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हमें क्या जानना चाहिए और क्यों?

प्रस्तुति

झंझावात  जिसे  अपने  पथ से डिगा न सके,                          कठिनाइयाँ जिसे आगे बढ़ने से रोक न सकीं। ।

         हृदय की पीर जिसके संकल्प को कमजोर न कर सकी,                   विपरीत परिस्थितियों में भी जिसकी आँखें धुंधली न हुईं।। 

सत्य तो यह है कि उस शख्सियत को मंज़िल तक पहुँचने से भला कौन रोक सकता था?

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद के सिरौली ग्राम में श्री लक्ष्मण सिंह बैसला और श्रीमती शांति देवी के यहां जन्मी जीवट की धनी श्रीमती कृष्णा देवी हैं वह शख्सियत जिन्होंने अनंत सीमितताओं के बावजूद अपने परिवार को सही दिशा देने, अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने, अपने नेक इरादों से लोगों की मदद करने में कोई कोर कसर ना छोड़ी और हमेशा ही अपने मज़बूत इरादों से लक्ष्य-सिद्धि की तथा समाज को यह स्वीकार करने के लिए बाध्य किया कि 'नारी ही नारायणी' है।

एक मेधावी छात्रा के रूप में अपना शिक्षणकाल सफलतापूर्वक तय करने के बाद जब उन्होंने वैवाहिक जीवन में पदार्पण किया तो अपनी गृहस्थी को भी सिद्धहस्त तरीके से चलाया, लेकिन वर्ष १९९० में अपने पति श्री बलजीत सिंह जी की तबियत ख़राब हो जाने और लंबी बीमारी के बाद वर्ष १९९८ में उनका निधन हो जाने के उपरांत कृष्णा जी को अपने तीन बच्चों का लालन-पालन और उनकी शिक्षा-दीक्षा जैसे दायित्वों के निर्णय भी स्वयं ही लेने पड़े। 

सुखद यह रहा कि उनके प्रत्येक निर्णय में उनके कौशल और परिपक्वता की झलक दिखी। बलजीत सिंह जी के निधन उपरांत उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र अमित, बिटिया दीपा और छोटे पुत्र प्रिंस को सक्षम और सफल बनाने में दिन-रात एक कर दिया। उनके अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप बड़े बेटे अमित कुमार एयरोनॉटिक्स इंजीनियर बने और प्रिंस  यू.पी.एस.सी. आहूत आई.ई.एस. परीक्षा (२००८) में चयनित हुए, जबकि पुत्री दीपा ने यू.पी.-पी.सी.एस. परीक्षा २०२१ में चयनित होकर अपनी मां के सपनों को साकार किया। 



नियति ने भी कृष्णा जी की परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वर्ष २०१५ में उनके बड़े पुत्र अमित की ब्रेन हेमरेज के कारण अकस्मात मृत्यु हो गई। इसके बावजूद कृष्णा जी ने साहस और धीरज बनाए रखा तथा बेहद सूझ-बूझ और आत्मिक शक्ति का परिचय देते हुए अपने पूरे परिवार को दिशा देती रहीं तथा अपने बच्चों को आगे बढ़ाते रहने में कोई कोर-कसर नही छोड़ा। कृष्णा जी का अक्स ही उनकी पुत्री और तीन बच्चों की मां दीपा में भी दिखता है जिसने यू.पी.-पी.सी.एस. २०२१ परीक्षा में सफलता अर्जित कर एक उल्लेखनीय मुकाम हासिल किया है। घरेलू ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए और स्वर रज्जु की गंभीर समस्या से उबरकर चालीस वर्षीया दीपा ने पी.सी.एस. परीक्षा और जीवन की परीक्षा में जीवट भरा प्रदर्शन किया है। उसकी शादी कम उम्र में हो जाने और जीवन मुख्य रूप से अपने परिवार की देखभाल पर केंद्रित होने के बावजूद कुछ खास करने का उसका सपना था जो उसने आखिरकार पूरा कर ही दिखाया। उनके छोटे भाई प्रिंस एक आई.ई.एस. अधिकारी रहे हैं और उन्हीं के मार्गदर्शन में दीपा ने यू.पी.-पी.सी.एस. की तैयारी शुरू की। दीपा को दूसरों की आलोचना और उपहास निरंतर अपने चयन तक सहना पड़ा, लेकिन वह निडर आगे बढ़ती रही और अंततः अपने लक्ष्य को पाने में सफल रही।

आइए आज हम उसी परिवार के जीवन की अनुभूतियों को महसूस करते हैं।

सीख

जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां सदैव सिखाती हैं और आगे बढ़ने में तथा कौशल को निखारने में मदद करती हैं।

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