साथियो! भावनाओंयुक्त बातें हमारे जीवन की गुप्त संगीतकार होती हैं, जो हमें अनुभवों के संगीतानुभव में निर्देशित करती हैं। वे ज्ञान देती हैं जिन्हें शब्द अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते। हमें अपनी भावनाओं को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वे हमारे मानव अनुभव की सच्चाई का समर्थन करती हैं। एकसाथ एक संवेदनशीलता, समझ और जुड़ाव की बुनाई करती हैं। इसलिए, हमें अपनी भावनाओं से बचने की बजाय, उन्हें हमारे अस्तित्व की असली शैली के रूप में गले लगाना चाहिए। उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने बात को लेकर निम्न रचनाएं तैयार की हैं।
प्रथमाँक
बात की तो बात ही क्या बात ही हृदय लुभाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात ही है जिसमें देखा नित नया मिठास होता। मिठास भी न आम होता हर तरह से ख़ास होता। विष भरा भी बात में ही इस जगत में दीख जाता। बात कुछ ऐसी भी होती जिससे मानव खीझ जाता। बात से ही बात बनती बात से ही बिगड़ जाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात से बातें निकलतीं बात का न अंत होता। कुछ मधुर बातों का सुख तो जीवन पर्यन्त होता। अनछुई बातों की मन में एक निराली गन्ध होती। गन्ध ऐसी ज़िन्दगी में न कभी भी मन्द होती। मधुर पल की बात कोई उर में रहती है लजाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात कुछ होती अमोली कोई भी न मोल होता। सब रसों का बात में ही एक नशीला घोल होता। बात कोई ऐसी होती उदर से न बाहर आती। वास हृदय में ही करती हर समय ही गुनगुनाती। बात से जो गाँठ पड़ती बात ही बस खोल पाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात ही सुमनों से कोमल बात ही होती नुकीली। बात में परिहास भी है बात ही होती चुटीली। किसी छोटी बात का भी दीखता बतंगड़ बनता। कभी कड़वी बात से ही प्यार तज मुक्का है तनता। बात ही काली कलूटी बात ही महफिल जमाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
बात हृदय तोड़ती गर, बात ही उर जोड़ती है। बात जब बढ़ती भयंकर कहीं का न छोड़ती है। कोई क्षण ऐसे भी आते बात न मुँह खोलती है। पर कभी बिन बोल के भी बात सब कुछ बोलती है। बात की महिमा अनूठी बात ही क्रन्दन कराती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
बात जो भी तोल कर के अपने मुख से बोलता है। वो ही इस पूरे जगत में प्रेम द्वारा खोलता है। बात खुशियों का खजाना और ग़म की पोटली भी। बात में होता वज़न है और होती खोखली भी। बात होती है दयालु जीत कर भी हार जाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
देश के नेता सदा ही बात मीठी ही बनाते। बात करके बात अपनी बहुत जल्दी भूल जाते। बात का विश्वास जिसने खो दिया जीवन में अपने। वो कभी भी ज़िन्दगी में कर न सकता पूर्ण सपने। बात सच्ची ही जगत में मान गौरव है दिलाती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
ईश से विनती है मेरी बात न मिथ्या हो कोई। बात ने प्रतिष्ठा पाई बात ने प्रतिष्ठा खोई। हम अनैतिक बात कोई इस जगत में ना परोसें। बात जो भी मुख से बोले हर तरह से उसको पोसें। बात कोई भी हमारी ना किसी को हो सताती। बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
द्वितीयांक
तुम अगर होती मेरे संग और ही कुछ बात होती।
बात पल दो पल न होकर बात दिन और रात होती।
यूँ तो बातें हर तरफ ही हर तरह की फैलती हैं।
किन्तु कुछ बातों से देखा भावनाऐं दहलती हैं।
कुछ हैं बातें मन सरोवर में नित ही तैरती हैं।
कोई न मिलता किनारा मन मसोसे लहरती हैं।
तुम अगर होती तो शोभित अधर पर हर बात होती।
बात पल दो पल न होकर बात दिन और रात होती।
बात तो होती हैं अब भी पर न मन की बात होती।
बात हँसती और हँसाती दीखती अन्तस् में रोती।
बात हो एकाकी अब भी मन के कोनों को सजाती।
और! नज़रों में जगत की साज मधुरिम सा बजाती।
तुम अगर होतीं तो धुन भी साज की कुछ और होती।
बात पल दो पल न होकर बात दिन और रात होती।
कौन जाने बात मेरी तुम हो सुनती या न सुनती।
कैसे पहुँचे बात मुझ तक ऐसे किसी पथ को चुनती।
बात वो ही बात होती बिन कहे जो बात होती।
रह न पाती बिन कहे भी बिन कहे नयना भिगोती।
तुम अगर होती धरा बात हर रंगीन होती।
बात पल दो पल न होकर बात दिन और रात होती।
बात जो करता मैं लिखता बात उसमें जोड़ती तुम।
छूट जाती बात जो भी बात न वो छोड़ती तुम।
बात जो लिखता मैं रहता तुम वज़ह हो खास उसकी।
बात का तुम ही हो जीवन और तुम ही साँस उसकी।
फिर भी तुम होती अगर तो बात खुल कर आम होती।
बात पल दो पल न होकर बात दिन और रात होती।
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