भूमिका
'अल्हड़' की अनवरत काव्यधारा का सृजन प्रिय मित्रों के लिए है। ये स्वरचित रचनायें सिर्फ और सिर्फ जीवन का स्पर्श करने के लिए हैं।
मौन या नौ मौन, बहु पै ऊपरी हवा।
गाँव गली हकीम हैं, नौ काई पै दवा।।
स्वरचित रचना
"#दास्तान"
बहुत लोगों को कहते सुना है
हमें तो चुप रहना है
जुर्म सहना है नहीं कुछ कहना है
यही दुनिया का दस्तूर है
हमारा इसमें क्या कुसूर है
देखते-देखते सर से पानी गुजर गया है
समय की नई कहानी है,
किसी की बदजुबानी है
चालाक और धूर्त बहुत हैं,
कैसी यह जिंदगानी है
हमसे कुछ होने वाला नहीं है
कोई फरिश्ता आएगा हमें बचाएगा
भय के राक्षस से मुक्ति दिलाएगा
हमें क्या पता था, हम ही गुनहगार हैं
सजा मुकर्रर है, हम ही तलबगार हैं
आगे से हम अब चुप नहीं रहेंगे
अगली पंक्ति में चोर-चोर चिल्लाएंगे
'अल्हड़' समझ का फैसला हो गया है
हर तरफ जंग का आगाज हो गया है
यश भाटी (अल्हड़)
"#प्रेम #एक #अवस्था"
प्रेम यदि अपराध था तो राधा ने क्यूँ कर किया ?
प्रेम यदि बदनाम था तो रुकमणि ने क्यूँ किया ?
पिता के घर से भागकर कृष्ण ने क्यूँ वर लिया ?
प्रेम यदि खराब था मीरा ने क्यूँ जहर पिया ?
प्रेम इतना बेकार था हीर रांझा क्यूँ मर गया ?
प्रेम के बगैर ही, भाई भाई से लड़ गया
पड़ौसी प्रेम के बगैर, जीना हराम कर गया
औलाद के प्रेम बगैर ही, माँ बाप मर गया
समाज प्रेम मर्यादा बगैर, तार-तार कर गया
स्वार्थ की खातिर प्रेम, जन- जन से घट गया
जिन हृदय प्रेम नहीं, वह जीते जी मर गया
अल्हड़ सत्य कहने में, तेरा मेरा हो गया
प्रेम प्रार्थना, प्रेम साधना, मैं तो यारों तर गया
यश भाटी 'अल्हड़'
"#जिंदगी"
जिंदादिली है तो जिंदगी है!
सादगी है तो जिंदगी है!
बंदगी है तो जिंदगी है!
सच्चाई है तो जिंदगी है!
साफगोई है तो जिंदगी है!
सहजता है तो जिंदगी है!
सरलता है तो जिंदगी है!
विचार है तो जिंदगी है!
सदाचार है तो जिंदगी है!
परमार्थ है तो जिंदगी है!
परोपकार है तो जिंदगी है!
शिष्टाचार है तो जिंदगी है!
लक्ष्य है तो जिंदगी है!
जीवन प्रेम है तो जिंदगी है!
जीवन सार है तो जिंदगी है!
यह सब नहीं तो,
फिर नहीं जिंदगी है!
यश भाटी 'अल्हड़'
"#अच्छा #लगता #है "
भावों की महफ़िल, शब्द संवर जाना अच्छा लगता है
जज्बात समंदर ठहर जाना अच्छा लगता है
खामोश यूँ कैसे रहें, मगरूर शहर बहुत है
मुहब्बत राहों में, रह जाना अच्छा लगता है
दो जून की रोटी कभी मयस्सर न थी
पकवान गिनकर खाना अच्छा लगता है
अपनों से ठोकरों का हिसाब किताब बहुत है
रब की रहनुमाई में, रह जाना अच्छा लगता है
शिकवा शिकायत का अब दौर शेष नहीं है
जख्मों की तुरपाई का, हुनर अच्छा लगता है
'अल्हड़' यारा तेरी जिंदादिली को सलाम है
दरिया का यूँ ही बहते रहना, अच्छा लगता है
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रों के नाम संदेश स्वरचित रचना के रूप में।
"#जज्बात "
तुम अद्भुत व सुंदर हो, क्यूँ दूर होते हो
दुनियादारी बातों से, हमें क्यूँ खोते हो
जज्बात आंधी में, उड़ न जाएं कही
फासलों के अंधेरों में, हमें क्यूँ ढोते हो
तुम अद्भुत व सुंदर...
