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समाज व्यवस्था परिवर्तन से ही शासन व्यवस्था परिवर्तन संभव-डॉ. महीपाल

इस समय पिछड़ा समाज जाति एवं धर्म में बिखरा पड़ा है। बिखरे समाज का और बिखराव उन्हें विभिन्न खेमों में बांटकर किया जा रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि 'ऐसा क्यों हो रहा है'। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस वर्ग की विभिन्न जातियां इसकी सामाजिक व्यवस्था बनाये बिना राज सत्ता प्राप्त करने की कोशिश कर रही हैं। जब नींव ही मजबूत नहीं है तो उस पर मकान कैसे सशक्त बन सकता है। इसलिए समाज को तैयार किये बिना शासन सत्ता की तैयारी कैसे हो सकती है? अब प्रश्न उठता है कि इस बीमारी का इलाज कैसे  किया जाये? पिछडा वर्ग; जिसमें एससी, एसटी व ओबीसी समाज शामिल हैं अपने को एक संगठित समाज न बना पाकर विभिन्न जातियों में बिखरा पड़ा है। उदाहरण के लिए संविधान (आ०जा०) आदेश 1950 के अनुसार 29 राज्यों में एस०सी० की 1108 जातियां हैं। इसी प्रकार 22 राज्यों में अनुसूचित जनजातियों की 744 जातियां हैं। ओ.बी.सी. की 5013 जातियां हैं। उपरोक्त जातियों के आधार पर इन समूहों की औसत जातिवार जनसंख्या की स्थिति इस प्रकार उभर कर आती है। भारत की जनगणना के अनुसार देश की आबादी 124.70 करोड़ अर्थात 125 करोड़ है। देश में एस.सी. की आबादी 16.6 प्रतिशत है। एस०टी० की आबादी 8.6 प्रतिशत है। ओबीसी की आबादी 52.01 प्रतिशत है। इस जनसंख्या प्रतिशत के आधार पर एस.सी. की आबादी 20 करोड 75 लाख, एस.टी. की आबादी 10 करोड 75 लाख है तथा ओबीसी की आबादी 65 करोड है। इन तीनों वर्गों की आबादी को उनकी जातियों से भाग करके जातिनुसार औसत आबादी प्राप्त होती है, जो इस प्रकार है एस.सी. की जातिनुसार औसत आबादी 1 लाख 87 हजार है। एस.टी. की औसत जातिवार आबादी 1 लाख 44 हजार है और ओ०बी०सी० की जातिवार औसत आबादी 1 लाख 30 हजार है।

उपरोक्त विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि इन तीनों समूहों का जातियों में बँटना इन्हें सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचा सकता। समाज में देखने से पता चलता है कि जो भी जाति कुछ समर्थ हुई व देश समाज के बारे में जानने लगी एकदम अपनी जाति का संगठन या एसोसियेशन बनायेगी। उनको यह पता नहीं है कि ब्राह्मणवादी शोषणकारी व्यवस्था यही चाहती है कि ये समूह वर्ण न बनकर जातियों में बंटे रहें और ब्राह्मणवाद को 'सपोर्ट' करते रहें। आगे बढ़ने से पहले आइए इस समस्या के दूसरे पहलू पर नजर डालते हैं। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार ब्राह्मण जिनमें भूमिहार भी शामिल हैं, की आबादी 5.52 प्रतिशत थी। जाहिर है कि अब तो यह और भी ज्यादा होगी, लेकिन इस प्रतिशत पर इस वर्ण की जनसंख्या 2011 की जनगणनानुसार 6 करोड 90 लाख है (6.90 करोड) है। हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था के अनुसार यह वर्ण सबसे ऊँचा है। दूसरे स्थान पर क्षत्रिय आता और तीसरे स्थान पर वैश्य आता है। सबसे बाद में शूद्र आता है। ब्राह्मण जातियों में बंटा न होकर एक है। चूंकि यह वर्ण जातियों में नहीं बंटा है तो इस वर्ण की जनसंख्या 6.90 करोड हो गई। 

उपरोक्त से स्पष्ट है कि चूंकि एस.सी., एस.टी. एवं ओ.बी.सी. विभिन्न जातियों में बंटा है जिसके कारण जाति की औसतन आबादी दो लाख से कम बैठती है। जबकि ब्राह्मण वर्ण की औसत आबादी 6.90 करोड़ है। इस स्थिति में पिछड़ा वर्ग कैसे इस वर्ण से प्रतियोगिता कर सकता है। दूसरे शब्दों में, कैसे अपनेआप को राज सत्ता में स्थापित कर सकता है। यह बहुत बड़ी चुनौती एस.सी., एस.टी. एवं ओ.बी.सी. समाज के सामने है। तर्क को आगे बढ़ाने से पहले एक तथ्य बताना उचित प्रतीत होता है। अगर विभिन्न वर्णों को देखें तो सबसे ऊपर का वर्ण अर्थात ब्राह्मण जागरूक है। सबसे नीचे वर्ण व्यवस्था से बाहर का वर्ग जो कभी अछूत था वह जागरूक है। वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे का वर्ण अर्थात् शुद्र जागरूक नहीं है जो ओ.बी.सी. का पर्यायवाची है। ब्राह्मण वर्ण जागरूक है, तो सत्ता में भी है। दलित जागरूक हुआ था मा. काशीराम के समय वह भी सत्ता में था और अब भी सत्ता में आने के प्रयास में है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वर्ण व्यवस्था की सीढ़ी में सबसे ऊपर का वर्ण एवं वर्ण व्यवस्था से बाहर का समूह अर्थात् दलित जागरूक है। दोनों अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जातियों को संगठित कर रहे हैं।

