हमारा सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा है कि इसमें प्रत्येक इंसान कम करके अधिक अर्जित करने की आकांक्षा रखता है। इसी का अनुसरण करते हुए दैनिक अमर उजाला के संपादकीय के अंतर्गत प्रकाशित ए.डी.आर. की एक रिपोर्ट यहां प्रस्तुत की जा रही है। समझने की जरूरत यह है कि आखिर संपादक रचित संपादकीय के स्थान पर सामाजिक अध्ययन में लगे और रचे बसे ए.डी.आर. की रिपोर्ट को ही संपादकीय के केंद्र में रखकर क्यों प्रकाशित किया गया?
आपराधिक छवि के सांसदों से संबंधित एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की ताजा रिपोर्ट राजनीति में अपराधीकरण के बढ़ते ही नहीं, इसे नियंत्रित करने की सामूहिक स्तर को इच्छाशक्ति के अभाव के बारे में भी बताती है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा 514 लोकसभा सदस्यों में से 225 यानी 44 फीसदी ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की जानकारी चुनावी हलफनामे में दी है। राजनीति में प्रत्याशियों पर मुकदमे दर्ज होना सामान्य बात है, पर इनमें से 29 फीसदी सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों-यानी हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक शत्रुता को बढ़ावा देना, महिलाओं के खिलाफ अपराध का होना चिंताजनक है। दागी सांसदों में से पचास फीसदी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश के हैं। रिपोर्ट इस तथ्य की ओर भी इशारा करती है कि शीर्ष अदालत और चुनाव आयोग की सक्रियता के बावजूद अगर राजनीति में अपराधीकरण को रोका नहीं जा सका है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह राजनीतिक दलों की 'सर्वस्वीकृत उदासीनता' ही है। इससे पहले, राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को टिकट न देने और नामांकन से पहले प्रत्याशियों की आपराधिक जानकारियां सार्वजनिक करने के अदालत के निर्देशों की अवहेलना हम देख ही चुके हैं। राजनीति और अपराध किस कदर जुड़े हैं, इसे चुनाव आयोग के शीर्ष अदालत में पेश हलफनामे से भी समझा जा सकता है, जिसमें - उसने कहा था कि हम राजनीति को साफ करना चाहते हैं, लेकिन यह हमारे वश में नहीं है। दरअसल, चाहे प. बंगाल के संदेशखाली में कथित आरोपी विधायक को बचाने में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल हो या फिर हाल ही में एक माफिया की मौत पर राजनीतिक दलों का आपस में उलझना, ये पारस्परिक हितों की उस व्यवस्था की ओर ही इशारा करते हैं, जिसमें अपराधी राजनीति का और राजनीति अपराधियों का इस्तेमाल करती है। यह भी दिखता है कि आरोपों-प्रत्यारोपों की राजनीति में राजनीतिक दलों को समस्या इससे नहीं है कि वे निरपराध हैं और उन्हें फंसाया जा रहा है, बल्कि यह है कि उनके अपराधों को नजरंदाज क्यों नहीं किया जा रहा। यहां तक कि कुछ जगहों पर तो राजनीतिक गतिविधियों के सूत्र प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सजायाफ्ता लोगों के हाथ में दिखते हैं। जब धनबल व बाहुबल पूरी व्यवस्था पर हावी हों और राजनीतिक दलों में व्यवस्था को यों ही जारी रखने पर मतैक्य भी हो, तो मतदाताओं की जागरूकता ही राजनीतिक दलों पर राजनीति की सफाई के लिए अपेक्षित दबाव बना सकती है।
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