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मेरा मत (अपडटेड स्तंभ) - इं. शेषराज सिंह (अपडेटेड ३१.०१.२०२६)

भूमिका

मानव जीवन के विविध पक्षों को लेकर सेवानिवृत्त अभियंता श्री शेषराज जी समय समय पर अपने विचार साझा करते रहते हैं। यह उनकी अभिरुचि है और निरंतर चीजों को समझने की जिज्ञासा भी। संभव है कुछ आपके भी काम आ जाए। 

फ़िलवक़्त स्थिति

धार्मिक भावनाओं को दिग्भ्रमित करने का प्रयास अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। न्यायालय के माध्यम से सामाजिक अन्याय को नियंत्रित करते रहना भी अधिकतम एक-दो वर्ष तक ही संभव हो पाएगा। साथ ही, राजनीतिक सत्ता को दलालों के माध्यम से संचालित करने का प्रयास स्वयं को अत्यंत बुद्धिमान समझने वालों द्वारा किया जा रहा है, जबकि दलालों का अस्तित्व ही अब खतरे में पड़ चुका है।

ऐसी स्थिति में मनुवाद करे भी तो क्या करे—छद्म देशभक्ति के कृत्यों से भी अब वांछित परिणाम नहीं मिल रहे हैं। अंबेडकर, गांधी और नेहरू की छवि खराब करने के निरंतर प्रयासों से भी कोई ठोस लाभ प्राप्त नहीं हुआ। अन्ना आंदोलन ने लगभग दस वर्षों तक सत्ता का आधार अवश्य दिया, किंतु अब वही कारण आपसी जूतम-पैजार का रूप ले चुका है।

विशिष्ट संगठनों की तथाकथित विशिष्टता केवल जाति-विशेष के हितों तक सीमित है—यह परम सत्य भी अब जनता को समझ में आने लगा है। लोग सचेत हैं, तैयार बैठे हैं। अधिकतम पाँच वर्ष और—और फिर राम नाम सत्य।

मानसिक कलुषिता 

किसी समाज या वर्ग को यदि दीर्घकालीन विनाश की ओर ले जाना हो, तो सबसे प्रभावी उपाय उसकी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करना होता है। जब किसी समाज को वास्तविक ज्ञान के स्थान पर अंधविश्वास, कूपमंडूकता और अप्रासंगिक विचारधाराएँ दी जाएँ, तो उसकी सोचने-समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है, और वह समाज वैज्ञानिक प्रगति एवं तार्किक विवेक से वंचित रह जाता है।

ऐसे समाजों में प्राचीन और कालबाह्य मान्यताओं को ‘ज्ञान’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है—जैसे यह विश्वास कि पृथ्वी चपटी और स्थिर है तथा सूर्य उसकी परिक्रमा करता है; या यह कि सूर्यग्रहण राहु-केतु जैसे पौराणिक पात्रों के कारण होता है। इसी प्रकार, यह भी कहा जाता है कि पृथ्वी किसी दिव्य प्राणी के सींग पर टिकी है, और उसका हिलना भूकंप का कारण बनता है। वर्षा को इंद्र का अनुग्रह माना जाता है, और गंगा का अवतरण शिव की जटाओं से जोड़कर समझाया जाता है।

जब इस प्रकार की मान्यताओं को शिक्षा प्रणाली में स्थान मिलता है, और उन्हें वैज्ञानिक तथ्यों के समकक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि समाज को एक सुनियोजित दिशा में गुमराह किया जा रहा है।

इन विचारों को संस्थागत समर्थन देने के लिए कुछ विशेष मानसिकता वाले शिक्षाविदों को शिक्षा व्यवस्था में स्थान दिया गया। वर्ष 2002 से प्रारंभ होकर, ऐसे अनेक सहायक प्रोफेसर नियुक्त किए गए, जो वैज्ञानिक सोच से अधिक पौराणिक कथाओं और रूढ़ मान्यताओं को महत्व देते हैं। विगत दो दशकों में इनमें से कई उच्च शैक्षिक पदों, यहाँ तक कि कुलपति पद तक भी पहुँच चुके हैं।

जब इनके दृष्टिकोण को सामाजिक स्तर पर चुनौती मिलने लगी, तो व्यवस्था ने न्यायिक और प्रशासनिक उपायों के माध्यम से इस प्रवृत्ति की रक्षा का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप, अब "आँसुओं से गर्भधारण" जैसे विचार भी सार्वजनिक विमर्श में स्थान पा रहे हैं—ऐसे विचार जो न केवल अवैज्ञानिक हैं, बल्कि समाज को पिछड़ेपन की ओर धकेलने वाले भी हैं।

यह समय है जब हमें शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य—विवेक, तर्क, और वैज्ञानिक सोच—को पुनः स्थापित करना होगा। अन्यथा, हम इतिहास के गर्त में लौटने को विवश हो सकते हैं।

सामाजिक मनःस्थिति का विश्लेषण

समाज विविध संस्कृतियों और विचारों का एक पुंज है और यह सर्वविदित है कि समाज वह अद्भुत कार्यशाला है जिसमें कुछ सीमाओं का स्वयं निर्धारण करके कुछ ना कुछ अद्वितीय किया जा सकना संभव है। और! यह समाज की नहीं अपितु वैयक्तिक समस्या है कि कुछ राजनीतिज्ञों को येन केन प्रकारेण कुर्सी ही चाहिए तथा वह सामान्य रूप से सत्ता पक्ष की सेवा से ही मिल सकती है। इसके लिए नेता समाज के झंडाबरदार होने का दावा करते हैं और सत्ता पार्टी के समक्ष गिड़गिड़ाते भी हैं कि मैं रातों रात कुछ बन जाऊँ। देश के आजाद होने के समय से अभी तक भी समाज की अधिसंख्य जनता साक्षर हो या निरक्षर पर भोली भाली है। इसलिए राजनीतिज्ञ बनने को प्रतिबद्ध व्यक्ति अंधों में काणा सरदार बन बैठता है। पूर्व में तो यही माना जाता था कि नेता भ्रष्टाचारी नहीं हैं परंतु कलइयां खुलने के बाद से अब धारणा यह बनती जा रही है कि नेता बना ही भ्रष्टाचार करने के लिए जाता है। अब ऐसी होड़ में जब एक के स्थान पर सौ प्रयासरत हैं तो राजनीतिक सामंजस्य तो कल्पना में भी हो ही नहीं सकता। रही सामाजिक विषय या फिर चेतना की बात तो समाज को नहीं पता कि होना क्या चाहिए और नेता तो सीखता ही समाज से है। अतः नेताओं को भी नहीं पता कि भविष्य के लिए क्या मुद्दे होने चाहिए। विगत पैंतीस वर्ष में धर्म की आड़ में नेतागिरी होती रही तो कलइयों के खुलने के बाद अब यह फार्मूला भी विफल होता जा रहा है। परिणामस्वरूप नेतागण खीझ रहे हैं कि अब क्या करें? 

ये कुछ ना करके रास्ता बनाने वालों के समक्ष की समस्यायें हैं जो अगले लगभग दस पंद्रह वर्ष तक अस्तित्व में रहेंगी। इस अवधि में युवा वर्ग को भी समझ आ जाएगी और उनके पास नेतागिरी जैसे फालतू कार्य के लिए वे सुलभ ही नहीं होंगे। उनके ऊपर अपने बड़े बूढों को पालने की समस्या आ जाएगी। फेसबुक पर लिखने और रील बनाने के लिए तो समय ही नहीं होगा।

समाजशास्त्रियों के समक्ष प्रश्न

समाजशास्त्रियों के समक्ष ये प्रश्न वैज्ञानिक भी हैं और दार्शनिक भी कि 'जीवन क्या है?' और 'हम कहाँ से आये हैं?' पूरे के पूरे ज्ञात इतिहास में विभिन्न दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की यथासंभव कोशिश की है। 

प्राचीनकाल में एथेन्स के किसी बगीचे में सुकरात और उनका उतना ही लोकप्रिय शिष्य प्लेटो सितारों को निहार रहे होंगे, तब सितारों और जमीन को इशारा करते हुए शिष्य ने अपने गुरु से पूछा होगा कि "आचार्य, यह सृष्टि कहाँ से आयी है?" सुकरात ने अपनी मौलिक द्वन्द्वात्मक प्रवृत्ति के अनुरूप प्रतिप्रश्न किया होगा कि "तुम बताओ, प्लेटो। क्या यह कोई प्राकृतिक घटना है या फिर इसके पीछे कोई महान दैवीय विचार है?"

सुकरात से भी पहले ग्रीक दार्शनिक अनाक्षीमेंदर ने एक अवसर पर कहा था कि "जीवन और सृष्टि की उत्पत्ति पानी में हुई है और मनुष्य का विकास मछली जैसे जीवों से हुआ है।" एम्पीडोक्लीज ने सुझाया था कि सृष्टि की उत्पत्ति चार तत्वों; पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल; से हुई है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के सन्दर्भ में ये प्राथमिक भौतिकवादी धारणाएं थीं जो बताती थीं कि जीवन और सृष्टि किसी दैवीय हस्तक्षेप का नहीं अपितु प्रकृति और प्राकृतिक तत्वों; जैसे धरती, अग्नि, वायु और पानी; की प्रक्रिया का ही परिणाम हैं।

यूनान से हजारों मील दूर प्राचीन भारत में गंगा के तट पर स्थित किसी आश्रम में याज्ञवल्क्य से उनके किसी शिष्य ने भी यही सवाल किया होगा। जिसके जवाब में याज्ञवल्क्य ने कहा होगा कि सृष्टि की हर वस्तु 'ब्रह्म' से उत्पन्न होती है और उसी में मिल जाती है। जैसे यह नदी सागर से निकलती है और फिर उसी में विलीन हो जाती है।

याज्ञवल्क्य या कहें उपनिषदों की इस भाववादी व्याख्या के अलावा सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल के अनुसार प्रकृति और पुरुष सभी वस्तुओं के अग्रगामी हैं! हालांकि वह प्रकृति (यानी पदार्थ) को ही पुरुष सहित हर वस्तु का कारण मानते हैं।

चार्वाक भी इसे विशुद्ध भौतिकवादी आधार प्रदान करते हुए किसी भी दैवीय या ईश्वरीय उपस्थिति से इंकार करते हैं। 

उसी युग में गौतम बुद्ध भी किसी आत्मा या परमात्मा के अस्तित्व से इंकार कर रहे थे और संसार को हर क्षण परिवर्तनशील मानने वाला सिद्धांत प्रतीत्य समुत्पाद या क्षणिकवाद प्रस्तुत कर रहे थे।

यहूदी, ईसाई और इस्लामी मत सृष्टि को दैवीय रचयिता का कार्य कहते हैं। ईसाई दार्शनिक संत अगस्तीन ईसाई मत और प्राचीन यूनानी भौतिकवादी मत को मिलाकर राय प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर की प्रेरणा से जीवन प्राकृतिक रूप से प्रकट होता है।

अरब दार्शनिक व वैज्ञानिक इब्ने सीना भी कुछ इसी तरह का विचार प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार हालांकि जीवन की सृष्टि ईश्वर ने की है लेकिन यह उसने प्राकृतिक तरीके से किया है।

मध्य युग में कमोबेश यही विचार रहे कि जीवन का निर्माण ईश्वर ने किया है या फिर एक पुराने ग्रीक विचार की पुनरावृत्ति होती रही कि जीवन निर्जीव से खुद ही प्रकट हो जाता है। जैसे किसी सड़े हुए मांस के टुकड़े में अपने आप कीड़े व मक्खी पैदा हो जाते हैं। यह आइडिया भी कोई नया नहीं था। प्लेटो के शिष्य और सिकंदर महान के गुरु अरस्तु ने यह विचार सदियों पहले दिया था, लेकिन मध्य युग में यह काफ़ी पॉपुलर हो चला था। फ्रांसिस्को रेडी और बाद में लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया कि जीवन अपनेआप नहीं बल्कि पहले से मौजूद जीवन से पैदा होता है। लुई पाश्चर और उनसे पहले एंटोनिए वान लीवेन्होक ने बताया था कि जीवन तो अति सूक्ष्म रूप में भी मौजूद है जो नंगी आँखों से देखा ही नहीं जा सकता। लेकिन बैक्टीरिया नामक यह सूक्ष्म जीवन भी कहीं न कहीं से आया ही होगा। 

सदियों के बाद 1871 में चार्ल्स डार्विन अपने मित्र वनस्पति विज्ञानी जोसफ डाल्टन को एक पत्र लिखते हैं। डार्विन ने पत्र में एक 'छोटे गर्म तालाब' का जिक्र किया था। यह तालाब हर तरह के रसायनों से भरा हुआ था। डार्विन का अनुमान था कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व धरती के महासागर इसी तालाब के जैसे थे जिनमें तमाम तरह के साधारण रसायन थे, जिन्होंने मिलकर जटिल अणुओं का निर्माण किया और इन्हीं से जीवन का उदय हुआ होगा। इसमें विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं की भूमिका रही होगी; जैसे आसमानी बिजली, ज्वालामुखीय गतिविधियां, उल्कापात आदि।

1920 के दशक में अलेग्जेंडर ओपेरिन और हाल्डेन ने भी स्वतंत्र रूप से डार्विन जैसा ही सिद्धांत दिया और इसे प्राइमॉडियल सूप थियरी का नाम दिया।

फिर आया 1953 का साल। अप्रैल का महीना था। यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो की प्रयोगशाला में एक नौजवान वैज्ञानिक एक प्रयोग में लगा हुआ था। पिछले कई हफ्ते से अपने प्रोफेसर हेरल्ड उरे के मार्गदर्शन में स्टैन्ली मिलर नाम का यह प्रतिभावान शोधार्थी पृथ्वी के शुरुआती समय की परिस्थितियां या कहें डारविन का प्राइमॉडियल सूप प्रयोगशाला में पैदा करने की कोशिश कर रहा था। मिलर ने कांच के एक जार में पानी, मीथेन, अमोनिया और हाइड्रोजन जैसी गैसों को एकत्र किया और उसमें बिजली की चिंगारियां छोड़ दीं। यह कार्य वह काफ़ी समय से कर रहे थे लेकिन उस दिन कुछ विशेष घटित हुआ। मिलर ने नोट किया कि जार के अंदर रखे पानी में अमीनो एसिड्स पैदा हो गये हैं। अमीनो एसिड्स यानी जीवन के निर्माण खंड। 

लेकिन कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं थी। 

2007 में मिलर की मृत्यु हो गयी थी, लेकिन उनके कार्य पर शोध अभी भी जारी था। शोधकर्ताओं ने जब उनके मूल प्रयोग से सम्बंधित सैंपल खोज निकाले। आधुनिक तकनीक के साथ जब इन सैंपलों की जाँच की गयी तो जितने अमीनो एसिड्स मिलर ने खोजे थे, उससे भी अधिक अमीनो एसिड्स के प्रकार और कई दूसरे प्रकार के कार्बनिक यौगिक मूल प्रयोग के उन मूल नमूनों में पाये गये।

1970 के दशक में कार्ल वोसे नामक एक जीवविज्ञानी जीवन के विभिन्न रूपों के आधारभूत संबंधों को समझने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन इस काम के लिए प्रयोग होने वाले पारम्परिक तरीके लगातार अपर्याप्त सिद्ध हो रहे थे। वोसे किसी बेहतर तरीके की तलाश में थे।

उन्होंने अलग अलग प्राणियों के जेनेटिक पदार्थ का विश्लेषण करना शुरू किया। उनका मुख्य फोकस था आरएनए का एक प्रकार यानि ribosomal RNA (rRNA)। प्रोटीन के निर्माण हेतु यह अणु आवश्यक होता है, लेकिन इसलिए इसका अध्ययन नहीं किया जा रहा था। असल में इस जेनेटिक मैटीरियल की कोर संरचना पिछले बिलियनों वर्ष से लगभग लगभग अपरिवर्तित रही है। नि:संदेह परिवर्तन हुआ है लेकिन यह इतना कम है कि लगभग ना के बराबर है।

विभिन्न प्राणियों के rRNA के सीक्वेन्सेस की तुलना करने पर कार्ल वोसे को कुछ अद्भुत मिला। उन्होंने बैक्टीरिया और eukaryotes (यानि वे प्राणी जो बहुकोशिकीय जटिल संरचना लिये होते हैं, जैसे जानवर और पेड़ पौधे) से इतर एक नए तरह के जीवन की खोज कर ली थी। वोसे ने इस नई जीवन संरचना को नाम दिया Archaea. 

इस खोज ने जीवन वृक्ष के बारे में हमारी धारणाओं को बदलकर रख दिया था। जीवन वृक्ष में एक नई शाखा खोजी जा चुकी थी जिसका नाम था Archaea. 

यद्यपि लीवेन्होक ने बैक्टीरिया के बारे में बताया था और वोसे ने Archaea के बारे में, लेकिन प्रश्न अभी तक भी यही था कि क्या जीवन को प्रयोगशाला में पैदा किया जा सकता है और बिना किसी दैवीय हस्तक्षेप के? जीवन तो नहीं लेकिन जीवन के घटकों यानी अमीनो एसिड्स को तो जरूर पैदा किया जा सकता है। अगर हमारे पास सही सामग्री और सही परिस्थितियां हों। हो सकता है कि निकट भविष्य में जीवन के उद्भव की गुत्थी भी प्रयोगशाला में सुलझा ली जाये।

तो आखिर जीवन क्या है? देवताओं या ईश्वर द्वारा रचित कोई चमत्कार? किसी परम चेतना की भौतिक की अभिव्यक्ति? या फिर विशुद्ध भौतिक रासायनिक प्रक्रिया जो विशेष भौतिक परिस्थितियों में स्वतः घटित हुई थी?

असल में दैवीय और प्राकृतिक दोनों तरह के सिद्धांतों में बीच यह द्वन्द्वात्मक संघर्ष आदिकाल से चल रहा है। जहाँ तक वैज्ञानिक सिद्धांतों, प्रयोगों व अभी तक मौजूद साक्ष्यों का सवाल है, तो हम कह सकते हैं कि किन्हीं विशेष भौतिक परिस्थितियों में गतिशील परिवर्तनशील पदार्थ में जीवन व चेतना रूपी यह गुण विकसित हुआ है जो हमें पदार्थ के हर रूप की तरह, जीवन की गतिशीलता और परिवर्तनशीलता के बारे में बताता है। यह बताता है कि हर चीज बदलती है। यूनिवर्स बदलता है, धरती बदलती है, जीवन बदलता है, समाज बदलता है, सामाजिक व्यवस्था बदलती है। यहाँ तक कि जीवन के उद्भव व विकास से सम्बंधित विचार भी विभिन्न युगों में बदलते और विकसित होते रहे हैं। (०१.१२.२०२४)

सामाजिक जागृति 

सामाजिक जागृति मूलतः मनोभावों आधारित होती है। अतः उसकी गति भावों के अनुरूप होती है जो सामान्यतया धीमी रहती है। इसकी गति में बदलाव मनोभावों से प्रयोगों के अनुकूलन के अनुसार होता है। जागृति की धार को कुंद करने के लिए भी प्रयास होते रहते हैं और इसके लिए धर्म का उपयोग प्रायः होता है। दिलचस्प यह है कि जागृति सब ही की जरूरत है और जागृति न उत्पन्न होने पाए या सिर्फ कुछ लोगों तक ही सीमित रहे ऐसा सोचकर जाग्रत वर्ग निरंतर प्रयासरत रहता है।इतना तो तय है कि ऐसे कृत्य जागृति की गति को धीमी कर देते हैं। कितना? यह आकलन किया जा सकना संभव नहीं। जागृति की गति धीमी इसलिए भी होती है क्योंकि धर्म के संदर्भ में बुद्धि का प्रयोग नही होता बस भावना होती है जो सदियों से चली आती है। ऐसा भी नही है कि बुद्धि का प्रयोग कभी भी न हो। एक दिन ऐसा भी आता है कि अज्ञानी भी वास्तविकता से अवगत होने पर सोचने के लिए विवश हो जाता है कि कहीं मैं कोई गलती तो नही कर रहा हूं। इस विषय पर मुझे सोचना ही चाहिए। बस वहीं से परिवर्तन आरंभ हो जाता है। वहीं से स्वजागृति आरंभ हो जाती है और यह सोच ही एक अतिरिक्त लाभ के रूप में सामाजिक कार्य को भी गति प्रदान करती है। आपने मेरे वक्तव्य को पढा यह निश्चित रूप से विज्ञान से संभव हुआ और इस विज्ञान को ही ज्ञान कहा जाना चाहिए।  (२९.११.२०२४)

संविधान दिवस पर

भारत का संविधान एक - एक विधान पर लंबी चर्चा के उपरांत सर्वसम्मति बनने के बाद ही अंगीकृत किया गया जिसमें आजादी का संघर्ष करने वाले और देश की आजादी का विरोध करने वाले सभी सदस्य सम्मिलित थे। इन सबसे अलग एक और वर्ग और वर्ण ऐसा था जो इस संविधान से सहमत नही था। उसका प्राथमिक उद्देश्य ही अपने वर्ण का वर्चस्व बनाए रखना था और आज तक भी है तथा यह एक तथ्यात्मक सत्य भी है। आश्चर्यजनक यह है कि उनके साथ अनेक अन्य भारतीय भी सहमत हैं जो उनके वर्ण के नही हैं और यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नही है कि यह अन्य वर्ण के भारतीय नागरिक उनसे भी अधिक कट्टर समर्थक हैं क्योकि इनके ऊपर धार्मिक भावनायें अधिक प्रभावी हैं। ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इनको धर्म के बारे में ही पता नहीं है। यह अपने धर्म को लाखों करोड़ों साल पुराना मानते हैं, जबकि इनको एक हजार साल पहले के अपने धर्म तक का ज्ञान नही है। इतनी बड़ी संख्या (15-20 करोड) का अल्पज्ञान धार्मिक व्यवस्था में ही संभव है। विचारणीय विषय यह है कि यह संख्या निरंतर बढ रही है, स्थिर है या घट रही है। मेरे आकलन में यह संख्या तेजी से घट रही है और यह संभव है कि संविधान का विरोध करने वाले आगामी दस वर्षों में एक करोड़ से भी कम रह जाएंगे और यह भी संभव है कि अन्य वर्णों के उनके समर्थक गली मुहल्ले मे भयंकर अपमान का सामना करें। आग पर तो काठ की हांडी ही नहीं, कागज पर भी पानी उबाला जा सकता है, परंतु जैसे ही अंदर का पानी समाप्त होता है कागज और काठ की हांडी जल जाती है। (२६.११.२०२४)

आनुवंशिक बल सुनहरा कल

सामाजिक जागृति का अगला कार्यक्रम भोपाल (मध्य प्रदेश) में दिनांक 21 एवम् 22 दिसंबर को पाटीदार भवन में आयोजित किया जाएगा। 

विगत बारह कार्यक्रमों की भांति समाज के इतिहास, सभ्यता, गौरवशाली व्यक्तित्वों, समाज के द्वारा राष्ट्र निर्माण मे योगदान तथा भविष्य के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग, कृषि अर्थतंत्र पर एक एक घंटे के व्याख्यान होंगे।

व्यक्तिगत, पार्टी तथा धर्म पर चर्चा प्रतिबंधित है। इनका प्रचार तथा आलोचना निषिद्ध है

ना तो मंच पर कोई फूलमाला दी जाती है और ना ही दीप प्रज्वलित किया जाता है।

किसी से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लिया जाता है। व्याख्याता भी निजी व्यय पर यात्रा करते हैं। इस ग्रूप का कोई अध्यक्ष, महासचिव या कोषाध्यक्ष नहीं है और न ही कोई कोष है।

कार्यक्रम में प्रदेश के स्थानीय पचास से साठ शिक्षित महानुभावों के सहभाग की अपेक्षा की जाती है। राजनीतिक व्यक्ति यदि प्रशिक्षु के रूप मे सहभाग करता है तो स्वागत है परन्तु वक्तव्य देने का अवसर नही मिलेगा।

कार्यक्रम पूर्ण रूप से अराजनीतिक है। शासकीय अधिकारी कर्मचारी भाग ले सकते हैं उनका स्वागत है।

दूसरे दिन के व्याख्यान पूर्णत: युवाओं के भविष्य के लिए समर्पित हैं।

भोजन की व्यवस्था मध्य प्रदेश/स्थानीय महानुभावों के सहयोग से की जानी है। आपसे सहभाग की प्रार्थना है। (२१.११.२०२४)   

सामाजिक समागम में प्रतिभाग              

17 नवंबर को समाज के समृद्ध श्रेणी के महानुभावों से विचार विनिमय हुआ, जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत वैज्ञानिक, जैविक कृषि में संलग्न किसान, कृषि विभाग के उच्चतम को सुशोभित करने वाले प्रशासनिक अधिकारी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मुख्य अभियंता, वर्तमान में उच्च पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा में सेवारत अधिकारी तथा हरियाणा की गुर्जर सभाओ/भवनों के अध्यक्ष सम्मिलित थे। यह अवसर गुर्जर कल्याण परिषद पंचकुला के द्वारा मुझे सम्मानित करने के लिए बुलाए जाने के कारण मिला। 

विचार विनिमय में गुर्जर समाज के इतिहास की जानकारी , कृषि कानून और उनका विकल्प, शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग तथा बिखरे समाज को एक करने के प्रयास आदि सभी विषय सम्मिलित थे। यह हर्ष का विषय है की समाज का बुद्धीजीवि वर्ग इस और सोचने लगा है और यह भी अच्छी बात है की समाज के बुद्धीजीविओ को यह उचित लग रहा है की अपने अपने क्षेत्र के Achievers को सम्मानित किया जाए। विचार विमर्श से यह लगा की समाज समस्याओ का निदान चाहता है समाज इस बात से भी परेशान है की हमारी नई पीढी हम से अलग हो रही है क्योकि हम उसको प्रेरणा देने मे सफल नही हुए है।

विचार विनिमय में यह निकलकर आया कि हमारे बुद्धिजीवी अपने अपने स्तर पर बहुत अच्छा सोच और कर रहे है परन्तु आवश्यक है की बुद्धिजीवी मिलबैठकर भी विचार करें और यह केवल कुछ मिनट के संबोधन से संभव नहीं है अपितु इसके लिए घंटों और दिनों की आवश्यकता है। 

यह भी निर्विवाद है कि इस विचार विनिमय में राजनीतिज्ञ न हों तो अच्छे परिणाम आएंगे।      

18 नवंबर को अफला सिंह वर्मा जी की पत्नी की तेरहवीं के अवसर पर देखने को मिला कि समाज का आम आदमी अभी भी राजनेताओ की ओर तो आकर्षित है परंतु उनके पास विचार विनिमय के लिए समय नहीं है और विशुद्ध रूप से सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहमियत का अभी समाज को ज्ञान नही है। 

मेरी यही सलाह है कि बुद्धिजीवियों को अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर समाज को जाग्रत करने के लिए सामूहिक रूप से आगे आना चाहिए तभी हम सामाजिक ऋण से मुक्त हो सकते है। (१९.११.२०२४)  

