कवितायें
चल-चल, बढ़-बढ़,
चल उठ, पढ़-पढ़।
समय व्यर्थ न कर,
सब कर्म समय पर कर।।
लक्ष्य पथ पर अनवरत चल।
चल-चल, बढ़-बढ़
सत्य वचन पर चल,
असत्य पर मत मचल।
तन स्वस्थ,मन स्वच्छ,
मत कर,मत कर नकल।।
चल-चल, बढ़-बढ़
जगकर कर,सफल जतन,
उठकर कर,भगवन् भजन।
चलकर कर,सफल वतन,
भगकर कर,जनक नमन।।
स्वयं पथ पर मत मचल।
चल-चल, बढ़-बढ़
नल पर जल व्यर्थ न कर,
सफल बन,समय व्यर्थ न कर।
स्वयं जन पर जलन मत कर,
स्वयं जतन पर शंक मत कर।।
मत बदल,बन सफल बन सफल।
चल-चल, बढ़-बढ़
चल उठ, पढ़-पढ़।
रचनाकार
कवि मुकेश कुमावत मंगल
समीक्षा अपेक्षा
बिना मात्रा के लिखने का प्रयास किया है। मेरा यह प्रथम प्रयास कैसा रहा आप हृदय की गहराई से बताएं?
आकलन नि:संदेह सफल प्रयास।
सरल सहज भाषा में बच्चों को प्रेरणा देने वाली ये विशेष कविता है मेरी।


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