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लेखक की सहमति उपरांत संशोधित पाठ्य

आत्मविश्वास प्रगति के लिए अत्यावश्यक है तो अतिआत्मविश्वास उतना ही आत्मघाती भी। 'अबकी बार चार सौ पार' नारा उस अतिआत्मविश्वास ही का द्योतक है जो नैय्या ले डूबेगा, क्योंकि यह नारा लगाते लगाते अनजाने में ही सही पर अचानक से दूसरे की पिच पर खेला जाने लगा है ठीक ऐसे ही जैसे क्रिकेट में कोई फील्डर कैच लेने के लिए बाउंड्री से पार हो जाता है। 'अबकी बार चार सौ पार' नारा गढा तो छद्म उद्देश्य के लिए जनमानस को उत्प्रेरित करने और उसको दबाव में लेने लिए गया था परंतु जनमानस भी मूर्ख नहीं और न ही वर्षों राजनीति में खपा देने वाले विपक्षी। ये तुलनात्मक रूप से अधिक समझदार इसलिए हैं क्योंकि छद्म तौरतरीकों से ये गुरेज करते हैं।समाज में एक वर्ग सबसे बुद्धिमान है यह मानना और मनवाने का प्रयास करना भी बंद कीजिए। ऐसा कहना कि 'अबकी बार चार सौ पार' अपने आपको श्रेष्ठ बुद्धि का मानने वालों के अनुसरण ही का परिणाम है। इस विशालकाय समाज में जिसको भी अवसर मिलेगा वह आगे बढेगा। और! यही उपयुक्त तथा विधानसम्मत भी है। इसलिए विकसित राष्ट्र के लिए भारत में जन्म लेने वाले सभी भारतीयों को श्रेष्ठ शिक्षा स्वास्थ्य और प्रेम सद्भाव का वातावरण देकर विकसित कीजिए। उत्तम कीजिए विधानसम्मात तरीके से और बिना किसी पूर्वाग्रह के आपकी मदद करने वाले दूसरे वर्गों में भी स्वमेव मिलेंगे।

इं. शेषराज सिंह जी

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