उपरोक्त तर्क को दूसरी तरह से रखते हैं। समाज को सत्ता के द्वार पर लाने के लिए तीन बातें समझने की जरूरत है। ये तीन बातें हैं-

१. सत्ता की मांग या आवश्यकता,

२. सत्ता के लिए इच्छा एवं

३. शक्ति या ताकत।

जिस वर्ण में सत्ता की मांग होगी उसके साथ 'विल पावर' भी होगी और वही सशक्त होगा और शासन करेगा। जो वर्ण उसके साथ जुड़े है वे भी सत्ता का मजा लेंगे। सत्ता को बरकार रखने के लिए वह समाज में विभिन्न 'हार्डवेयर' अर्थात् संरचनात्मक विकास एवं 'सॉफ्टवेयर' अर्थात् मानसिक विकास भी विकसित करेगा। ब्राह्मण वर्ण को सत्ता में रहने के लिए शक्ति दी आर.एस.एस. ने। समय के अनुसार उनकी सामाजिक संगठन व्यवस्था में भी मजबूती आ रही है। अर्थ यह है कि ब्राह्मणवादी वर्ण की मांग है सत्ता में रहने की इसलिए उसने अपनेआप को संगठित रखा है और अन्य को तोड़ा है। दूसरी ओर दलित वर्ग है, जिसकी सत्ता प्राप्त करने की मांग या आवश्यकता है। इसलिए दलित ने अपने  विभिन्न जातियों में बंटे समाज को इकट्ठा किया और उसे सफलता भी मिली है। इसलिए उत्तर प्रदेश में एक से अधिक बार इस वर्ग ने शासन भी किया है लेकिन शासन करते समय ठोस रूप में 'हार्डवेयर' एवं सॉफ्टवेयर' विकसित नहीं कर सके। इसलिए सतत रूप से सत्ता में नहीं रह सके।

उपरोक्त विश्लेषण से यह बात सामने आई कि अगर पिछड़े वर्ग को शासनकर्ता जमात बनना है तो उसे अपनी सत्ता की मांग को अधिक गहराई और गम्भीरता से लेना होगा। इसके लिए दलित वर्ग को ओ.बी.सी. में सत्ता के लिए 'इच्छा' को 'मांग' में परिवर्तन करना होगा।। इस समय ओ.बी.सी. कुंभकरण की तरह सोया हुआ है। क्यों सोया हुआ है क्योंकि वह हजारों जातियों में बँटा है। अगर उसकी सत्ता की इच्छा माँग में परिवर्तित हो जाती है तो वह शासनकर्ता जमात बन सकता है क्योंकि अगर ऐसा होता है फिर इसकी जतिवार औसत जनसंख्या एक लाख तीस हजार नहीं बल्कि 65 करोड़ होगी अर्थात वह जातियों में बंटा नहीं होगा। वह सिर्फ एक वर्ण होगा। वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत जो सामाजिक ढाँचा है उसको गांवों में मटकों की 'जेठ' से समझा जा सकता है। इस 'जेठ' में सबसे नीचे बड़ा मटका होता है। उसके ऊपर उससे छोटा मटका रखा जाता है। उसके ऊपर उससे भी छोटा मटका रखा जाता है और उसके ऊपर उससे भी छोटा मटका रखा जाता है। इस प्रकार ये चार मटके हैं जो चारों वर्णों की स्थिति को स्पष्ट बताते हैं। सबसे नीचे जो बड़ा मटका है, वह ओ.बी.सी., दलित व आदिवासी समाज है। उसके ऊपर वर्ण वैश्य है, उससे ऊपर क्षत्रिय वर्ण है और सबसे ऊपर ब्राह्मण वर्ण है। यह सबसे नीचे का मटका सदियों से ऊपर के तीनों मटकों का वजन झेल रहा है। कारण है अज्ञानता। अगर नीचे के सबसे बड़े मटके को हटा दिया जाये तो ऊपर के सारे मटके धडाम-धडाम कर नीचे गिर जायेंगे। अतः सबसे नीचे के कुंभकरण रूपी मटके को हटाना है। इस मटके ने जैसे ही अंगड़ाई ली सारी वर्ण व्यवस्था नीचे गिर जायेगी। लड़ाई करने की तो जरूरत ही नहीं पडेगी। इसलिए प्रयास करने हैं तो इस मटके को हटाने के लिए करने हैं।

अतः ओ.बी.सी. की सत्ता के प्रति 'इच्छा' को 'मांग' में बदलना है। इस कार्य को दलित समाज ही कर सकता है, क्योंकि उसे समाज व्यवस्था की समझ है।

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