चट्टानों सी खिसक कर दूर न जाओ कहीं
झरनों सी बहकर निकल जाओ कहीं
मासूम सी बनकर, ठिठक जाओ वहीं
सुदूर घने जंगलों में, हमें क्यूँ रुलाते हो
तुम अद्भुत व सुंदर....
डर कर जीना हमें, हरगिज़ नहीं आता
झूठ फरेब में, हमें कहना नहीं आता
गैरों की महफ़िल में, रास नहीं आता
फिर से लौट भी आओ, क्यूँ दूर जाते हो
तुम अद्भुत व सुंदर....
सत्य हृदय दफन है, बमुश्किल जीना है
अविरल दरिया है, रह रहकर रहना है
अल्हड़ गागर में, सागर को रहना है
आधी अधूरी रात को, क्यूँ देकर जाते हो
तुम अद्भुत व सुंदर ...
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रों के नाम संदेश स्वरचित रचना के रूप में।
बोलै तो घूंघट खोलै, बदरी तौ आंगण डोलै
गागर में सागर डोलै, तेरे मन की सांकल खोलै
"#यथार्थ "
कर्म की पोटली सर पर, दिलों में नफरत पाले हैं।
भूला है सत्य जीवन का,घरों में सांप पाले हैं।।
अहं की दुकां सजायी है, कर्कश वाणी हवाले है।
पल भर की खबर नहीं, क्यूँ वर्षों के रिसाले हैं।।
खुद से पूछो एक बार ,घर महमां आने वाले हैं।
चिर निंद्रा में सोना है, फुर्सत के छण आने वाले हैं।।
प्रेम भक्ति यह सागर है, मुरली बजाने वाले हैं।
आज नहीं तो कल, समय बताने वाले हैं।।
अल्हड़ प्रेम दरिया में, डुबकी लगाने वाले हैं।
तेरी मेरी बातों के, अब दौर जाने वाले हैं।।
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रो के नाम संदेश स्वरचित रचना के रूप में।
मैं कहूँ नौ तेरी तू कहै नौ मेरी, आधी रोटी तेरी आधी रोटी मेरी।
अकल पच्चुओं की फौज लड़ रही, नौ तेरी नौ मेरी।।
"#अभी के #अभी "
सारे के सारे मिटेंगे, तिलांजली दे दो अभी के अभी
वर्तमान की खातिर, इतिहास भुला दो अभी के अभी
झूठे हैं वादे झूठी शान है, मिलकर मिटा दो अभी के अभी
जाति वि जाति भेद हटा दो, अभी के अभी
कुनबा गारत न हो जाए, बता दो अभी के अभी
गाँव गली शहर में, दीपक जला दो अभी के अभी
अल्हड़ प्रेम झरनों को बहा दो, अभी के अभी
दुनिया को आइना दिखा दो, अभी के अभी
यश भाटी 'अल्हड़'
"#दिमाग की #बत्ती "
शब्दों के तीर चले हैं, हवा चली चहुँ ओर है,
तेरा मेरा जोर जगत में, करते सीनाजोर हैं,
घणे ज्ञान की पोटली, धरता कोई और है,
अल्हड़ मूंढ वि मूंढ ही, बात कुछ और है,
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रो के नाम संदेश स्वरचित रचना के रूप में
उधेड़ बुन में रात गुजारी, पास नहीं कुछ पल्लै है।
खुद के गलै धरी कटारी, मौत हमारे पल्लै है।।
"#जलजला"
जलजला चलकर मेरे गाँव आया है।
जुमलों का बड़ा सरदार आया है।।
जलजला चलकर मेरे गाँव...
