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कृष्णदत्त जी की बिन मात्रा की रचनाएं

अमात्रिक कविता

खन खन खनकत अब कर कंगन। 

उमंग उठत लखत खन कंगन। 

बसत रहत मन खन खन कंगन। 

अन्तस लगत भलत खन कंगन।


पवन चलत जब उड़त-उड़त लट। 

चंचल मन तब रुकत लखत लट। 

उड़त लखत लट लरजत हर घट। 

रंग चढ़त लख उलट पलट लट।


घन गरजत लख कंपत तन मन। 

बरसत घन जब तर बर कण-कण। 

सर-सर पवन करत तन कम्पन। 

तपत रहत कब बरसत जब घन।


घन बस बरस भरत जल जंगल। 

जल बस बरस करत जन मंगल। 

भर मन लख अब मंगल-मंगल। 

मन रख मंगल मत कर दंगल।


मन मत थकत फकत बस चल-चल। 

चलत चलत कर हर उलझन हल। 

वक्त टलत कब कर भल कलकल। 

भज बस भगवन मतकर छल बल।


मटक-महक मत चल अब हर पल। 

लख अब उमर भजन कर हर पल।

कर अब मनन जगत लख हलचल।

कर मन धवल न कर अब मट मल।

कृष्ण दत्त शर्मा 'कृष्ण'


डर मत

डर  कर  मत  चल  हर पल।

नजर  रखकर पल-पल चल। 

हर  पल मत कर कल-कल।

मन मत कर अब बस छल ।


नटखट  जगत  जन मन।

मत कर हर क्षण कतरन। 

अब  कष्ट सहन कर तन। 

वश  रख  हर  पल  मन।


लख दर-दर हर क्षण तम। 

सहन  करत  हम हर दम। 

मत  रख  मन अन्दर गम। 

नयन  मत कर  अब नम।


अब घर पर रहकर रमण। 

तन  पर  पहन नव वसन।

कण-कण  लख  भगवन।

कर  बस  हर क्षण नमन।

मूल रचना - हंसराज हंस

संपादन - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'

(उलझन सुलझन के लिए)

गजब जगत चलन

अजब गजब यह जगत चलन। 

पर धन लख हर रखत जलन। 

रहत न जन-जन जगत मगन। 

अजब बहत यह जगत पवन।


रंग ढंग न कर अब बदरंग। 

हर हृदय भर बस नवरंग। 

नवल-नवल अब न कर जंग। 

करत जंग-जंग पल-पल तंग।


अब कर वश यह चंचल मन। 

कहत संत हर संकट मन। 

भजन करत हर पल भगवन। 

अब कर सरल सरलतम मन।


अब रख स्वच्छ यह तन व मन। 

तरंग रख जग हर पल मन। 

मत रख छल व कपट अब मन। 

जन-गन-मन लख अब भगवन।


रहत बहत मन-मन उलझन। 

करत यतन न रह उलझन। 

उलझन संकट जड़ इस मन। 

मत कर मन उलझन सृजन।

कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'

25/03/24

श्रीकांत जी की टिप्पणी

"मैंने आज तक किसी भी कवि को इतना मुश्किल काम इतनी आसानी से करते नहीं देखा .... सभी से आग्रह है अवश्य पढ़ें और आनंद लें।"

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