कार्यक्रम का विवरण

गुर्जर कल्याण परिषद पंचकुला में स्थापना दिवस पर मुख्य अतिथि तेग सिंह (ऑडिटर जनरल, पंजाब)  तथा मुख्य वक्ता डा. सुनील पंवार (बंगलौर) थे। दोनों महानुभावों ने सामाजिक विषय पर अपने विचार रखे।  दोनों समाज के इतिहास पर अच्छी जानकारी रखते हैं और सामाजिक विकास पर अपना स्पष्ट संदेश देने में सफल रहे। इस कार्यक्रम में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड के लिए साहित्यिक,  सामाजिक,  कृषि और अन्य सेवाक्षेत्र के लोगों को चुना गया था। प्रबुद्ध वर्ग को संबोधित करने का अवसर मिला। मेरा संबोधन मेरी यूट्यूब SRS official पर उपलब्ध है। मैंने आनुवांशिक बल सुनहरा कल के उद्देश्य और प्रगति पर समाज के तीन सौ बुद्धिजीवियों को अवगत कराया। गुर्जर कल्याण परिषद पंचकुला ने आनुवांशिक बल सुनहरा कल का कार्यक्रम आयोजित करने का अनुरोध किया जिस पर फरवरी माह की संभावना परस्पर विचार विनिमय के उपरांत तय हुई। एक सफल आयोजन था समाज के सभी महानुभाव इस पर चिंतित दिखे कि भावी पीढ़ी समाज से अलग थलग है। इस पर विशेष प्रयास होना चाहिए क्योंकि हम सब मिलकर जो कर रहे हैं वह अंततः भावी पीढी के लिए ही है। (१८.११.२०२१)

छद्म दोषारोपण

कनिंघम और मैकाले मनुवादी समाज के सबसे घृणित व्यक्ति क्यों हैं? यह मनुवाद से पीड़ित व्यक्तियों को सोचना चाहिए कि आखिर इन दोनों ने ऐसा क्या किया कि इनसे सबसे अधिक घृणा की जाती है। इन्होंने किस व्यवस्था को क्षति पहूंचाई? कनिंघम पुरातत्व की खोज करते रहे और उन्होंने मिट्टी के टीलों में दबे हुए और जंगलों के मध्य छुपी गुफाओं को खोजा। भारत के खोए इतिहास को खोजा तो इसमें गलत क्या हुआ? मनुवादी समाज को यह सहन नहीं हुआ कि गौतम बुद्ध को पुनर्जीवित किया जाए। बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने वाले कनिष्क को खोजा जाए।  

यही मैकाले को लेकर समस्या है। मनुसमृति यह अनुमति किसी को भी नहीं देती कि सब समाज शिक्षित बनें। यह आरोप लगता है कि मैकाले की शिक्षा ने अंग्रेजों की सेवा के लिए बाबुओं की फौज तैय्यार की। मान लेते हैं कि उन्होंने अपने लिए सेवक तैय्यार किए जिनमें कि इंजीनियर भी थे तो इसमें नफरत की बात कहां, क्यों और कैसे आ गई। आरोप लगता है कि मैकाले ने भारत की संस्कृति को क्षति पहुंचाई। विचारणीय है कि उस संस्कृति में विशेष क्या था? मनुवाद की वर्ण व्यवस्था की विघटनकारी नीति को छोड़ भी दें तो अच्छा क्या था जिसको कि क्षति पहुंचाई। पंद्रहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक समाज में आई विकृतियों पर सोचकर देखिए कि समाज की वास्तविक स्थिति क्या थी। सती प्रथा, बाल विवाह, महिला शिक्षा वर्जित, समुद्र पार जाना अशुद्ध होना, छुआछूत सब सही नहीं था। कृपया अंतर्मन से पुन: सोचिए। (२७.१०.२०२४)

दिलचस्प और तथ्यपरक सत्य

कितना दिलचस्प है और हास्यास्पद भी कि जब किसी कार्यक्रम का आमंत्रण देने वाले अतिथि, विशिष्ट अतिथि, वक्ता, मुख्य वक्ता, सांसद, विधायक की लंबी फेहरिस्त हम कार्यक्रम के निमंत्रण-पत्र में देते हैं और वे आ भी जाते हैं, मंच पर माला डलवाकर विराजमान भी हो जाते हैं पर उनके श्रोता वही होते हैं, जो उनकी गाडी में बैठकर आए लोग होते हैं। यकीन मानिए यदि सभागार में मंच पर एक भी राजनेता न हो और केवल सामाजिक कार्यकर्ता ही हों तो सभागार आधे से अधिक भर जाएगा और लोग अपनी इच्छा से ही सभागार में आएंगे। इसका कारण यह है कि राजनेताओं के पास जनता को बताने या उसका ज्ञानवर्धन करने के लिए कुछ भी नहीं है और सामाजिक कार्यकर्ताओं के पास ऐसा बहुत कुछ है जिसे जनता सुनना और गुनना चाहती है। बस एक अनुरोध है कि सामाजिक कार्यकर्ता सामाजिक व्याख्यान देकर राजनेता बनने की चेष्टा न करे। जैसा कि वर्तमान परिवेश में सामान्यतया होने लगा है। उसके लिए अभी एक दशक प्रतीक्षा करनी होगी तब तक जब तक कि आम जनता पर से गत चौंतीस साल से चढ़ा हुआ धर्म का भूत ना उतरे और युवा वर्ग को नून-तेल-लकडी का भाव पता ना चले। ऐसा होने पर ही आपके सामाजिक कृत्य जनता के सामने होंगे और सामाजिक कार्यकर्ताओ को खोजा जाएगा प्रतिनिधित्व करने के लिए। हम तब तक ऊंचा सुनने लगेंगे लेकिन हम सुकून के साथ इस संसार से विदा होंगे। अभी तो हमें राजनीतिक इच्छा वाले हंसी का पात्र मानते हैं और गाहे बगाहे इशारे इशारे में बदतमीजी भी करते हैं करने दीजिए अपना क्या जाता है। (२८.१०.२०२४)

समझना जरूरी

इंटरनेट प्रचालित व्हाट्सएप हो या फिर फेसबुक अथवा कोई अन्य प्लेटफार्म उनका उपयोग और दुरुपयोग दोनों ही संभव हैं। हम इनका उपयोग भविष्य निर्माण के लिए भी कर सकते है और अपने आज को विकृत करने के लिए भी। सोशल मीडिया में प्रतिभाग करके हम स्वयं को नियंत्रण में रखना भी सीख सकते हैं और स्वैच्छिक होना भी। यह स्थापित सत्य है कि परिवर्तन की दिशा और दशा के निर्धारण के लिए तथा गलत को रोकने के लिए नियंत्रण की परम आवश्यकता होती है तो सही को प्रोत्साहित करने के लिए स्वेच्छा। नियंत्रण के लिए भय का प्रयोग होता है और स्वैच्छिक के लिए स्वाध्याय और श्रेष्ठ अध्ययन का। स्वैच्छिक गतिविधियों से हमको प्राप्त होते हैं उत्तम परिवेश, गुणवान मित्र और हितैषी, हमारी सोच के अनुसार वातावरण। यानि स्वैच्छिक सोशल मीडिया की समस्त गतिविधियों हमारी सोच के अनुसार परिवेश निर्मित करती हैं। यहां भयभीत करने के लिए, निकृष्ट साहित्य, स्वार्थी राजनेता, दिग्भ्रमित करने वाले धर्मोपदेशक सभी उपलब्ध हैं और मशीनों का उपयोग कर पूरी शक्ति के साथ क्रियाशील हैं अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए। सोशल मीडिया के प्रयोग ने सब क्षेत्रों और दिशाओं में अपनी पकड़ बनाई है। स्वैच्छिक तरीके से भविष्य के निर्माण का अवसर भी दिया है और लोकलुभावन दिग्भ्रमित करने वाले स्वप्न दिखाकर भविष्य को चौपट करने का भी। यहां पर समाज की जागृति डराने या लालच देने वालों के लिए बाधा उत्पन्न करती है। यह जान लें कि जाग्रत समाज सत्य के साथ वैज्ञानिक तरीके से आगे बढता है। वह किसी अलौकिक शक्ति से भी नहीं भयभीत नहीं होता है। इसके साथ ही साथ यह भी जान लें कि जो व्यक्ति या समाज पराशक्ति में विश्वास करता है उसे तो जाग्रत कहा ही नहीं जा सकता और यह भी तय है कि एक दिन उसे बदलना ही होगा और सत्य की ओर आना ही होगा। अंत मे आपसे सानुरोध यही अपील है कि सदैव विवेकपूर्ण निर्णय लें और भविष्य निर्माण में सहयोग करें सोशल मीडिया का तथा अन्य समस्त माध्यमों का भी। साथ ही उचित यह भी होगा कि समस्त उपलब्ध मीडिया के परिवेश को जान और समझ कर संबंधित प्लेटफॉर्म का सदुपयोग हो दुरुपयोग कदापि नहीं। आइए इसके लिए हम सब ही समाज को प्रेरित और उत्साहित करें। (२७.१०.२०२४)

वास्तविकता

कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने  आठवीं सदी में चारों पीठ की स्थापना की, परन्तु उनके बाद में आए मंडन मिश्र को उनसे अधिक मान्यता मिली और चौदहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य विजयनगर साम्राज्य द्वारा श्रंगेरी मठ को पोषित करने पर ही ब्राह्मणवाद को सफलता मिली। इसी काल में अनेक लेखकों ने अपने ग्रंथों को शंकराचार्य नाम देकर लेखन किया जिसमें स्मृति ग्रंथ भी सम्मिलित है। इसी को बाद में हिंदुत्व तथा हिन्दू नाम दिया गया। लगभग सभी ग्रंथों मे प्रेरणा स्रोत महायानी बुद्धिस्म ही है, परंतु यह भी सत्य है कि इस सोच का आरंभ प्रतिहार वंश के सांस्कृतिक मंत्री राजशेखर द्वारा दसवीं सदी  के समय आरंभ हो गया था। उनके द्वारा ही बाल भारत और बाल रामायण का राज दरबार मे मंचन कराया गया था। गुर्जर कन्या से विवाह करने के कारण  उनको यह अवसर मिला और बाद मे ब्रह्मा की पदवी धारण की। ग्रंथ लेखन में कथानक पूर्णत: काल्पनिक नहीं होते। उनमें कुछ न कुछ ऐतिहासिक समावेश और कुछ किवदंती अवश्य होती है जिसको विस्तृत स्वरूप दिया जाता है। ठीक ऐसे जैसे आजकल के दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक किया जाता है। अभी हम तथ्य की ओर जाना आरंभ कर रहे हैं। एक दिन आएगा दूध फट जाएगा पनीर अलग और पानी अलग। बस दूध मे फिटकरी डालनी है जो काफी खट्टी होती है  शेषराज सिंह पंवार खट्टा  कसैला ही सही। (२६.१०.२०२४)

समझ विकसित हो

'यूची', 'जूजर', 'गूज्जर', 'गुर्जर' शब्द केवल उच्चारण मात्र नहीं, बल्कि इनमें विशाल सभ्यतायें समाई हुई हैं। एक पुरातन मान्यता के अनुसार कहते हैं कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है। यह निःसंदेह अतिशयोक्तिपूर्ण है, परंतु नाग वंश, जिसका प्रतीक नाग है, इतना शक्तिशाली था कि यह कहावत बनी। अफगानिस्तान से उत्तर-पूर्व के नागालैंड और मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक तक राज्य करने वाला यह वंश निश्चित रूप से इसका हकदार है। वैसे भी उस समय के संसार के सबसे बड़े धम्म बौद्ध धर्म के मानने वाले और रक्षक थे। आठवीं से दसवीं सदी तक नाग वंश की भोज वंश (प्रतिहार) और राष्ट्रकूट शाखा लगभग सारे भारत पर राज कर रही थी। इससे पहले भी दूसरी तीसरी सदी में कुषाण वंश के कनिष्क बौद्ध धर्म के प्रचारक बन गए थे। उनके समय में शक और कुषाण एक साथ आ गए थे। दसवीं सदी में नाग वंश के भोजवंशी, पोसवाल, कुषाण, खटाणा, चेची, कपासिया तथा हूण (तथाकथित आर्य) सभी कबीलों ने एक साथ आकर गुर्जर गुलदस्ता बना लिया था। हूणों के साथ आई संस्कृत की व्याकरण बनकर लेखन में प्रयुक्त होने लगी थी। (पाली प्राकृत ब्राह्मी को प्रतिस्थापित कर दिया था!) इस गुलदस्ते ने बौद्ध धर्म पोषित किया और इस गुलदस्ते के एक फूल हूण वंश ने शिव और विष्णु की अवधारणा दी। भोज वंश के सोलंकी राजवंश ने लुप्तप्रायः जैन धर्म को पुनर्जीवित किया और देवनारायण के चौहान राजवंश ने ब्रह्मा तथा शंकराचार्य को सहयोग देकर चारों पीठ की स्थापना कराई। हमारा यह परिवार, जिसे कुछ श्रेष्ठ बुद्धि कुछेक गोत्रों तक ही सीमित करना चाहते हैं। एक वृहत बहुआयामी व्यवस्था है इसे जानिए और अपने वंश पर गौरव कीजिए। और! सबको इन विशेषताओं से अवगत कराइए। (२४.१०.२०२४)

स्वप्रयास

किसी भी सामाजिक समस्या के समाधान की दिशा में सबसे पहला प्रयास नैतिकता (Morallity) के आधार पर अपने स्तर से किया जाता है पंचायत करके। उसमें विफल होने पर क़ानून का सहारा लिया जाता है। और! यदि वहाँ से भी न्याय न मिले तब आतंकित करके जबरिया प्रयास किया जाता है। इसे ही नक्सलवाद कहा जाता है परंतु यह देखा गया है कि इससे वांछित परिणाम नही मिलता। अंततः फिर से नैतिक मूल्यों को ध्यान में समस्या का टीवी से ही समाधान होता है। संसार में इसको सिद्ध कर सकने में सक्षम अनेक उदाहरण हैं मसलन कार्ल मार्क्स, लेनिन, मार्टिन लूथर, नेल्सन मंडेला, पेरियार, अंबेडकर, सुभाषचंद्र बोस और गांधी। यहां दिलचस्प यह है कि अंततः सफलता बुद्धि को ही मिली बल को नहीं। नक्सल और आतंक को तो एक दिन शांत होना ही है। वास्तविकता यह है कि अन्याय से मुक्ति के लिए व्यक्ति में सबसे पहले विद्रोह की भावना ही आती है परंतु यहां विचारणीय विषय समस्या के समाधान का है। संदर्भ बहुत बड़ा और बहुत पुराना (पौराणिक) है। इसका समाधान पंचायत (जाजम ) से नहीं हो सकता इसके लिए संगठित सोच की ही आवश्यकता है। हम सबसे अधिक त्रस्त हैं तो अगुवाई भी हमें ही करनी होगी परंतु हम अकेले ही समाधान नहीं कर पाएँगे। हमें उनको साथ लेना होगा जो हमारा ही अंग हैं अथवा हमारी तरह से त्रस्त हैं। (२३.१०.२०२४)

वैचारिक प्रकृति

समाज में विविध प्रकृति के आचार विचार और प्रकृति के लोगों की व्यवस्था है तो उनको देख और समझकर आमजन अपने भविष्य का निर्धारण करते हैं। कोई सामाजिक कार्य करता ही मिलेगा तो कोई सामाजिक कार्य कर राजनीति मे स्थान बनाने के प्रयास करता तो कोई सही गलत की सोचे बिना विशुद्ध राजनीति करता। लोकतंत्र को सही मायनों में सिद्ध करने के लिए होना तो यह चाहिए कि हमें आजादी मिलने के बाद स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले लोग और सही व निष्पक्ष सोच रखने वाले ही राजनेता बनें। हमारे देश में ऐसा हुआ भी परन्तु केवल बीस-पच्चीस वर्ष तक ही। उसके बाद स्वतंत्रता सेनानियो के परिवारीजन और सत्तालोलुप व्यक्तियों ने सत्ता पर कब्जा करना आरंभ कर दिया। इस बीच सामाजिक जागृति ने भी उभार लेना आरंभ कर दिया और छात्र नेता ही नहीं अन्य समस्त विधाओं के ज्ञाता भी राजनीतिज्ञ बनने की आकांक्षाएं पालने लगे और दबे कुचले समाज में भी अपमान से छुटकारा पाने की आशा जगी। संवैधानिक विधानों के कारण कुछ शिक्षा और पुश्तैनी कार्यों से मुक्ति पाकर कुछ अन्य विकल्प भी सुलभ हो गए। देश में औद्योगिक विकास भी हो रहा था। इसलिए अपमानित जीवन से मुक्ति के लिए राजनीतिज्ञ बनने के लिए और भी दबे कुचले समाज में से लोग आगे आए। लोगों के सामने फूले-पेरियार और अंबेडकर के उपदेश और उदाहरण थे। यह स्थिति भी बीस-पच्चीस वर्ष ही रही। कुछ लोगों को सफलता मिली तो कुछ जीवन भर लगे रहे पर आंशिक रूप से ही सफल हो पाए। इस अवधि के समाप्त होते ही संसार का चिरपरिचित उपाय राजनीति में धर्म का उपयोग आया। यह उपाय कुछ लंबे समय पच्चीस-तीस साल तक चला, परंतु विगत चार-पांच साल से यह उपाय भी सफलता नहीं दिला पा रहा है तो कहीं ना कहीं कारण सामने होते हुए भी मानसिक कलुषिता होने के कारण उसका निदान नहीं कर पा रहे। इसी अवधि में एक अन्य विकराल समस्या आ गई है कि बेरोजगारों की बहुत बड़ी संख्या हो गई है जो अक्षम होने के बावजूद राजनीति को विकल्प के रूप में देखते हैं। इसके लिए वे अपने आपको सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं और वरिष्ठ समाजसेवी कहकर स्वयं का परिचय देते हैं। आजकल सोशल मीडिया उपलब्ध है ही कुछ भी मनोनुकूल प्रस्तुत कर देने के लिए। दुखद है तो यह कि इन सब प्रयासों के बावजूद इनकी सफलता का प्रतिशत बहुत ही कम और निराशाजनक है। इसका कारण यह है कि समाज अभी जाग्रत नहीं हुआ है लेकिन समाज अपनी आवश्यकताओं को भलीभांति समझने लगा है, परंतु स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक तत्वों (Ingredients) को नहीं समझ रहा है। ऐसी स्थिति में उसका विश्वास राजनीतियों पर से उठ रहा है। यही नहीं सामाजिक कार्य कर राजनेता बनने में भी अपेक्षित परिणाम ना दे पाने के कारण लोगों को विफलता ही मिल रही है। मेरे तीन -चार मित्र मेरे समाज में से ही गत बीस-पच्चीस साल से दिन-रात लगे हैं परंतु सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि अभी सामाजिक कार्य से राजनीति में सफल होने का समय नहीं आया है पर आने वाला है। वे सामाजिक कार्यकर्ता जो अभी प्रौढ की श्रेणी में नहीं आए हैं उनके लिए तो आशा की किरण बची है परंतु जो प्रौढ हो गए हैं। उन्हें यही सलाह है कि वे स्वयं ही राजनीतिज्ञ बनने की आशा छोड़कर राजनीति को प्रभावित करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बन जाएं निश्चित रूप से सुखी रहेंगे। (२२.१०.२०२४)

सम्मिलित प्रयास

सामान्यत: लुभावनी प्रतीत होने वाली Material gain की theory में त्वरित परिणाम दिखाई देते हैं। फलतः हम प्रसन्न हो उठते हैं, परंतु यह अस्थायी होने के कारण कुछ समय बाद ही परिणाम लुप्तप्रायः हो जाते हैं। इसका साक्षात् उदाहरण पचास के दशक में डा. अंबेडकर और कांग्रेस के जगजीवन राम हैं। डा. अंबेडकर ने किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को सीधे नौकरी पर लगाने का प्रयास नहीं किया जबकि जगजीवन राम जी ने लाखों लोगों को सीधे नौकरी का अवसर दिया। निश्चित रूप से नौकरी पाने वाले तात्कालिक रूप से लाभान्वित और प्रसन्न हुए। परंतु डा. अंबेडकर की व्यवस्था से लोग आज तक और निरंतर लाभान्वित हो रहे हैं। इससे यह तात्पर्य कदापि न लिया जाए कि Material gain के कार्य न किए जाएं। बस उपरोक्त उदाहरण को समझकर यह भाव लिया जाए कि ऐस स्थायी प्रभाव वाले कार्य ही किए जाएं जिनके स्थायी परिणाम आएं। हम Work और Force के सिद्धांत से भी अवगत हैं कि जितना बड़ा कार्य है उतना ही बल लगाना जरूरी और उपयुक्त है अन्यथा अपेक्षित परिणाम नहीं आता। वैसे भी इसके लिए सम्मिलित प्रयास यांत्रिकी के जैसे किए जाने चाहिए। (२१.१०.२०२४)

प्रमुख समस्या

सामाजिक विभेद भारतवर्ष की प्रमुख समस्या है। इसीलिए भारत के संविधान में शोषित वंचित समाज के लिए Affirmative Action के रूप में आरक्षण का प्राविधान सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्यान में रख किया गया। यह आर्थिक पिछड़ेपन के लिए नहीं है और यह इसलिए है कि एक वर्ग विशेष ने एक वर्ग विशेष को सामाजिक और शैक्षिक अधिकार से वंचित किया। मैनिपुलेशन कर शैक्षिक अधिकार अपने लिए आरक्षित किया और सामाजिक अधिकार से वंचित करने के नियम बनाए और लागू कराने के लिए अन्य वर्गों का उपयोग किया। यह सर्वविदित है कि शैक्षिक और सामाजिक व्यवस्थाओं का प्रभाव आर्थिक होता ही है। इसके साथ साथ आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए परंतु फिर भी आरक्षण में आर्थिक आधार को समाविष्ट करना उचित नही माना गया जबकि आर्थिक प्रगति होने पर भी सामाजिक दुर्भावना नहीं जाती है। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था न होते हुए भी 1992 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने यह मान लिया कि समाज में व्यक्ति का आर्थिक स्तर सुधरने और उसको कोई पद मिलने से उसका और उसके बच्चों का सामाजिक शोषण नही होता है। यह कितनी मूर्खतापूर्ण सोच थी और आज सच सबके सामने है। इस सोच के कारण ही क्रीमी लेयर का सिद्धांत लाया गया और उससे आगे जाकर सांसदों के अयोग्य होने के कारण इकोनॉमिक वीकर सेक्शन (EWS) का प्राविधान कर लिया गया। 

संविधान में आरक्षण के ऊपर 50% सीमा की कोई व्यवस्था नहीं है। संविधान सभा में डा. अंबेडकर से अनुसूचित जाति के आरक्षण का प्राविधान करते हुए यह सवाल पूछा गया था कि यह कितना होगा जिसके जवाब में मात्र यह कहा गया था कि यह अधिक नहीं होगा। तब अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आयोग के गठन की बात मान्य की गई थी। "उनके लिए आरक्षण होगा अथवा नहीं होगा या कितना होगा?" यह प्रश्न ही नहीं था। इस विषय में भी जो 50% की सीमा लगाई गई है वह केवल न्यायाधीशों की मनुवादी सोच के कारण।

प्रश्न यही है कि भारत के 90% नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित करने वाले 10% समाज के न्यायाधीश कब तक मनमानी करते रहेंगे। सीधा सा उत्तर यह है कि जब तक अंधभक्त समाज को दिग्भ्रमित करते रहेंगे तब तक। इसलिए समस्या यदि हमारे गांव और गली मोहल्ले में है तो समाधान भी वहीं होगा। (२०.१०.२०२४)

मतिभ्रम 

सुप्रसिद्ध भारतीय समाज सुधारक ज्योति बा फूले ने 1850 ई में कहा था कि 

"शिक्षा बिना मति गई मति बिना गति गई और गति बिना अर्थ गया।" 

इसको सही परिप्रेक्ष्य में समझकर और शिक्षा की महत्ता को जानकर डा. अंबेडकर ने शिक्षा को संविधान के प्रावधान से सुनिश्चित किया। शोषित समाज में शिक्षा आने से मति आ गई है और उसकी गति भी आरंभ हो गई है तथा पुरुषार्थ व परिश्रम से अर्थ भी आ रहा है। 

मति आने का प्रभाव मतदान के रूप में दिखाई दे रहा है। लोकसभा चुनाव से समाज की मति का एहसास राजनीतिज्ञों को हो जाना चाहिए था पर नही हुआ। संघ और भाजपा वाले सब कुछ जानकर भी यही कहते रहे कि राहुल गांधी ने आरक्षित वर्ग को दिग्भ्रमित किया और अब ठीक हो जाएगा। यह सत्तारूढ वर्ग का मतिभ्रम ही है। राहुल गांधी ने दिग्भ्रमित नहीं किया, अपितु देश में पदयात्रा करने से समाज क्या सोचता है उसको यह अहसास हो गया तो वो जाति जनगणना की बात करने लगे और पहले चरण की वोटिंग होते ही संविधान की प्रति दिखानी आरंभ की। यह अलग बात है कि राहुल गांधी संविधान की प्रस्तावना के पहले दो शब्द "हम भारत ...." के लोग का पालन नही करते और हिंदुस्तान बोलते हैं। राहुल गांधी ने मतिभ्रम पैदा नहीं किया अपितु मति अर्जित कर ली है। आज अनुसूचित जाति और अन्य पिछडा वर्ग को मति आ गई है। और! ये वर्ग अपने किसी भी नेता से आशा नहीं कर रहे चाहे वह मायावती हो, चंद्रशेखर हो, प्रकाश अंबेडकर हो या नितीश/अखिलेश हो। इसलिए 2014 या 2019 के अनुसार सोचना कोरी मूर्खता है। 

अब राजनीति में जितना अधिक धर्म का प्रयोग होगा उतना ही अधिक राजनीतिक नुकसान होगा क्योंकि मति आ गई है जो धर्म के माध्यम से हर ली गई थी। अभी भारत के न्यायधीशों को भी मति आ जानी चाहिए। आज 1950 की स्थिति नहीं है कि संविधान लिखा जा रहा है और संविधान सभा के सदस्य जो चाहे लिखवा लेंगे और आप बिना लिखा भी अपने मत के अनुसार निर्णय दे देंगे। आज 2024 में आपको वह निर्णय देना होगा जो भारत के नागरिकों का उचित मंतव्य है। अब आगे आगे जनता जो चाहेगी वह संशोधन कराएगी। आज राजनीतिक पार्टी का हारना और जीतना उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के कारण भी हो रहा है। जिसे चाहे सुओ मोटो ले लो जब चाहे आंख मूंद लो। अपने मन मुताबिक निर्णय दे दो। सामाजिक अन्याय के विषयों पर अपने वर्ग के अनुसार निर्णय देना। यह अनेकों निर्णयों से सत्यापित भी है कि जितना सामाजिक न्याय देने में विलंब होगा उतना ही न्यायप्रणाली का विरोध होगा। (०६.१०.२०२४)

