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गौरैया की पुकार (अपडेटेड दिनांक १०.११.२०२४)

भूमिका

गौरैया की पुकार एक अभियान है इस निरीह पक्षी को संरक्षित करने की दिशा में। एक मानव ने एक पक्षी की ही और से गौरैया को वाणी देने का सफल प्रयास किया है। 

पुस्तक

देखिए तो जरा - 


पत्र समीक्षा
"हंसराज जी को धन्यवाद शिविरा पत्रिका में "गौरैया की पाती" पुस्तक की समीक्षा प्रकाशित होने की सूचना देने के लिए। जुलाई में भेजी थी।" 
समीक्षा का मूल पाठ भी प्रस्तुत है।

गौरैया की पुकार
संपादक
डॉ. सूरज सिंह नेगी,  और डॉ. मीना सिरोला तथा चन्द्रमोहन उपाध्‍याय 
प्रकाशक
दीपक पब्लिशर्स एण्‍ड डिस्ट्रीब्यूटर्स
जयपुर
पृष्ठ संख्या : 192 
मूल्य: रु. 595

गौरैया की पुकार
श्रीदादू पर्यावरण संस्थान रानीपुरा, साहित्य मंच टोडारायसिंह के अथक प्रयासों से एवं वरिष्‍ठ साहित्यकार डा. सूरज सिंह नेगी जी, डा. मीना सिरोला जी एवं चन्द्रमोहन उपाध्‍याय जी के संपादन में 'गौरेया की पुकार' पुस्तक साहित्य अनुरागियों द्वारा गौरैया के संदर्भ में लिखे गए 62 पत्रों का एक संकलन है । इन पत्रों में गौरैया सीधे मानव जाति को संबोधित कर रही है।
गौरेया चिडिया की आवाज बनते इन पत्रों के शब्दों में गौरैया की पीड़ा,दर्द,व्यथा,अंतर्वेदना और अंतरात्मा की पुकार है जो पत्र लेखकों के माध्‍यम से गौरैया खुद बयां कर रही होती है।पुस्तक के प्रथम पत्र में अनिल यादव के माध्‍यम से गौरेया कहती है ‘हे मानव तुम ईश्‍वर की सर्वश्रैष्‍ठ रचना हो और हम मूक पक्षियों का दर्द समझ सकते हो इसलिए तुम्हें पत्र लिखकर हमारी पीड़ा से अवगत कराना हमारा अंतिम उपाय है ।‘
पुस्तक के प्रारम्भ में श्री मारिया शाइन ए उपवन संरक्षक टौंक का संदेश है जिसमें वे बताते हैं कि किन कारणों से गौरैया का अस्तित्व संकट में पड़ा है और अब क्या किया जाना चाहिए ?उत्तर है-लुप्त होती गौरेया चिडिया को बचाने के लिए किसी एक की नहीं हम सब की नैतिक जिम्मेदारी बनती है।पुस्तक में दिया गया दूसरा संदेश दादू पर्यावरण संस्थान के अध्‍यक्ष श्री देवेन्द्र कुमार भारद्वाज का है हैजिसमें वे जानकारी देते हैं कि उक्त संस्थान द्वारा 5000 मिट्टी के घोंसले तैयार करवाकर वितरण किया जा रहा है,इसके अतिरिक्त 75000 परिंडों का निशुल्क वितरण भी किया गया है।
 लगभग सभी पत्रों में पत्रलेखकों के माध्‍यम से गौरेया चिडिया करूण एवं मार्मिक शब्दों में कहती है कि किस तरह से वह दस हजार वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्‍य समाज का अभिन्न अंग बनी हुई है,उत्सव, जन्म,मरण,परण(विवाह) के पलों की वह साक्षी रहती आई है।
इन पत्रों में गौरैया का महत्व प्रतिपादित किया गया है कि किस तरह से फसलों के लिए हानिकारक कीटों को खाकर वह किसानों की मदद करती है।घर में गौरेया के घौंसला बनाने को शुभ शगुन माना गया है।प्रात: इसकी चहचहाट से मन मुदित हो उठता है।
अधिकतर पत्रों में गौरेया का अस्तित्व खतरे में पड़ने के कुछ कारण बताए गए हैं जैसे-मोबाइल टावरों से निकलती हानिकारक तरंगो को ये मासूम जीव सहन नहीं कर पाते।फसलों में कीटनाशकों का छिड़़काव से इनका भोजन कीट आदि नष्‍ट हो जाते हैं ।पौधों के नवाकुंर जहरीले हो जाते हैं,भंडारण के लिए डाला जाने वाला अनाज भी कीटनाशक रसायनों से दूषित हो जाता है जो इनकी मौत का कारण बनता है।पतंगों के चाइनीज माझों से, छत के पंखों से कट जाना,फैक्ट्रियों एवं वाहनों से निकले धुंएं से दम घुट जाना इनकी मौत का कारण बनता है।कुछ पत्रों में गौरेया चिडिया के जीवन चक्र,प्रजनन,आदतें, भोजन, प्रजातियां,जैविक संरचना आदि का विशद वर्णन किया गया है।
कुछ पत्रों में कुछ संस्थाओं एवं व्यक्तियों के प्रयासों का संदर्भ दिया गया है।रामसिंह साद के पत्र में सालिम अली की गोली से चिडिया का मरना, तड़पते हुए देखना,उनका हृदय परिवर्तन होना तथा संपूर्ण जीवन पक्षियों के हित में समर्पित कर देने का वर्णन जिक्र है।
ओमप्रकाश क्षौत्रिय चीन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि किस तरह से चीन में लाखों की तादाद में चिडियाओं को मारा गया और इसके अगले ही वर्ष कीड़े मकोड़ो की बाढ़ आ गई फसलें नष्‍ट हो गई और अकाल पड़ गया। परवीन बानोजी के पत्र में चिडिया कहती हैं कि –‘इंसान चाहता है कि उसे उड़ने के लिए पर मिले,और हम चाहते हैं कि हमें रहने के लिए घर मिले।
सभी पत्र लेखकों ने यह बात पुरजोर ढ़ग से कही है कि प्रत्येक घर में,धार्मिक स्थानों में चिडियाओं के लिए गत्ते के डिब्बे या लकड़ीके अथवा मटकी घोंसला बनाने के लिए रखी जानी चाहिए । पानी के लिए कोई सकोराया परिंडा और दो मुट्ठी चुग्गे का भी प्रबंध किया जाना चाहिए अन्यथा केवल एक दिन गौरैया दिवस मनाने से कुछ नही होगा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि गौरेया चिडिया के संदर्भ में यह पुस्तक एक सर्वांगीण दस्तावेज है जिसमें एक ही पुस्तक में गौरेया के विभिन्न पहलुओं के बारे में इतना कुछ लिखा गया है।विद्यार्थियों एवं पर्यावरण अनुरागियों के लिए यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।
समीक्षक
केदार शर्मा (सेवानिवृत व्याख्‍याता)
बमोर रोड, अन्नपूर्णा डूंगरी 
टोंक (राजस्थान) - 304001, 
 मो:9587615121

