"रकम"
अजब गजब रकम चक्कर,
सब जन पड़त इस चक्कर।
जगत सब बक बक यह जड़,
जन अर्जन इस कई जतन कर।
यह सब कर्म करत सफल,
जन करत जतन हर पल।
जन गलत कर्म न करत शर्म,
जन घट भर कर कर अधर्म।
अर्जन कर रकम पर रख जन,
सद आचरण कहत संतजन।
सत्कर्म करत जन रहत स्वर्ग,
गलत अर्जन धन गमन नरक।
जन रख स्मरण एक कसम,
गलत कर्म कर अर्जन न रकम।
मन रख हरदम स्वयं का सम,
जन रकम न रहत अंत समय।
हंसराज हंस
टोंक, राजस्थान।
"नष्ट जंगल"
नष्ट जंगल पड़त गजब असर,
नर न रख इस कर्म कसर।
कटत रहत कई दरख्त सतत,
सतत जंगल नष्ट भष्ट समस्त।
वन घटत रहत अनवरत,
गलत पवन हरदम चलत।
अब जब कम पड़त जंगल
तहस नहस समस्त मंगल।
सब दरख्त कहत यह वचन,
मत कर जन यह नटखटपन।
सतत बढ़त रहत भंयकर दर्द,
हर वर्ष बढ़त कई कई मर्ज।
इस समय पर कर अब मनन,
रख सरल सहज तन व मन।
हंस कहत सब दर्द एक हल,
जन सत्कर्म आचरण पर चल।
हंसराज हंस
टोंक, राजस्थान।
"एक शहर"
शहर रहन सहन गजब,
अलग-अलग सब मस्त।
रहत सब एकल कपल,
सब रहत हरदम व्यस्त।
जब अवसर शहर गमन,
तब मन रहत अलग थलग।
गरम पड़त शहर जबरदस्त,
पर उदर भर गमन अवश्य।
शहर जन घनत्व बढ़त सतत,
शहर गजब गजब यंत्र रहत।
धड़-धड़ गड़-गड़ कर हरदम,
ईश्वर न अमन तन मन शहर।
हंसराज हंस
टोंक, राजस्थान।
"अवसर"
जगत अंदर आए कई अवसर,
पकड़ इन अवसर कर्म कर।
अग्रसर हर नर कर्म कर तब,
सफल बन नव पहल कर।
करत जन-जन यह जतन,
अनवरत रह कर तन मन।
हर पल आत कई अवसर,
इंसान न कर मनन उन पर।
समय पर पकड़ इंसान अवसर
तब करत यह जबरदस्त असर
ईश्वर हर जन रक्षक हर पल,
पर यह न समझ हर जन।
करत गलत कर्म सतत जन,
न रहत स्वस्थ तब हरदम।
तन मन रहत हर समय गम,
हंस कहत हर समय रहत सम।
हंसराज हंस
टोंक, राजस्थान।
"बस"
गरड़ गरड़ चलत यह बस,
बज गए दस आई यह बस।
बस अंदर कदम रख रतन,
डर मत जतन कर ऊपर चढ़।
इंजन इस बस अज़ब गज़ब,
यह बस चलत हर शहर शहर।
समय पर न चलत यह बस,
बस चलत सब पथ हर पहर।
पहल पहल आई आज बस,
सब स्मरण करत इस बस।
सब जन गमन करत इस बस,
मस्त सब जन कर सफ़र बस।
हंसराज 'हंस'
टोंक राजस्थान।
"पत्र"
अजय अब उधर मत चल,
इधर आकर यह पत्र पढ़।
पत्र पढ़कर अब घर चल,
इधर-उधर मत टहल।
अजब गजब यह पत्र,
खत सहज कर रख।
कलम अक्षर अब उत्तर,
मन वचन इस पर रखकर।
पत्र गज़ब करत तब असर,
जब आचरण गलत न कर।
खत एक एक शब्द जबरदस्त,
कई सबक ग्रहण करत अब।
मन ईश्वर मनन रहत हरदम,
तन मन मत रख अब गम।
सतत करत अब ईश्वर भजन,
तब मस्त रहत यह तन मन।
हंसराज हंस
टोंक, राजस्थान।
"बरगद"
बरगद पर चढ़कर ,
खग रहत गदगद।
फल चखकर रहत मस्त,
न रहत वह अस्त-व्यस्त।
पथ पर चलकर जन जब,
थककर ठहर करत तब।
आमंत्रण करत सब जन,
आनंद करत तन मन।
पवन चल जब सर सर,
बरगद करत फर फर।
खग उड़त इधर-उधर,
कहत सब इस खग घर।
इस पर चढ़त सब झटपट,