अक्ल बड़ी या भैंस, समझ नहीं आती।
आंखों पर पट्टी, लाल रुमाल लाया है।।
जलजला चलकर मेरे गाँव...
खेतों की आग, मेरे दिल में लगी है।
अंधों को हाथ यहाँ, बटेर लगी है।।
जलजला चलकर मेरे गाँव...
जीने मरने की बात, आज होने लगी है।
किस्मत खोलने का, औजार लाया है।।
जलजला चलकर मेरे गाँव...
डूब रही किश्ती, किनारे कहाँ हैं ?
भूखों को रोटी, नसीब कहाँ हैं ?
जलजला चलकर मेरे गाँव...
अल्हड़ रोने धोने का हिसाब कहाँ है ?
पुराने अखाड़े का, पहलवान आया है।।
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रों के नाम संदेश स्वरचित रचना के रूप में।
तोय मोय कुछ पतौ नौ है, बासण थारे घर में नाय हैं।
भूखे पेट भजन नौ होवै, कटोरा जितनौ पेट में नाय है।।
"#काठ की #हांडी "
सलीके से रोटी मयस्सर है न मकां,
फिर भी लोग राम गीत गा रहे हैं।
जिनके उसारों के फूस तक जला दिए,
वही गुलामी का परचम लहरा रहे हैं।
जमीं बिक रही आसमां बिक रहा है,
खाली हाथों में कटोरा थमा रहे हैं।
पग-पग पर बेड़ी पैरों में हैं डाली,
हमारे जनाजे में भंगड़ा करा रहे हैं।
काठ की हांडी काठ की ही रहेगी,
वजह बेवजह फिर से चढ़ा रहे हैं।
अल्हड़ कब तलक अंजान रहेगा,
झूठ मूठ बातों से, मरहम लगा रहे हैं।
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रों के नाम संदेश स्वरचित रचना के माध्यम से
दगड़े में पड़ी लकड़ी उठा रहा हूँ,
वजह बेवजह सर खुजला रहा हूँ।
"#सांच को #आंच "
बहुतों को गिरते देखा है, बहुतों के इमान बिके हैं।
गाँव गली दीवारों पर, उनके अपने नाम लिखे हैं।।
दया धर्म शेष नहीं हैं, अंधों के सरदार बिके हैं।
वोट चोट लगाएं कैसे, सभी पहरेदार बिके हैं।।
अल्हड़ हर कोई पाक साफ है, दामन फिर भी दाग लगे हैं।
उठो सवेरा होने को है, चहुँ ओर पैगाम लिखे हैं।।
यश भाटी 'अल्हड़'
प्रिय मित्रों के नाम संदेश
स्वरचित रचना
नौ लावै नौ लेजावै, छूटौ झगड़ौ क्यूँ बोवै ?
लाल तेरौ नौ आवैगौ, वृथा काहे क्यूँ रोवै ?
"#मन #आंगन "
झर झर झरनों सी झरती, मन आंगन के द्वार है।
तृण तृण धरा पर सजती, तन सोलह श्रंगार है।।
सांकल खोले तो मैं जाऊँ, गाती मेघ मल्हार है।
आर नहीं वह पार नहीं, घट माही संसार है।।
सखी री कुछ तो बोल....अब डर काहे का।।
प्रेम प्रार्थना, प्रेम साधना,
यश भाटी 'अल्हड़'
ताजा-ताजा घाव है, दवा तो पुरानी है।
चहुँ दिशाओं में, एक ही कहानी है।।
स्वरचित रचना
"#अफरातफरी "
चौपालें सज गयी हैं, शामत जो आने वाली है।
वादों के पिटारे में, आफत जो आने वाली है।।
जातियों के जमघट में, पंचायत होने वाली है।
घरों की चहारदीवारी में, कैद होने वाली है।।
चोंच भिड़ाये बैठे हैं, तू तू मैं मैं होने वाली है।
पुराने जख्मों की, अब तुरपाई होने वाली है।।
गाँव गरीब हिस्से में, बेवफाई आने वाली है।
झूठे की बहाड़ गयी है, पहचान होने वाली है।।
सांच को ही आंच है, दस्तूर बदल गया है।
बगैर ज्ञान समझ के, हाकिम नया नया है।।
अल्हड़ उदघोष का, पैंतरा बदल गया है।
पूरब से पश्चिम तक, फैसला बदल गया है।।
यश भाटी 'अल्हड़
प्रिय मित्रो के नाम संदेश।
"#दुनियादारी "
सभी को प्रेम चाहिए, फिर करते क्यूँ नहीं ?