प्रिय मानव,

नमस्कार।

इस प्रकृति में असंख्य जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सदियों से रहते आ रहे हैं। ईश्वर उन सबको कुछ खाने, रहने को देता है। इसलिए कहा भी जाता है कि "ईश्वर ने चोंच दी है, तो चुग्गा भी देगा।"

आज ऐसी ही एक सुहावने पक्षी ने (गौरैया) मानव के नाम पाती लिखी है।

मैं गाँवों में भी रहती हूँ। पर शहरों में सबसे अधिक पाई जाने वाली पक्षियों की प्रजातियों में मेरा नम्बर पहला है। इन्सान द्वारा मुझे पक्षियों में सबसे अधिक प्यार मिलता है। मैं भूरे रंग का एक छोटा सा पक्षी हूँ। मेरा आकार टेनिस की बॉल से बड़ा नहीं है। मेरी पीठ पर काली धारियाँ होती हैं जिससे नर और मादा को आसानी से पहचाना जा सकता है। मेरी पहचान मेरे आकार से ही नहीं बल्कि रंग से भी हो जाती है। मैं अपने साथी के साथ सपत्नीक सम्बन्ध भी बनाती हूँ। मैं मेरे घोंसले से बहुत प्यार करती हूँ। मैं उसके आस-पास के क्षेत्र की बड़ी सुरक्षा करती हूँ। पर मैं देख रही हूँ कुछ समय से इन्सान के मन में लालच/स्वार्थ की भावना घर कर गई है। उसने अपने लोभ की खातिर जंगलों से पेड़ों को काटकर सड़कें, बड़े-बड़े फ्लैट्स बना दिये हैं। पर उसने यह कभी नहीं सोचा कि यह पेड़ भी किसी जीव-जन्तु के आशियाने होते हैं। इन पेड़ों से ही उनको आहार मिलता है। बहुत दिनों से परेशान होकर आज मैंने मानव के नाम पाती लिखने का निश्चय किया है। हे मानव ! तूने तो स्वयं के फ़ायदे के अलावा और कुछ भी नहीं सोचा। मुझे आज भी वह दिन याद है, जब मैं गाँवों में पेड़ों पर बैठकर मीठी राग में बोलती थी। पेड़ों पर उछल-कूद करती रहती थी। उन पर घोंसला बनाती थी। पर अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा। तेरे स्वार्थ ने प्राकृतिक पर्यावरण को असन्तुलित कर दिया। तूने रात-दिन मशीनों से प्रकृति का अति दोहन करके सारी प्राकृतिक व्यवस्था के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। तूने जगह-जगह मोबाइल के टावर खड़े कर दिये हैं। तुझे पता नहीं इन मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन हमें श्वास नहीं लेने देता है। ये मोबाइल टावर हमारी जान की आफत बन गये हैं। जिससे दिनों-दिन हमारी संख्या घटती जा रही है। दिल्ली सरकार ने 2012 में हमें राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा तो दे दिया पर हमारे संरक्षण के लिए कुछ भी नहीं किया। हे मानव तू भी हमारे प्राणों की रक्षा के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है। इन सबका परिणाम यह हो रहा है कि आज हमारी संख्या पूरे देश में नगण्य हो गई है। हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। पर आज यहाँ एक गौरैया (चिड़िया) को जीने के लाले पड़ गये हैं। हे मानव ! अभी भी समय है तू सम्भल जा। मैं तुझसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। हमारे संरक्षण के लिए हर गाँव, शहर के खुले मैदानों, खेतों की मेड़ों, सरकारी जमीनों, विद्यालयों, तालाब, नहरों की पालों आदि पर सघन वृक्षारोपण करके, हमारी शेष रही सन्तानों को बचा लो। यह हमारी आप से विनती है। आपके संरक्षण से ही हमारे वंश की वृद्धि सम्भव हो पायेगी। यदि अब भी तुमने कुछ भी प्रयास नहीं किये तो हमारा वंश हमेशा-हमेशा के लिए काल-कलवित हो जायेगा। आपके प्रयासों से ही यह राष्ट्रीय पक्षी (गौरैया) पहले की तरह ही गाँव व शहरों में हर पेड़ पर अपने छोटे से मुँह से चीं-चीं की मीठी आवाज सबको सुना सकेगा। सरकारी स्तर पर हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। पर जब तक जन-समुदाय में हमारे संरक्षण के प्रति जागृति नहीं आयेगी तब तक सरकार भी कुछ नहीं कर पायेगी। इस दिशा मे टोंक जिले में टोडारायसिंह तहसील के "साहित्य मंच टोडा" ने गौरैया बचाव हेतु राष्ट्रीय स्तर की पाती लेखन प्रतियोगिता व हस्ताक्षर अभियान चलाकर लोगों में जागरूकता के लिए बहुत अच्छा कार्य किया है। ऐसा ही एक कार्य पर्यावरण व पक्षी प्रेमी पूर्व पार्षद कर्मवीर ढिल्लो ने करीब 5000 (पाँच हजार) घोंसले मिट्टी व लकड़ी के बनाकर निःशुल्क लोगों में वितरित किये हैं। हमारी प्रजाति को बचाने के लिए इस तरह के प्रयासों की बहुत आवश्यकता है। ऐसे छोटे-छोटे कार्यों से ही लोगों में जागरूकता आती है। जब तक पूरा जनमानस हमारे संरक्षण के लिए उठ खड़ा नहीं हो पायेगा तब तक हमारी रक्षा नहीं हो सकेगी। मेरी आप सब इन्सानों से एक हाथ जोड़कर विनती है कि आप जो भी नये-नये डिजायन के भवन बना रहे हैं उनमें भी हमारे लिए एक छोटी सी जगह ग्रीन कॉर्नर के नाम से रखकर उसमें मिट्टी व लकड़ी के घरौंदे बनाकर जरूर रखें।