सब जन कहत इस वट।
लख-लख कर जतन,
जब लगत यह रत्न।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"स्वस्थ तन"
अनवरत कसरत कर,
सतत अध्ययन कर।
व्यसन लत मत रख,
स्वस्थ तन मन रख।
मन अंदर रख हसरत,
कर सत्कर्म अनवरत।
लक्ष्य पर सतत चल।
स्वस्थ तन यह हल।
कर मदद हरदम सब जन।
उज्जवल वसन रख तन,
प्रथम आनंद स्वस्थ तन।
हरदम प्रसन्न रख मन।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
हंसराज जी के एक साथी कवि मुकेश कुमावत मंगल का प्रयास (स्वरचित मौलिक रचना)
"चल बढ़"
चल-चल , बढ़-बढ़,
चल उठ, पढ़-पढ़।
समय व्यर्थ न कर,
सब कर्म समय पर कर।।
लक्ष्य पथ पर अनवरत चल।
चल चल ....1.
सत्य वचन पर चल,
असत्य पर मत मचल।
तन स्वस्थ,मन स्वच्छ,
मत कर,मत कर नकल।।
चल चल ....2.
जगकर कर,सफल जतन,
उठकर कर,भगवन् भजन।
चलकर कर,सफल वतन,
भगकर कर,जनक नमन।।
स्वयं पथ पर मत मचल।
चल चल ....3.
नल पर जल व्यर्थ न कर,
सफल बन,समय व्यर्थ न कर।
स्वयं जन पर जलन मत कर,
स्वयं जतन पर शंक मत कर।।
मत बदल,बन सफल बन सफल।
चल-चल, बढ़-बढ़,
चल उठ, पढ़ - पढ़।
बिना मात्रा के लिखने का प्रयास किया है मेरा प्रयास कैसा रहा आप हृदय की गहराई से बताएं।
"सुंदर।"
"असत्य दंभ"
अलग-अलग मद सब जन,
रखत पद तन मन व धन।
पर कर इज्जत हर जन जन,
जब सरल रहन उच्च वचन।
यह कहत सब संतजन,
घमंड न कर पद तन धन।
कब पल प्रलय करत ईश्वर,
जब मचत हलचल सब ओर।
अतः एक वचन रख स्मरण,
ईश्वर भजन कर क्षण क्षण।
रहस्य यह अजब गजब,
मत भर यह असत्य दंम।
जगत अंदर यह सब वहम,
सब पर कर हरदम रहम।
करत रहत हरदम सत्कर्म,
सत्य वचन कहत सब धर्म।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"मत उत्सव"
जब मत उत्सव अवसर आए,
मत यंत्र अंदर कर मत हरदम।
मन अंदर मत रख वहम,
मत हक हर जन एक सम।
सब जन-जन बन जनतंत्र,
स्मरण रख सब यह मंत्र।
हर मत कर जनतंत्र सशक्त,
यह फर्ज हम सब इस वक्त।
डर-डर कर न कर मत अब,
आ अब यह शपथ कर सब।
एक एक मत जनतंत्र सख्त,
जनतंत्र रख महत्व जनमत।
मन रख स्मरण जनतंत्र पर्व,
कर इस उत्सव पर सब गर्व।
हंसराज हंस कहत यह अर्ज,
इस समय यह रख सब फर्ज।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"गगनचर"
उड़त रहत हरदम हर पहर।
डगर डगर हर शहर शहर।
सब खग पर पंख अलग।
मत कर इन अलग-थलग।
गरम पड़त जबरदस्त अब,
रख हरदम जल बर्तन तब।
घर अंदर रख इन आलय,
तब उड़त यह न डर न भय।
हम सब कहत गगनचर ,
पतंग सम उड़त नभचर।
तब खग वंश बढ़त हर क्षण,
संग रहकर जन कर यह प्रण।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"चंचल मन"
चल मंद मंद जब पवन,
चंचल मन उड़ उड़ गगन।
नव नव कथन कहत मन।
जबरदस्त उठ तरंग तन।
अटल रह कर जतन।
ध्वज लहर लहर गगन
मन मत रख अब भय,
जन गण मन जय जय।
जब मन उड़ चल नभ,
कह मन कसर न अब।
