अभिभावकों का बच्चे के विकास के हर स्तर को समझना बहुत आवश्यक है। वह एक इन्सान है, जिसे अभिभावक को ही आकार देना है, अभिभावक ही उसे एक सांचे में ढालेंगे। उस बच्चे के विकास के साथ-साथ अभिभावकों का भी विकास होता है, वे भी परिपक्व होते हैं। बहुत से पिता यह मानते हैं कि बच्चों को बड़ा करने में, उन्हें सही शिक्षा देने में, परवरिश करने में उनकी कोई भूमिका या जिम्मेदारी नहीं है, वह सब कुछ मां के हाथ में छोड़ देते हैं।
यह बात बिलकुल गलत और एक बड़ी चिंता का विषय हो सकती है। हर बच्चा ईश्वर की रचना है, जिसमें दिल और आत्मा, दोनों का वास होता है। कभी भी अपने बच्चे को यह नहीं जताना चाहिए कि आपको उनकी जरूरत नहीं है या उनकी चाहत नहीं है। आपको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर बच्चा दूसरे से भिन्न और अपने आप में खास होता है। सभी के अपने शौक, अपनी खूबियां, अपना अलग व्यक्तित्व होता है। आपको सिर्फ उनकी खूबियों और कौशल को पहचानकर उसे आगे बढ़ने का अवसर, प्रेम और मार्गदर्शन देना है। आपको उन्हें भविष्य की एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना है, ताकि उन्हें कभी किसी से हार न झेलनी पड़े।
(दैनिक अमर उजाला ११.०४.२०२४ अंक से साभार)
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