जीतने की कवायद

आज हरियाणा नई सरकार को चुनने के लिए मतदान हो रहा है। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि प्रत्याशी के बारे में और प्रदेश की सरकार बनाने के बारे में मति की गणना की व्यवस्था हो रही है। मैंने प्रदेश के भ्रमण के दौरान यह पाया कि मति बनाने के सभी प्रयास निरर्थक हैं तो इसलिए क्योंकि मतदाता ने प्रत्याशी की घोषणा के साथ ही अपना मन बना लिया था कि किसको मत देना है। बाहर से बड़े बड़े नेताओं को बुलाकर बड़ी बड़ी रैलियां कर हवा बनाने के प्रयास का प्रभाव लगभग नगण्य है। प्रत्याशी के बारे में लगभग नब्बे प्रतिशत मतदाता जानते हैं और सिर्फ दस प्रतिशत मतदाताओं पर प्रत्याशी के द्वारा दिए गए भाषण से फर्क पडता है। पत्तलकार अपनी रोजी रोटी के लिए लगे थे तो वे किसी को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं, परन्तु उनकी वीडियो से उनका पता चल जाता है कि कहां कहां से इनको प्राप्ति हो गई है। यह भी पाया गया कि मन बनाने के लिए मतदाता लंबे समय तक सोचता है जिसमें स्वार्थ भी निहित होता है लेकिन हरियाणा का वोटर मुखर है और अच्छी बात यह है कि वह डरता नहीं है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है परंतु यह बात प्रत्याशी पर लागू नहीं होती। वह बहुत डरता है। एक शब्द मुंह से गलत निकला और विरोधियों को मुद्दा मिला। यह बात अलग है कि लगभग पचहत्तर प्रतिशत मतदाता प्रत्याशी का सारा इतिहास भूगोल जानते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र स्वमेव प्रगति पर है।

    परन्तु और बड़ा सवाल यह है कि मतदाता की मति बनाने के लिए ऐसा क्या किया जा रहा है जिस से* मत *दान में मिलता है। यह कहने मे कोई संकोच लगभग नगण्य है। प्रदेश की सरकार शिक्षा स्वास्थ्य जनता का व्यवसाय जनता की अर्थव्यवस्या को निर्धारित करती है। इन विषयों का चुनाव में अभाव था। रोजगार पर विपक्ष ने रैलियों में बोला लेकिन रैली में तो अधिकांश आपके समर्थक ही होते हैं। एक गांव में हमने जनता से निष्पक्ष पत्रकार बनकर जानने का प्रयास किया तो पता चला कि शिक्षा का बुरा हाल है। आठ सौ विद्यार्थी पर केवल दो प्रशिक्षक। स्वास्थ्य केंद्र का जनता को पता ही नहीं और न विश्वास। कृषि की अर्थव्यवस्थाओं का तो पार्टी के नेताओं को ही पता नहीं। अन्य प्रदेशों से बुलाए गए विधायकों मंत्रियों को भी कुछ पता नहीं है। बस लगे हैं अपनी अपनी हांकने में। अब समय आ गया है कि यह रैलियों पर होने वाले धन का अपव्यय बंद हो जहां जहां बड़े बड़े नेताओं की रैलियां हुई हैं। वहा जीतने की संभावनाए कम ही साबित होंगी। मतदाता की मति बनाने का कार्य निरंतर जनता के बीच रहकर कार्य करने से होगा। भारत में सबसे कम मत प्राप्त करने वाला *शेष* (०५.१०.२०२४)

समयकाल और उसकी गणना

"दुनिया भर में समयकाल की गणना भ्रांतिपूर्ण है।" 

ऐसा कहने और मानने के पीछे तर्कपूर्ण कारण हैं, अन्यथा ऐसे बहुत से क्रियाकलाप हैं जिनके विलंब से होने पर भी कभी उनको भ्रांतिपूर्ण नहीं माना गया। आइए समझने का प्रयास करते हैं कि इस गणना को भ्रांतिपूर्ण की संज्ञा क्यों दी गई। यह अधिकतम आज से 2081 साल पूर्व तक जाती है और इसे विक्रमी संवत कहा जाता है। इसको पूर्वप्रचलित शक संवत को, जो आज से 1966 साल पहले प्रचलन में था, को हटाकर स्थापित किया गया था। शक संवत महाराज कनिष्क द्वारा स्थापित किया गया था, परंतु यह तय है कि विक्रमी संवत से पहले की कोई गणना पद्धति मौजूद नहीं है। इसमें अभी भी मलमास और तिथि की गणना में भ्रांति ही रहती है क्योंकि दिन पूरा चौबीस घंटे का नही होता। दस - बारह सैकंड का अंतर होता है। यह चंद्रमा के पृथ्वी के चक्कर काटने के अनुसार है। इस्लाम की हिजरी की गणना भी इसीलिए शत प्रतिशत सही नहीं है क्योंकि वह बारह महीने और एक महीने में तीस दिन पर आधारित है। प्रति वर्ष पांच दिन छह घंटे और कुछ सैक॔ड की समस्या बनी हुई है। ईसा मसीह के संदर्भ में गणना में पहले जूलियन कैलेंडर में समस्या थी। इसलिए ग्रेगेरियन कैलेंडर बनाया गया वह भी परफेक्ट नहीं है। उसमें भी समस्या है और गणना करने में दुविधा है क्योंकि A.D. को After Death अधिकांश दुनिया मानती है परंतु ईसाई धर्म नहीं मानता। 

आपसे यह सब इसलिए साझा किया क्योंकि जब इन दो हजार साल में ही गणना को लेकर इतनी विविधता है तो लाखों करोड़ों वर्ष की गणना, जिसका कोई आधार ही नही है? वह कैसे सही हो सकती है? यह हमें दिग्भ्रमित करने की कोशिश मात्र है। छह-सात हजार साल पहले न तो आग जलानी आती थी और न अनाज पैदा करना आता था तथा न ही घर परिवार बनाकर रहना। केवल मात्र हमें दिग्भ्रमित करने के लिए लिख दिया गया था।

अब, हम उसे क्यों मानें यह आपके, हमारे और सबके लिए 'यक्ष' प्रश्न है। (०४.१०.२०२४)

जागृति

समाज जैसे जैसे जाग्रत होता है वैसे वैसे नेता गौण होते चले जाते हैं। एक दिलचस्प और तथ्यपरक सत्य यह है कि अशिक्षित समाज का नेता बनना आसान है, परंतु शिक्षित समाज का नेता बनना दुष्कर है। इस सबके चलते कोई भी नेता लंबे समय तक समाज का नेता नहीं बना रह पाता है। बिलकुल यही स्थिति राजनीतिक पार्टियों पर भी लागू होती है। उनको आरंभ में जनता को दिग्भ्रमित कर सफलता मिलती है और सत्ता मिल जाते ही जब क्षमता दिखाने का अवसर मिलता है तब लोकप्रिय कार्य करने की गति यद्यपि समाज की जागृति से अधिक होनी चाहिए और उसमें स्पष्टता भी होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही सत्ता की अवधि बढ़ सकती है अन्यथा जनता के परीक्षण में विफल होने की संभावना बढ़ जाती है। एक कहावत है - 

"Power corrupts and absolute power corrupts absolutely." 

अर्थात "सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट करती है।" 

यह कहावत शत-प्रतिशत सब ही पर लागू होती है। सत्ता पर  सोने संबंधी

'कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय' 

कहावत लागू होती है और अनैतिकता से अर्जित किया गया धन यौन अनाचार की ओर भी ले जाता है। संगठन के संदर्भ में कल मैंने लिखा था। उसमें भी यही स्थिति होती है कि कहने को  और बोलने को कुछ भी हो पर संगठन का निहित उद्देश्य भी होता है। वह सर्वव्यापी हो ही नहीं सकता। सबके हित का भी नहीं हो सकता। यह कहना उचित होगा कि उसको बनाने और चलाने वालों के हित की पूर्ति करता है। उसका सर्वोच्च पद भी बदलते रहना चाहिए और उसमें नए नए विचार और विचार करने वालों का समावेश होते रहना चाहिए। अन्यथा संगठन बौना होता चला जाता है।  सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति को मति भ्रम रहता है कि मैं सर्वोपरि हूँ। आज  सोशल मीडिया  के युग में जनता ही सर्वोपरि है। कोई भी किसी का बँधुआ नहीं है और आज की राजनीति में सब स्वार्थी हैं परंतु अतिशयोक्ति भी होती है। कहने का तात्पर्य है कि हालात हालत बदलते रहते हैं। बावजूद इस सबके हमें प्रयास करते रहना चाहिए और शेष समय पर छोड दीजिए। (०३.१०.२०२४)

कृषकों की समझ

कृषि विश्व भर का सबसे प्राचीन और सबसे वृहद उद्यम है और भारत की तो समग्र अर्थव्यवस्था ही इस पर निर्भर है। भारत सरकार के कुल बजट का दो गुना भारत के नागरिकों के भोजन पर व्यय आता है। आज के प्रति व्यक्ति 136 $ प्रतिदिन औसत व्यय (विश्व बैंक के अनुसार) के अनुसार भारत एक वर्ष में बहत्तर लाख करोड़ का खाना खाता है। इसमें से कृषि उत्पादन करने वाले किसान को सोलह लाख करोड़ रुपए मिलते हैं। दलाल कृषकों से उनकी कृषि उपज खरीदकर चौबीस लाख करोड रुपए में बेचते हैं जिसमें तीन लाख करोड़ रुपए की सरकार भी मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर खरीद करती है। यदि किसानों की कृषि उपज मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर बिक जाती तो कृषकों को चौबीस लाख करोड़ रुपए मिलते। यही नहीं वास्तविक अंतिम उपभोक्ता इसके लिए अडतालीस लाख करोड रुपए व्यय करता है। ब्राजील और अमेरिका जैसे देश अपने कृषकों को इतनी फसल के लिए छत्तीस लाख करोड़ रुपए (उपभोक्ता के भुगतान का 75%) का भुगतान सुनिश्चित करते हैं, जी उनकी विकसित अर्थव्यवस्था का प्रमाण है।

भारत में कृषकों के बच्चे कृषि समेत कृषि आधारित समस्त कार्यों से दूर भागते हैं, जबकि आज के युग में कृषि संबंधी अधिकांश कार्य मैकेनाइज्ड हो चुके हैं। कृषि भूमि में प्रबंधकीय तरीके से केवल मात्र श्रम ही करना है। कृषि का सही मूल्य मिले इस दिशा में सटीक प्रयास और बहुत बड़ा योगदान हमारे शिक्षित बच्चे ही कर सकते हैं और आज की सबसे बड़ी जरूरत खाद्य पदार्थों तथा उत्पादों का रसायन रहित तरीके से प्रसंस्करण और पैकेजिंग भी आसान, सरल और सुगम कर सकते हैं। 

इससे अकल्पनीय लाभ होगा। सिर्फ हमारे परिवारों को ही लाभ नहीं होगा भारत सरकार की अर्थव्यवस्था भी स्थायी रूप से विकसित होगी। साथ साथ निशुल्क स्टार्टअप विकसित करने की दिशा में कृषक वर्ग आगे बढ़ सकेगा।

हम प्रयास करते हैं कि चीजें कृषकों की समझ में आएं, परंतु आज की राजनीति इसमे भी बाधक बनती है। आज जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्म दिवस पर श्रद्धापूर्वक आपको प्रेषित। (०२.१०.२०२४)

स्वार्थी व्यवस्था

स्वार्थ के ध्येय से बनाई गई चातुर्वर्ण व्यवस्था को मैं सही नहीं मानता, परंतु इसका प्रभाव आज तक भी है। इसमें से दूसरा वर्ण संविधान ने समाप्त कर दिया है और तीसरा वर्ण अब व्यापक है और सबके लिए खुला है। कोई उसमें रहे या न रहे, परन्तु पहला वर्ण इसका अभी तक भी भरपूर लाभ ले रहा है। उसकी बादशाहत बरकरार है। अपने आपको गांधी जी के दिए गए नामों से सुशोभित करते हुए जाति के आधार पर एक-दूसरे से ऊंच-नीच की ब्राह्मणवाद की भावना का अक्षरश: पालन कर रहे हैं। डा. अंबेडकर के संवैधानिक प्रावधानों का लाभ लेते हुए अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने का प्रयास भी करते हैं, परंतु इनके प्रयास अपने अकेले के दम पर बच्चों को सफल बनाने के रहते हैं जबकि बच्चों की शिक्षा के उपरांत की सफलता सामाजिक वातावरण पर निर्भर करती है। उसके लिए सामाजिक जागृति चाहिए। पहले वर्ण के व्यक्ति इसके लिए चिंतित नहीं होते, क्योंकि वह सामाजिक जागृति के लिए प्रयास करते हैं, जिसमें उनके कमतर अंक लाने वाले बच्चे भी सफल हो जाते हैं। आज की आवश्यकता है कि वातावरण में परिवर्तन लाया जाए । वातावरण में परिवर्तन दीर्घकालिक व्यवस्था से आता है और इसमें समाज के प्रबुद्ध वर्ग को वृहद स्तर पर भागेदारी आवश्यक होती है। आज इसमे शनै: शनै: प्रगति हो रही है जिसमें सोशल मीडिया की महती भूमिका है जो इस वर्ग के स्वार्थी नेताओं को जमीन पर ला रही है। (२५.०९.२०२४)

जीवन की सामाजिक और असामाजिक गतिविधियों में बहुत महीन अंतर है जिसको सूक्ष्मता से ही परखा जा सकना संभव है। इसीलिए इनके बीच में अधिकांश स्वयंभू समाजसेवी अथवा राजनीतिज्ञ या नेतागिरी की लाइन में लगे लोग होते हैं। इनका नंबर नेताओं से लगभग सौ गुणा होता है। इनमें से दस प्रतिशत ऐसे भी होते हैं जो बहुत बड़े वर्ग को दिग्भ्रमित करने में सफल होते हैं। इनमें से एक प्रतिशत अपने आप को स्थापित कर लेते हैं और इनको भरपूर सहयोग मिलने लगता है और चार पांच साल तक मिलता रहता है। इतने दिनों में इनके प्रयोग का परीक्षण होकर परिणाम  सामने आने लगते हैं और आगे का सहयोग और सहयोगी उस पर निर्भर  करने लगता है जिनका कार्यक्रम बीस पच्चीस  साल चल जाता है। उनको सैंकड़ों साल तक याद किया जाता है। उनकी आलोचना तो पचास साल में ही आरंभ हो जाती है। कभी कभी उनसे नफरत करने वाले भी पैदा हो जाते हैं और उनकी संख्या सच सामने आने या दिग्भ्रमित होने से बढती रहती है, क्योंकि असामाजिक  तत्त्व भी सक्रिय रहते ही हैं, परंतु यह सच है कि आज राजनीतिज्ञ बनने के लिए आपको यह दिखाना ही है कि मैं सामाजिक कार्यकर्ता हूं। यह कार्य समाज का है कि वह परीक्षण करे और यह निर्विवाद है कि समाज में सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं, जो समाज को प्रेरित तथा जाग्रत करते हैं जिसके सुखद परिणाम आते हैं। ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता स्वयं में कुछ प्राप्त करें या न करें परंतु संतुष्ट रहते हैं और जीवन भर लगे रहते हैं। हार थककर नहीं बैठते जब तक उनका मस्तिष्क कार्य करता रहता है। वे आरंभ में तो हंसी के पात्र बनते हैं फिर द्वेष को सहते हैं और अंत में सम्मान (मानव जीवन का प्रथम और अंतिम उद्देश्य) भी प्राप्त करते हैं। आज के युग में इनकी संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हो रही है। यह परिवार निरंतर बढ़ रहा है और एक दिन यही लोग समाज के संचालक बनेंगे। पैंतीस साल से प्रयासरत एक छिहत्तर वर्षीय  सामाजिक  कार्यकर्ता के मन की बात। (२४.०९.२०२४)

मनुस्मृति

भारत में छठी शताब्दी में हूणों के साथ आई संस्कृत की पाणिनी और पतंजलि ने आठवीं शताब्दी में व्याकरण तैयार करने के बाद नवीं शताब्दी में ग्रंथों की रचना आरंभ हुई। वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों (ऐतरेय, तैत्तिरीय आदि) उपनिषद धर्मसूत्र ग्रह सूत्र कुछ स्मृतियों एवम् गीता की रचना हुई। दसवीं शताब्दी में रामायण और महाभारत (जय) की रचना हुई। इसके उपरांत ग्यारहवीं व बारहवीं शती में इनका लेखन आरंभ हुआ। पहले ताड़पत्र फिर भोजपत्र (भोज परमार) और बारहवीं सदी के अंत में काग़ज़ पर। वेदों के लेखन के समय पहला और दसवाँ मंडल जोड़ दिए गए। इसी समय मनुस्मृति की रचना हुई जिसमें चातुर्वर्णीय व्यवस्था बनाई गई ।

इस्लाम के अन्य राजाओं ने इस व्यवस्था में दख़लंदाज़ी नहीं की जो उनके लिए दोहरा लाभकारी सिद्ध हुआ। इसमें छेड़छाड़ करने से अव्यवस्था फैलती जब इस व्यवस्था से ग्रसित समाज इस्लाम धर्म में परिवर्तन कर रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी इसमें दख़लंदाज़ी नहीं की। ब्रिटिश शासन ने भी मानवीय आधार पर कुछ आदेश किए पर वर्ण व्यवस्था पर कोई आदेश करना आवश्यक नहीं समझा।

1950 में संविधान लागू हुआ जिसमें मनुस्मृति के एक प्रभाव छुआ-छूत को निषिद्ध किया और सब नागरिकों को समान माने जाने की व्यवस्था की, परंतु वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने का स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया। परंतु संविधान लागू होने से एक वर्ण जिसे कहात्रीय कहा गया था वह निष्प्रभावी हो गया क्योंकि छत्र की व्यवस्था समाप्त हो गई। चौथे वर्ण वालों को स्वतंत्र छोड़ दिया कि वे वर्ण व्यवस्था के नियम स्वीकार करें या न करें। इनके बीच से स्वार्थी व्यक्ति खोजे गए जो इस मानसिकता को सर पर ढो रहे हैं।

इनको यथास्थितिवादी भी कहा जाता है समय के साथ साथ मेरे (शेषराज सिंह पंवार) जैसे परिवर्तनवादी भी बहुतायत में आ रहे हैं और धीरे धीरे सच को स्वीकार कर रहे हैं। हज़ारों साल की व्यवस्था को सुधारने में दशकों का समय लगता है। (२३.०९.२०२४)

सही-गलत

अरस्तू ईसा पूर्व 350 से अगस्तीन 350 ईस्वी तक 700 साल की अवधि में दार्शनिक आत्मा और ईश्वर पर एक निश्चित मत नहीं बना पाए इसलिए शासक के कोप का भाजन बनते रहे। इनके बाद वालों को अभयदान तभी मिला जब इन्होंने ईश्वर (God) का होना और उसमें चमत्कारिक शक्ति होना स्वीकार किया। इसके उपरान्त धर्म और राज्य दोनों मिलकर एक-दूसरे के पोषक और शक्तिशाली भी बन गए व जैसा कि होता आया है कि शक्ति सभी प्रकार के भ्रष्टाचार की जननी है। इसलिए दोनों ने मिलकर भ्रष्टतम कार्य किए और विरोधियो को भयंकर यातनाएं दी गईं। यहां तक कि अपने ही धर्म के विरोधियों को फांसी पर लटका दिया गया तथा चौराहों पर जिंदा जलाया गया ।

इस सबके उपरांत भी मानव और समाज की खोजी प्रवृति निष्प्रभावी रही और निर्बाध चलती रही। भारतीय भूभाग में ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि यहां पर लोग धर्मी-विधर्मी, स्वदेशी-विदेशी मे उलझे रहे परंतु निकृष्ट वर्णव्यवस्था का अनुपालन निर्विवादित रूप से जारी रहा। इसमें मुगलों ने हस्तक्षेप नहीं किया और जैसे ही अंग्रेजों ने इसमें दखल देने की कोशिश की उनका विरोध आरंभ हो गया।

अब लगभग समस्त संसार में सत्रह सौ साल से चली आ रही धर्म की सत्ता डगमगा रही है। इस्लामिक देश अपना धार्मिक किला ध्वस्त होने से बचाने में अभी आंशिक रूप मे सफल हो रहे हैं परन्तु यह भी अल्पकालिक ही लग रहा है। कल पता नहीं क्या होगा लेकिन जो भी होगा ठीक ही होगा लेकिन यह तय है कि जो कुछ भी होगा अपनेआप ही होगा। इसमें कोई कुछ नहीं कर पाएगा। गत सत्ताईस सौ साल का इतिहास तो यही कहता है पर आप नाराज न हों। आप जहां हो, जैसे हो, जो मानते हो मानते रहो। बस कभी कभी चिंतन अवश्य कर लो कि क्या सही है और क्या गलत। (०७.०९.२०२४)

छुटकारा

महायान/हीनयान, दिगंबरी/श्वेतांबरी, कैथोलिक/प्रोटेस्टेंट, सवर्ण/अवर्ण, शिया/सुन्नी, जट्ट/रामदासी आदि सब समाज में मौजूद हैं और भेद कर यह मत मतान्तर निर्मित कर देने वाले भी। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। विचारणीय तो यह है कि ऐसा क्यों है? निस्संदेह यह यथास्थितिवाद और परिवर्तनवाद के कारण है और इसमें कोई विवाद नही है कि परिवर्तन सदैव अच्छे के लिए होता है और होकर ही रहता है। उसे कितना भी प्रयास कर रोका नहीं जा सकता लेकिन यह सही है कि सब ही अपनी श्रेष्ठता या उच्च पद बनाए रखना चाहते है और यह भी निर्विवाद और तथ्यपरक सत्य है कि यथास्थितिवाद की स्थिति बनाए रखने वाले कम पड़ जाते हैं और परिवर्तन चाहने वाले अधिक हो जाते हैं। परिणामतः यथास्थितिवाद वालों को झुकना ही पड़ता है क्योंकि समाज परिवर्तनशील है और निरंतर प्रगति की और अग्रसर रहता है। समस्त संसार की तरह भारत में भी यही नियम लागू होता है और यहां भी यथास्थितिवादी अपनी पूरी शक्ति लगा रहे हैं, परंतु समाज में जागृति आ रही है और हजारों साल की भ्रांतियां दूर हो रही हैं। अब समय आ गया है कि यथास्थितिवाद के पोषक समाज और उसके द्वारा फैलाए गए दिग्भ्रमित करने वाले विचारों से छुटकारा पाकर हम आगे बढ़ें। (०६.०९.२०२४)

समाज में शिक्षक का स्थान

शिक्षक को यदि ईश्वर की तुलना में भी उच्च स्थान दिया गया है तो उसके मूल में अनेक कारण हैं। ईश्वर को तो आज तक भी सिद्ध नहीं किया जा सका है, परंतु शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को संसार में ही निभा रहे हैं। आज से ढाई हजार साल पहले दार्शनिकों ने यह सिलसिला आरंभ किया था। सबसे पहले सोफिस्ट दार्शनिकों ने शिक्षा के बदले धन लेना स्वीकार किया था जिसकी समाज में काफी आलोचना हुई थी, पर आज तो शिक्षा ही धन के लिए और डंके की चोट पर दी जा रही है और इस शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था का ध्येय सेवा क्षेत्र में करियर बनाना है लेकिन कैसी विडंबना है कि सेवा क्षेत्र ही आज खतरे में नजर आ रहा। धन प्रायः सबके पास नहीं होता। यह भी कह सकते हैं कि जिनको शिक्षा की वास्तव में जीवनयापन अर्थात जीविकोपार्जन के लिए आवश्यकता है उनके पास धन नही होता उनके लिए नागरिकों की दान दया से कुछ विशेष नहीं हो सकता। यह नागरिकों की प्रथम वरीयता होनी चाहिए और सरकार को अहसास कराने या संविधान की याद दिलाने का कार्य नागरिकों का है। कुछ धन देकर अपनी जिम्मेदारी से पिंड छुड़ाने से काम नहीं चलेगा। अपने सर पर सरकार का कार्य लेने से कुछ नही होगा। हमें स्तरीय शिक्षा और शिक्षक चाहिए जो पुस्तकालय में नही होते। (०५.०९.२०२४)

भारत - एक कृषि प्रधान देश

भारत एक कृषि प्रधान देश है यह वास्तविकता है और इसमें कितने भी प्रयास करके प्राकृतिक व्यवस्था में बदलाव कर इसको केवल कहावत बना देना संभव नहीं। हमको यदि ऐसा लगता है कि भारत 1980 के बाद उद्योगपतियों का देश बनकर रह गया तो यह सिर्फ प्रतीति भर है जिसके मूल में कृषक वर्ग का उदासीनता भाव और कृषि को लेकर जिज्ञासा का लगभग समाप्त हो जाना है। अन्यथा तो कृषि क्षेत्र में आज भी

आश्चर्यजनक रूप से रोजगार के विविध किस्म के अवसर सृजित करने की क्षमता है 

हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अंतर्गत दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित डाफने डेमेट्री के आलेख के अनुसार,

"बहुत से लोगों का किसी क्षेत्र में कदम रखना जुनून होता है। कुछ लोग इसे एक अतिरिक्त काम के रूप में भी देखते हैं। लेकिन अगर आपका शौक ही एक सफल अवसर में बदल जाए तो? इसके लिए आपको बस अपने शौक को एक व्यापार में बदलने के व्यवहार्य तरीकों से परिचित होना जरूरी है। उद्यमी बनने के मार्ग की कल्पना करते हैं, तो हम अक्सर एक सीधे रास्ते की कल्पना करते हैं, जो अपनी कृषि कार्यों में लगे लगे एक व्यवसाय शुरू करने से है। और! ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब कुछ उत्साहियों ने कृषि के साथ ही अपने शौक को सफल उद्यम में तब्दील किया है। इसलिए अगर आपके पास किसी विशेष क्षेत्र में गहरी रुचि और कौशल है, तो कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखकर उससे जुड़ा काम कर सकते हैं। इसलिए ऐसी कोई भी कार्य योजना बनाते समय तैयार रहना महत्वपूर्ण है।"

कृषक वर्ग की उदासीनता ही का परिणाम है कि देश के लिए आवश्यक कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की आवश्यकता हो गई है। यह कैसी विडंबना है कि संसार की खाद्य तेल की आपूर्ति करने वाला देश आज खाद्य तेल और दाल बाहर से आयात कर रहा है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने कृषि को प्राथमिकता की सूची से बाहर कर दिया। 2002 में तो उद्योग को प्राथमिकता देने की उद्योगपतियों की सरकार ने नीति ही बना दी और यह कहकर बनाई कि इससे रोजगार में वृद्धि होगी, लेकिन परिणाम उसके उल्ट हैं। कार्यबल का केवल 12.5% औद्योगिक श्रमिक हैं और कृषि पर कार्यबल का 50% निर्भर है और उसमें से 30% बेरोजगार हैं। ऐसा नही है कि इससे औद्योगिक उत्पाद ही जनता को सस्ते मिले हों। देश आजाद होने के बाद कृषि उत्पाद केवल 60 से 100 गुणा महंगे हुए हैं, जबकि औद्योगिक उत्पाद की लागत तथा कर्मचारियों का वेतन 300 से 600 गुणा बढ़ा है। उद्योगपतियों की सरकारें इसके बाद भी जनता की गाढ़ी कमाई को उद्योगपतियों पर लुटाती रहती हैं और इसके लिए शर्मिंदा भी नही होती हैं क्योंकि देश की जनता को आपस में उलझे रहने की व्यवस्था की गई है।

आज देश के बजट का केवल 15% ही विकास के लिए होता है, जिसमें से हिस्सा बंटाने के लिए जनप्रतिनिधि लालायित रहते हैं, परंतु देश के बजट का डेढ गुणा प्रतिवर्ष भोजन पर व्यय करने वाला देश इसके बारे में सोचता ही नही है।

देश आजाद होने के समय बजट की आधे से अधिक राशि भोजन व्यवस्था के लिए थी और देश आजाद होने के समय कृषि की GDP लगभग 50% थी। आज उसका हिस्सा घटकर 17% हो गया है।

आपका प्रश्न होगा कि समाधान क्या है तो इसका उत्तर हम अनुवांशिक बल सुनहरा कल के कार्यक्रमों में देते हैं। (२५.०८.२०२४)

समझेगा कौन?

