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कृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य न होकर ‘युग पुरुष’ थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न ‘राजनीतिवेत्ता’ ही नही, एक महान् ‘कर्मयोगी’ और ‘दार्शनिक’ प्राप्त हुआ, जिसका ‘गीता’ ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक के रूप में है। श्रीकृष्ण की प्रशंसा लगभग सारे भारत में किसी न किसी रूप में की जाती है। वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, निश्चित रूप से ‘श्रीमदभगवद्गीता’ से प्रभावित हैं।  ‘गीता’ को श्रीकृष्ण से ही जोड़ा जाता है। ऐसे श्रीकृष्ण को ध्यान में रखकर उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने प्रस्तुत कविता की रचना करी है। आप भी उसका आनंद उठाइए -

कृष्ण महा अवतार जगत में महिमा महा निराली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।


बन्दीग्रह में जन्म मिला उस पर भी जी भर रो न सके। 

रात अन्धेरी में भी माँ से लिपट तनिक वो सो न सके। 

एक डलिया में खुद को लिटवा पिता शीश पर रखवाया। 

यमुना मैया को पैदल ही पार पिता से करवाया। 

गोकुल में नन्द बाबा के घर खुद की की रखवाली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।१।।


बिछड़ देवकी माता से फिर मात यशोदा अपनाई। 

ममता मात यशोधा ने भी अपनी उन पर बरसाई। 

मामा दुष्ट कंस ने उन पर वार अनेकों करवाये। 

लेकिन वो अवतार हरि थे कंस ना कुछ भी कर पाये। 

कभी भला नहिं उनका होता जिनकी करनी काली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।२।।

बाल सुलभ मोहकता उनकी पागल सा कर जाती थी। 

एक-एक गोपी संग में उनके रास रचा हर्षाती थी। 

मगर मोहनी राधा गोपी उनको रही समर्पित थी। 

पावन प्रेम अलौकिक अपना करती उनको अर्पित थी। 

निश्छल प्रेम किया जिसमें ना इच्छा कोई पाली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।३।।

गोप गोपियों के संग खेले सबके ही नायक बनकर। 

अनुज दाऊ व नन्द के लाला दिखलाये लायक बनकर। 

किशोर अवस्था में ही जाकर मामा दुष्ट कंस मारा।

मात-पिता को मुक्त कराया होता पाया जयकारा। 

चन्द दिनों में विद्या पाकर भरी ज्ञान की प्याली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।४।।

सखा बनाया अर्जुन को तो खुद को उसको दे डाला। 

वचन निभाने दुर्योधन को निज सेना दल दे डाला। 

बिना उठाये शस्त्र युद्ध तक पक्ष पांडव जितवाया। 

उनकी कूट नीति के सम्मुख नहिं कोई भी टिक पाया। 

द्रोपद चीर बढ़ाया उसकी विनती गई न टाली है।

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है॥५।।

ज्ञान हमारे अवतारों में कितना यह अनुमान नहीं। 

ज्ञान सभी उत्तम पर जग में गीता जैसा ज्ञान नहीं। 

भरा हुआ गीता में पाया जन मानस कल्याण महा। 

गीता में जो ज्ञान भरा है और बताओ भरा कहाँ। 

गीता तो है गंग ज्ञान की भरी ज्ञान हरियाली है। 

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है॥६।।

मित्र धर्म कैसे निभता है मात्र कृष्ण ने बतलाया। 

मित्र सुदामा का दुख हरकर निभा धर्म को दिखलाया। 

मधुर मधुर मुस्कान कृष्ण की हर पीड़ा हर लेती है। 

क्रोध कर्म जो नहीं करे मुस्कान उसे कर देती है। 

महा कला अवतारी माधव कला स्वयं मतवाली है। 

जिन भक्तों को झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।७।।

सूरदास ने सदा कृष्ण को अपना मीत बनाया है। 

मीरा ऐसी हुई बावरी पीकर गरल दिखाया है। 

कृष्ण स्वयं मुरलीधर गिरिधर वो ही रासबिहारी हैं। 

अर्जुन रथ पर बने सारथी चक्र सुदर्शनधारी हैं। 

नाम कृष्ण लेना मीठा ज्यों मिसरी मुँह में डाली है। ,

जिन भक्तों की झोली भर दी हुई कभी ना खाली है।।८



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