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गुरु अपरोक्षानंद जी से मिल सोलह अप्रैल बनी अविस्मरणीय तिथि

कब, कहां और कैसे किसी के जीवन में शुभ का आगमन हो जाए ना तो यह कोई जानता है और न कह सकता है, लेकिन कल सोलह अप्रैल को यह तब साक्षात महसूस किया गया, जब उलझन सुलझन पत्र के प्रतिनिधि को अंतर्राष्ट्रीय जीवन विज्ञान संस्थान (ऋषिकेश) के अग्रज गुरु अपरोक्षानंद जी महाराज का सान्निध्य मिला। मानव चिकित्सा में प्राणपण से संलग्न गुरुदेव का यह सान्निध्य भी एक अजब संयोग रहा। 

उलझन सुलझन पत्र प्रकाशन समूह की वार्षिक पत्रिका 'जीवन की अनुभूतियां' के लिए गुरुदेव से बातचीत विचाराधीन थी और गुरुदेव की व्यस्तता को दृष्टिगत रख उनसे हफ्तों पूर्व समय निर्धारित हो गया था आठ अथवा नौ अप्रैल २०२४ का, लेकिन दुर्भाग्यवश जीवन की अनियमित्तताओं के चलते कुछ व्यवधान उत्पन्न होने से गुरुदेव को उस सब से अवगत करा दिया गया। स्वच्छमना गुरुदेव ने स्थिति को समझा और पद्रह अप्रैल को उनकी सूचना दिल्ली जाने के संदर्भ में मिली और उलझन सुलझन पत्र के प्रतिनिधि को इस पुण्यात्मा का सान्निध्य मिलने की संभावना बलवती हुई और उलझन सुलझन पत्र के पंजीकृत कार्यालय पर भेंट निश्चित हुई।

अद्वितीय पुण्य के कार्य में संलग्न  स्वामी अपरोक्षानंद जी के सान्निध्य की कल्पना ही से प्रतिनिधि बेहद उत्सुक था। अतः कब, क्या और कैसे करना है विचार मानव मन को मथते रहे। गुरुदेव वर्षोंवर्ष से मानव मात्र को अपनी सेवाएं निरंतर  दे रहे हैं। पूज्य स्वामीजी महाराज शीत काल में योग साधना व योग-चिकित्सा शिविर के माध्य से जनसाधारण के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक कष्टों व संतापों को दूर करने के कार्य में संलग्न रहते हैं, जिसमें अनेक गंभीर रोग सम्मिलित हैं। उलझन सुलझन का प्रतिनिधि यह सब जान चमत्कृत भी था और अभिभूत भी, लेकिन सोलह अप्रैल को आई गुरुदेव की फोन कॉल से स्थान परिवर्तन की सूचना से सान्निध्य और आशीष तो मिला, लेकिन विविध कारणों से बातचीत संभव न हो सकी।

स्थान परिवर्तन के पीछे दूरस्थ आश्रम से निकलने में होने वाला स्वाभाविक विलंब कारण रहा। अतः मिलने का स्थान राष्ट्रीय राजमार्ग अट्ठावन सुभारती विवेकानंद विश्वविद्यालय के गेट के सामने का तय हुआ। और! यह सान्निध्य चमत्कृत विभूति गुरु अपरोक्षानंद जी महाराज तथा उनके प्रबंधक श्री जितेन्द्र जी से सांय ४.२४ बजे संभव हो सका। गुरु जी ने इस संक्षिप्त मुलाकात में नाभि चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित करते हुए आर्युवेद में नाभि की ऑयलिंग के फायदों का भी जिक्र किया। कई अन्य प्राचीन चिकित्साशास्त्र के ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। नाभि को हमारे शरीर की शक्ति का केंद्र बिंदु भी माना जाता है। इसलिए नाभि में तेल डालने से कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक परेशानियों से तत्काल राहत मिलती है। आजकल लोग पुराने देशी तरीकों को भूलकर हर परेशानी का इलाज कैमिकल्स में खोजने लगे हैं, जिससे परेशानियों में वृद्धि हुई है। 

मुलाकात के दौरान के दृश्य

स्वामी अपरोक्षानंद जी महाराज
प्रबंधक जितेन्द्र जी
उलझन सुलझन के अभिभूत प्रतिनिधि ने गुरुदेव का सान्निध्य का सुअवसर प्रदान करने के लिए आभार व्यक्त किया और बातचीत के लिए पुनः संभाव्य तिथि अठारह अप्रैल २०२४ रखी गई तब गुरुदेव के शब्द थे 'ठीक है, जो हरि इच्छा!' 
इस अवसर पर मासिक उलझन सुलझन के प्रतिनिधि ने गुरुजी महाराज को मासिक समाचार पत्र की कुछ प्रतियां भेंट कीं और यह नमन प्रेषित किया जो हम पर विशेष आशीष रखने वाले बड़े भाई श्री कृष्णदत्त शर्मा रचित है - 

श्री अपरोक्षानंद जी महाराज
नमन
स्वामी जी है नमन आपको नमन भाव स्वीकार करो। 
देकर के आशीष स्वयं का हम सब पर उपकार करो। 
नमन आपकी कर्मठता को नमन भाव उपकारी को।
जो योगिक महकी पुलवारी नमन उसी पुलवारी को।

ऋषिकेश ऋ‌षियों की नगरी जहां आपने डेरा डाला। 
जन-जन के कल्याण हेतु ही निज जीवन अर्पण कर डाला। 
योग चिकित्सा और साधना से करते उपचार महा। 
प्राकृतिक आहार चिकित्सा आदि का विस्तार महा।

मनोचिकित्सा चुम्बक काय करते प्राण चिकित्सा हो। 
आध्यात्मिक चिकित्सा में पाया आप सभी की आशा हो। 
आप हिमालय का गौरव हो लगे शोध में रहते हो। 
चिकित्सा में लेखन नित करते ग्रन्थों में रत रहते हो।

मन बुद्धि और तन में जब तक नहीं चेतना जागेगी। 
स्वास्थ्य हेतु तब तक मानव में नहीं भावना रागेगी।
अपने राष्ट्र हेतु करते हो पूज्य स्वामी जी कर्म महा। 
जन-जन का कल्याण मात्र ही जीवन हेतु धर्म कहा। 
कोटि-कोटि नमन।।
रचनाकार
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' 
उलझन सुलझन (मासिक) के लिए

16.04.24

इसका प्रस्तुत स्वरूप जिसको कल्पनाशील श्री मनोज चावला जी ने आकार दिया।

इस प्रकार गुरुदेव के साथ समाचार पत्र प्रतिनिधि की यह भेंट बातचीत ना हो पाने के बावजूद भी यादगार बन गई।




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