हम कई तरीके के हानिकर कीड़े-मकोड़ों को खाकर अपनी व आपकी फसलों की भी सुरक्षा करते हैं। आपके घर में मधुर आवाज से घर का वातावरण प्रातःकाल से ही मधुरमय भी बनाते हैं। इस प्रकार आप हमारी रक्षा करोगे तो आपको भी हमसे कई सारे फ़ायदे होंगे। बिगड़ते पर्यावरण की रक्षा भी हम करते हैं। इसलिए आप अधिक से अधिक पेड़ लगाकर अपने स्वयं के जीवन की रक्षा करोगे, आपको ऑक्सीजन प्राप्त होगी साथ में हमें भी रहने, खाने-पीने के लिए आवास व आहार मिल जायेगा।

इसी प्रार्थना और विनती के साथ मैं मेरा पत्र आपको भेज रही हूँ। मुझे पूरी आशा है आप हमारी प्रार्थना को जरूर सुनेंगे। और! हमारी सन्तति को बचाने की दिशा में प्रयास करना शुरू करेंगे। इसी आशा और विश्वास के साथ मैं निवेदन भरा पत्र समाप्त करती हूँ।

आपकी प्यारी गौरैया

"बुलबुल"

हंसराज 'हंस'

शिवराज जी का प्रयास

साहित्य मंच टोडारायसिंह के पदाधिकारियों ने जिला मुख्यालय पर जिला कलेक्टर केकड़ी श्वेता चौहान से शिष्टाचार मुलाक़ात कर गौरैया संरक्षण आधारित पुस्तक "गौरैया की पुकार" सप्रेम भेंट कर विलुप्त होती गौरैया चिड़िया के बचाव सम्बंधित विस्तृत चर्चा की। इसके बाद 'हरियालो राजस्थान अभियान' के तहत पौधारोपण पर चर्चा एवं पर्यावरण को बढ़ावा देने हेतु बीसलपुर रोड पर स्थित प्रसिद्ध लाडपुरा बालाजी धाम की पहाडियों मे सीड्स बाल फेंककर पौधरोपण की जानकारी दी। पर्यावरण के बचाव के लिए धरती को हरा भरा रखना जरूरी है, इसके लिए पर्यावरणविद अनूपमा तिवारी द्वारा पर्यावरण को बढ़ावा देने हेतु सीड्स बाल उपलब्ध करायी गयी, जो महिलाओं द्वारा जंगल में फेंकी गई ताकि वर्षा काल में बीज अंकुरित होकर पौधे बन सकें।  संयोजक शिवराज कुर्मी व प्रवक्ता आशीष विजयवर्गीय ने साहित्य मंच द्वारा की जाने गतिविधिया जैसे पक्षियों के लिए परिंडे़ बांधना, वृक्षारोपण, पाती लेखन सहित विभिन्न सामाजिक व नवाचार कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी।

साहित्य मंच द्वारा आगामी कार्यक्रम, प्रतिभा सम्मान समारोह आयोजन पर चर्चा कर जिला कलेक्टर महोदय को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया। इस अवसर पर साहित्य मंच टोडारायसिंह के संयोजक शिवराज कुर्मी, प्रवक्ता आशीष विजयवर्गीय मौजूद रहे।

कार्यक्रम चित्रों के झरोखे में



बाबूलाल नायक (व्याख्याता) का प्रयास
(राजस्थान उच्च माध्यमिक विद्यालय खरेड़ा टोडारायसिंह टोंक राजस्थान)

