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स्पर्श - एक एहसास - ललिता पारिक (लेखिका व अध्यापिका, राजकीय प्राथमिक विद्यालय दुर्गापुरा-दूनी, ब्लॉक देवली, टोंक)

स्पर्श का संसार के सभी जीवों में बड़ा महत्त्व है। इंसान हो चाहे जानवर, स्पर्श को पहचानने की शक्ति सबको दी है भगवान ने। एक जानवर को भी जब कोई स्पर्श करता है, तब वह यह पहचान कर लेता है कि जो स्पर्श कर रहा है उसके मन में अहसास क्या है? उनके लिए अच्छा है या बुरा और क्या उसकी प्रकृति हमारे अनुरूप है? गाय के बछड़े को भी अगर सिर या पेट से सहलाते हैं तो वह गाय के नजदीक आ जाता है और अगर उसकी पीठ पर सहला दिया जाए तो वह लात मार कर उसका विरोध करता है। इसका मतलब है कि उसको स्पर्श का अहसास है कि वह अच्छा है या बुरा। जानवर तो उसके अनुरूप विरोध कर देता है लेकिन सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है कि इंसान इसका फैसला तो भलीभाँति कर लेता है, लेकिन उसकी शिकायत विविध कारणोंवश नहीं कर पाता है विशेषकर छोटे बच्चे। ग्रामीण परिवेश तथा डर-घबराहट के कारण भारत देश में पांच सालों में पॉस्को एक्ट में रजिस्टर केस में तीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है। भारत एक ऐसा देश है, जो विविधता में एकता का संदेश देता है। अपनी लोक परम्परा से परिपूर्ण है, जो समृद्ध और शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से विकास कर विकासशील देश के रूप में उभर रहा है, लेकिन साथ ही साथ बालिकाओं के साथ भी बढ़ रहे दुराचार के मामलों के आंकड़ों को देखते हुए उनकी सुरक्षा की चिंता भी बढ़ती जा रही है। एक ओर पूरे भारत में बच्ची को यौन शिक्षा देने की बात चल रही है, उसके साथ ही साथ स्पर्श की शिक्षा भी जरूरी होती जा रही है। क्योंकि अच्छे के अहसास एवं उसकी समझ के बावजूद भी विरोध नहीं करने के पीछे छिपा हुआ डर है लोकलाज का। सही मायनों में देखा जाए तो बच्चे सबसे ज्यादा शिकार अपने उन लोगों से हो रहे हैं, जिनके साथ वह सबसे ज्यादा अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं, विश्वास करते हैं। इस कारण से वे प्रतिक्रिया तक नहीं कर पाते हैं। किसी को संकोचवश बता भी नहीं पाते हैं। जो कि उनके बचपन से शुरू होती हैं और कहीं न कहीं युवा होने तक 'मी टू' जैसे विषयों को जन्म देती हैं। हमारा समाज विकसित हो रहा है, परंतु साथ ही समाज में ऐसी मानसिकता वाले लोग भी पनप रहे हैं, जो छोटे बच्चों और शिशुओं को अपना निशाना बना रहे हैं। इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोग प्रायः घर परिवार या आसपास वाले ही होते हैं। विद्यालय स्तर पर स्कूल कर्मचारी व साथ ले आने वाले ट्रांसपोर्ट के लोग ऐसे अपराध करते हैं। इसके लिए हमें बच्चों को प्रारम्भिक स्तर से ही गुड टच - बैड टच की शिक्षा देनी चाहिए। बच्चों को बताना चाहिए कि गुड टच का अर्थ ऐसा स्पर्श है, जिसमे बच्चा सुरक्षित और सुखद महसूस करें। यह स्पर्श बच्चों में मुस्कान पैदा करते हैं। जैसे माँ का गले लगाना, मां का नहलाना, दादा-दादी का बाहों में लेना, बड़ों का सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना, फिर खेलते समय दोस्त का हाथ पकड़ना। यह सभी स्पर्श बच्चों को सुरक्षित महसूस करवाते हैं। इसी प्रकार बच्चों को यह भी बताना चाहिए कि गुड टच की तरह ही बैड टच भी होता है। स्वयं की अनुमति के बिना या किसी गलत तरीके से जब कोई गलत जगह छूता है तो हमें उस स्पर्श का उसी समय विरोध कर उस व्यक्ति को रोकना चाहिए। इस प्रकार के स्पर्श से हमें बचना चाहिए। बच्चों को गुड टच बैड टच में अंतर सीखना अत्यन्त जरूरी है। वर्तमान समय में ऐसी घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, जो शोधों का कारण बन रही हैं। एक शोध के अनुसार 18 वर्ष की उम्र से पहले नौ लड़‌कियों में से एक तथा तरेप्पन लड़कों में से एक को यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। वहीं 90% मामलों में यौन शौषण ऐसे व्यक्ति के द्वारा किया जाता है, जो उनका करीबी या रिश्तेदार होता है। केवल 10% बच्चों का ही यौन शोषण किसी अजनबी के द्वारा किया जाता है। मेरा मानना है कि इन सबके पीछे कारण है यौन शोषण के बारे में बच्चों को जागरूक न किया जा सकना। वर्तमान समय में इसके प्रति बच्चे जागरूक हो गए हैं, परन्तु ग्रामीण परिवेश में माता-पिता अपने बच्चों से इस विषय पर बात करने में संकोच करते हैं। यही कारण है कि बच्चे स्पर्श को मूल रूप में उसके भाव के अनुसार समझ ही नहीं पाते हैं। एक शिक्षक होने के नाते हमारा यह कर्तव्य है कि हम बच्चों को ऐसे स्पर्श के प्रति जागरूक करें। विद्यालय में अपने बच्चों को किसी भी विषय स्थिति या किसी भी बुरे व्यक्ति का सामना करने के लिए अच्छे बुरे स्पर्श में अंतर सिखाएं। बच्चों को गुड टच, बैड टच को सिखाने के लिए हमें कुछ टिप्स अनुसरण करने पर मदद साबित हो सकेगी। बच्चों को गुड टच, बैड टच के बारे में जागरूक करना संवेदनशील कार्य है, इसके बारे में बच्चों को समझाना आसान नहीं है क्योंकि नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफॉरमेशन (एनसीबीआई) की वेबसाइट पर प्रकाशित शोध के अनुसार 4 से 5 वर्ष की आयु के बच्चे इस प्रकार का स्पर्श महसूस कर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इस आधार पर हमें 4 से 5 वर्ष की उस के बच्चों को गुड टच, बैड टच की जानकारी देना शुरू किया जाना चाहिए। एक शिक्षक और अभिभावक होने के नाते हमें निम्न बिंदुओं का ध्यान रखना चाहिए। बच्चों को गुड टच और बैड टच बताने से पहले जरूरी है कि शिक्षक, अभिभावक बच्चों के साथ दोस्त बनें। कई बार हम देखते हैं कि बच्चे माता-पिता की डाँट के डर से उन्हें कुछ नहीं बताते और बातों को छुपाने लगते हैं। ऐसे में उनके साथ यदि कुछ हो भी जाए तो वह अपने माता-पिता को इस तरह की बातों को नहीं बताते हैं।