आखिर यह कौन तय करेगा कि अब समय आ गया है कि अनुसूचित जाति (अनुसूचित जनजाति नहीं) का राजनीतिक पदों पर आरक्षण समाप्त कर दिया जाए, क्योंकि ये समाज के प्रतिनिधि नहीं बल्कि समाज के विकास को अवरुद्ध करने वाले बन गए हैं। ये स्वार्थ के वशीभूत होकर समाज के विरुद्ध बोलने लगे हैं और जिन्हें समाज अपना समझता है वो वास्तविक रूप में सामाजिक विरोधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाज तो इन्हें अपना प्रतिनिधि मानता है, परंतु समाज के लिए इनके कारनामे काले होने लगे हैं। डा. अंबेडकर पृथक निर्वाचन इसीलिए चाहते थे कि जनप्रतिनिधि समाज के हितैषी बने रहें। और! यह तभी हो सकता है जब इसका परीक्षण समाज ही करे कि इनके कृत्य समाज-हित में हैं भी या नहीं। किसी भी सामाजिक आरक्षण का मनुवादी विरोध करते हैं, परंतु राजनीतिक आरक्षण को बनाए रखने के लिए विरोध नहीं होता, जो कई जगह तीस साल के लिए बढा दिया जाता है क्योंकि यह आरक्षण मनुवाद को ही सहारा दे रहा है। गत तीन दशक से पहले उनके समर्थन से मनुवादी सरकार बनती थी जिनके नाम के बाद में राम होता था और अब उनके नाम से सरकार बन रही है जिनके नाम से पहले राम होता है। जब राम नाम से ही सरकार बन रही है और बननी है तो फिर राजनीतिक आरक्षण की जरूरत ही नहीं है। (२३.०८.२०२४)

वर्तमान राजनीतिक स्थिति

विश्व भर में यदि अध्ययन की महत्ता आज तक भी है तो उसके मूल में राजनीतिक दल नहीं बल्कि वे कर्मठ मानव संसाधन हैं जिन्होंने ना केवल अपने को अध्ययन के द्वारा समृद्ध किया बल्कि अध्ययन प्रक्रिया में भी यथोचित बदलाव किए। राजनीति में समस्त राजनीतिक दलों की स्थिति उनके क्षेत्र में अध्ययन की दृष्टि से लगभग एक सी है। कांग्रेस, सपा आदि का सामाजिक ही नहीं सांगठनिक ज्ञान लगभग शून्य ही है और इनको जो वोट मिली भी हैं उसमें बहुत बड़ा भाग भाजपा की समाज विरोधी नीतियों के कारण है, क्योंकि भाजपा की आरक्षण विरोधी (छद्म) नीति, मुस्लिम घृणा और मुखर वक्ता (झूठ परोसने) का खुलासा हो गया है। साथ ही उनके भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के एजेंडे का एहसास भी जनता को हो गया है।

भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में जान कांग्रेस और सपा भले ही अपनी सफलता मान खुश हो रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इन दोनों दलों के पास सांगठनिक क्षमता नहीं है तो सत्तारूढ़ दल के पास यदि यह क्षमता है तो उसका अध्ययन एवं विश्लेषणात्मक पक्ष कमजोर है। समस्याओं को जानना अलग बात है और उनका स्थायी निराकरण अलग व निराकरण जानते हुए भी निदान ना करना तो सबसे निकृष्ट स्थिति है। कांग्रेस का नायक अभी तीन साल से समस्याओं को खोज रहा है तो समस्याओं की Solution Apprenticeship अवगत कराई जा रही है, जो 1968 में भी थी। यह अच्छा है लेकिन सांगठनिक अभाव में यह भी प्रभावित होगी और वास्तविकता यह है कि किसी भी राजनीतिक शीर्ष तक सारी समस्याएं तो पहुंच ही नहीं पाती हैं। मसलन किसानों की समस्या का समाधान MSP को कानून बनाना है, लेकिन इसी विषय से जुड़ी किसानों की समस्याएं और भी हैं।

भारत की राजनीतिक पार्टियों ने वोट बैंक बनाने और पक्षपात के नजरिए से सदैव काम किया है। फलतः परिणाम ना तो राजनीतिक दलों को संतुष्ट कर पाए हैं और ना ही जनता को। मंडल आयोग जैसे ना जाने कितने आयोगों की रिपोर्ट आज तक भी रद्दी की टोकरी में धूल चाट रही है। फिलवक्त एक नया प्रयोग कर लिया गया है कि किसी भी रिपोर्ट को आंशिक रूप से उपयोग में ले आकर रिपोर्ट लागू कर दो व शोर मचा दो। मंडल आयोग पर लोकसभा की बहस में मंडल आयोग का विरोध सपा के मुलायम सिंह ने किया था और कांग्रेस के एक बहुत बडे ग्रुप ने भी।

यह बात अलग है कि वी पी सिंह जी को मंडल आयोग लागू करने की सलाह देने वाले शरद यादव और रामविलास पासवान दोनों ही अंततः भाजपा के सहयोगी बने। यह सत्य भी भूलें नही कि ममता बनर्जी के साथ मायावती भी भाजपा की सहयोगी रह चुकी हैं और ममता तो कुछ समय के लिए कम्युनिस्ट भी रहीं। 

यही कारण है कि ये पार्टियां स्थायित्व की उच्चाकांक्षा के बावजूद भी सत्ता में आती जाती रही हैं। अभी तो संघ की भी यही सोच है कि कुछ समय के लिए भाजपा सत्ता से बेदखल हो जाए तो वापसी की संभावनाएं बनी रहें।

मेरे शब्दों से आप समझ रहे होंगे कि मैं अपरोक्ष रूप से भाजपा का समर्थन कर रहा हूं। जी नही, यह पार्टी और इनके संरक्षक विशुद्ध रूप से एक वर्ण से संचालित होते हैं, दूसरे वर्ण को साथ रखते हैं और तीसरे का आर्थिक हित साधते हैं, जो जनता के लिए अत्यंत घातक है। अब आप कहेंगे कि फिर बचा ही क्या?

यह पोस्ट लिखने के पीछे उद्देश्य है कि जनता जागरूक होकर निर्णय लेने में सक्षम हो रही है। हमें हमारे पडौसी देशों की स्थितियों को ध्यान में रख काम करना होगा और सतर्क भी रहना होगा।

हम अब पुनः इस प्रश्न पर आते हैं कि 'सामाजिक क्या है?' निश्चित रूप से समाज की उच्च स्तरीय शिक्षा, स्वस्थ नागरिक बनाना, नागरिकों का सदुपयोग और मूल आवश्यकताओं; कृषि, ऊर्जा, जल प्रबंधन तथा संविधान; की सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्थाओं तथा संस्थाओं के संरक्षण को हम सामाजिक कह सकते हैं। (२०.०८.२०२४)

चिंतन

दार्शनिकों की सामाजिक बदलाव लाने समेत समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी क्रम में अरस्तू (350 ईसा पूर्व) से पूर्व के संसार के समस्त दार्शनिकों (गौतम बुद्ध और महावीर के अतिरिक्त), जिनमें पाइथागोरस, थेल्स, जेनो, सुकरात और प्लूटो भी सम्मिलित हैं, में से अधिकांश आत्मा (Soul) की बात करते हैं। पाइथागोरस के अनुसार तो आत्मा वृक्षों के बीज में होती है, जबकि थेल्स के अनुसार आत्मा चुंबक की तरह होती है। बकौल कुछ के सुखी जीवन कैसे जिया जा सकता है?, जीने की कला या समाज को कैसे प्रभावित कर सकते हैं? इसको लेकर बात करते हैं या राजा को उपयुक्त रूप में राज करने के लिए क्या करना चाहिए? इस पर मंतव्य देते हैं, जिसके कारण उनको राजाओं या सम्राटों के कोप का भाजन भी बनना लड़ा और अनेक को तो मृत्युदंड तक झेलना पड़ा या उस सम्राट के कारण देश छोड़ना पड़ा, परंतु इन दार्शनिकों में से किसी ने भी क्षमायाचना नहीं की और अपने दर्शन पर अटल रहे। ये सभी पृथ्वी को स्थिर और चपटी तथा सूर्य को चलायमान मानते थे। इतना ही नहीं इनमें से कुछ स्वर्ग की कल्पना भी करते थे।

दिलचस्प है तो यह कि इनमें से कोई भी परमात्मा अथवा ईश्वर (God) की कल्पना करता नहीं पाया गया। God की सर्वप्रथम कल्पना का श्रेय अरस्तू ही को जाता है। यहां यह भी विचारणीय है कि अरस्तू की मृत्यु 346 ईसा पूर्व ही हो गई थी (गौतम बुद्ध के लगभग तीन सौ वर्ष बाद)। कहने का तात्पर्य यह है कि ईसा मसीह का आगमन भी अरस्तू के बाद हुआ और तब तक Relegion या धर्म शब्द का प्रयोग कहीं दिखाई नहीं देता है। (१८.०८.२०२४)

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

किसी गुलाम देश को जब आजादी मिलती है तो इतिहास के पन्नों में दर्ज तिथि उस देश के जनमानस को उल्लास से भर देती है। हम भारत के नागरिक भी हमारे देश की स्वतंत्रता का 78वां पर्व ठीक वैसे ही उल्लास के साथ मना रहे हैं, पर स्वतंत्रता  देश तक सिमट कर रह गई है। देश स्वतंत्र है,  परन्तु नागरिक स्वतंत्र हैं या नहीं यह विचार योग्य विषय है। 

क्या नागरिक  संविधान की उद्देशिका के अनुसार स्वतंत्र है? 

क्या हमें विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? 

क्या हमें धार्मिक विषय पर बोलने व लिखने की स्वतंत्रता है? 

क्या हम संविधान विरोधी वक्तव्यों या व्यक्तियों की आलोचना कर सकते हैं या न्यायाधीशों के संविधान विरोधी आदेशों की आलोचना कर सकते हैं? और! 

इस सबसे विलग क्या हमें अपने मन मस्तिष्क के अनुसार धार्मिक होने या न होने की स्वतंत्रता है? 

इन सबका उत्तर यदि नहीं है, तो इसके लिए उत्तरदायी कौन है? 

ऐसा भी नही है कि हम कह दें कि अधिसंख्य नागरिक ऐसा चाहते हैं, क्योंकि स्वतंत्र भारत के गत पचास  साल का मतदान ऐसा नही दिखाता (आज तक Referendum तो किसी विषय या इस विषय पर हुआ नही है।) अब सत्तत्तर साल बाद यह जरूरत हो गई है कि हम स्वतंत्र हों। 26 नवंबर 1949 को संविधान सौंपते हुए संविधान के शिल्पकार ने कह दिया था कि इस संविधान की सफलता इसको चलाने वालों के ऊपर निर्भर करती है। सत्तत्तर साल में हम समझ गए हैं कि संविधान को चलाने वाले और संवैधानिक संस्थाएं विफल सिद्ध हो रही हैं, परन्तु हम यह जानकर भी यह मानें कि कुछ नहीं हो सकता, तो यह हमारी अकर्मण्यता है क्योंकि शपथ 

"हम भारत के लोग We the people of india" 

कहकर ली जाती है। हमारे जनप्रतिनिधि हम ही चुनते हैं यदि वे संविधान की शपथ लेकर भी संविधान को सुरक्षित और उसका पालन सुनिश्चित नहीं कर पाते हैं या नहीं कर रहे हैं, तो हमारा यह दायित्व बनता है कि देश के सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी जिम्मेदारी  का  वहन करें और इसके लिए हमें मुखर होना ही होगा। हम दो-तिहाई से अधिक हैं और संविधान को लागू कराने के लिए सक्षम हैं। बस बीच के एजेंट से हमको विदाई लेनी होगी। हम हैं और हमारा संविधान है। हम बोलेंगे और  डंके की चोट पर बोलेंगे कोई  बाधा हम सहन नहीं करेंगे।

आप सभी को और स्वयं  को हार्दिक शुभकामनाएं कि हमारा गणतंत्र दीर्घायु हो और प्रगतिशील बने। (१५.०८.२०२४)

मानव जीवन की भूमिका

मानव जीवन समस्त जीवों में श्रेष्ठ है और समाज में उसका सम्मान बुद्धि, चरित्र और लगनशीलता के अनुसार सामान्यतया होता है। किसी परिवार का मुखिया यदि इन तीनों से युक्त हो तो परिवार का भी सर्वत्र सम्मान होता है। किसी भी परिवार का सम्मान और संचालन केवल अधिकार से नहीं हो सकता। उसमें कर्तव्य, उद्देश्य और सहनशीलता की भी आवश्यकता होती है क्योंकि परिवार के सदस्यों को अपने अधिकार की अधिक चिंता होती है और वे स्वयं भी अपना परिवार बना रहे होते या संभाल रहे होते हैं। इस स्थिति में परिवार के मुखिया का किरदार अहम् हो जाता है। एक ओर उसका स्वयं का परिवार और मित्र होते हैं तो दूसरी ओर अपनी जिम्मेदारियों का वहन करते हुए उसका अपना पैतृक परिवार। इस स्थिति में स्वार्थ को तो छोड़ना ही होता है। संतुलन के लिए समझौते करने होते हैं। कुछ अपनी हानि भी सहन करनी होती है। यह बात अलग है कि वह हानि ही बाद में लाभ में परिवर्तित हो जाती है।

लगभग यही स्थिति समाज पर लागू होती है और देश पर भी। समाज के लिए व्यक्ति में बुद्धि, चरित्र और लगनशीलता होनी चाहिए। साथ ही सहनशीलता भी। तब ही समाज का हित हो सकता है। देश के संबंध में भी यही स्थिति है। सर्वोच्च स्तर पर जाने के लिए और बने रहने के लिए बुद्धि, चरित्र, लगनशीलता, सहनशीलता और निष्पक्षता भी चाहिए क्योंकि आपका परिवार और मित्र यहां आपकी बहुत बड़ी समस्या हो जाते हैं। वह आपके सलाहकार नहीं होते और आप उनको अपना हितैषी मानकर चलते हैं। यहां आकर सब कुछ आपके विवेक पर निर्भर करता है । (१४.०८.२०२५)

अवसर की महत्ता

यदि हम अवसरों की महत्ता को नहीं समझ रहे तो कुछ भी नहीं समझ रहे।परिणाम अपने परिवार के आयोजनों को भी हम अराजनीतिक कहकर राजनीति कर रहे लोगों के हवाले कर अपने समाज की स्वयं ही और निरंतर क्षति कर रहे हैं। यह बिल्कुल सामान्य सी बात है कि समाज के एकत्रित होने पर आयोजन का संचालन आयोजन की प्रकृति के अनुसार होना चाहिए। यदि पारिवारिक कार्यक्रम है तो परिवार अथवा समाज के व्यक्ति के हाथ में कार्यक्रम का संचालन होना चाहिए। अन्यथा एक तो समाज में सही संदेश नहीं जाता दूसरे इसका दूरगामी परिणाम होता है क्योंकि समाज आज आकलन करने में इतना सक्षम हो गया है कि वह सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक के मध्य का अंतर समझ सकता है और निर्णय भी ले सकता है। किसी भी परिवार की प्रतिष्ठा समाज की सोच पर निर्भर है और राजनीति तो केवल और केवल समाज के ऊपर निर्भर होती है। समाज यदि साथ नहीं है या उसको आप साथ रखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं तो आप किसी भी स्थिति में सफल हो ही नहीं सकते। गौतम बुद्ध के अनुसार कोई भी धर्म स्थायी नही हो सकता वह परिवर्तनशील है। लोकतंत्र मे उसी तरह कोई भी राजनीतिक पार्टी स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि नागरिकों की सोच परिवर्तनशील है और वह स्थायी नही हो सकती। कुछ समय के लिए आभास हो सकता है कि राजनीतिक पार्टी का यह कार्य अच्छा है कुछ दिनों बाद ही लोग उस कृत्य को भूल जाते हैं और फिर नए नए विषय सामने आ जाते हैं और पार्टी और उसके कार्य अप्रासंगिक हो जाते हैं। 

तात्पर्य यह है कि हम अपने परिवार और विशेष रूप से समाज की सहभागिता वाले कार्यक्रम को राजनीति की भेंट न चढ़ाएं। कल ऐसे ही एक आयोजन में संचालन एक ऐसे स्वयंसेवक को दे दिया गया जिसको अवसर की नाजुकता का भान ही नहीं था नतीजतन एक विचारधारा के लोगों ने अपना अपना वक्तव्य अपने अपने दृष्टिकोण से दिया जिसके समक्ष वह अवसर गौण हो गया और वक्ता बोलते रहे तथा चलते बने। उन वक्ताओं के लिए एक घंटा रुकना भी संभव नहीं था। यहां तक कि नगर और बाहर से आए हुए महानुभावों में से आधे से अधिक सामूहिक श्रद्धांजली के समय तक जा चुके थे। केवल समाज के लोग ही अंत तक बने रहे तथा समाज के राजनेताओं में से केवल पारिवारिक मित्र (एक विधायक) ही अंत तक रहे। यह एक मिथ्या धारणा है कि हम सामाजिक आयोजन को धार्मिक प्रवचन में परिवर्तित कर राजनीतिक लाभ ले सकते हैं। दिवंगत मेरे पुत्र समान था इसलिए इससे अधिक कुछ लिखना उचित नही है। जो लिखा है यदि उससे भी किसी को किसी किस्म की वेदना हो तो उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। (१३.०८.२०२४)

तटस्थता भाव

विश्व भर के सामाजिक चिंतक धार्मिक कट्टरता को अच्छा नहीं मानते यानि मानते हैं कि सहिष्णुता होनी चाहिए अर्थात् दूसरे धर्मों को भी स्वीकार किया जाना चाहिए। इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि हमें सभी धर्मों के लिए तटस्थ होना चाहिए। इसमें एक समस्या यह आती है कि विगत हजार वर्षों में राजा-महाराजाओं ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के ध्येय से राजकीय शक्ति अथवा धन के बल पर लोगों का धर्मांतरण कराया तो उस समय किसी भी प्रकार का विरोध नहीं किया गया इसलिए अब विरोध किया जा रहा है। विचारबिंदु यह है कि आज इस विरोध का लाभ क्या है? जब हमने संविधान में यह व्यवस्था कर दी है कि धन या शक्ति के बल पर धर्म परिवर्तन दंडनीय अपराध है और इससे भी अधिक समस्या यह है कि घर वापसी के लिए चाहे जितने प्रयास किए जाएं घर वापसी इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि धर्म परिवर्तन से भी कोई विशेष लाभ नहीं होता। इसके लिए यदि हम निष्पक्ष होकर मानवता की दृष्टि से सोचें तो धर्म का कर्मकांड अधिक दिखाई देता है जिससे कोई अध्यात्मिक लाभ मिलता दिखाई नहीं देता। और! आज की स्थितियों में केवल और केवल राजनीतिक प्रसार, लाभ और विस्तार के ध्येय से उसी के लिए फैलाई गई दुर्भावना दिखाई देती है। मानव बने रहने के लिए किसी धर्म को अपनाना आवश्यक नहीं है। हम बिना किसी भेदभाव व आडंबर के भी मानव बने रह सकते हैं और मानव सेवा भी कर सकते हैं। अलौकिक शक्तियों से डराकर मानव बनाना हजारों साल पहले की आवश्यकता थी। आज की जरूरत डराकर मानव बनाए रखना नहीं बल्कि समझाकर मानव बनाए रखने की है। मानव बनिए मानव बनाइए यही सबसे बड़ी पूजा-अर्चना है। (११.०८.२०२४)

आकलन

2650 वर्ष पूर्व जन्मे (गौतम बुद्ध के समकालिक) दार्शनिक थेल्स आत्मा (Soul) के आत्मा के संबंध में कहते हैं कि यह एक चुंबकीय शक्ति है, जो मनुष्य में तरंग पैदा करती है। यह उस समय का उल्लेख है जब कि परमात्मा या गॉड की अवधारणा नहीं थी। गौतम बुद्ध भी पुनर्जन्म को स्वीकारते हैं, परंतु वंश वृक्ष की निरंतरता के रूप में जैसे वृक्ष के फल, उनसे बीज और फिर वृक्ष के रूप में पुनर्जन्म ही है। परमात्मा के होने के बारे में गौतम बुद्ध नकारते हैं तो कुछ लोग आत्मा और परमात्मा को अणु और परमाणु की तरह भी मानते हैं। चुम्बकीय तरंग ने आज के युग में क्रांति का सृजन किया है। मैं स्वयं मानव मस्तिष्क में एक चुंबकीय शक्ति (Magnetic field) होने को मानता हूं, जो धीरे धीरे क्षीण होने लगती है। आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में कुछ अधिक समय तक प्रभावी रहती है, पर स्वाभाविक मृत्यु के बाद यह समय दिनों में ही होता है महीनों मे तो नहीं।

  इन चुंबकीय शक्तियों की सामूहिक सोच को भगवान/परमात्मा/ईश्वर का स्वरूप मान लिया जाता है। अनेक दार्शनिकों द्वारा अपनी सोच के अनुसार इसकी व्याख्या की है। भगवत गीता में भी इसे समझाने का प्रयास किया गया है और ईशोपनिषद में भी लगभग सभी धार्मिक व्यवस्थाओं में अपनी अपनी सोच के अनुसार इसकी व्याख्या की गई है। मानव मस्तिष्क के पास चुंबकीय क्षेत्र होने पर शोध चल रहा है। भविष्य के वैज्ञानिक खोज ही लेंगे। 

आज ही के 9 अगस्त के दिन हमारी मां और पिताजी हमे वंश वृक्ष के रूप में छोड़कर इस नश्वर संसार से चले गए थे। उनकी याद में ये मेरे व्यक्तिगत उद्गगार है इनको अन्यथा न लें। (१०.०८.२०२४)

लेखन

भारत में इतिहास विषय पर बात करें तो सबसे ऊपर और पहले नाम कल्हन की 'राजतरंगणी' का आता है। कश्मीर के बारहवीं सदी के राजाओं ने अपना इतिहास लिखने के लिए कश्मीरी ब्राह्मण कल्हन को नियुक्त किया और इसके लिए आवश्यक धन उपलब्ध कराया। यह उनका सबसे उल्लेखनीय कार्य था। लेखन कार्य में समय लगा । पुस्तक में देश भर के सम्राटों और राजाओं का संदर्भ भी उल्लिखित है और कश्मीर के राजाओं की वंशावली तथा कश्मीर के स्थानों के बारे में विस्तृत विवरण है। इसमें मिहिरकुल हूण (छठी शताब्दी) और उनके साहसिक कृत्यों के बारे में उल्लेख है जैसे मिहिरकुल हूण का अनुराधापुरम के राजा को हटाकर उसके भाई को गद्दी पर बिठाना। पुस्तक में महाभारत के संदर्भ भी दिए गए हैं। यहां यह भी अवगत कराना है कि इससे एक सदी पहले मिहिरभोज के दरबार में 'बालभारत' और 'बाल रामायण' का मंचन किया जा चुका था। इससे पहले कश्मीर के मठ मंदिरों के बारे में 'नीलमत पुराण' लिखी जा चुकी थी। कालीदास की 'रघुवंशम' एवम वाल्मीकि की 'रामायण' तथा भोज परमार की अनेक पुस्तकें पाली भाषा में रची जा चुकी थीं। राजशेखर ने भी पाली और संस्कृत में लेखन किया था।

आज का यह लेखन इस संदर्भ में है कि अंग्रेजों ने जब 'राजतरंगणी' की खोज की, तो यह हाथ से निर्मित कागज पर लिखी गई थी और कल्हन के वंशज ने इसको आधा आधा बांट लिया था। इससे दो तथ्य निकलकर आते हैं। एक कश्मीर के राजाओं ने जिन्होंने इसके लेखन के लिए धन दिया था इसे अपने पास रखने की व्यवस्था नहीं की या पास रखने की जरूरत नहीं समझी। दूसरी कि परिवार में बंटवारे के समय बेशकीमती को भी टुकड़ों में बांट दिया जाता है। यही सिद्धांत देश के बंटवारे पर भी लागू होता है। सब अपना अपना हिस्सा निर्धारित करने पर ध्यान देते हैं। बंटने के बाद उसके होने वाले नुकसान को तो भूल ही जाते हैं।

आप सभी से अनुरोध है कि आपके पास जो भी सामाजिक साहित्य है उसे विक्षत होने से बचाने के लिए समाज को समर्पित कर दीजिए। आप इससे समाज का भला कर सकते हैं। (०९.०८.२०२४)

तुलनात्मक अध्ययन

पहले श्रीलंका और उसके बाद बांग्लादेश में जनविद्रोह यह सिद्ध करता है कि सत्ता पर विराजमान व्यवस्था तभी स्थायी रह सकती है जब वह जनभावना से जुडी हो। शाक्य संघ के बहुमत के सिद्धांत में भी दो ही पक्ष होते थे - पक्ष और विपक्ष। निष्पक्ष या नोटा जैसी व्यवस्था उसमें भी नहीं थी। प्रथमत: इन व्यवस्थाओं के कारण अधिसंख्य सिद्धांत में चयनित बहुमत से चयनित नहीं होते, परंतु अल्पमत में होते हुए भी वे सत्ता प्राप्त करने पर उपलब्ध सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी बपौती मानने लगते हैं। सबसे बड़ी समस्या तब उभर कर आती है जब न्यायपालिका भी न्याय नहीं करती और असंगत पद्धति से चयनित न्यायपालिका अपनेआप को सर्वोपरि मानकर अपने व्यक्तिगत आकलन (Judgement) को न्याय (Justice) मानकर जनता पर बलपूर्वक थोपने लगती है।

पुरानी कहावत कि चंद लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बनाया जा सकता है लंबे समय नहीं। और! इस ही क्रम में अधिक लोगों को कम समय के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है, परंतु अधिक लोगों को अधिक समय तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। यह अब चरितार्थ हो रही है। सत्ता के नशे मे मदमस्त सत्ताधारी जनभावना को समझ पाने में विफल हो रहे हैं। यही कारण है कि श्रील॔का, पाकिस्तान, नेपाल और अब बंग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ है और यह भी सिद्ध हुआ है कि न्यायपालिका के बलबूते सत्ता पर काबिज नहीं रहा जा सकता। अक्सर यह न्यायपालिका ही सत्ता गंवाने का कारण बनती है, क्योंकि न्यायपालिका समाज का वास्तविक रूप में प्रतिनिधित्व ही नही करती है।