भाई का भाई दुश्मन है, समझते क्यूँ नहीं ?
निस्वार्थ भाव प्रेम है, तरते क्यूँ नहीं ?
अहिंसा परम धर्म है, धरते क्यूँ नहीं ?
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ते क्यूँ नहीं ?
जाति वि जाति बातों से, हटते क्यूँ नहीं ?
प्रेम प्रार्थना, प्रेम साधना, ध्यान धरा क्यूँ नहीं ?
यश भाटी 'अल्हड़
"#अहसास "
प्रेम एक अहसास है, उजाले का प्रवास है।
दीया बाती तेल में, जलने का प्रयास है।।
अल्हड़ दरिया में, डूबने की आस है।
तेरी मेरी बात नहीं, प्रेम ही रास है।।
यश भाटी 'अल्हड़
"#बातों #बातों #में "
मेरे हिस्से की रोटी के, सौदे बहुत हो लिए,
किस्मत निगौड़ी जीत के, हिस्से बहुत हो लिए,
खुश्क ढांचे लहू के, फाके बहुत हो लिए,
वादों के दौर में, धोखे बहुत हो लिए,
मदारी के वेश में, फरिश्ते बहुत हो लिए,
धर्म की आड़ में, अधर्म बहुत हो लिए,
धधक रही आग है, शमशान बहुत हो लिए,
अंधों की फौज के, सरदार बहुत हो लिए,
जाग मुसाफिर जाग, बहुत दिनों तक सो लिए,
हिम्मत नहीं हारिये, बिसारिये न राम को,
'अल्हड़' तेरी बात के तो मज़ाक बहुत हो लिए,
यश भाटी 'अल्हड़'
"#धर्म #अधर्म "
सदियों से होलिका जल रही, मेरा तम जस का तस है।
प्रहलाद भक्त कहानी में, आज बंट रहा सोम रस है।।
हमने सुना था गिले-शिकवे, रंगों में घुला करते हैं।
पर आज बहुत से लोग, मौके ढूँढा करते हैं।।
समझदार हूँ यह सोचकर, घर में छुपकर बैठा हूँ।
मुंह में तो राम है, बगल में कटार लिए बैठा हूँ।।
रमजान भी है, होली भी है, अनजान रहता हूँ।
धर्म की आड़ में, अधर्म करके रहता हूँ।।
कभी मैंने बुजुर्गों से सीखा था, सौहार्द प्रेम से रहना।
सियासत के बाजार में, बहुत कुछ बचाकर रखना।।
रंगों की बरसात है, होनी भी चाहिए।
रंग बसंती चोले में, मुझे भगत सिंह चाहिए।।
'अल्हड़' वजूद प्रेम रस, पीने को विवश है।
मिहिर से तिमिर तक, चल चला चल हर्ष है।।
यश भाटी 'अल्हड़'
"#मनमीत "
इस ओर से, उस छोर से कहानी किस्से नये-नये।
हंसते-गाते बीत रहे हैं, ख्याल ख्वाब हैं नये-नये।।
पलक पांवड़े बिछा दिए हैं, स्वप्न सलोनी रातों में।
अधरों पर अठखेली करतीं, बिन बोली-सी बातों में।।
प्रण प्राण परवाह तुम्हारी, श्रंगार सजी है गीतों में।
बोल रही है डोल रही है, सुर झंकार हुई नव रीतों में।।
खामोशी की चादर ओढ़े, प्रण प्राण परवानों में।
आती जाती पवन वेग सी, ठहर गयी अरमानों में।।
'अल्हड़' मोती ढूँढ रहा है, यत्न हुए हैं नये-नये।
घूंघट के पट खोल प्रिये, जीवंत हुए हैं नये-नये।।