स्पर्श का अंतर बताकर

माता-पिता या एक शिक्षक को बच्चों को स्पर्श के बारे में बताना चाहिए कि स्पर्श कितने प्रकार के होते हैं तथा कौन-सा स्पर्श हमारे लिए अच्छा और कौन-सा स्पर्श हमारे लिए बुरा होता है। इस प्रकार के स्पर्शों पर यदि बात की जाए तो बच्चा आसानी से गुड टच बैड टच के बारे में समझकर उसका विरोध कर सकेगा।

अपने शरीर के मालिक हम खुद हैं। हमें बच्चों को यह बताना चाहिए कि यह शरीर हमारा है और हमारी सहमति के बिना कोई भी व्यक्ति इसको छू नहीं सकता है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति हमारी अनुमति के बिना हमारे शरीर के किसी भी अंग को छूने का प्रयास करता है तो हमें उसका विरोध करना चाहिए और वहाँ से ना कहकर या तो उस व्यक्ति को धक्का देकर भाग जाना चाहिए तथा अपने माता-पिता को सारी बात बतानी चाहिए। अपने बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए। आज उन्होंने पूरे दिन में क्या किया, कहाँ गए, किन-किन व्यक्तियों से उन्होंने बात की। इस तरह की सारी बात करने पर बच्चे हम से घुल मिल जाते हैं और हमें सारी बात बताने में किसी भी तरह का संकोच महसूस नहीं करते हैं।















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