🐤कहाँ खो गयी गौरैया?🐤

डाली-डाली नीम की खाली,
कहाँ खो गयी गौरैया?
चीं-चीं-चीं-चीं करती उड़ती,
भूरी-चितकबरी गौरैया।।
सूनी पड़ी अटारी मेरी,
दाना-पानी अटा पड़ा।💧
नीड़ पुराना बना बनाया,
छज्जों के नीचे सड़ा।।
मेरी थाली से आकर के,
चांवल के दाने चुनना।
अपने बच्चों की भी जाकर,
चीं-चीं-चीं-चीं भी सुनना।।
बंधा परिण्डा नीम की डाली,
तुझको आज पुकार रहा।
कब आओगी छूने मुझको,
मेरा अस्तित्व नहीं रहा।।
मैं आऊँगी उड़ती-उड़ती,
करने को विश्राम वहाँ।
बंद कर देना पंखे अपने,
जाऊँगी मैं जहाँ-जहाँ ।।
मेरे शत्रु है ये पंखे,
प्राण-पखेरू हर लेते।
नन्हें बच्चे भूखे-प्यासे,
सिसक-सिसक कर दम देते।।
डोर पतंग की धार तेज ये,
गर्दन हम सबकी काटे।
उलझ-उलझकर हम दम तोड़ें,
छा जाते है घोर सन्नाटे।।
रक्षा करना सब मिलकर के,
ऐसा प्रण तुम लेना आज।
तभी बचूँगी इस कलयुग में,
रखना सारे मिलकर लाज।।
      //●●●//

