई भी अपनी समग्र बुद्धिमता का परिचय दे दे और यह स्पष्ट दिखे कि यह किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित मानव संपदा नहीं अपितु समस्त भावों को अपने में समाहित किए एक वास्तविक मानव संपदा है। 

साथियो आइए इस पत्रिका के इस अंक के साथ कोई एक प्रण लेकर इसके आगामी अंक के प्रकाशन के मध्य की अवधि में कुछ ऐसा करने का प्रण करते हैं जो सिद्ध कर दे कि जिन्दगी मुस्कराती है।

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