आज यह कहने में कोई संकोच नही है कि जनता जनप्रतिनिधियों से अधिक समझदार,जागरूक और भविष्य के लिए सतर्क है। और हो भी क्यों ना, आखिर मेहनत तो जनता ही करती है और जनता को पता है कि दो जून की रोटी की व्यवस्था कैसे करनी है? परिवार को कैसे चलाना है? जिनका परिवार ही नहीं है, उन्हें आटा दाल का भाव पता नहीं होता और सत्तारूढ़ होते ही ऐसा कोई कार्य करना भी नहीं पड़ता ।

मुझको लगता है कि कुछ अति आत्मविश्वासी श्रेष्ठ बुद्धि मेरे कथन से असहमत होंगे। पर मुझे भारत में भी पडोसी देशों जैसी स्थिति बनती लग रही है। काश हमारे जनप्रतिनिधि समय रहते सुधर जाएं और संवैधानिक भारत बना रहे। (०६.०८.२०२४)

उपयोग प्रयोग

यह धरती और सृष्टि यदि मौलिक रूप में चले तो ही श्रेयस्कर है। वरना मानवीय प्रयोग तो इस समस्त व्यवस्था को नष्ट भ्रष्ट करने में लगे हैं। एक ऐसा ही प्रयोग मानव ने मानव पर ही किया था 'विभाजन करो और राज करो'! यह इंसानों को विभाजित करने का एक अमोघ अस्त्र बना और आज तक भी इसका उपयोग हो रहा है। इतना कारगर कि जाति, धर्म, वर्ग, रंग, पेशा या फिर अन्य किसी भी विषय को आधार बनाकर उपयोग कर लो। इसका श्रेय अठारहवीं सदी में भारत आए अंग्रेजों को भले ही दिया जाता हो, लेकिन इसका उपयोग सभी कर रहे हैं। इसी अमोघ अस्त्र से बौद्ध धर्म का महायान और हीनयान में, तीसरी सदी में जैन धर्म का श्वेतांबर और दिगंबर में विभाजन हुआ। इतना ही नहीं इसके सृजकों अंग्रेजों में स्वयं कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट का विभाजन पंद्रहवीं सदी में हुआ। मनुस्मृति का ग्यारहवीं सदी का वर्ण विभाजन या और आगे बारहवीं सदी का जाति विभाजन तो बहुत प्राचीन है। अंग्रेजों ने तो इसका 1925 में केवल मात्र प्रयोग किया, वह भी इसलिए जिससे कि वे भारत में राज करते रहें। आधुनिक भारत के लोकतंत्र में इसका प्रयोग 1992 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने किया (इंदिरा साहनी क्रीमीलेयर) फिर सुदामा कोटे में हुआ और अब इस अस्त्र का नवीनतम प्रयोग अनुसूचित जाति और जनजाति के मामले में किया गया है। स्पष्ट कहा जा सकता है अपनेआप को श्रेष्ठ और सर्वोत्तम मानने वाले ही बंटवारा करते हैं। 

आरंभ में स्थिति अज्ञानतावश कुछ और थी लेकिन आज बांटने वालों को समाज स्वीकार नहीं करता और स्वस्फूर्त सामाजिक एकता चाहता है। बहुत हुआ बंटवारा पर अब सब साथ आना चाहते हैं। और! इतना ही नहीं बराबरी का भाईचारा भी चाहते हैं। (०५.०८.२०२४)

भारत में जाति

अनुचित होने के बाद भी जाति भारत की सच्चाई यदि है तो उसमें असुरक्षा का भाव निहित है। अध्ययन अध्यापन से लेकर सामाजिक कार्य करने तक के लिए आपको जाति का उल्लेख करना पड़ेगा और उसके अनुसार ही कार्य करने की बाध्यता है। उस व्यवस्था से अनुकूलन कर यदि चले तभी सफलता मिल सकती है, क्योंकि आपका क्या समाज के सभी तबकों का सामना वर्ण और जाति से प्रसरित की गई और की जा रही दुर्भावना से है। समस्या जाति में ऊपर उठे हुए महानुभावों की है कि उनको इसका आभास या अहसास तक नहीं होता। जाति के विकास की बात करना जातिवाद नहीं है। आपके सामाजिक कार्य की बेसिक यूनिट ही जाति है और यह एक हजार साल में विकसित की गई व्यवस्था है। हम सभी का (अन्य पिछडे वर्ग तथा अनुसूचित जाति) विनाश या सामाजिक स्तर गिराने की कार्रवाई जाति के आधार पर ही हुई है और आज तक भी हो रही है। कोई अपने आपको कितना ही बुद्धिमान समृद्ध और विकसित मानता हो, पर इस प्रहार से बच नहीं सकता। दस बार सांसद विधायक बनकर भी नहीं क्योंकि शोषण व्यक्तिगत नही सामाजिक होता है।

यह बिलकुल असंभव है कि संसार में शोषण कर श्रेष्ठ पद पाने वाला वर्णवादी अपने मूल पैतृक स्वभाव को ही छोड दे। अभी तक भी लेखक राहुल सांकृत्यायन और पत्रकार आशुतोष के अतिरिक्त कोई उदाहरण सामने नही आया।

यह बिलकुल असंभव है कि संसार में शोषण कर श्रेष्ठ पद पाने वाला  वर्णवादी अपने मूल पैतृक स्वभाव को ही छोड दे। अभी तक भी लेखक राहुल सांकृत्यायन और पत्रकार आशुतोष के अतिरिक्त कोई उदाहरण सामने नही आया। (०४.०८.२०२४)

समझना ज़रूरी

भारत की सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक विषयो मे न्याय की आशा करना व्यर्थ है क्योंकि हर क्षेत्र और व्यवस्था में जातीय हस्तक्षेप है। और तो और उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों में न्यायाधीश चयन भी वर्णवाद, जातिवाद और परिवारवाद से ग्रसित है। ऐसी स्थितियों में उच्च या उच्चतम न्यायालय से सामाजिक विषयों पर निष्पक्ष निर्णय की आशा करना लगभग व्यर्थ ही है। उच्चतम न्यायालय का उत्तर प्रदेश में अयोध्या पर तीन न्यायशीशों का अपने वर्ण, धर्म और जाति के अनुसार निर्णय देना यह स्पष्ट सिद्ध करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सामाजिक विषयों आधारित निर्णय करने के लिए बेंच का गठन सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देते हुए एक निष्पक्ष जज के निर्देशन में होना चाहिए और यह तब ही संभव है जब जजों की भर्तियों में कालेजियम सिस्टम समाप्त हो और समाज के समानुपात में प्रतिनिधित्व हो। जैसे कि IAS, IFS, IRS के कैडर हैं, उसी तरह IJS का कैडर भी हो। उसी में से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रोन्नत होकर कैडर बने। तभी भविष्य में न्यायालयों से न्याय की अपेक्षा की जा सकती है। अन्यथा तो अन्याय ही होता रहेगा। अब अन्याय सहने वाला समाज नहीं रहा। वह हजारो साल का हिसाब लेने के लिए भी तैय्यार है। अब सामाजिक न्याय के सभी मसलों (इंदिरा साहनी भी) का सामाजिक परीक्षण होगा और जो उसमें बाधा बनेगा उसको पद से जाना होगा। वह कहावत कि बहुत बड़ी जनसंख्या को बहुत लंबे समय तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता चरितार्थ होगी। पथप्रदर्शक इं. शेषराज पंवार जी (०३.०८.२०२४)

समझना तो होगा

संसार भर में सभ्यता सोच के और शिक्षा के साथ सर्वोत्तम रूप में निर्मित होती है और इस तर्ज पर विकसित समाज का छोटा-सा अंश भी समाज में किसी प्रकार के हुडदंग (अपनी इच्छा को दूसरों के ऊपर येन केन प्रकारेण लागू करना) को पसंद नहीं करता है। और! आज सोशल मीडिया के दौर में चीजें बहुत दूर तक जा रही हैं।

तीन दशक पहले भारत में हुड़दंग दिन के कुछ घंटों के लिए होता था, उसके बाद सारी रात लोगों को रात्रि में सोने न देने के रूप में होने लगा। गत तीन दशक से तो यह छ: सात दिन सड़कों पर दिखाई देने लगा है। गत पंद्रह दिन से जारी हुड़दंग का आज समापन हो रहा है। 

इस अवधि में क्या क्या हो गया यदि इसका आकलन करें तो सैंकड़ों युवाओं की जान असमय चले जाने से और उनके कारणों को जानकर हमको तो अत्यंत दुख होता है, लेकिन विदेश तो हतप्रभ रह जाता होगा कि आखिर इतनी नासमझी वाले देश को कैसे विश्वगुरु का रुतबा मिल सकता है। अध्ययन के इस युग में विधायिका का काम केवल चुनाव प्रबंधन भर नहीं और वह भी उपयुक्त रूप में नहीं। 

हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश  और उत्तराखंड में गत एक सप्ताह से आम जनजीवन पूर्णतया ठप्प है और कहीं पर भी प्रशासनिक कौशल का दृष्टांत उल्लेख करने योग्य नहीं अलावा रास्तों को पूरी तरह से बंद कर कुर्सी डाल कर बैठ जाने के। यदि नष्ट किए गए मानक दिवस जोड लिए जाए तो कुल मिलाकर 20-25  हजार करोड रूपए व्यर्थ ही नष्ट हुआ है। देखें तो केवल जल ही तो चढ़ाया है। यदि इतना व्यय और श्रम इस क्षेत्र  के जल प्रबंधन पर लगा दिया जाए तो इन तथाकथित शिव भक्तों की पंद्रह से बीस पीढ़ियां इन्हें श्रवण/भागीरथ की तरह श्रद्धेय मानतीं। (०२.०८.२०२४)

जलभराव की समस्या

दुनिया भर के कुछ लोग संसाधनों के अभाव में भी केवल व्यवस्था बनाकर भी अपना नाम बनाए रखते हैं। तो हमको भी गवर्नेंस और व्यवस्था को लेकर गंभीर होना चाहिए। हमारे मामले में यह गंभीरता हमको द्विगुणित लाभ देगी क्योंकि वर्तमान में भारत दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला देश है। एक सिविल इंजीनियर होने के नाते मेरा मानना है कि जल प्रबंधन बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र के लिए सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। वर्ष 1971 तक भारत की भी थी, परंतु आज इस प्राथमिकता में हम सबसे पीछे हैं क्योंकि वोट धर्म के नाम  पर मिल जाते हैं। गत एक माह पहले सारे देश में पेयजल के लिए  हाहाकार मचा था और आज जल प्लावन से हाहाकार  मचा है। देश की राजधानी हो, उत्तर प्रदेश की राजधानी हो, राजस्थान की राजधानी हो या फिर महाराष्ट्र  की राजधानी  सब जगह एक-सा आलम है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि "आखिर ऐसा हो क्यों रहा है कि शहर डूब रहे हैं और प्रॉपर तरीके से जल की निकासी नहीं हो पा रही है। इसके लिए केवल एकमात्र  शहरी नियोजन जिम्मेदार  है। वर्षा तो पहले से ही होती रही है, लेकिन ऐसा अब क्या हो गया जो केवल एक घंटे की बारिश में ही सड़कें नदी बन जा रही हैं। सीधा-सा कारण है कि हमने कोठी, मकान और चौड़ी चौड़ी सीमेंट की सड़कें बनाकर बारिश के पानी को जमीन में जाकर भूजल में समाने से रोक दिया है। परिणामतः सारा बहकर वापस सड़क पर ही आ जा रहा है। सामान्यत: खुली जगह पर मिट्टी वाला क्षेत्र 50% वर्षा जल को सोख लेता है। पूरी चौड़ाई मे सीमेंटेड सडक बनाकर हमने यह व्यवस्था समाप्त कर दी है। हमने यह व्यवस्था लगभग समाप्त  कर दी है। वह बहुत बड़ा वह क्षेत्र जो वर्षा जल को सोख लेता था वहीं  अब अनियमित तरीके से मकान बन जाने के कारण जल को सोख पाने का काम जरूरत के मुताबिक नहीं हो रहा है। गुड़गांव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

   भारत सरकार ने वाटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता संबंधी नियम बनाया  लेकिन  इसकी जिम्मेदारी भवन निर्माण करने वालों पर ही डाल दी। परिणामस्वरूप पच्चीस साल में इसका क्रियान्वयन लगभग शून्य है। उल्टे कारखाने अपना दूषित जल जमीन में निर्बाध पहुंचा रहे हैं। 

  यह तो शहरी क्षेत्रों का हाल है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सीमेंट से मार्गों का निर्माण होने तथा राजबाहों का सुदृढ़ीकरण होने से हाल ऐसा ही नहीं और भी बदतर हो गया है। आज से सौ साल पहले गांव में सिंचाई के लिए  कुएं होते थे, जो वर्षाकाल में भूजल को रिचार्ज कर देते थे। विगत सत्तर  साल से नलकूपों ने कुओं की जगह  ले ली है। वर्षाकाल में वर्षा का जल जमीन में जाने की व्यवस्था समाप्तप्रायः हो गई है। 

अब शासन को यदि ऐसी दुश्वारी भरी स्थिति से बचना है तो उसको बड़े बड़े कुओं का निर्माण करवाकर वर्षा का जल भूमि में जल पहुंचने की व्यवस्था करनी होगी और भवन निर्माण करने वालों को अपनी छत से आने वाले पानी को जमीन मे पहुंचाने की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करनी ही होगी। जैसे बंगलौर में जल व्यवस्थापन की पेयजल नीति वरदान सिद्ध हुई  है। इसी व्यवस्था को अपनाकर देश भर में वर्षा जल को भूमि में भेजे जाने की बाध्यता की जानी चाहिए और यह व्यवस्था देश के सभी बडे शहरों में तुरंत लागू होनी चाहिए। 

नेपाल से आने वाली नदियां उत्तर प्रदेश और  बिहार मे भयंकर बाद का कारण बनती हैं। नेपाल को तथा उत्तराखंड को बांध निर्माण  के लिए  आर्थिक सहयोग केंद्र सरकार  को देना ही चाहिए। यदि  कांवड यात्रा  पर 15 -20  हजार करोड़  खर्च हो सकते हैं तो जल प्रबंधन पर क्यों नही हो सकते। (०१.०८.२०२४)

सदुपयोग करना जरूरी

"आलोचना करना तो आसान है, पर कुछ कर दिखाना कठिन है।" 

ग्रेटर नोएडा की प्राइम लोकेशन पर जमीन लेना और उस पर करोड़ों रुपए का भवन बनाना किसी भी समाज के लिए आसान काम नहीं था, पर गुर्जर समाज ने ऐसा कर दिखाया।

आज का गुर्जर समाज करना क्या चाहता है या उसको क्या करना चाहिए इसके लिए यह भवन वरदान के साथ साथ मददगार भी साबित होगा।

फिलवक्त हम सब केवल एक दिशा राजनीति में अधिक सक्रिय हैं। इसे चुनाव जीतने की नीति कहा जाता है। हमारे समाज के व्यक्ति किसी भी तरह से राजनीतिक पद पाने के लिए लालायित रहते हैं बिना अपनी क्षमताओं का आकलन किए। लोकतंत्र में रहना भी चाहिए, परंतु यह भी समझना चाहिए कि राजनीतिक सफलता समाज के संगठन और उसकी जागरूकता पर निर्भर करती है, जिसके लिए एक बाध्यकारी थिंक टैंक होना जरूरी है।

समाज की जागरूकता से न केवल समाज सम्मानित होता है बल्कि राजनीतिक दलों में समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले भी सम्मानित होते हैं। राजनीतिक सफलता अस्थायी होती है, पर समाज की चेतना एक कंक्रीट व्यवस्था हर स्तर पर बनाती है। वर्तमान स्थितियों में समाज के उज्जवल भविष्य के लिए क्या किया जाए यह चेतना समाज में होनी चाहिए। भविष्य में राजनेता बनने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि तथा उद्योग के बारे में सतही जानकारी होने पर सफलता तो मिल सकती है, लेकिन अपेक्षित परिणाम तब ही आयेंगे जब इन क्षेत्रों का विस्तृत ज्ञान होगा। 

इसके लिए समाज को जाग्रत करना होगा और असंगत क्रियाकलापों से बचते हुए ऐसे संदेशों, आह्वानों और संकेतों से हटना होगा जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अहितकर हों या बुद्धिमता की सीमितता दर्शाते हों। केवल धन, जाति और धर्म के बलबूते राजनीति करने के दिन अब लद गए और कुशलता आधारित क्षेत्रों की आज गिनती नहीं। हमारा प्रण होना चाहिए कि हमको अपने अपने क्षेत्र में कौशल को विकसित करना है।

हम केवल कह भर नहीं रहे हैं। देश भर में समाज को उसके स्वर्णिम और चमकदार इतिहास, सभ्यता, भाषा, सामाजिक समर्पण और वर्तमान के मुद्दों पर जाग्रत कर रहे हैं और आत्मावलोकन के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। अभी तक नौ प्रदेशों में गुर्जर ज्ञान गोष्ठी कर चुके हैं शेष तीन पर कार्य आरम्भ है। प्रयास सफल हो रहे हैं ऐसे संकेत निरंतर मिल रहे हैं। निश्छल भाव से अभियान जारी है पवित्र हृदय के साथ। न किसी से कोई चंदा लिया न कोष है न कोषाध्यक्ष न कोई अध्यक्ष है न महासचिव। समाज से केवल भोजन में सहयोग लेते हैं तो वह भी परस्पर साहचर्य विकसित करने के ध्येय से।

सुखद और अपेक्षित परिणाम आने में अभी एक-दो साल लग सकते हैं। हमारा विश्वास है कि हम एक देशव्यापी ग्रुप थिंक टैंक के रूप में बनाने में सफल होंगे। हमारा विश्वास है कि नोएडा के शोध संस्थान में हम एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम वर्ष 2025 में आयोजित कर उसका श्रेष्ठतम इस्तेमाल कर पाएंगे। तब आप लोगों से भेंट होगी तो शोध संस्थान के निर्माण के लिए पूरे समाज की ओर से साधुवाद भी दिया जाएगा।

'अनुवांशिक बल सुनहरा कल' समूह की ओर से शेषराज सिंह पंवार मवीकला सहारनपुर फोन नंबर 9717260007 

(२७.०७.२०२४)

अहसास 

भारत की विधायिका लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के सदस्यों को दस साल के बाद पहली बार अपनी बात कहने का अवसर मिलना आरंभ हो गया है। इसके लिए समूचा श्रेय उत्तर प्रदेश राज्य की पिछड़े वर्ग की जातियों और अनुसूचित जातियों को जाता है। विशेष रूप से देश को आभारी होना चाहिए कि कांवड ढोने वाले युवाओं ने भी वोट ना डालकर अपरोक्ष रूप से ही सही पर किसी हद तक अपने भविष्य की चिंता की है। इस प्रकार उसने अपनी आस्था और विवेक दोनों की लाज रख ली है। अब सत्तारूढ पार्टी को यह एहसास हो जाना चाहिए कि केवल धार्मिक भावना से सत्ता अधिक समय तक नहीं रह पाएगी और सामाजिक न्याय की भावना आपको भी आत्मसात करनी पडेगी। इन वर्गों के सत्तालोलुप कुछ व्यक्ति अब समाज के ठेकेदार नहीं रह गए हैं। अब अन्य वर्गों की जनता भी जागरूक हो गई है और जनप्रतिनिधियों से भी अधिक समझदार हो गई है। काश दोनों सदनों का सीधा प्रसारण होता रहे, क्योंकि अधिकांश जनप्रतिनिधियों को समझ आ गया है कि उनके सदन में वक्तव्य को उनके मतदाता देखते हैं और सदन मे बोलने के लिए तैय्यार होकर आना पडेगा। इसका सीधा लाभ विपक्ष को मिलेगा, क्योंकि उनके उठाए गए विषयों का सही जवाब सत्ता पक्ष अब नहीं दे पाएगा। उन्होंने चौंतीस साल से एक सूत्री कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया है, जो है 'धार्मिक भावना'। शेष सामाजिक विषय में वे कोरे कागज जैसे हैं। केवल और केवल IT Cell से राजनीति करने के दिन गए। अब सदन में तैय्यारी कर आना होगा। वैसे भी केवल धर्म पर कार्य करने से विवेक स्वतः ही समाप्त हो जाता है । (२६.०७.२०२४)

उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास

अपने अपने कार्यकाल को सहेजने का प्रयास दुनिया भर में शासक सत्ता ने किया है और उन प्रयासों के मूल में भावना अपनी उपस्थिति दर्ज कराना मात्र था। इस कार्य को करने के लिए दुनिया भर के शासक वर्ग ने लोग नियुक्त किए। उनमें किसी ने यह कार्य सबसे सामान्य तरीके से आड़ी तिरछी रेखाओ से आरंभ किया तो किसी ने शिलालेखों पर रेखाएं अथवा शब्द उत्कीर्ण करके। आड़ी तिरछी रेखाओं से मंतव्य को समझाने पर आधारित प्रयास आज भी चीन में जारी हैं, जहां सांकेतिक भाषा प्रचलन में है। प्रमाण छोड़ने के लिए शिलालेख भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वाधिक प्रचलन में आए, जिनमें महान सम्राट अशोक के काल के शिलालेख बहुतायत से मिले। उसके बाद राष्ट्रकूट और प्रतिहार वंश तक के शिलालेख भी मिलते हैं। इसके उपरांत के दान आदि के आदेश ताम्रपत्र पर प्रतिहार वंश तक प्रचलित थे। भोज परमार के द्वारा भोजपत्र का प्रयोग किया गया, जो दस हजार फिट की ऊंचाई पर मिलता है। दसवीं सदी में श्री देवनारायण की गाथा/फङ कपड़े पर चित्रित की गई। स्पष्ट है कि तब तक कागज ग्रंथ लेखन के लिए उपलब्ध नहीं था और लेखन कार्य व्ययसाध्य होने और लेखन कला में सबके सिद्धहस्त न होने के कारण केवल राजाओं द्वारा ही अपने अधीनस्थों के द्वारा लेखन कार्य कराया गया।

भारत में ग्यारहवीं सदी में कागज की उपलब्धता होने पर ग्रंथ लेखन अस्तित्व में आया, परंतु विडंबना देखिए कि सोलहवीं सदी तक भी लेखन कार्य राजाओं के सहयोग के बिना संभव नहीं था। इन परिस्थितियों में उस समय तक मौलिक लेखन नही हो पा रहा था। वर्तमान में भी लेखक केवल अपने विचार को ही सत्यापित कर पाता है। अभी तक भी मौलिक लेखन और विशेष रूप से सामाजिक लेखन लगभग नगण्य है, क्योंकि सामाजिक चिंतकों द्वारा अधिकांश लेखन पूर्व के ग्रंथों में उल्लिखित अमानवीय स्वार्थ से परिपूर्ण बातों का खंडन करने पर ही केंद्रित रहा है। वर्तमान आवश्यकता भविष्य के लिए लेखन किये जाने की है। बहुत हो गया कपोलकल्पित झूठ का अध्ययन। (२५.०७.२०२४)

परम्परा से परे

कथानकाें के अनुसार आज से दो सौ वर्ष पूर्व विश्व का सबसे विशाल मेला रूस के बाकू शहर में लगता था। उस समय अनगिनत लोग उस मेले में जाते थे। कहा जाता था कि उसमें एक विशेष दिन वहां अग्नि देवता प्रकट होते थे। बिना किसी प्रयास के ही वहां आग लगती थी। वैज्ञानिकों ने खोज की तो पाया कि वहां पृथ्वी में भारी मात्रा में पेट्रो पदार्थ मौजूद हैं इसलिए आग लगती है। उसके बाद प्रश्न आया कि एक विशेष दिन ही आग क्यों लगती है? फिर से वैज्ञानिकों ने खोज की और पाया कि उस विशेष दिन सूर्य की किरण एक विशेष कोण से उस स्थान पर पड़ती है और तापमान बढने से आग लग जाती है। आज उस स्थान पर अनेक तेल के कुंए हैं और कोई मेला नहीं लगता है। कोई भी चमत्कार हो विज्ञान और वैज्ञानिक देरसबेर उसका सही कारण खोज ही लेते हैं। संसार वैज्ञानिकों ही के कारण विकसित हो रहा है। किसी अलौकिक शक्ति से नहीं। भारत के संविधान में अनुच्छेद 51 वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का निर्देश नागरिकों को देता है। संविधान की शपथ लेकर भावनाओं के नाम पर अंधविश्वास फैलाना असंवैधानिक और जघन्य अपराध है। भारत में सती-प्रथा, बली देने की प्रथा, सभी को शिक्षा न देने की नियमावली, जन्म के आधार पर अछूत मानने जैसी प्रथायें समाप्त हुई हैं। राजनीति में भावनाओं का प्रयोग कर सत्तारूढ होने पर भी अब विराम लगता दिखाई दे रहा है। हम यह जितनी जल्दी समझ जाएं देश और नागरिकाें के लिए उतना ही श्रेयस्कर है। (२४.०७.२०२४)

अभियांत्रिकीय संरचनाओं का आकलन

अभियांत्रिकी कल्पनाओं को साकार कर देने वाली एक विधा है जिसमें सिविल इसकी सर्वाधिक लोकप्रिय शाखा। किसी भी इमारत या निर्माण को साकार कर देने वाली अभियांत्रिक की क्षमता। इसके अंतर्गत निर्मित किसी भी रचना, जैसे कि किसी भी पुल के क्षतिग्रस्त होने पर एक सामान्य टिप्पणी आती है कि इंजीनियर, ठेकेदार की मिलीभगत से सीमेंट, सरिया की चोरी के कारण पुल गिर गया। दूसरी टिप्पणी आरक्षण के विरोधियों की तो एक ही लाइन की होती है कि आरक्षण श्रेणी वाले इंजीनियर होंगे। इसलिए पुल गिर गया और तीसरा कमेंट राजनीतिक दृष्टिकोण से आता है कि राजनीतिक पार्टी ने अपने चहेते ठेकेदार  लगाए, इसलिए  गिर गया। इन सब धारणाओं में सच्चाई हो तो सकती है लेकिन अधिकांश मामलों में लगभग नगण्य   होती है। टिप्पणियों संबंधी इन तीनों बिंदुओं का यदि हम परीक्षण करते हैं तो निष्कर्ष यह निकलता है कि बहुत छोटे निर्माण, जैसे पुलिया आदि (पुल में तो नही), में चोरी यदि की भी है तो अधिकतम 10-15% हो सकती है, जबकि Factor of safety 200-300% होता है। इसलिए बड़े पुल सामान्यतया नहीं गिरते।

दूसरी टिप्पणी आरक्षण संबंधी है, जिसमें दिलचस्प यह है कि आरक्षित श्रेणी वाले भी वही परीक्षा पास कर इंजीनियर बनते हैं जिसे पास कर सामान्य श्रेणी वाले बनते हैं और वो ऐसा कोई भी प्रयास नहीं करते जैसे कि यूपीएससी के प्रशिक्षकों के मामलों में सामने आए हैं। पास होने के लिए आरक्षण आधारित कोई व्यवस्था नहीं है और इंजीनियरिंग के निजी संस्थान खोले जाने के बाद से अयोग्य इंजीनियर गत पच्चीस साल से निरंतर सर्टिफिकेट्स के साथ बन रहे हैं और उन्हीं के आधार पर नौकरियाँ भी पाई जा रही हैं। इतना ही नहीं। सर्टिफिकेट्स के सत्यापन को लेकर नियोक्ताओं के समक्ष एक अजीब प्रकार की दुविधा है। जिसका प्रभाव कार्य पर भी दिखाई दे रहा है क्योंकि 95% पुल अयोग्य इंजीनियरों द्वारा कार्य की योजना बनाने और अनुभवहीन अभियंताओं द्वारा कार्य कराने के कारण बने हुए गिर रहे हैं। उत्तराखंड और बिहार इसी श्रेणी मे आते हैं।

