परिचय
साथियो! आज हमारे मध्य एक राजनीतिक-सामाजिक व्यक्तित्व है। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने राजनीतिक दल के संरक्षण में कार्य करते हुए भी अनेकानेक कार्यकर्ताओं की मदद कराई और राजनीतिक जनप्रतिनिधियों के माध्यम से जनहित की शासकीय प्रचालित योजनाओं से कार्यकर्ताओं को लाभान्वित कराया। इतना ही नहीं ऐसे कार्यों में पात्र कार्यकर्ता के समक्ष उत्पन्न होने वाली दुश्वारियों का निवारण भी संकटमोचक की तरह किया। इसके अतिरिक्त जिन जिन दायित्वों को उनको सौंपा गया उनको उन्होंने परिमाणात्मक रूप से करके दिखाया। आइए आज मिलते हैं मुजफ्फरनगर के भटौड़ा ग्राम निवासी श्री अशोक चौधरी जी से।
बातचीत
प्रश्न १. एक राजनीतिक व एक सामाजिक कार्यकर्ता में आप क्या अंतर पाते हैं?
उत्तर - "भारत में लोकतंत्र है जिसमें दलगत राजनीति है तथा राजनीतिक कार्यकर्ता अपने दल के घोषणापत्र से बंधा होता है। यही कारण है कि यदि उसके दल में जनता का कुछ अहित भी हो तो वह खुलेआम अपने दल का विरोध नहीं कर सकता। यदि वह ऐसा कुछ करेगा तो इसको उसकी अनुशासनहीनता माना जायेगा। कमी को सार्वजनिक रूप से बताना विरोधी दल का काम है। इसके ठीक विपरीत एक सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे किसी भी कार्य के लिए, जो गलत है, का विऱोध करने के लिए स्वतंत्र है। इन दोनों में यही बेसिक अंतर है।"
प्रश्न २. एक कार्यकर्ता बहुत अपेक्षाओं के साथ कोई प्रयास करता है। ऐसे में कार्य न होने पर अथवा अपेक्षा पूरी न होने पर उसकी मनःस्थिति पर क्या प्रभाव होता है?
उत्तर - "किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में कार्य संवैधानिक दायरे में होते हैं। अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता राजनीतिक दबाव में कार्य कराना चाहते हैं, जबकि दबाव से बहुत सीमित और हल्के कार्य हो सकते हैं। बड़े लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को लिखित में चलना पड़ता है। इसमें एक विशेषता यह है कि राजनीतिक दबाव किस बिंदु पर बनाया जाना चाहिए इसका ज्ञान होना भी बेहद जरूरी है। अन्यथा सब बेकार जाता है और निराशा ही हाथ लगती है।"
प्रश्न ३. अशोक जी आप एक वार्षिकी भी तैयार करते हैं और उसमें लेखन के लिए आपको जब अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलते आप अपनी तब की अनुभूति बताइए?
उत्तर - "कोई भी पत्र अथवा पत्रिका निकालने के दो मकसद होते हैं। एक तो वर्तमान में चल रहे घटनाक्रम की सूचना जनमानस को देना और दूसरा अपना विचार जनमानस में देना। अपना विचार देने के लिए डॉक्टर अंबेडकर, महात्मा गांधी, विजय सिंह पथिक, बाल गंगाधर तिलक, आर.एस.एस. ने अपने पत्र-पत्रिका निकाले। मैंने भी अपनी वार्षिकी पत्रिका देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों का चरित्र आम जनमानस तक पहुंचाने के लिए निकाली है। इसीलिए आज तक कोई और कैसी भी निराशा नहीं।"
प्रश्न ४. हाल ही में आपके निकटतम दो परिजन साथ छोड़ गए तो इस विछोह की स्थिति में क्या आप अपने भावों से अवगत कराएंगे?
उत्तर - "जन्म और मृत्यु के बीच के समय को ही जीवन कहा जाता है। अपने प्रिय लोगों के जाने का दुःख हर इंसान को होता है, परंतु असली दुःख का कारण वह होना चाहिए कि जो सेवा हम अपने किसी भी प्रिय को जीतेजी दे सकते थे वह हम नहीं दे पाए। यदि आपने और हमने अपने प्रिय या संबंधी का जीतेजी ध्यान रखा है तो हम ईश्वर की और अपनी नजर में दोषी नहीं हैं। हमें अपने सगे संबंधी के लिए जो कुछ भी करना है उसके जीतेजी ही करना है। मृत्यु के बाद तो जो कुछ भी किया जाता है वह खुद के लिए है।"
प्रश्न ५. राजनीतिक हो या सामाजिक परिवेश आपको जिस अपेक्षा के साथ कार्य दायित्व सौंपा गया आपने सदैव पूरा किया तो जब जब आप दायित्व की अपेक्षा के अनुसार पूर्ति कर देते हैं तो कैसी अनुभूति आपको होती है?
उत्तर - "मेरा मानना है कि जब भी आप किसी के दुःख को दूर करने का कारण बनते हैं तो उस जैसे सुखद अनुभव को बयान करना मुश्किल हो जाता है। परंतु किसी का भी भला करने से पहले यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वह उसका पात्र है भी कि नहीं। कुपात्र पर की गई कृपा या मेहनत का फल दंड के रूप में भोगना पड़ता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।"
प्रश्न ६. आपके अब तक के सामाजिक जीवन में ऐसा कौन सा कार्य या अभियान था जो आपको सर्वाधिक कठिन लगा और क्यों?
उत्तर - "अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्य को दूसरों को समझाना, क्योंकि समाज में समर्थन अच्छे और बुरे कार्य के आधार पर नहीं अपने और पराए तथा लाभ और हानि के आधार पर ही मिलता है। महाभारत में कौरवों की ओर से ग्यारह अक्षहीनी दल तथा पांडवों की ओर से सात अक्षहीनी दल इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि लोग न्याय अन्याय का संज्ञान लिए बिना ही लाभ को महत्व देते हैं। किसी भी लोकतंत्र में कार्य संवैधानिक दायरे में होते हैं। अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता राजनीतिक दबाव में कार्य करना चाहते हैं, जबकि दबाव से बहुत सीमित और हल्के कार्य हो सकते हैं। बड़े लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को लिखित में चलना पड़ता है। इसमें एक विशेषता यह है कि राजनीतिक दबाव किस बिंदु पर बनाया जाना चाहिए इसका ज्ञान होना भी बेहद जरूरी है। अन्यथा सब बेकार जाता है और निराशा ही हाथ लगती है।"
प्रस्तुति


अशोक चौधरी जी का जीवन निष्कलंक, निस्वार्थ एवं एक अच्छे समाजसेवी कर रहा है मैं इनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं
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