स्वरचित रचना के रूप में आज प्रातः का सृजन प्रिय मित्रों के नाम।
मैं एक कवि हृदय हूँ, जहन में कुछ सवाल उठे आप तक भेज रहा हूँ, मैं क्षमा प्रार्थी हूँ किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना मेरा कोई मकसद नहीं है।
- यश भाटी 'अल्हड़'
मेरे हृदय में छल-प्रपंच बिलकुल नहीं,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ.... हे राम।
तुमने छल से बाली मारा, सूपर्नखा की नाक कटाई,
राम मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ... हे राम।
आप कैसे पुरुषोत्तम औ कैसी यह मर्यादा,
राम मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ.... हे राम।
अबला व निर्दोष माँ सीता को त्यागा,
राम मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ.... हे राम।
सालता है प्रश्न कि संबूक ऋषि को क्यूँ मारा,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ... हे राम।
आप तो स्वयं सरयू में डूब गए,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ.... हे राम।
आज आपके नाम पर सर्वत्र लोग ठग रहे,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ मरुँ.... हे राम।
नहीं मरुँगा, नहीं डरूंगा, सच कहूँगा,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, क्यूँ मरुँ.... हे राम।
अल्हड़ पथिक मैं अडिग विश्वास हूँ,
राम बता मैं कहाँ जाऊँ, क्यूँ बताऊँ.... हे राम।
जाति, रंग, रूप व धर्म का चोला नहीं हूँ,
राम बता कहाँ जाऊँ, डट कर रहूँ.... हे राम।
- यश भाटी (अल्हड़)


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