कर यश अब हर शहर,
उड़ उड़ मन हर पहर।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
ॐ
हंसराज जी आज आपकी उपलब्धि को नमन नमन है।
पुरस्कार जो मिला आपको प्रसन्न जन उलझन सुलझन है।
सरल, सौम्य व कर्मठता का यह थोड़ा उपहार मिला है।
राजस्थान में पाया है ज्ञानीजन का हिय खिला है।
मानसरोवर से लगता है मोती चुनने हंस गया आ।
मोती रूपी मान और सम्मान मनोहर हँस गया पा।
शत्याधिक वर्षी हो जीवन काम अलौकिक कर दिखलाओ।
बिना मात्रा वाली कविता विधा अनूठी बढ़ा दिखाओ।
ज्ञान पिटारी मोती जैसी संजो हृदय में रखी हुई है।
मोल नहीं उसका है कोई स्वयं आपने ढकी हुई है।
अपने ज्ञान ध्यान से सबमें ज्ञान वृद्धि कर दिखलाओ।
जीवन भर ही जो भी देखे उसको मुस्काते ही पाओ।
हंसराज जी उपलब्धि पर देता मैं हूं 'कृष्ण' बधाई।
नाम आपका देवे सबको नील गगन तक रोज सुनाई।
सेवा और समर्पण पाया पूर्ण रूप से भरा हुआ है।
ऐसा लगता जनसेवा में खुद को अर्पित किया हुआ है।
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
(उलझन सुलझन के लिए)
श्री संदीप जी की प्रतिक्रिया
अमात्रिक काव्य रचना लेखन का छोटा सा प्रयास
नरम नजर नयन धर ऊपर
चलत सजन मन मगन कर ।
लटक मटक तन मन हरसत
गरज घन बरसत रह झरमर ।।
नटखट सजन रंग रगड़कर
अंग रगन रंग मण भर भर ।
जलधर जब तन पर टपकत
मन सरवर छलकत झरझर ।।
अगर मगर कहत सकत न
बस चलत न सजन ऊपर ।
तन मन बरबस सब अरपण,
सजन चरण कमल पर धर ।।
संदीप कुमार जैन 'नवोदित'
ककोड, टोंक (राजस्थान)
कु. मीना श्री हंसराज जी की शिष्या
आरव उपवन तक चल,
अब आलस मत कर।
इधर-उधर कर टहल,
सरपट सरपट मत चल।
घर पर चलकर पढ़,
अब आलस मत कर।
स्मरण कर सब अक्षर,
अगल-बगल नजर मत कर।
अजब गजब रख संगत,
सब संग संग रख पंगत।
चहल पहल रख अब,
कर मन स्मरण रब।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"आदर"
सरल सहज रख वचन,
छल कपट मत रख मन।
जब घर आए जन-जन,
हरदम तब कर नमन।
अलग-अलग रहत सब नर,
कर सब नर आदर भव तर।
न कर गड़बड़ उर पटक बल,
सब कहत यह उत्तम हल।
मत रख अब मन कपट,
मत बन अब नटखट।
हरदम करत रहत सत्कर्म,
यह वचन कहत सब धर्म।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"आचरण"
सहज व स्पष्ट रख आचरण,
मन न रख घमंड आवरण।
आए जन रख सदन शरण,
मन रख हरदम यह प्रण।
चलत अलग-अलग पवन
कथन पर रह अटल हरदम।
हरदम रख मन सब गम,
संत कहत यह परम धन।
करत रहत हरदम सब खटपट,
रख मन स्वच्छ व कथन स्पष्ट।
सब जगह रख सरल तंत्र,
सब आनंद मंगल यह मंत्र।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
"पर्व"
शहर शहर नगर नगर,
सब ह्रदय पटल पर।
पटक गहन असर पर्व ,
करत हर जन जन गर्व।
उमंग भर मन मस्त,
हम करत नव कर्म।
चहक महक तन मन,
हर अवसर जब पर्व।
जब जब आए यह पर्व ,