तीसरा बिंदु अवश्य सोचनीय है क्योंकि देश की वृहदतम योजनाओं के अंतर्गत बिना समय पर ध्यान दिए कार्य त्वरित तरीके से अवश्य राजनीतिक निर्णयों और स्वहित के उद्देश्य से दिए जा रहे हैं। एक ही कंपनी के बार बार ब्लैकलिस्ट/विफल होने पर भी ठेके मिलना, टेंडर व्यवस्था में ठेकेदार की गुणवत्ता श्रेणियों पर ध्यान ना देने या घडी बनाने वालों से पुल निर्मित करवा लेने जैसे निर्णय इसी टिप्पणी के अंतर्गत आते हैं। अतः इस सबको जनता को सुरक्षित परिवेश बनने के लिए समझना ही होगा और जनता को जाग्रत होकर सम्यक दृष्टि इस सब पर रखनी ही होगी, क्योंकि नुकसान जनता का होता है, नेता का नही। मानव हित के लिए आंकड़ों, मानकों और गुणवत्ता का ध्यान रखना ही होगा। (२२.०७.२०२४)

पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण अर्थात् पृथ्वी का आवरण एक बहुत अहम् विषय है जो विडंबनाओ से भरा है तो इसलिए कि यह सभी चाहते हैं कि श्वास लेने के लिए स्वच्छ हवा मिले, लेकिन इसके लिए त्याग और श्रम तनिक सा भी न करना पडे और वायु स्वच्छ हो जाए तथा शहर हरे-भरे हो जायें भले ही इसके लिए हरे-भरे गांव उजाड दिए जाएं। सिर्फ दिखाने भर के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए ग्रीन वे बना दिए जाएं। भले ही पहले से एक नहीं दो दो मार्ग उपलब्ध हों।मतलब हरे-भरे खाद्यान्न उत्पन्न करने वाले खेतों में सड़कें बना दी जाएं। शहरों में कोठिया बना-बनाकर हरे-भरे खेतों मे गांवों को शहर का हिस्सा बनाते जाओ। भले शहरों को साफ स्वच्छ रख पाने में विफल रह जाओ। कोठी के गमलों में मनी प्लांट लगाते जाओ या फिर सड़कों के बीच में बोगनवीलिया लगाकर पर्यावरण बचाने का प्रयास कर तो रहे हैं। हमने 80 के दशक में टिहरी बांध निर्माण के समय सुना था कि बांध बनने से पर्यावरण दूषित हो जाएगा। पेड डूब जाएंगे। आंदोलन भी वन विभाग के पेड काटने वाले ठेकेदार कर रहे थे गौरा देवी से प्रेरणा लेकर। टिहरी बांध पूरा होने पर भी इसके उद्घाटन का विरोध धार्मिक आधार पर हो रहा था। 1845 में गंग नहर बनाने के समय भी विरोध हो रहा था। वही समाधान टिहरी बांध में किया गया, बिल्कुल वही जो कभी अंग्रेजों ने किया था। गत तीस वर्षों से बांध बनाकर जलविद्युत बनाने का कार्य लगभग बंद कर दिया गया है। आज भारत लगभग 70% विद्युत कोयले से उत्पादित कर रहा है। ऐसा लगता है कि कोयला खदान के लिए वृक्ष काटने में पर्यावरण दूषित नहीं होता है और न वायुमंडल में कोयले का धुआं छोड़ने से और चीन, ऑस्ट्रेलिया से कोयला मंगाने में तो विदेशी मुद्रा भी नहीं लगती यह विडंबना ही है। हम खुश हो रहे है कि विद्युत आधारित गाड़ियां हम चला रहे हैं। दावा है कि इनसे वायुमंडल दूषित नहीं होगा, लेकिन उत्पादन के लिए कोयला दहन को लेकर कोई समस्या शासन को नहीं लगती है। राजस्थान के बहुत बड़े भू भाग को एक ही नहर ने रेगिस्तान से हरा भरा और उत्पादक बना दिया। यदि 70 के दशक में तत्कालीन केंद्रीय सिंचाई मंत्री डा. के.एल. राव को संसद में आने दिया गया होता तो नदियों को जोड़ने की योजना लागू हो गई होती और आज भारत में पर्यावरण की स्थिति कुछ और ही होती। गंगा और यमुना को जोड़ने के लिए उनके डुंडा (उत्तरकाशी) का दौरा करने और उसके लिए पूरी योजना बनाने की प्रक्रिया में मैं भी शामिल था। अनुरोध है देश के नीति नियंताओं से कि विकास के लिए व्यावहारिक बनिए व सोच को विकसित कीजिए। पाठक वर्ग मेरे मत से यदि सहमत हो तो इसको Like नही Share करें। (२१.०७.२०२४)

सेवा क्षेत्र का प्रभाव

वर्तमान में क्या पहले से ही समाज में शीर्ष स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से शासकीय सेवाओं में स्थान बनाना समाज के सभी बुद्धिमान युवाओं का सपना रहा है। समाज भी इनको श्रेष्ठ बुद्धिमता वाले मानता है। एक सीमा तक पढने-लिखने और मेहनत कर बौद्धिक क्षमता को विकसित कर सफलता प्राप्त करने के कारण नि:संदेह ये सम्मानीय होते भी हैं। दिक्कत यह है कि ऐसे सफल युवाओं को जिनको यह सफलता मिलती है उनमें से अधिकांश में अहंकार भी आ जाता है ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि इनमें से अधिकांश सामाजिक सम्मान कार्यक्रमों में जाते ही नहीं हैं। उनके अभिभावक ही सम्मान लेने आते हैं। स्वयं भाग लेने वालों में केवल वही सहभाग करते हैं जो प्रायः अविवाहित होते हैं। वैसे आम जन को तो लाल बहादुर शास्त्री अकादमी में ही प्रशिक्षण के दौरान ही उनमें अहंकार और समाज की परवाह न करने के लक्षण दिखने लगते हैं। ऐसा पास में ही निवास करने के कारण बारह वर्ष तक नजदीक से देखा है। यहां तक का तो व्यक्तिगत विषय है, परंतु वास्तव में पदस्थ होने के बाद समाज के लिए अहंकार लेशमात्र भी नही होना चाहिए। इनका सबसे नजदीकी व्यवहार अपने मातहत के अतिरिक्त समाज के अधिकांश सबसे अल्प बुद्धि लालची नेताओ से होता है और वे सत्तारूढ होते हुए इनसे भिखारी की तरह व्यवहार करते हैं। भारत के स्वतंत्रता सेनानियो ने यह कल्पना स्वप्न में भी नहीं की थी। इस सीमा तक तो सरदार पटेल ने भी नहीं की होगी। विडंबना है कि समाज के विकास का आकलन इनकी संख्या से होता है और यह तब तक होता रहेगा जब तक निस्वार्थ भाव वाले बुद्धिजीवी राजनेता पदासीन न होंगे। प्रस्तुति में कुछ वचन कठोर लग सकते है इसलिए अग्रिम क्षमा। (२०.०७.२०२४)

भूमिका की समीक्षा जरूरी

कारगिल दिवस हमारी सेना के शौर्य, पराक्रम और पुरुषार्थ का प्रतीक अभियान है, जो विशुद्ध सेना की देखरेख में सेना का गौरव गान करने के लिए होना चाहिए तो यह समझना चाहिए कि इन विशेषताओं से युक्त सेना के अनेक प्रोफेशनल्स ट्रेनर के रूप में सेना के एसेट्स होते हैं और विदेश में शासकीय ट्रेनर की भूमिका निभाकर सैनिकों को प्रशिक्षित करके विदेशी मुद्रा को अर्जित करने का माध्यम बन सकते हैं। विधायिका द्वारा प्रतीकात्मक पर कार्यक्रम आयोजित हो रहे है, जबकि वो सेना के द्वारा ही आयोजित किए जाने चाहिए। मूलतया कारगिल युद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री की प्रसिद्धी की लोलुपता के कारण हुआ। इस युद्ध में सेना के हाथ बांध दिए गए थे आदेशित करके कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नहीं जाना है। केवल अपनी चौकियां ही खाली करानी हैं। और! भारतीय सैनिकों ने समस्त सीमाओं में रहते हुए ही अदम्य साहस, पराक्रम और बलिदान से अपनी सारी चौकियां वापस ले लीं।

इसके बाद शांति पुरस्कार की अपेक्षा के साथ आक्रमणकारियों को सुरक्षा आवरण लौट जाने के लिए दिया गया। यह निपट नासमझी ही थी। उस समय हम देश की सुरक्षा के लिए अहम् चौकियों को हस्तगत कर अपने सैनिकों के लिए सुरक्षित आवरण बना सकते थे।

युद्ध की समस्त समायावधि में मैं और मेरे परिजन टेलीविजन के सामने इसलिए बैठे कामना करते रहे कि कोई अनहोनी न हो। इस अभियान में मेरा सबसे बड़ा पुत्र भी सम्मिलित था। उसकी शादी भी जून में प्रस्तावित थी। हम और हमारे समधी असमंजस में थे कि विवाहोत्सव को उसी तिथि को रखा जाए या कि स्थगित किया जाए। युद्ध की विभीषिका कम होने पर केवल सात दिन पहले मेरा बेटा घर आया और विवाह की प्रक्रिया संपन्न कराकर लौट गया। वह अपनी यूनिट का Adjutant भी था। उसकी इकाई के पुजारी के द्वारा अपने ही एक जवान की हत्या कर दिए जाने के कारण उसकी यूनिट वहां से आने के बाद भी एक साल उसको वही पर रहना पड़ा।

इस सबको कहने का तात्पर्य यह है कि सेना के शौर्य और पराक्रम के लिए विजय दिवस सेना के द्वारा प्रोफेशनल तरीके से मनाया जाना चाहिए, पर सत्तासीन लोगों को उनकी मूर्खता के लिए आईना भी दिखाया जाना चाहिए।

सटीक आकलन

मेरी, आपकी क्या सबकी कथनी और करनी मे अंतर नि:संदेह सामाजिक स्थिति और मान्यता का निर्धारण करता है, लेकिन अब क्योंकि समीक्षा सब चीजों की सब करने लगे हैं तो समीक्षक द्वारा की जाने वाली समीक्षा और सामान्य इंसान के द्वारा की जाने वाली समीक्षा में उत्पन्न अंतर परिणामों को भी प्रभावित करने लगा है। इसके परिणामस्वरूप स्थिति यह हो गई है कि स्थितियों को समझ पाना जटिल क्या अत्यंत जटिल हो गया है। क्या संभव है और क्या असंभव इसके आकलन तक प्रभावित होने लगे हैं। 'समाज समझ ही न पाए' ऐसा तो नहीं है लेकिन क्या समझे और उसका क्या परिणाम हो यह आज अवश्य विमर्श का मुद्दा होना चाहिए। और! जो इस पर विमर्श करेंगे उनकी सोच उन्नत निष्कर्ष निकाल पाएगी। मान्यताओं में भिन्नता हो या कुछ और। निष्कर्ष सदैव कसौटी पर कस कर ही सटीक आ सकते हैं। और कसौटी के समस्त कारकों पर की गई समीक्षा ही उपयुक्त परिणाम दे सकेगी। बेशक भूखे व्यक्ति की समस्या केवल भूख होती है व वह इससे आगे सोच नही पाता है। नकारात्मकता का जिस प्रकार अनथक प्रसार हो रहा है उसमें यह भी संभव हो सकता है कि बहुत बडी जनसंख्या को भूखा रखना किसी षड्यंत्र ही का हिस्सा हो। संसार भर के प्राकृतिक सभी संसाधन नि:शुल्क उपलब्ध हैं और हमारे पास हैं। फिर भी वृहद मानव संसाधन को कार्य करने के लिए उत्साहित ना करके उनको राशन देना पड रहा है। और! न सिर्फ इनकी संख्या को लेकर विरोधाभास है, बल्कि बड़ी संख्या बताकर गौरव की अनुभूति भी कर ली जाती है। ठीक ऐसा ही विरोधाभास बुद्धिमता को लेकर है। किसी वर्ग विशेष से राष्ट्राध्यक्ष बना देंगे या पार्टी अध्यक्ष लेकिन निर्णायक कार्यिकी का मुखिया नहीं बनाएंगे। साथ ही उसी वर्ग को अयोग्य बताते जायेंगे। फिर वही गधे घोड़े का उल्लेख कर आरक्षण का विरोध। ऐसा ही विरोधाभास राष्ट्र भक्ति को लेकर भी है। अनेक खिलाड़ी वर्ग विशेष के होते हैं पर उस वर्ग को देशभक्त नहीं मानेंगे और इसके लिए प्रमाण भी खेल में हार जीत पर खुशी मनाने का ही देंगे। जनता को लेकर सोच भी इसी श्रेणी में आती है। चुनाव से पूर्व जनता माई बाप और चुनाव होते ही निर्वाचित सदस्य माई बाप बन जाते हैं। पार्टियां ऐसा दर्शाती हैं मानो आंतरिक रूप से वे सब घनिष्ठ मित्रों की तरह हैं जबकि उनकी स्थायी खींचतान और जूतमपैजार से जनता भलीभांति अवगत होती है। समय यह अवगत कराने का है कि होश में आइए। आप जनता को देते तो कुछ नहीं उल्टे लेते ही हो। (१७.०७.२०२४)

दिशाबोध

किसी भी क्षेत्र में उन विभूतियों का स्मरण सदैव किया जाता रहा है और किया जाएगा जिन्होंने तटस्थ भाव से स्थितियों सदैव अवलोकन किया हो और आकलन करके अपनी बात निष्पक्ष रूप से कही हो। ऐसी एक विभूति ज्योतिबा फुले का कथन था कि

"शिक्षा से मति, मति से गति और गति से अर्थ आता है।" 

यह उनका बिल्कुल सटीक आकलन था। शिक्षा कभी वर्ग विशेष का अधिकार था और उसने अपनी मति और गति से भारत के अर्थतंत्र पर धीरे धीरे अधिकार भी कर लिया, परंतु एक सामाजिक नियम और भी है कि किसी भी परिवार के अर्थ अर्जन में चार पांच पीढ़ियां ही प्रगति करती हैं उसके बाद परिश्रम न करने के कारण परिवार की अर्थव्यवस्था स्वतः गिरने लगती है। अपरिपक्व निर्णय होने लगते हैं और अंतत: सब बिखरने लगता है। अतीत में हमने देखा कि कैसे बड़े बड़े नामीगिरामी सम्राटों की सात पीढी, राजाओं, नवाबों की पांच और जमीदारों के परिवारों की तीन पीढी ही सर्वोच्च स्तर से निम्न स्तर पर आ जाती थीं। वर्ग विशेष के अर्थतंत्र पर भी यही नियम लागू होता है। पर दिलचस्प यह है कि इस प्राकृतिक वास्तविकता से भी सब ही अवगत हैं कि शिक्षा स्थायित्व देती है और लोकतंत्र इस अमानवीय व्यवस्था को पूरी तरह खारिज कर देता है। 

गत 100 वर्षों में येन केन प्रकारेण शिक्षा को अपने नियंत्रण में करने का प्रयास वर्ग विशेष द्वारा निरंतर किया जाता रहा है और उन प्रयासों की सफलता के उपरांत से शिक्षा का स्तर निरंतर गिर रहा है। कुलपति, व्याख्याता और प्रधानाचार्य के पद अक्षम लोगों से भरे जा रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि विश्वगुरु देश के शिक्षण संस्थानों का स्तर संसार के मानकों में निम्नतम हो गया है। देश आजाद होने के बाद तीसरी पीढ़ी शिक्षण संस्थानों के ऊपर काबिज है। अब ढलान आरंभ होगा तो इसे रोका नहीं जा सकेगा सरस्वती मां भी रोक नही पाएंगी। (१६.०७.२०२४)

कथोपकथन 

वक्तव्यों में छांटकर कथन बना देने को कला की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस कला में राजे महाराजे कभी भी प्रवीण नहीं हो सके भले ही उनमें कितना ही कौशल था। यदि हम समग्र इतिहास की समीक्षा करें तो पाएंगे कि इस कला में स्वयं कोई भी राजा प्रवीण न था और जो भी कथन हैं उनमें से अधिकांश वक्तव्यों का हिस्सा हैं जिनको शब्दशिल्प में पारंगत लोगों ने रच दिया।

जैसे कि गौतम बुद्ध के अनुसार दु:ख आने ही हैं, क्योंकि दु:ख हमारी इच्छाओं के अनुसार हैं। हम अपनी इच्छाओं को बढ़ाते ही रहते हैं और यह तय है कि सारी बढ़ती हुई इच्छायें निरंतर पूरी नहीं हो सकतीं। अतः दु:ख अनित्य है हम यह कर सकते हैं कि हम अपनी इच्छाओं को संभावनाओं तक ही सीमित करें। यह बड़ी सूक्ष्म रेखा है, क्योंकि विकास का प्रयास न करना अपराध है विफल हो जाना नहीं। अतः प्रयास करने में अपराध बोध नहीं होना चाहिए, क्योंकि सब कुछ संभावनाओं पर निर्भर है। यहीं पर संतुलन की आवश्यकता है। हम इच्छाओं का संतुलन यदि नहीं बनाएंगे तो हम दु:खी होंगे और निश्चित रूप से इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम किसी चमत्कारिक शक्ति पर विश्वास करेंगे। इससे हम अत्यधिक दु:खी तो होंगे ही। अपने जीवन का अमूल्य समय भी नष्ट करेंगे, जो एक सामाजिक अपराध है। (१५.०७.२०२४)

मानव जीवन

सृष्टि में जीवन की निरंतरता के लिए नर एवम् मादा के यौन संबंधों की व्यवस्था प्रकृतिजनित है और जीवन की निरंतरता के लिए यह एक आवश्यकता है। युगल के साथ रहने से मानव का और मानव से मानवता का उदय हुआ। समाज के प्रगतिशील लोगों ने व्यवस्था बनाने के नाम पर विविध प्रकार से नियंत्रण का प्रयास आरंभ कर दिया। ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्ण व्यवस्था स्थापित की गई। साथ साथ यम यमी के प्रकरण से यौन संबंधों पर दिशा निर्देश भी दिए गए। संसार के सभी धर्मों में अपने अपने मत के अनुसार इस विषय पर निर्देश विद्यमान हैं, जिनको स्त्री-पुरुष के विवाह के रूप में स्वीकार्य किया गया है। मानव जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण निकाय है। जीवन का बहुत बड़ा भाग इसकी तैय्यारी में लग जाता है और शेष भाग इसके कारण जनित व्यवस्थाओं में लग जाता है। गत दशक में इस व्यवस्था में जीवन के इस महत्वपूर्ण विषय को युवा वर्ग महत्व नहीं दे रहा है उसकी सोच केवल यौन संबंधों तक सिमट कर रह गई है। यह सोच प्रकृति के विरुद्ध है और युवाओं को जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित कर रही है। इसका एहसास इनको वृद्ध होकर होगा कि इन्होंने अपने जीवन को आनंदमय नहीं, बल्कि कष्टदायक बनाया है। सभी से अनुरोध है कि विवाह को व्यवसाय नही महत्वपूर्ण प्राकृतिक अनिवार्यता मानें। (१४.०७.२०२४)




विमर्श

विश्व भर में विमर्श सर्वोत्तम तरीका है व्यापक परिप्रेक्ष्य में मंथन करने का, जिसमें हम क्या कोई भी किसी भी दृष्टिकोण को लेकर अपनी बुद्धिमता के अनुसार होनी अनहोनी का आकलन कर सकता है। ज़रा सोचिए कि मात्र दस साल बाद 120 करोड़ की आबादी में से कोई भूखा न हो। पचास करोड़ कार्यबल के लिए कुछ-न-कुछ कार्य हो। दस करोड़ बच्चों को उत्तम व पौष्टिक भोजन मिल रहा हो। तीस करोड़ विद्यार्थियों को उत्तम और एक समान शिक्षा मिल रही हो। पांच करोड़ कर्मचारी अच्छा वेतन पा रहे हों। पचास करोड़ कार्यबल में से तीस करोड़ खेती किसानी और इससे जुडे उद्यमों में लगा हो। और! ये सभी बौद्धिक रूप से स्वावलंबी हों। पंद्रह करोड़ संगठित श्रमिक और पांच करोड़ गृहकार्य में व्यस्त हों तथा पंद्रह करोड़ स्वरोजगार में लगे हों और सब सुविधाओं से लैस गांवों में रह रहे हों। पिच्छत्तर साल व उससे अधिक आयु के पंद्रह करोड़ वृद्ध सामाजिक चिंतन के साथ समाज को व्यवस्थित रखने में अपना योगदान दे रहे हों, तो यह देश स्वर्ग, जन्नत, Heaven से कम नहीं रहेगा। यह कोरी कल्पना नहीं है संभव है और यह होगा ही। हमारे पास शक्ति है हम समयावधि को घटा और बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह स्थिति अनुकूल सोच के साथ है। हम यदि प्रतिकूल दृष्टिकोण से सोचेंगे तो स्थिति सर्वथा विपरीत भी हो सकती है। हो चाहे जो पर सही दिशा में सही सोच के अनुरूप समाज का निर्माण करने में देश के प्रत्येक नागरिक का विमर्श लोकतंत्र की आवश्यकता है। पथप्रदर्शक आदरणीय श्री शेष राज पंवार जी

धर्मानुयायी 

किसी भी धर्म के अनुयायी यदि उस धर्म में हैं तो उसको परंपरागत तरीके से समझ कर। यद्यपि यह समझ हस्तांतरित होती है यदि अपने आपको आज से पांच सात सौ साल पहले की स्थिति मे यथावत रखना चाहते हैं या रख रहे हैं, तो वैश्विक विकास की दौड़ में उनका पिछड़ना निश्चित या तय ही है। कोई भी यदि अपनी सोच को संसार की उन्नत या फिर विकसित सोच के अनुसार परिवर्धित नहीं करेगा वह निश्चय ही पछताएगा। यह प्रत्येक धर्म, जाति, वर्ग और क्षेत्र क्या सभी पर लागू एक तथ्यपरक सत्य है। यह सही है कि मानवता के स्वाभाविक मानकों में कोई भी परिवर्तन स्वतः नहीं हुआ है और न ही करने की आवश्यकता है और यह भी कि प्रत्येक धर्म के मूल में मानवता के मौलिक गुण हैं, उनमें परिवर्तन की कोई आवश्यकता नही है पर गतानुगति लोक: तो मूर्खता ही है।- पथप्रदर्शक आदरणीय श्री शेष राज पंवार जी।

पर्यावरणीय अनियमितता

नित्यप्रति होने वाली वृक्षारोपण की सुर्खियां कुछ कुछ चिंता तो कुछ कुछ छद्म चिंता लिए होती हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वृक्षों का कटान अत्यंत दुर्दांत तरीके से किया गया है। इस सबका पर्यावरण पर घातक असर हुआ है और वातानुकूलकों, ताप नियंत्रकों तथा मोटर वाहनों के अंधाधुंध व अनियंत्रित प्रयोग से संसार का तापमान बढ गया है देश भर में वर्षा की असमानता इसको स्पष्टतया दर्शा रही है। इसी के परिणामस्वरूप यह स्थिति देखी जा रही है कि यमुनानगर, सहारनपुर, करनाल, शामली, सोनीपत और बागपत में तो अभी तक सामान्य वर्षा भी नहीं हुई है, जबकि उत्तराखंड, दिल्ली, मेरठ और मुजफ्फरनगर तथा 

हरिद्वार में सामान्य से अधिक वर्षा हो गई है। इसका कारण बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून की हवाएं तथा हिंद महासागर से पाकिस्तान पंजाब होकर आने वाली हवाएं आपस में टकरा रही है और एक दूसरे पर ही दबाव डाल रही हैं और देहरादून उत्तराखंड की ओर चली जा रही हैं। यह मेरा अनुमान है कि हो सकता है मौसम विभाग किसी और सिद्धांत की जानकारी दे, लेकिन यही हाल रहा तो किसानों की फसल को नुकसान होगा। अगले 15-20 दिन जब तक कश्मीर, पंजाब हिमाचल के तापमान में कमी नहीं आएगी यह समस्या बनी रहेगी ऐसा मेरा मानना है।

और! आज वृक्षारोपण ही नहीं एक कठोर जीवन शैली को अपनाने की भी जरूरत यदि है तो इसलिए क्योंकि इस पर्यावरणीय असंतुलन के लिए दोषी भी हम हैं। (१२.०७.२०२४)

बुद्धिमता के उपयोग का सर्वोत्तम समय

आरक्षण दिया गया तो क्यों? और ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न हैं जो प्रत्येक भारतीय के मनोमस्तिष्क में कुलबुलाते रहते है और यह अर्थ आधारित ना होकर जाति या फिर वर्ग आधारित क्यों है! जैसे प्रश्न तो मुख्य रूप से। विधायिका को सर्वोच्च मानकर राजनीति में अपना स्थान बनाकर इस जैसे अनेक मुद्दों को अपने बूते सुधार लेने जैसी अनेकानेक महत्त्वाकांक्षाओं वाले लोग भी यदि आज विफल होकर बैठ गए हैं तो उसके मूल में बुद्धिमता संबंधी अंतर ही है। और! यदि आरक्षित श्रेणी के आज के युवा अपने आपको बहुत होशियार समझते हैं तो यह उनका गंभीर मतिभ्रम है। सामान्य और आरक्षित श्रेणी की जातियों के मध्य मुख्य अंतर ही बुद्धिमता का है। आरक्षित जातियों में आरक्षण का विरोध करने वाले युवा इस व्यवस्था का विरोध इस आधार पर करते हुए मिलेंगे कि अब कोई भेदभाव नहीं है, जबकि आज भेदभाव सबसे स्पष्ट तरीके से देखा और समझा जा सकता है पर यदि शतुरमुर्ग की तर्ज पर देखें तो नहीं ही दिखेगा। सबको समान अवसर हैं उसको यदि ऐसा दिखता है तो उसके पीछे बुद्धिमता ही है जिसने ऐसा माहौल बना दिया कि हम ना देखें और ना ही ऐसा कुछ दिखाई दे। 

भारत क्या दुनिया भर के न्यायालय याचिकाओं के अनुपालन ही में सुनवाई करती हैं अर्थात् जैसी याचिका वैसी ही कार्यवाही और निर्णय। इससे हमको प्रतीत होता है कि उच्चतम न्यायालय भी यह पता नहीं लगा पाएगा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने कितने अपनों को प्रश्न-पत्र उपलब्ध कराया होगा। आखिर आरक्षित श्रेणियों में ऐसे कितने अधिवक्ता हैं जो कि "सत्यपरक कथनों का एकत्रण और उनको प्रमाणित करने की क्षमता रखते हों और समाज में व्याप्त हो चुकी अनंत कल्पित रीतियों से पार पाने में सक्षम हों।"

