आज प्रातः का सृजन स्वरचित रचना प्रिय मित्रों के नाम। समाहित किए है जीवन में दौलत की भूमिका को।
बगैर पैसे के मैंने देखा है, बहन घर नहीं आती,
छत से पक्षियों की आवाज तक नहीं आती।।
मैंने देखा है, दोस्त को पहचानने से इंकार कर देना,
कैसे कह दूँ, सच्चाई व उसूलों पर आंच नहीं आती।
बगैर पैसे के मैंने देखा है, बहन घर नहीं आती।।१।।
पर कतरने का शौक जमाने को कितना ही हो,
हमारे उड़ने की तो फिर भी चाह नहीं जाती।
भाई को मेरे हिस्से की जमीं भी जो चाहिए,
और! उसके कहने भर से मेरी जां नहीं जाती।
बगैर पैसे के मैंने देखा है, बहन घर नहीं आती।।२।।
या मेरे मौला, तू ही एक रहमो करम है,
कोई जो चाहे, पर मेरी दरियादिली नहीं जाती।
'अल्हड़' यारा रोने की तो कोई बात नहीं है,
लोगों के जहन से, कभी शिकायत नहीं जाती।
बगैर पैसे के मैंने देखा है, बहन घर नहीं आती।।३।।


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