एक पत्र मानव के नाम
प्रिय मनु सन्दीप, 
वंदन आपके चरणों में 
ची-ची चू-चू ची-ची ,,,,इस आवाज को सुनकर शायद तुम मुझे पहचान गए होगे। हां, बिल्कुल, मैं तुम्हारे घर आंगन में रहने वाली एक नन्ही सी चिड़िया गौरैया ही हूँ। 
मैं देख रही हूँ कि बड़ी प्रगति कर ली आप मानवों ने। बड़े बड़े घर,
भौतिकता से भरे पूरे साजो-सामान, शीशे के चमकदार खिड़की दरवाजे और भी न जाने क्या-क्या सुख-सुविधाएं। जरूरी भी है यह सब आप मनुष्यों के जीवन के लिए ।
 शायद तुम्हे याद होगा जब आप छोटे थे घुटनो के बल चलते थे , तब मेरी परदादी गौरेया आपके घर आंगन में दरवाजे के ऊपर वाली ताक (मेडा ) में घोसला बनाकर रहती थी । दिनभर मेरी परदादी यहां वहां आंगन में इधर से उधर फुदकती रहती थी और आप उसे देख देखकर खुश होते हुए घुटनो के बल सरपट दौड़ते हुए उसे पकड़ लेने की कई-कई असफल कोशिशें करते रहते थे । यह खेल दिनभर में न जाने कितनी ही बार चलता रहता था । मगर मैं आज तुम्हें अपना दुख दर्द सुनाना चाहती हूं ।आपकी इस भौतिकता वादी दुनिया ने हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है ।आपने  अपनी सुख-सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े शीशे की खिड़कियों वाले घर बना लिए हैं जिससे अब हमारा उन घरों में आना-जाना दूभर हो गया है । आपके पूर्वज पहले कच्चे घरों में रहते थे , जिससे हमारी कई पीढ़ियां उन घरों में आसानी से आटी जाती रहती थीं  और कहीं भी अपना घोंसला बना लिया करती थी ।
जिससे हमारा जीवन सर्दी, गर्मी, बरसात सभी तरह की मौसमी घटनाओं से सुरक्षित था । मगर अब जिन पेड़ों पर हम अपना घोंसला बनाती थी ना वह पेड़ रहे और ना आपके मकान में है हमें आने की स्वतंत्रता  । क्योंकि आपलोगो को  एक ही डर सताए रहता है कि तिनके-तिनके लाकर हम कहीं आपके घर को गंदा ना कर दे । हमारी विष्ठा(बीट) से आपके घर आंगन में लगे मार्बल, टाइल्स ,स्टोंस मेला-कुचिला ना हो जाए । इसी कारण चौतरफा शीशे के खिड़की दरवाजों से बंद आपके मकान , आपके घर में हमारा आना जाना बंद हो गया है । बाहर के पर्यावरण में हमारे रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा है । जिससे हमारा जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है और धीरे-धीरे हमारी संख्याएं भी कम होती जा रही है । मगर आप खुद अपने कृत्यों पर नजर डालें तो पाएंगे कि एक दिन में आप कितना कचरा इस धरती पर फैला देते हैं । उसका आप मनुष्य को कोई अफसोस नहीं है और हम अपना नीड बनाने के लिए जब  एक तिनका भी आपके घर आंगन में गिरा देते हैं तो आप क्रोधाग्नि में जल उठते हैं और आपकी गृहिणीया झाड़ू लेकर हमें यहां वहां दौड़ती फिरती है और कभी आंख बचाकर अगर हम अपना घोसला बना भी लेती हैं तो यदा-कदा आप अपने मकानों की सफाई करके उस घोसले को बाहर सड़क पर फेंक देते हो । जरा सोचो कि उस वक्त हमारे दिल पर क्या बीतती होगी ।