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी मसला हो या व्यापम उनका पूरा सच यदि जानना है तो याचिका ही ऐसी तैयार हो कि जानने की बाध्यता हो जाए तब इनका क्या किसी भी मसले का पूरा सच न्यायालय सामने लाने को बाध्य हो जायेगा। स्मरण कीजिए हाल ही का मामला जब चुनाव आयोग को रिक्वायर्ड जानकारी देनी ही पड़ी। यह सब जानते हैं कि UPSC में लिखित परीक्षा और अंतिम साक्षात्कार के अंकों मे समानता नहीं होती। यदि सहायक प्रोफेसर के पदों पर साक्षात्कार देने वाले सभी प्रत्याशी NFS किए जाते हैं तो निश्चित रूप से वह पद संघ के निर्देश पर अनारक्षित श्रेणी से भरे जाते हैं। सामाजिक सोच के व्यक्तियो को कष्ट इस बात का होता है कि समस्त आरक्षित श्रेणी ही नालायक सिद्ध की जाती है और आरक्षित श्रेणी के पात्र उसका सिर्फ लाभ लेना चाहते हैं उस व्यवस्था की अनिवार्यता और जरूरत को समझ उसके पैरोकार बनने में उनकी कोई रुचि यदि नहीं तो यहां भी आपको और हमको बुद्धिमता का अंतर दिखेगा। एक ओर बुद्धि कौशल से आरक्षण की व्यवस्था पर प्रश्न उठा दिए गए और उसी व्यवस्था से लाभान्वित होने वालों को उस व्यवस्था के विरोध में खड़ा कर दिया गया। आरक्षित व्यवस्था के ऐसे कितने बालक हैं जो अपने प्रमाणपत्रों पर विविध विद्यालयों में नौकरी कर एक करोड़ से भी अधिक रुपए अर्जित करने वाली लड़की के समान व्यवस्था कर पाए। (०९.०७.२०२४)

देश की अग्निवीर व्यवस्था पर एक फौजी के पिता के विचार 

अग्नि प्रज्वलन का आविष्कार मानव जीवन के लिए एक अद्भुत क्रांति थी,  लेकिन इसका दुरुपयोग उस काल मे ही आरंभ हो गया था जब प्रत्येक  आयोजन; शिशु के जन्म, अन्नदान योग्य बनने, विवाह, भूमि जोड़ने/ फसल बोने; के लिए अग्नि प्रज्वलन  के लिए विशेषज्ञ बुलाए जाने लगे और उसके लिए उनकी भोजन, वस्त्रादि संबंधी प्रत्येक मांग पूरी की जाने लगी। इसके बाद इसका सबसे बड़ा दुरुपयोग समाज में सूर्य और अग्नि कुल का विभाजन किया गया, जिसने विदेशी आक्रांताओं के लिए देश में आने का मार्ग प्रशस्त किया। तीसरा दुरुपयोग अब अग्निवीर के नाम पर किया गया। समाज के दुर्बुद्धि लोग संसार के प्रत्येक कृत्य को धन से आकलित किया करते हैं।

राष्ट्र के लिए समर्पण  की भावना व्यापारी को छोड़कर प्रत्येक नागरिक के मनमस्तिष्क में जन्मजात होती है। युवा मन में यह सर्वाधिक होती है। भारतीय सेना इस जज्बे को परखकर ही सेना में भर्ती करती है। तब ही शारीरिक सौष्ठव  के साथ साथ मानसिक भावना का परीक्षण भी किया जाता है।

भारतीय सेना के लिए की गई अग्निवीर व्यवस्था यदि जवानों के मध्य भय पैदा करती है तो इसलिए कि तत्काल ही सबसे बड़ी क्षति समर्पण की भावना में कमी के रूप में सामने आई है।

सेना जवानों को कठिनतम  परिस्थितियों से जूझने के लिए  प्रशिक्षण देती है जिसमें पूर्ण प्रशिक्षित होने के लिए निश्चित अवधि का प्रशिक्षण आवश्यक है और रेजीमेंट में पोस्टिंग होने के बाद भी सेना के जवानों का कौशल मानकों के अनुसार बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण सालों साल निश्चित अंतराल पर चलता रहता है जिसमें पूरी रेजीमेंट के जवान और अधिकारी सम्मिलित होते हैं। अग्निवीर की व्यवस्था से सेना की पूर्वप्रचलित व्यवस्था को तिलांजलि दे दी गई है जो बहुत घातक निर्णय है। इसके परिणामस्वरूप जवान देश के लिए,  सेना के लिए और स्वरक्षा के भी सक्षम नहीं रह पाएगा।

सेना में जवान केवल धन अर्जित करने के ध्येय से नहीं जाता। सैन्य सेवा से निवृत्त होने के बाद भी देश के लिए समर्पण की भावना सेना के सभी अधिकारियो में व सैनिकों मे स्वाभाविक रूप से रहती है। सभी नागरिकों को विदित है कि धन के लिए हमारे सैन्यकर्मी गलत कार्य करने को सामान्यतः तैयार नहीं होते हैं। इनको देश के लिए अपना जीवन न्यौछावर देने में ही नहीं दुश्मन को उसके अंजाम तक पहुंचा देने में भी गौरव की अनुभूति होती है। इसलिए  इनको देश के लिए जीवन देने पर केवल धन देकर इतिश्री करना एक नासमझी भरा अपरिपक्व और मूर्खतापूर्ण निर्णय है। 

ऐसे निर्णय करने वाले बालबुद्धि नहीं दुर्बुद्धी कहलाएंगे। 

एक विचारक पिता शेषराज पंवार

(०५.०७.२०२४)

विस्मित करने वाली निर्भीकता

बिहार में नित्यप्रति गिरते पुलों का बदहाल देखकर मुझको तो अपने आपको अभियंता कहने पर शर्म आने लगी है आखिर कितना समय लगा होगा वहां के अभियंताओं को कुछ भी न करने की मानसिकता की उत्पत्ति करने में। उस से भी आगे विचार का विषय यह है कि आखिर इन्हीं सड़कों और पुलों का उपयोग उनके परिजन भी तो करेंगे। बिहार सरकार और उसके अभियंता किस मिट्टी के बने हैं जो इस भयावह स्थिति में भी लीपापोती कर रहे हैं अपने सम्मान की रक्षा नहीं। 

सभी दुर्घटनाग्रस्त सेतुओं को देखने से यह स्पष्ट हो रहा है कि सभी पुल नींव की उचित गहराई न होने के कारण गिरे हैं अर्थात् Scour debth का सही अध्ययन नहीं किया गया है। यह और भी विस्मयकारी है कि नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया के निर्माणाधीन सेतु गिर जाते हैं और ऐसा एकाध वाकया नहीं पुल बार बार गिर जा रहे हैं। स्पष्ट है कि Well Sinking में लापरवाही या बेईमानी हो रही है या फिर D.P.R. बनाने वाली फर्म अपने कार्य को भली प्रकार नहीं जानती अर्थात् अक्षम है। ऐसा तब ही हो सकता है जब कार्य आवंटन ही नहीं निर्माण के प्रत्येक प्रोसेस में भ्रष्टाचार किया गया हो अन्यथा तो शासन कल्पना में भी ऐसा नहीं होने दे सकता। ऐसा करने की तो सोचकर भी सिहरन होती है। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि सीमेंट में फ्लाई ऐश की मिक्सिंग को लेकर उसकी निगरानी में होने वाली शिथिलता भी कई बार ऐसे वाकयों का कारण बन जाती है। यह जानकर सभी आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि प्योर ओपीसी सीमेंट सामान्य रूप से बाजार में उपलब्ध तक नहीं है। वैसे सामान्यतः किसी सिविल निर्माण या फिर सेतु के गिरने के मुख्य कारण के रूप में केवल सीमेंट-सरिया-बालू रेत की गुणवत्ता संबंधी बेईमानी नहीं अपितु कार्य कराने वाली संस्था की अकर्मण्यता अधिक होती है। गत तीस वर्षों में तकनीकी शिक्षा का निजीकरण और सिविल क्षेत्र के निर्माणों में निर्माणक सामग्री के घटकों में बदलाव को लेकर हो रहे प्रयोग इसके लिए विशेष रूप से उत्तरदायी हैं। वहां का शासन, प्रशासन और निर्माणकारी संस्थाएं यदि अभी भी चेत जाएं तो श्रेयस्कर है। और! देश के बाकी राज्यों के लिए तो ऐसी घटनाएं नज़ीर के जैसे हैं चेतने के लिए। (०४.०७.२०२४)

मानवीयता का सिद्धांत

समाज, सिद्धांत और समझौता सामाजिक परिप्रेक्ष्य में नि:संदेह सामान्य शब्द नहीं हैं। समाज का अर्थ समता या बराबरी है। इस ही को सामाजिक सिद्धांत कहा और माना जाना चाहिए। सिद्धांत को भी सामान्य भाषा मे अंतत: सिद्ध ही माना जाए। समझौता समझ से उत्पन्न निर्णय होना चाहिए। 

     दरअसल भारत में ये सभी क्या अनेक परिभाषायें बदलती रही हैं। वैसे तो संसार में भी बदलती रही हैं लेकिन शास्त्रार्थ से तर्क की कसौटी पर कसने का प्रचलन सिर्फ भारत में ही था। दूसरे वहां पर केवल आर्थिक कारण प्रभावी रहे और उसके लिए धार्मिक प्रपंच रचे गए। भारत में आर्थिक हित साधने के लिए अलग सिद्धांत प्रयोग किया गया जिसमें वर्ग को प्रतिष्ठित बनाया गया। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि यह सर्वमान्य है कि जिस वर्ग की प्रतिष्ठा होती है उसके समक्ष आर्थिक समस्या उत्पन्न नहीं होती। प्रतिष्ठा क्योंकि सम्राटों से युद्ध कर नहीं मिल सकती थी इसलिए धर्म को नियंत्रण में लेकर या अपनी व्यवस्था को धर्म बनाकर प्रतिष्ठित वर्ग बनाये गये। 

     अब आलोच्य विषय सामाजिक समझौता और सिद्धांत। समझौता समझ से ही होता है। अब जब समझ नियंत्रित हो गई और परिस्थितिजन्य समझौता लाचारी हो गई तो सामाजिक रूप से अमानवीय होते हुए भी असमझ के कारण समझौते करने पडते हैं और तब तक करने पड़ते हैं जब तक शिक्षा और मति नही आ जाती। 

     गत दो शताब्दी में शिक्षा आने से अमानवीय सिद्धांत की ही आलोचना आरंभ हो गई और आज समरसता की बात होने लगी। यथास्थितिवाद में यह अंतिम प्रयास है, परंतु समाज को तो समानता चाहिए यही लोकतंत्र की परिभाषा और मानवीयता का सिद्धांत भी है। (०४.०७.२०२४)

विश्वास अविश्वास

आत्मा के सिद्धांत में विश्वास करते-करते हम कहां तक पहुंच गए  हैं कि हमने परमात्मा बना लिए और  स्वयं में विश्वास करना बंद कर दिया। परिणामतः आज आप हमारे आत्मविश्वास की स्थिति को देख सकते हैं जो सदैव हमारी सफलता अथवा असफलता के मूल में होता है। यह गीता का ज्ञान है कि तुम कुछ नहीं हो मैं (परमात्मा) ही हूं, जो तुमसे सब कुछ  कराता हूं (द्रौपदी का चीरहरण भी और महाभारत भी) इसलिए जो कहता हूं करते जाओ। बस करते जाओ। उसके बाद आते हैं सब धर्मों के परमात्मा (गुरु) उन्होंने जो कहा या किया सब सही है। भले ही हाथरस जैसा लोमहर्षक हादसा हो जाए। उस पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता और वह अनंत काल तक सही रहेगा। आप चन्द्रमा पर जाओ या मंगल पर जाओ, पर सही वही है जो परमात्मा कह गए। उन्होंने अपनी आत्मा पर इतना  विश्वास नहीं किया होगा जितना उनके मानने वाले करते हैं और अब कलयुग या परमसुख युग में अपनेआप में विफल डाक्टर-इंजीनियर-मैनेजर-सिपाही सब ही गुरु बन रहे हैं। जैसे कि अनेक शीर्ष स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में विफल होने वाले कोचिंग इंस्टीट्यूट्स चला रहे। ठीक ऐसे ही बड़े-बड़े उपदेशक या स्वयंभू भगवान बन रहे हैं और बेचारी तथा स्वार्थ-निस्वार्थ को समझ पाने में अक्षम जनता दूर-दूर से उन गुरुओं को सुनने आती है तथा हाथरस जैसी घटना (एक गुरु आहूत समागम में अव्यवस्था के चलते मची भगदड़ में अपुष्ट समाचारों के मुताबिक डेढ़ सौ जीवात्माएं ईश्वर को प्यारी हुई हैं।) हो जाती है और फिर एक दिन परमसुख बांटने वाले आज के परमात्मा जेल में होते हैं, परन्तु उनके प्रबंधक परमात्मा के संदेशवाहक बनकर अपना परमसुख  प्राप्त करते रहते हैं और भक्तों को बांटते रहते हैं। सब विश्वास और अंधविश्वास का ही सम्मिश्रित कारनामा है जो हाथरस केदारनाथ  मक्का जैसी अनेक  घटनाएं निर्बाध निरंतर होती रहती हैं (तीर्थाटन में होने वाली वाहन दुर्घटनाएं तो सामान्य बात हैं)।

      आस्था आपकी है सरकार को तो बस मुआवजा देना है (और! वह भी अपनी पार्टी के बजट से तो देना नही) जबकि सारा प्रचार-प्रसार इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। यह सब लिखने का तात्पर्य यह अवगत कराना है कि भारत के संविधान में 'अंधविश्वास को बढावा देना' दंडनीय अपराध है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सब विधिक तरीके से हो रहा या किया जा रहा है? आखिर कब तक जलीकट्टी करते रहेंगे? (०३.०७.२०२४)

आकलन

एक बार महान दार्शनिक रोजर बैंक से प्रश्न किया गया कि कृपया बताएं कि 

"बुद्धिमान व्यक्ति की क्या पहचान  है?" 

रोजर बैंक ने कहा कि मैं मूर्ख की पहचान बता देता हूं। उसको जानकर  आप यह समझ लें कि शेष सब बुद्धिमान होते हैं। यह कहने के बाद उनके द्वारा मूर्ख की चार पहचान   बताई गईं -  

1. वह व्यक्ति मूर्ख है जो बलशाली के समक्ष स्थायी रूप से  नतमस्तक होता है। अन्यथा तो वह स्वयं बलशाली बनने के लिए प्रयास करेगा।

2. वह व्यक्ति मूर्ख है जो बदहाली को समझ ना पाए और उसमें भी संतुष्ट रहे (या कहता है कि यह सब ऊपर वाले के कारण है), अन्यथा तो वह खुशहाल बनने का यथासंभव प्रयास  करेगा। 

3. वह व्यक्ति मूर्ख है जो किसी भी कार्य या रीति-रिवाज  को इसलिए करे कि यदि सब कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं (गतानुगति लोक:), अन्यथा तो स्वयं की बुद्धि से परीक्षण कर (गौतमबुद्ध  के अनुसार) और सही समझने पर ही कोई कुछ करेगा।

4. वह व्यक्ति मूर्ख है जो किसी भी कार्य या रीति-रिवाज को सिर्फ इसलिए करता है कि यह तो पूर्वजों के समय से किया जा रहा है या परंपरागत तरीके से होता आ रहा है (आज मीठे के लिए  आटा-घी-शक्कर से पूडे बनाना नहीं तो मिठाई  बनाई  जा सकती है) समय और उपलब्धता के अनुसार गतिविधियों में परिवर्तन नही करता।

इसको ध्यान में रख हम समझ सकते हैं कि शेष सभी मनुष्य  बुद्धिमान होते हैं। हमें स्वयं अपना परीक्षण  करना चाहिए कि कहीं हम ऐसा कुछ तो नहीं कर रहे को हमको मूर्खों की श्रेणी में खड़ा कर दे। मूर्खता दर्शाने वाले किसी भी काम को करने से बेहतर आत्मावलोकन करना है। आखिर बुद्धिमान बनना और मूर्खता को प्रमाणित करने वाले कार्यों से बचकर रहना तो सभी का अधिकार है।

(०२.०७.२०२४)

मानव जीवन

सृष्टि की तथाकथित योनियों में मानव जीवन सभी मनुष्यों को सबसे प्रिय अर्थात DEAR होता है। जानने और समझने का यदि प्रयास करें तो इस मानव जीवन के चार महत्वपूर्ण चरण हैं, जो ऐच्छिक या अनैच्छिक तरीके से समान्यत: सभी को पूरे करने होते हैं।

    इनमें पहले चरण में सबसे महत्वपूर्ण योगदान अभिभावकों का होता है जिसमें वयस्क होने तक पालन-पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और योग्य बनाने की कार्रवाई लक्षित तरीके से होती है। इसमें मनुष्य भविष्य के सपने अर्थात् Dreams देखता और बुनता है। इसको जीवन का सबसे सुखमय भाग कहा जा सकता है क्योंकि यह अभिभावकों के नियंत्रण में होता है।

   दूसरे चरण में मनुष्य अपने प्रथम चरण में बुने गए सपने पूरे करने के लिए प्रयास अर्थात् Efforts करता है। यह जीवन का व्यस्ततम भाग है जिसमें व्यक्ति दिन-रात लगा रहता है। बहुधा जीवन साथी भी मिल जाने पर वह भी उसके सपने साकार करने में सम्मिलित हो जाता है और दोनों ही की मिश्रित जिम्मेदारी भी इस चरण में आ जाती है अर्थात् बच्चों का पालन-पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था और अपने और औलाद के लिए गृह निर्माण (सबसे कठिन और कष्ट दायक)। इस चरण में धन भी अर्जित करना होता है और व्यय भी करना होता है। अभिभावकों का दखल होता है परंतु स्वीकार्यता कम ही होती है क्योंकि जीवनसाथी और बालकों का दखल अधिक हो जाता है।

   इस क्रम में तीसरा चरण मनुष्य के प्रयासों की प्राप्ति अर्थात् Achievement का और उस संदर्भ में जीवन जीने का है। यह 45-50 वर्ष की आयु में आरंभ होता है और 65-70 वर्ष तक रहता है। इसमें द्वितीय चरण के परिणाम तो आने लगते हैं, परंतु नियंत्रण स्वयं के हाथ में नही होता है। इस चरण में मानसिक द्वंद्व सबसे अधिक होता है। यह भी कह सकते हैं कि इस चरण में हताशा, निराशा का भाव प्रबल होता है और सुख की अपेक्षा अधिक होती है। बहुत कुछ कर गुजरने की इच्छा हर वक्त बलवती रहती है पर क्षमता कम हो जाती है और प्रायः लोग केवल वक्ता बनकर रह जाते हैं।

       चौथा चरण 65-70 के उपरांत आता है जिसे वानप्रस्थ भी कहा गया है। इसी को अंग्रेजी में Rest या Restoration कहा जाता है। इसमें मनुष्य मूकदर्शक बनकर जीवन व्यतीत करता है। घर-परिवार में कोई सुनता नहीं है। तीसरी - चौथी पीढी के सपने प्रारंभ हो जाते हैं और बहुत संयम से रहना पड़ता है। 

       इस प्रकार हम जीवन के चार चरण D.E.A.R. को पूर्ण करते हैं। कभी-कभी हमारे विशेष प्रयास पूर्वजों एवम् समाज के सामाजिक प्रयासों से इस व्यवस्था में अंतर आ जाता है।

     गांवों में इसको सरल पर सख्त और Rude भाषा में पशु-पक्षी के साथ उदाहरण के साथ कह दिया जाता था कि पहले चरण में आप आदमी हैं और आनंद लेते हैं। दूसरे चरण में बैल हैं और कोल्हू में उसकी भांति चलते रहते हैं, तीसरे चरण में कुत्ते की तरह भौंकते रहते हैं और परिवारीजन सतर्क मात्र हो जाते हैं व चौथे चरण मे उल्लू की तरह रात में जागते हैं तथा दिन में सोते हैं एवं ताकते रहते हैं। कर कुछ भी नहीं सकते।

       ऊपर का सारा वृत्तांत आप और हम सब जानते हैं। इसको लिखने का एकमात्र उद्देश्य यह अवगत कराना है कि संसार के महान व्यक्तित्व गौतमबुद्ध, महावीर, ज्योतिबा फूले, विजय सिंह 'पथिक', डा. अंबेडकर ने दूसरे चरण मे ही अपना मार्ग बदल दिया और महान बने। जो दूसरे चरण मे दोनों नाव मे सवार रहे कुछ विशेष नही कर पाए। (०१.०७.२०२४)

समझना ही है सबसे उपयुक्त तरीका

नि:संदेह नियम, कानून और न्याय को विकसित  समाज  का प्रतिबिंब  कहा जाता है और नियम व कानून निर्माताओं में सर्वसमाज का प्रतिनिधित्व  नगण्य  होता है। यदि ऐसा प्रतीत होता है तो उसके मूल में कारण यह है कि ऐसे किसी भी प्रयास के लिए मानसिक व्यापकता की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होती है। सर्वसमाज को प्रतिनिधित्व देने भर से मानसिक व्यापकता की पूर्ति नहीं होती और ना ही यस मैन बन जाने से। 

ऐसा कहा जा सकता  है कि कानून कुछ असरदार  लोगों की सुख-सुविधा या शासन तंत्र की सुविधा के लिए  बनाए  जाते थे, लेकिन कानून बनाना और उसको क्रियान्वित कराने से लेकर उनको प्रचलन में लाने तक की प्रक्रिया में अनेक लोग जुड़ते हैं। अब उन सब लोगों की भूमिका और समझ ही उन नियम कायदों की असंगतता को संविधान संशोधनों जैसे प्रयासों के रूप में सामने आती है। इसके असंख्य उदाहरण  उपलब्ध हैं। यह तो स्पष्टीकरण रहा विधिक क्षेत्र का। इस सबके प्रभावस्वरूप समाज में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। यह समाज में वर्ग-विशेष की शक्तियों  में परिवर्तन से भी नियमित होता रहता है। हम जब भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर Survival of the fittest की समीक्षा करने का प्रयास करेंगे तो हमको लगेगा कि यह जंगल  का नियम है जबकि इसकी एक बेहद साधारण उदाहरण से समझा जा सकना संभव है। क्या किसी पहलवान से साधारण शारीरिकी वाला व्यक्ति कुश्ती लड़ सकता है? क्या संस्कृत के विद्वान के द्वारा किए गए मंत्रोच्चार की शुद्धता के साथ कोई भी आमजन उनको शुद्धता के साथ बोल सकता है। शासक और धर्माधिकारियों द्वारा शक्तियों या फिर अधिकारों का दुरुपयोग ठीक ऐसे है जैसे एक आम नागरिक सुविधा का दुरुपयोग कर ले। इसका व्यापक  प्रयोग किया गया है ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शक्तियों का प्रयोग व्यापक दायरे में हो रहा जबकि आम नागरिक द्वारा किया जा रहा दुरुपयोग सीमित क्षेत्र में। इसमें मानवीयता का पहलू नदारद लगता है, लेकिन नियम और विधि में मानवीयता की बात करना मतलब रियायत की अपेक्षा। 

संसार में लोकतंत्र  ही सर्वप्रथम समाज  के संचालन  के लिए  प्रयोग हुआ और राजनीति के नायकों ने शिक्षा के स्थापित नियम कायदों की समझ विकसित ना कर पाने के कारण सरलतम अस्त्र तलाशने आरंभ किए तो सबको समझाने का सरलतम माध्यम उनको बुद्धि हरना अर्थात बुद्धि का अपहरण ही लगा। और! उन्होंने किया। परिणाम पूर्वाग्रहों का प्रसार होता चला गया और बिलकुल मौलिक और प्राकृतिक Survival of the fittest को लेकर प्रश्न खड़े होते चले गए तथा पूर्वाग्रह हावी होते चले गये क्या वो कट्टरता में बदलते चले गए। आप वर्तमान में यह स्थिति स्पष्टतया देख और समझ सकते हैं।

बलशाली और कूटनीतिज्ञ राजा बनने लगे तो अपेक्षा भी तो ऐसे ही व्यक्ति की fittest होने के कारण की जाती है। सबसे बड़ी समस्या और आपत्ति सबको वंशबेल को राजकाज में स्थायी रखने में आती है जबकि हम स्वयं बिलकुल ऐसा ही करते हुए अपनी अग्रज पीढ़ी को आर्थिक रूप से सुरक्षित क्षेत्र प्रदान करने का हर संभव प्रयास करते हैं। 

     न्याय, अन्याय समेत विविध शब्द उनके सटीक प्रयोग से ही सही और उपयुक्त भावार्थ दे पाते हैं। अन्याय जैसे शब्दों को दरिद्र से संबद्ध कर देने के लिए विविध प्रयास हुए। बेशक ग्रंथों की रचना धार्मिक आवरण के साथ  प्रस्तुत  की गई व मनुस्मृति ऐसे ही कानूनों का पुलिंदा है और उसमें न्याय के नाम  पर अमानवता और  अन्याय का शक्ति प्रदर्शन है। 

लगभग दो हजार वर्ष तक विलुप्त रहने के बाद नियम कानून बनाने का अधिकार पुन: आम नागरिक के पास आ रहा प्रतीत हो रहा है। समाज की सामाजिक शिक्षा ही इसे पुनर्जीवित और स्थापित  करेगी ऐसी पूर्ण आशा है, लेकिन किसी आम नागरिक के लिए भी उतनी समझ की दरकार अवश्य होगी जो यह सिद्ध कर सके कि उसकी सोच इतनी व्यापक है कि विधान के प्रत्येक पक्ष का स्पर्श कर पा रही है। (३०.०६.२०२४)

सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट

सृष्टि में सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट एक प्राचीनतम और सिद्ध थ्योरी है। इसमें ऐसा कहना नितांत असंगत है कि "दूसरों का हक छीनना प्रवृति या फिर मानव स्वभाव है।" यह दरअसल अपरिपक्व मानसिक स्थिति है, जो कि बचपन की वह मानसिकता कहलाती है जिसमें खिलौने छीनने को द्वंद्व आरंभ हो जाता है और अपनी जिद को मनवाने का प्रयास। लेकिन अपना हक सुरक्षित रखना भी बचपन से ही आरम्भ हो जाता है और यह प्रयास जीवन भर चलता है। येन केन प्रकारेण अपने हक से अधिक ग्रहण करने और उस पर कब्जा बनाए रखने से समस्या तो उत्पन्न होती है लेकिन दृढ़प्रतिज्ञ होकर न्यायसंगत तरीके से ऐसी स्थितियों से पार भी पाया जा सकता है। सब कुछ निर्भर करता है इंसान की परिपक्वता और धीरज पर क्योंकि जब तक अपने कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान नहीं होता तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं। परिपक्वता के साथ शिक्षा अपने कर्तव्य और अधिकार का ज्ञान करा देती है। दरअसल अनधिकृत अधिकार किए हुए व्यक्ति एक वर्ग बनाकर शिक्षा से वंचित रखने के लिए अपने नियम भी बनाते हैं जिसके लिए धार्मिक भावनाओं, परंपराओं और आर्थिक विषमताओं का दुरुपयोग किया जाता है, परंतु इस सबके बावजूद भी उपयुक्त सामाजिक विकास को रोका नहीं जा सकता। अन्ततः सब हथकंडे निष्प्रयोज्य हो जाते हैं और इसमें प्रकृति भी अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। पीछे जो कुछ लिखा और कहा गया वह सभी आज भारत में होता दिख रहा है।