हम सब करत इन पर गर्व।
नवल स्वरूप करत नर,
करत चम चम हर घर।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
कविता की भूमिका
बिन मात्रा की कविताओं की श्रृंखला एक अभियान है बालकों के लिए विशेष रूप से। इसके अंतर्गत नई कविता के रूप में श्री हंसराज जी हंस ने 'वतन रक्षक' की रचना की है।
"वतन रक्षक"
तन मन बसत वतन,
सरहद पर कर जतन।
भटक कर वन वन,
हम सब करत वंदन।
हम रक्षत करत हरदम,
हम सब करत यह प्रण।
लहर लहर ध्वज गगन,
पलक एकटक रख नयन।
उमड़-उमड़ कहत जन-जन,
करत फतह हर समर पर।
हमवतन पर कर हरदम,
तन मन धन सब अर्पण।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान) दिनांक २७.०३.२०२४
कविता की भूमिका
बिन मात्रा की कविताओं का संकलन करने का निश्चय कर जब काव्य विधा के माहिरों से संपर्क किया गया तो उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' ने 'अजब गजब चलन' शीर्षक से निम्न कविता का सृजन किया।
अजब गजब चलन
अजब गजब यह जगत चलन।
पर धन लख हर रखत जलन।
रहत न जन-जन जगत मगन।
अजब बहत यह जगत पवन।
रंग ढंग न कर भदरंग।
हर हृदय भर बस नवरंग।
नवल-नवल अब न कर जंग।
करत जंग-जंग पल-पल तंग।
अब कर वश यह चंचल मन।
कहत संत हर संकट मन।
भजन करत हर पल भगवन।
अब कर सरल सरलतम मन।
अब रख स्वच्छ यह तन मन।
तरंग रख जग हर पल मन।
मत रख छल व कपट अब मन।
जन-गण मन लख अब भगवन।
रहत बहत मन-मन उलझन।
करत यतन न रह उलझन।
उलझन संकट जड़ इस मन।
मत कर मन उलझन सृजन।
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
25/03/24
कविता की भूमिका
बिन मात्रा की कविताओं का संकलन करने का निश्चय कर जब काव्य विधा के माहिरों से संपर्क किया गया तो श्री हंसराज हंस जी ने प्रथम कविता मन कहत नमन शीर्षक से तैयार की, जो यह थी।
मन कहत नमन
डरकर मत चल नमन,
नजर मतकर इधर उधर।
तन मन तर कर नमन,
चल अब घर चल नमन।
जगत जन मन नटखट,
करत पर कतरन क्षण-क्षण।
तन पर पड़त गज़ब असर,
चल अब घर चल नमन।
हर शहर शहर दर दर तम,
रक्षक करत हम हरदम।
मत रख मन अन्दर गम,
चल अब घर चल नमन।
अब घर पर रहकर नमन,
तन पर पहन नव-नव वसन।
हर पल कर इस पर मनन,
मन कहत यह हरदम।
हंसराज हंस
टोंक (राजस्थान)
संशोधित संस्करण
डर कर मत चल हर पल।
नजर रखकर पल-पल चल।
हर पल मत कर कल-कल।
मन मत कर अब बस छल ।
नटखट जगत जन मन।
मत कर हर क्षण कतरन।
अब कष्ट सहन कर तन।
वश रख हर पल मन।
लख दर-दर हर क्षण तम।
सहन करत हम हर दम।
मत रख मन अन्दर गम।
नयन मत कर अब नम।
अब घर पर रहकर रमण।
तन पर पहन नव वसन।
कण-कण लख भगवन।
कर बस हर क्षण नमन।
मूल रचना - हंसराज हंस
संपादन - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
(उलझन सुलझन के लिए)






बहुत अच्छा सृजन
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