कितनी मेहनत से हम तीनका लाकर अपना घर बनाते हैं और आप उसे एक पल भर में कचरे के ढेर में फेंक देते हो । आप ही बताओ अब हम रहे तो कहां रहे । ना प्रकृति में हमारे लिए कोई स्थान बचा है और ना ही अब आप मनुषयो के  घर में हमारे लिए कोई जगह बची है । कुछ मानवीयता बची है तो उन लोगों में जो अपने घरों में या आसपास हमारे रहने  के लिए कृत्रिम चिड़िया घर बना करके दे रहे है । परिंडा अभियान चलाकर के हमारे लिए पेड़ों पर परिंडे बांधे जा रहे हैं । धन्य है कुछ ऐसे मानव भी जिन्हें हमारे लिए या  हमारे जीवन की सुरक्षा के लिए इस तरह के अभियान चलाए हैं । आप भी उन्हीं इंसानियत का पालन करने वाली में से हो जिन्होंने हमारी संरक्षण के लिए अपने घर में हमें स्थान दिया है । मगर आपकी मनुष्य जाति के बहुत से इंसान ऐसे भी हैं जिन्हें हम फूटी आंख भी नहीं सुहाते और हमारे रहवासो को उजाड़ कर के रख देते हैं । इस धरती के समस्त प्राणी जगत में आप मनुष्य ही तो हमारे संरक्षक हैं ।हमारी रक्षा का उत्तरदायित्व आप पर ही निर्भर है । इसलिए मैं आप सभी से पुनः निवेदन करना चाहती हूं कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का अस्तित्व बचा रहे और हम भी चिरकाल तक इस धरती के अंग बने रहे , तो हमारे संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करते रहे । हमें अपने घर आंगन में रहने के लिए एक छोटा सा कोना जरूर दें । जिससे सर्दी, गर्मी ,बरसात के मौसम से सुरक्षित रह सके । अगर आप ऐसा करते हैं तो आप हमारे लिए भगवान के समान है । हम आपके लिए आप हमारे लिए यही तो जीवन का मूल मंत्र है । असहाय,कमजोर एवम अबोध प्राणियों की रक्षा करना यही तो मानव धर्म है ।  बस मैं इतना ही कहना चाहती हूं कि आप एक प्रण ले कि आपकी वजह से हमारा अस्तित्व खतरे में नही पड़े और यह शिक्षा आप अपनी सन्तति को भी देकर जाए । जिससे उन्हें भी अपने कर्तव्य बोध का भान रहे । बस मैं इतना ही कहना चाहती हूँ , अंत में ,मैं पुनः अपना गीत सुना कर पाती समाप्त करती हूँ 
ची-ची ,चू-चू ,ची-ची-ची, चू-चू,ची-
ची । फुर्ररर,,फुर्ररर 

        आपके घर आंगन की एक नन्ही        
                   गौरैया चिड़िया

लेखक : सन्दीप कुमार जैन
प्रबोधक L-1
राजकीय प्राथमिक विद्यालय ,सरदारपुरा ब्लॉक उनियारा जिला टोंक (राज )






टिप्पणियाँ

  1. आधुनिक केदार जी शर्मा की समीक्षा पढ़ी। अपने गौरैया के संबंध में बहुत ही संतुलित और सारगर्भित विचारपूर्ण समीक्षा प्रस्तुत की है। जिसे पढ़ कर पूरी पुस्तक का सार समझ में आ जाता है।

    इस शानदार समीक्षा के लिए आपका हार्दिक आभार और अभिनंदन।

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