सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

शिक्षा में नवाचारों के पक्षधर हैं हंसराज जी

परिचय

आज हमारे साथ हैं श्री हंसराज हंस जी, जो विगत तीस वर्षों से हिंदी अध्यापन में संलग्न हैं। ये शिक्षा में नवाचारों के कट्टर पक्षधर हैं। 'हैप्पी बर्थडे' व 'गांव का अखबार' इनके द्वारा सृजित शैक्षिक नवाचार हैं। इनको शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में रिसोर्स पर्सन के रूप में कार्य करने का लगभग दस वर्षों का अनुभव है। विविध प्रकृति के आलेख व कविताएं नियमित रूप से लिखते रहे हैं। मौलिक लेख भी देश प्रदेश की विविध प्रकृति की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। कई शैक्षणिक आलेख प्रदेश के राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका शिविरा में प्रकाशित हुए हैं। आप विगत पांच वर्षों से वार्षिक सर्वे-शोध कार्य से भी जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त इनकी दो पुस्तकें 'मन की हूंक' व 'गुरुज्ञान' प्रकाशित हो चुकी हैं और एक अन्य पुस्तक 'मन तरंग' प्रकाशनाधीन है। इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों/वेबिनरों तथा फेसबुक पटल पर लाइव प्रसारण द्वारा अपने मौलिक विचारों व काव्य पाठ का प्रकटीकरण करते रहते है। तो आइए आज मिलते हैं राजस्थान के टोंक जनपद के उनियारा ब्लॉक से शिक्षा के धनी हंसराज हंस जी से।

बातचीत

प्रश्न १. सर हिंदी भाषा को लेकर आपका क्या अनुभव है?

उत्तर - हिंदी मात्र भाषा ही नही है, बल्कि यह हमारी मातृभाषा है। बच्चों को इसको सीखने के लिए अपने परिवार, समाज व आसपास के परिवेश में ही खूब सारे अवसर मिल जाते है इसलिए इसको सीखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती है। जब दूर कहीं देश, विदेश में कोई हिंदी भाषी व्यक्ति मिल जाता है तो वह परिवार के सदस्य जैसा ही लगता है। उससे जी भरकर बातचीत करने का मन करता है। हमें हिंदी भाषा पर बहुत गर्व‌ है।

"हिंदी हैं हम, हिंदी है वतन हमारा।"

प्रश्न २. हिंदी भाषा में सुधारों के नाम पर किए जा रहे बदलावों से आप कितना सहमत हैं?

उत्तर - हिंदी भाषा में सर्वाग्राही  का गुण मौजूद है। इस गुण के कारण इस भाषा का दिनोंदिन शब्दकोष समृद्ध हुआ है। यह भाषा अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित कर लेती है। हिंदी भाषा व्याकरण सम्मत है। जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। विश्व में भी हिंदी बोलने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कई विश्वविद्यालयों में विदेशों से विद्यार्थी हिन्दी भाषा का अध्ययन करने हमारे देश में आने लगे है।अब विश्व में भी हिंदी भाषा का सम्मान होने लगा है।

प्रश्न ३. आप अपनी पुस्तकों के शीर्षक किस दृष्टिकोण से तय करते है?

उत्तर -अभी तक तो मेरी दो पुस्तकें ही प्रकाशित हुई हैं। पहली 'मन की हूंक' 7पद्य विद्या में कविताओं का संग्रह है।

दूसरी 'गुरु ज्ञान' है, जिसमें गद्य विधा में कई तरह के सामाजिक, शैक्षिक आलेख हैं। 

आपका प्रश्न है कि आप किस दृष्टिकोण से नाम तय करते है। इस संदर्भ में तो मेरा यही कहना है कि कोरोना के समय मेरे मन में लिखने की जो भूख जगी थी। उसी को दृष्टिगत रखते हुए उस समय की जितने भी रचनाएं थी। उन सबको को संकलित करके 'मन की हूंक' नाम दिया गया है।

दुसरी पुस्तक 'गुरु ज्ञान' शीर्षक के पीछे यह सोच थी कि "पुस्तक ही सबसे बड़ा गुरु होती है", हमें गुरु से ही सीख मिलती है। पुस्तक में शामिल सभी आलेखों से भी कोई ना कोई सीख तो मिल ही रही है। इसलिए 'गुरु ज्ञान' नाम मुझे रखना उचित लगा। पुस्तक के नाम के पीछे सभी लेखकों की यही सोच रहती है कि नाम आकर्षक हो, रोचक हो, सहज और सरल हो, बड़ा न हो, उसमें थोड़ा बहुत सस्पेंस भी हो, वो पुस्तक की विषय वस्तु से भी मेल खाता हो।

प्रश्न ४. हिंदी भाषा के अतिरिक्त आपका अन्य प्रिय विषय कौन सा है और क्यों?

उत्तर - हिंदी भाषा के अतिरिक्त मेरी थोड़ी बहुत रुचि गणित में भी है।छोटे बच्चों के साथ गणितीय पहेलियां व इबारती सवाल हल करना भी मुझे अच्छा लगता है।

प्रश्न ५. सर आपके क्षेत्र में विद्यार्थियों का हिंदी भाषा के प्रति रुझान कैसा है?

उत्तर - राजस्थान राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में मेरा क्षेत्र आता है। इस क्षेत्र में हिंदी भाषा के प्रति बच्चों का रुझान बहुत अच्छा है। अधिकांश विद्यालयों में हिंदी साहित्य वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। बच्चों द्वारा भी कला विषय में हिंदी साहित्य विषय का चयन अधिक संख्या में किया जाता है।

प्रश्न ६. आपकी पुस्तकों के विक्रय की स्थिति से क्या आप अवगत होते रहते हैं?

उत्तर - हां जी। इसके लिए प्रकाशक महोदय ने मुझे एक लिंक दे रखा है। उसके माध्यम से समय-समय पर अपनी पुस्तकों की बिक्री की जानकारी कर लेते हैं जी। दोनों पुस्तकें केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ही क्रय की जा सकती हैं। सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। इसलिए लिंक के माध्यम से ब्रिकी को देखना सरल हो जाता है।

अंत में

आपने मुझे अपनी बात कहने का अवसर दिया इसके लिए आपका बहुत बहुत साधुवाद।




टिप्पणियाँ

  1. अंतर्सम्बन्ध ब्लाॅगर के इस प्रयास की मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं। निश्चित ही एक दिन आप अपने लक्ष्य में जरुर सफलता प्राप्त करोगे। इसके लिए आपको ढ़ेर सारी शुभकामनाएं भी देता हूं।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...