संविधान की महत्ता

संविधानसम्मत तरीके से देश में विधायिका को चलाने का श्रेय यदि जाता है तो कांग्रेस को। और! संविधान से इतर संविधान के प्रावधानों के अनुसार उसको चालाकी से दिखाने भर का/आभास कराने भर का बीजेपी को। वापस सत्ता में वापस आने की ललक में इन दोनों प्रतिद्वंद्वी दलों को सत्ता में आने के लिए विगत में की गई गलतियों को सुधारना एक आवश्यकता थी। अतः जनता के मध्य इन दलों के राजनीतिज्ञों ने जाकर स्पष्टीकरण देने के भरसक प्रयास किए जिनमें शिक्षा नीति में बदलाव और राजकीय संस्थानों का निजीकरण व दुरुपयोग, शिक्षा, कृषि और सामाजिक न्याय की अनदेखी करना आदि मुद्दे सम्मिलित थे। संवैधानिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने हुए व्यक्ति यदि सर्वोपरी हैं तो उनका अधिकार संपन्न होना भी। यह बिंदु विपक्षी दल पुरजोर तरीके से जनता के मध्य पहुंचा सकने में विपक्षी कामयाब रहे और लगभग बराबर की सफलता अर्जित कर पाए। संविधान एक चेहरे के पीछे अनंत अकर्मण्य लोगों का चयन कर देने का हिमायती बिलकुल भी नहीं। किसी भी स्थिति में निर्वाचन को चयन के तुल्य वरीयता संविधान ने दी है।

हम सभी को यह समझना चाहिए कि देश का बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर; ग्रीन हाईवेज या तीव्र गति से दौड़ने वाली रेलगाड़ियां नहीं हैं, अपितु जल प्रबंधन, सिंचाई हेतु नहरों का निर्माण, जल और वैकल्पिक साधनों से विद्युत का उत्पादन, उत्कृष्ट व अर्थपूर्ण शिक्षा, उत्कृष्ट सुगम सुलभ स्वास्थ्य तथा युवा संपदा का सर्वोत्कृष्ट उपयोग है। हम यदि उत्तम सड़क मार्गों का उल्लेख करें तो उनका भी उल्लेख हो जिन्होंने कि इन सड़क मार्गों की संकल्पना, डिजाइनिंग और निर्माण में प्रमुख भूमिका अदा की। ताकि उनका उपयोग देश की तरक्की की दिशा में हो सके। हमको समझना ही होगा विधायिका समेत समस्त चैनल्स की भूमिका को। (२८.०६.२०२४)

संसदीय चुनाव २०२४

वर्ष 2024 का हमारे देश का संसदीय चुनाव बेहद दिलचस्प रहा तो इसलिए कि सर्वोच्च सत्ता प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था आम जन के माध्यम से करा दी कि कोई भी राजनीतिक दल सफलता के मद में अहंकार से स्वमेव ही दूर रहे। इस आम चुनाव में यह लगभग तय हो गया था कि व्यक्ति या चेहरा अथवा पार्टी अहम् नहीं है, बल्कि पार्टी की विचारधारा अहम् है। न तो कोई जननायक है और न ही महामानव यह तथ्य नेताओं को जितनी जल्दी समझ आ जाए उनके लिए उतना ही अच्छा है। यदि सूक्ष्म अवलोकन करें तो पाएंगे कि कुछ हद तक शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियां एक विचारधारा पर चल रही हैं जो 1990/1992 के बाद बनी हैं, लेकिन पिछड़े वर्ग की कुछ जातियां आज भी धार्मिक भावना के साथ वोट करती हैं और इसी वर्ग की कुछ जातियां परस्पर प्रतिद्वंद्वी भावना के कारण प्रत्याशी की जाति के अनुसार वोट करती हैं। वस्तुस्थिति को देखते हुए यह भावना भी अगले पांच वर्ष में समाप्त हो जाने की प्रबल आशा है। सामाजिक न्याय के आधार पर बंटवारा (आरक्षण) अभी दस साल और चलने की संभावना है।

दिलचस्प यह है कि संविधान की शपथ लेना एक बात है और ली गई शपथ के अनुसार संविधान के प्रावधान लागू करना अलग बात। वास्तव में संविधान सृजकों ने इतने व्यापक मनोमस्तिष्क के साथ संविधान को आकार दिया है कि उसके समस्त प्रावधान अंतर्संबंध हैं।उनमें बदलाव का प्रयास उस प्रावधान को समूचे प्रावधानों से बिलकुल अलग कर देता है। 

अभी कुछ राजनीतिक दलों (सपा, कांग्रेस, रा ज द , डी.एम.के., टी.एम.सी.) को संविधान व उसके प्रावधानों की अहमियत का एहसास हुआ है। यही समझ उनको राजनीतिक सफलता दिलाने में सहायक हुई है। इसमें बी.जे.पी. से इतर किसी भी अन्य दल को चुनावी प्रबंधन के साथ चुनाव लड़ने का श्रेय किसी भी रूप में नहीं दिया जा सकता। इस सारे घटनाक्रम से यह सिद्ध हो गया है कि जनता इतनी मूर्ख नहीं है जितना कि नेता उसको समझने की भूल करते हैं। यह सिद्ध हो गया है कि साक्षर हो चाहे निरक्षर पर जनता नेता से अधिक समझदार है। यह राजनेताओं को भविष्य के लिए चेतावनी भी है। यदि चेत जाएं तो श्रेयस्कर होगा। (२७.०६.२०२४)

सब जानना जरूरी

सृष्टि में विविध क्षेत्र काम करने के लिए हैं और उन क्षेत्रों में स्वयं को आगे बढ़ाने के लिए कौशल विकसित करना होता है। ऐसा ही एक क्षेत्र राजनीति भी है जिसमें ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने राजनीति को अध्ययन कर करके आगे बढ़ाया।उन्होंने स्वयं को परिष्कृत किया, लेकिन उन्हीं में मध्य ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने राजनीति को सबसे सुगम समझकर उसको कुछ ऐसे सरलीकृत करने का प्रयास किया कि अनेक मौकों पर वह सब मखौल सा लगता है। ऐसे कुछ प्रयासों का राजनीतिक क्षेत्र को नुकसान उठाना पड़ा और धीरे धीरे कर्मठ लोगों का प्रतिभाग कम होता चला गया। राजनीति को सरलीकृत करने के एक ऐसे ही प्रयास में सिनेमा कलाकारों का राजनीति में पदार्पण दक्षिण भारत से हुआ। इन्हीं प्रयासों के मध्य दक्षिण के कुछ ऐसे कल्पनाशील सितारे भी थे जिन्होंने स्वयं राजनीति में पदार्पण किया और ये वहां के चमकते सितारे थे। दक्षिण भारत की अभिनेत्रियों में जयललिता, जयाप्रदा, हेमा मालिनी ने चुनाव जीतकर उत्तर भारत में नाम भर की राजनीति की, जबकि दक्षिण भारत में वो गंभीर प्रयासों के रूप में दिखती है। उत्तर भारत में अमिताभ बच्चन हों या शत्रुघ्न सिंहा, राजबबर हों या जया बच्चन उनकी राजनीति में क्षेत्र को चमत्कृत कर देने जैसा कुछ नहीं दिखा, जबकि उन्होंने अपने क्षेत्र में बहुत कुछ उल्लेखनीय ऐसा किया है, जो यादगार बन गया।

पहले दूरदर्शन फिर विभिन्न चैनल्स और अब OTT के आगमन से सिने कलाकारों की प्रभाविता कम हुई है, परंतु राजनीतिक क्षेत्र में अभिनय का पदार्पण अवश्य हो गया है। विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय करने वालों की राजनीति में गत दस वर्षों में बाढ सी आ गई है। इनमे महिला और पुरुष तो थे ही, अब किन्नरों का भी प्रवेश हो गया है। ऐसे लोगों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया के ट्विटर और व्हाट्सएप माध्यमों पर राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लोग सक्रिय हैं और इनकी संख्या में निरंतर वृद्धि तो होती जा रही है लेकिन गंभीर राजनीति कहीं पीछे छूटती जा रही है। यह आवश्यक नहीं कि कलाकार/अभिनेता/खिलाड़ी/प्रशासनिक अधिकारी को राजनीति का सामाजिक ज्ञान भी हो या स्वतंत्रता संग्राम अथवा संवैधानिक व्यवस्थाओं का ज्ञान भी हो। 

यथार्थ और डिजिटल मीडिया की स्वप्निल दुनिया से बाहर ऐसे लोगों को लाकर सच का सामना कराया जा रहा है तो उन लोगों की क्षमताओं की भी पोल खुल रही है। कहने को लोकतंत्र जागरूक हो रहा है, लेकिन जब प्रयास अपरिपक्व रखने की दिशा में हो रहे हों तो समाज यथार्थ में परिपक्व होने का अभिनय कर दे ऐसा तो नहीं चलेगा ना। (१८.०५.२०२४)

वर्तमान स्थिति

जनमानस शांत मन से आज के राजनीतिज्ञों और समाज को पंचशील (अहिंसा, सत्य वचन, चोरी, यौन संबंध और मद्यपान) पर यदि परखे तो पाएगा कि आज जो कुछ भी हो रहा वो न सिर्फ इसके बल्कि सब व्यवस्थाओं के विपरीत हो रहा और विपरीत क्या पूर्णतया ही विपरीत हो रहा है। बड़ी समस्या तो यह है कि हम इस सबको नगण्य मान निरंतर सहन करते चले जा रहे हैं, जबकि ना तो हमारी सभ्यता और न ही संस्कृति में ऐसा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम पौराणिक लेखन से प्रभावित होकर ऐसा कर रहे हों। यकीन मानिए कि दूसरे को गलत सिद्ध करने से या किसी और की गलती का उदाहरण देने से आप या फिर कोई अन्य निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता। 

आपको यदि दहेज निरोधक कानून या PMLA की तरह अपने आपको निर्दोष सिद्ध करना है तो कहीं ऐसा तो नही है कि पंचशील वाले बौद्ध/जैन धर्म के विरोध करने के फेर में हम यह अनैतिकता अपना रहे हों। (१५.०५.२०२४)

देश का यथार्थ

"यह देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का इस देश का यारों क्या कहना।"

ये केवल एक गीत की पंक्तियां नहीं इस देश का यथार्थ था। बौद्धिक दृष्टि से शानदार परंपराओं को निभाता हुआ। शास्त्रार्थ के माध्यम से बौद्धिक दृष्टि से उत्तम लोगों को समाज में स्थान और मान दिलाता। वक्त के बदलाव से शैक्षणिक और सामाजिक उन्नयन के समस्त उपागमों को राजनीति को सर्वोच्च वरीयता देते हुए हटा दिया गए। हितसिद्धि के प्रयास होने लगे और रविंद्रालय का कल का कार्यक्रम कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं था। यह कार्यक्रम अनुसूचित जाति की वर्तमान मनःस्थिति का प्रतीक था। 1994 से 2000 तक मैने यहां पर ना जाने कितनी बार बहुजन समाज के बुद्धिजीवियों को एकत्र कर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया। समाज की सोच का आकलन इस केंद्र पर भलीभांति हो जाता है जब भी वैचारिक दृष्टि से तर्कसंगत तरीकों से स्थितियों को समझने का प्रयास किया जाता है। राजनीति में छिपाव और दुर्भाव कुरीतियों के जैसे हैं तो ऐसे में राहुल गांधी की साफगोई और सवाल का सामना यह प्रदर्शित कर रहे है कि निश्चित रूप से भारत का भविष्य उज्जवल होगा। इस कार्यक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि समाज में वोटों के थोक व्यापारियों का अस्तित्व समाप्ति की ओर है। 

19 अप्रैल 2024 को ही समाज की मनःस्थिति का आभास हो गया था कल उसका ही सिर्फ प्रमाणीकरण था। भारत में मीडिया सिर्फ कुछेक आधिपत्य कर लेने वालों के हाथों में केंद्रित हो जाने के कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के टैग को हटवाकर ही मानेगा और मरते दम तक स्वामिभक्ति का पालन करेगा। वह इधर उधर घुमाएगा लेकिन यह नही कहेगा कि मोदी की विदाई के लिए किसी को श्रेय देना चाहिए तो वह अनुसूचित जाति और जनजातीय समाज है, जो भारत के जाग्रत समाजों में सम्मिलित है। भारत का अल्पसंख्यक तो अपने धर्म की रक्षा के लिए भा ज पा के खिलाफ वोट दे रहा है, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजाति तो समाज के भविष्य को देखकर भा ज पा के खिलाफ वोट दे रहा है। उसने यह सिद्ध कर दिया है कि समस्त समाज बिकाऊ नहीं है समाज के केवल दिशाहीन नेता ही बिकाऊ हैं और उनकी भी कीमत रेहड़ी पटरी पर बिकने वालों की सी हो गई है।

समाज में प्रगति के लिए समाज की सोच का ज्ञान सभी को होना चाहिए और वह हर कसौटी पर खरी उतरने वाली और वैज्ञानिक भी होनी चाहिए। (११.०५.२०२४)

मई दिवस

मई दिवस कब से मनाया जा रहा पर क्या वास्तव में यह दिन मजदूरों की खुशी, हर्ष या उल्लास का दिन बन पाया। यक्ष प्रश्न यह है! गुलामी की तरह जीवन भर के लिए तो नही बिक रहे पर साल, महीनों और प्रतिदिन के लिए तो बिक ही रहे हैं। विडंबना यह है कि श्रमिक रहते हुए सृजन अथवा नवाचार तो संभव ही नहीं हो पाता। इतना ही नही ये रोटी के लिए भी बिक ही रहे हैं और फिर भी रोटी नहीं मिल पा रही है। धर्म के नाम पर दुरुपयोग भी दर्शा रहा है कि कह सकते हैं कि दिमाग की बिक्री हो रही है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि सदैव ऐसा नहीं होगा और एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब बिना श्रम के खाने वाला सम्मानित नहीं होगा। और! वह दिन ही सही रूप मे मई दिवस के आशय को स्पष्ट रूप में व्यक्त कर पाने में सक्षम होगा।(०१.०५.२०२४)

मैं इतिहासकार नहीं पेशे से इंजीनियर हूं और पठन पाठन मेरी रुचियों में सम्मिलित है। अतः अपने अध्ययन के आधार पर चीन संबंधी कुछ तथ्य आपके समक्ष रखना चाहता हूं। 

वर्ष 1962 में चीन ने मैकमोहन सीमारेखा को नकारते हुए रिज लाइन के अनुसार बहुत बड़े भारतीय भूभाग पर कब्जा कर लिया। हमारी सेना की युद्ध के लिए तैय्यारी नहीं थी। चीन हमारा शत्रु देश हो गया। हूण काल छठी शताब्दी में चीन ने भारतीय आक्रमण से बचने के लिए ही चीन की प्रसिद्ध दीवार का निर्माण कराया था। सच तो यह है कि सभ्यता के विकसित होने में भारत चीन से बहुत आगे था। अशोक के काल तीसरी सदी ईसा पूर्व बौद्ध धर्म का फैलाव चीन में हुआ। इससे पहले चीन में बडे बडे राजवंश थे, जो कई कई शताब्दी तक राज करते रहे। चीन में कन्फ्यूशियस जैसे दार्शनिक भी हुए, जिनके लेखन को एक क्रूर शासक द्वारा नष्ट कराया गया। विडंबना यह रही कि वह उसको पूर्णतया नष्ट नहीं करा पाया और चीनी दर्शन पुन: स्थापित हुआ। चीन में मंगोलिया बहुत बडा भूभाग है और मंगोलियाई किसी भगवान देवी देवता खुदा गॉड को नहीं मानते थे। उनके लिए सर्वशक्तिमान आकाश था। सिकंदर जैसे योद्धा यहीं पैदा हुए। यही मंगोलियाई भारत में आकर मुगल बन गए और सत्ता के लिए उन्होंने इस्लाम को अपना लिया। 

चीन को लोहे की खोज (तेरहवीं सदी ईसा पूर्व ) का श्रेय दिया जाता है। स्थानीय राजाओं के काल में यहां मार्शल आर्ट भी विकसित हुई और कागज के निर्माण की कला भी चीन में विकसित हुई, जिसे आठवीं सदी में अरब आक्रांताओं ने अपने देश में पहुंचाया। चीन में ही चावल ओर चाय की खेती विकसित हुई। इस सबके पीछे निश्चित ही विकसित होने की दृढ़ इच्छा रही होगी जिसमें निश्चय ही मानव श्रम का पुरुषार्थ भी रहा होगा।

यह पृष्ठभूमि समझना वर्तमान भारत और चीन के तुलनात्मक अध्ययन के लिए जानना आवश्यक थी। इन परिस्थितियों में 1950 के दशक में दोनों देश राजशाही से मुक्त हो गए। इससे पहले अंग्रेजों ने भारत की तरह ही चीन का भी व्यापक शोषण किया था। उन्नीसवीं शताब्दी में चीन और जापान में व्यापक युद्ध हुए और जापान ने अनेक बार अपना विस्तार करते हुए चीन के वृहद भूभाग पर कब्जा किया। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत की स्वतंत्रता के समय चीन भारत से किसी भी रूप में आगे नहीं था, केवल भूभाग चीन के पास हमसे अधिक था। 

चीन हमारा शत्रु देश है लेकिन सत्य तथ्य यह है कि लगभग हमारे साथ ही राजशाही से मुक्त होने के बाद प्रगति की दृष्टि से वह हमसे बहुत आगे निकल गया है और उसने जिस तरह से अपनी जनसंख्या को उपयोगिता की दृष्टि से नियंत्रित किया है वह सब एक बिरला ही उदाहरण है। चीन के पास कृषि भूमि क्षेत्रफल भारत के कृषि भूमि क्षेत्रफल के आधे से भी कम है। इसी वर्ष हमारी जनसंख्या चीन से अधिक हो गई है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह हम से आधे क्षेत्रफल में हम से अधिक अन्न उत्पादन कर रहा है।  चीन खाद्य उत्पादन  में आत्मनिर्भर है। अब, यह कैसे संभव हुआ यह विचारणीय विषय है इसके साथ साथ अभी तक हमसे अधिक कार्यबल का सदुपयोग कैसे संभव हुआ? यह भी।

चीन में क्रांति के बाद दो क्रांतिकारी निर्णय लिए गए। इनमें एक था धर्म को विश्राम देने का और दूसरा पानी का प्रबंधन। धर्म को विश्राम देने के कारण दलाई लामा को तिब्बत छोड़ना पड़ा, जिसे भारत में शरण दी गई जो दोनों देशों में शत्रुता का आरंभ माना जाता है। दूसरा पानी का प्रबंधन जिसके लिए बड़ी बड़ी नदियों के ऊपर बांध बनाकर जल का सिंचाई के लिए प्रयोग करना, बाढ़ से बचाव और विद्युत उत्पादन। आवश्यक कुशल कारीगर और इंजीनियर तैयार किए गए और सबको बराबरी का दर्जा देते हुए सदुपयोग किया गया। सबको डांगरी पहनाकर साईकल थमाई गई। नतीजा चीन का 72% वर्षाकाल व्यवस्थित है, जबकि भारत का केवल 28% ही प्रयोग होता है शेष समुद्र मे अप्रयोज्य चला जाता है । चीन मे प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष विद्युत ईकाई उपलब्धता भारत से चार गुणा अधिक है। 

कुशल कारीगर और विद्युत उपलब्धता के कारण चीन में औद्योगिक क्रांति संभव हुई। सिंचाई के कारण फसलों की उपज (yield ) भारत से दोगुनी है। भारत मे निष्प्रयोज्य स्तरहीन शिक्षा के कारण राष्ट्रीय संपदा बोझ बन गई और चीन ने जनसंख्या का सदुपयोग कर उसको राष्ट्रीय संपति बना दिया ।

हम आज युवा राष्ट्र हैं, परंतु घटती जन्मदर के कारण अगले पंद्रह साल में हम भी चीन की तरह बूढ़े राष्ट्र बन जाएंगे। समस्या कार्यबल की होगी। अभी जिस जनसंख्या को हम बोझ बता रहे हैं वह उपलब्ध नहीं होगी। जरा सोचिए कि जब अभी उचित शिक्षित समाज अपने वृद्ध अभिभावकों को पालने में असहज हो रहा है तो जब अभिभावकों के साथ दादा दादी भी पालने होंगे तो समस्या कितनी विकराल होगी।

भारत सरकार ने गत दस वर्षों से सामाजिक आंकड़ों का प्रकाशन बंद करा दिया है इसलिए सभी आंकडे दस साल पुराने ही उपलब्ध हैं जिनमें आंशिक संशोधन ही संभव है।

कृपया व्यथित होकर सोचिए समस्या इतनी साधारण नहीं है। शेष फिर कभी। (२९ और ३०.०४.२०२४)

पूर्वाग्रह एक ऐसा नकारात्मक विचार है जिससे कोई भी नहीं बच सका है और जैसी सोच वैसी धारणा। मसलन भारतीय जनता पार्टी का सोचना है कि केवल मुस्लिम और ईसाई उनको वोट नहीं देते हैं और हिंदुओं का सवर्ण वर्ग 75% प्रतिशत, अति पिछडा वर्ग 60%, पिछडा वर्ग 45%, अनुसूचित जाति 30% उनको वोट देता है। 2019 में दिया भी है।

इस बार यदि राजपूत, जाट, अहीर, कुर्मी और सैनी किसान नाराज भी हो जाएंगे तो एक आकलन के अनुसार मत प्रतिशत 34% से कम होकर 32% हो जाएगा लेकिन धारा 370, राम मंदिर और मीडिया की सहायता से तथा विपक्ष को बदनाम कर इसमें 3-4% वृद्धि हो जाएगी और यह पार्टी 35% वोट लेकर 2019 से भी आगे चली जाएगी।

लेकिन यहीं पर एक चूक आकलन संबंधी हो गई जो चार सौ पार का जो नारा पार्टी ने अपने प्रोमोशन के लिए दिया था वही उल्टा पड गया और भारतीय जनता पार्टी के 34% वोट में लगभग 7% वोट अनुसूचित जाति का भी था जिसमें से 5% भयभीत हो गए कि संविधान संशोधन करने के लिए है यह नारा।

नतीजतन भारतीय जनता पार्टी के वोट में वृद्धि न होकर लगभग 7% की गिरावट आ गई जिसके परिणाम का एहसास भारतीय जनता पार्टी को हो गया है और अब कितना भी स्पष्टीकरण दीजिए समाज बदलने वाला नहीं है। अब मुस्लिम और अनुसूचित जाति में आपसी झगड़े होने का समय भी निकल गया है।

वहीं कांग्रेस का हृदय परिवर्तन भी समाज के बीच में जाकर उनसे मन की बात जानकर हुआ है। यदि मुस्लिम ईसाई धर्म का झुकाव कांग्रेस की ओर हुआ है तो सामाजिक सोच के कारण ही। लोकतंत्र में अपना भला-बुरा सोचने की समझ साक्षर और निरक्षर सब ही में है। अब भारतीय जनता पार्टी उनको कितना भी बदनाम करे इससे भारतीय जनता पार्टी का वोट बैंक बढने वाला नहीं है।

अब खीझकर ये जो भी कृत्य करेंगे वह क्षति में और वृद्धि ही करेगा। यह पूरा संसार रंगमंच को मनोरंजन मात्र मानता है। अतः प्रभाव क्षणिक होता है स्थायी नहीं। विविध किस्म के पूर्वाग्रहों से परे नागरिकों को अपनी और लोकतंत्र के भविष्य की चिंता है और होनी भी चाहिए। अब समय आ गया है कि जननेता यह जान और मान लें कि समाज उनसे बड़ा और विस्तृत होने के कारण आज के जन नेताओं से बेहतर सोचता है।

भारतीय जनता पार्टी या फिर कांग्रेस ने सब कुछ गलत किया है यह मेरे कहने का तात्पर्य नही है, लेकिन परिवर्तन संसार का नियम है और आज यथास्थितिवाद के प्रयास विफल ही होते हैं हजारों साल में सब उजागर हो ही जाता है। राजनीतिक क्षेत्र में कमियां रहीं इसीलिए जनता ने परिवर्तन कर पूर्व शासकों को विदा कर दिया था। अब जब अवसर मिला था कुछ नया करने का तो रास्ते अपरिवर्तित ही रहे, बल्कि गंदगी को अपने पाले में करके उसको ढांपने का प्रयास मात्र किया गया। परिणाम जनता को शून्य नजर आने लगा है। निराशा भाव चहुं ओर है।  (२७.०४.२०२४)

जब से तटस्थ भाव से सोचना या नजरिया निर्मित करना बंद हुआ है तब से अभी तक भी देश की पत्रकार बिरादरी बिंदुओं पर बात करती है। जैसे कि वर्तमान कम मतदान को लेकर चर्चा हो रही है और चिंतन का विषय लोकतंत्र की हानि ना होकर सत्ता को हानि पर केंद्रित है। हमारे सुधी पत्रकार बहुत बड़े परिवर्तन पर बहस न कर बहस कर रहे हैं कि जो मतदान हुआ है उसमें से कितने प्रतिशत ने 2019 के मतदान के विपरीत मत दिया है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही पार्टियों ने दूसरे चरण के मतदान के बाद समझ लिया है कि चार सौ पार का

नारा भारतीय जनता पार्टी के लिए भयंकर नुकसानदेह साबित हुआ है। भारतीय जनता पार्टी नारे से पीछे हट गई है और अब मोदी सरकार तीसरी बार कहना आरंभ कर दिया है, वहीं राहुल और प्रियंका बार बार कह रहे है कि यह नारा संविधान संशोधन के लिए ही था। 

चर्चा यह है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रमजीवी हैं और श्रम के लिए प्रतिदिन घर से बाहर निकलती हैं। इसलिए उनका प्रतिदिन अनंत लोगों के साबका पड़ता है और आजाद भारत में सर्वाधिक सामाजिक सोच इन जातियों में ही विकसित हुई है। इन जातियों ने अपने वर्ग के अनेक नेताओ का परीक्षण भी कर लिया है। पहले उनका परीक्षण किया और जिनके नाम के बाद में राम था और अब बीस साल से उनका परीक्षण कर रही हैं जिनके नाम में पहले राम है।

भारतीय समाज के लगभग एक चौथाई वर्ग को अशिक्षित और नासमझ समझना और इन वर्गों के राजनेताओं को इस समाज का सच्चा प्रतिनिधि मानना भयंकर भूल है। इस समाज की सोच इन प्रतिनिधियों से बहुत आगे और वैज्ञानिक है। इस बार के चुनाव मे इस वर्ग की सामाजिक सोच को मान्यता मिलेगी और आज से 68 साल पहले व्यक्त की गई।

बाबा साहब की व्यथा को समझकर यह समाज अपना मत दे रहा है। देर सबेर ही सही पर पत्रकारों को इसको केंद्र में रखकर चर्चा करनी ही होगी। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ जनता की जागरूकता होती है। यह तो स्पष्ट होकर रहेगा। (२८.०४.२०२४)

लेखक साक्षर समाज के प्रतिनिधि और अभियंत्रक हैं।

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