यश भाटी 'अल्हड़' #प्रकृतिमंद मंद पवन वेग, सुर-स्वर अहसास है।
प्रीत रीति गलियों में, करती प्रवास है।।
अविरल बह रही, दरिया अनायास है।
मधु मधुर रसपान, ये जीवन प्रयास है।।
ड्यौढ़ी पर बैठकर, खुद ही इतरा रही।
तृण तृण सज धज, धरा पर बिखरा रही।।
मन मुंडेर सांझ श्याम, खुशी के गीत गा रही।
आंधियों के बीच बैठ, दीपक जला रही।।
यश भाटी 'अल्हड़'
"#गुले #गुलिस्ताँ "
मुझे सुकूं से जीने देते, हाले हुज़ूर रहने देते।
मेरी किस्मत सौदों का, मुझको मोल लगाने देते।।
माना बड़ा शिकारी है, बहुत बड़ा अधिकारी है।
कर कलम उठाने देते, जिगर 'ए' लहु बहाने देते।।
मुझे सुकूं से जीने देते, हाले हुज़ूर रहने देते।
गुले गुलिस्ताँ बहुत उजाड़े,माली को हुनर दिखाने देते।
अंधियारों को चीर सकें,उजियारा जमीं पर होने देते।।
अल्हड़ तो मौहताज नहीं है,फाका मुझको सहने देते।
पथिक तो हुंकार भरेगा, नव इतिहास गढ़ने देते।।
मुझे सुकूं से जीने देते, हाले हुज़ूर रहने देते।
यश भाटी 'अल्हड़'
ठान लिया है, जान लिया है, पथिक राह निराली है।
गफलत में तुम सोए हो, दुनिया तो आनी जानी है।।
"#पथिक #परवाने "
पथ कंटक हो, चाहे जितने,
मिज़ाज फरिश्ते क्या जाने?
जिन राहों पर हम निकले हैं,
खामोश जमाना क्या जाने?
लोक परलोक, कथा नहीं हैं,
जीवन मरण हम क्या जाने?
पाषाण प्राण परवान नहीं हैं,
उलट पुलट हम क्या जाने?
एक राह है, एक ही मंजिल,
हम दुनियादारी क्या जाने?
'अल्हड़' तो मुठ्ठी तान खड़ा है,
खाली हाथ सिकंदर क्या जाने?
यश भाटी 'अल्हड़'
तेरे हिस्से मौज-मस्ती, मेरे हिस्से वादे आए।
बगैर फूस की झोंपड़ी में हमारी सरदार आए।।
गाँव की चौपाल पर जमघट यह कैसा है?
सच ये है झूठ-प्रपंच दौर के मेहमान आए हैं।।
'अल्हड़' बात बे-बात पर ये आखिर प्रश्न कैसा है।
मान तू या ना मान, शह और मात ये लेकर आए हैं।।
-यश भाटी 'अल्हड़'
"#क्रांति #दूत "
प्रण प्राण बलिदानी योद्धा, इंकलाब का नारा था।
रणभेरी बन छाया नभ में, नौजवान हलकारा था।।
राजगुरु, सुखदेव,भगत सिंह,माँ का राज दुलारा था।
अडिग पथिक योद्धा रण में,भारत आजाद हमारा था।।
हे क्रांति दूत फिर से, विचार मशाल लेकर आओ।
भाई, भाई का दुश्मन है, यहाँ आकर आज बताओ।।
राम रहीम की आड़ में,आजादी खो गयी है।
लोकतंत्र की गरिमा, मिलकर आज बचाओ।।
अल्हड़ फिर से हुंकार भरेगा,आकर हाथ बढ़ाओ।
स्वार्थ खातिर मीनारों को, गिरते हुए बचाओ।।
यश भाटी 'अल्हड़'
बहुत शानदार
जवाब देंहटाएं